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पंचायती राज

राज्य और स्थानीय शासन · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

पंचायतें अनुच्छेद 40 और बलवंत राय मेहता, अशोक मेहता, जी.वी.के. राव तथा एल.एम. सिंघवी समितियों से 73वें संशोधन तक कैसे पहुँचीं; भाग 9 अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद (ग्राम सभा, तीन स्तर, आरक्षण, निर्वाचन और राज्य निर्वाचन आयोग, शक्तियाँ, वित्त और राज्य वित्त आयोग); अनुच्छेद 243ड द्वारा बाहर रखे गए क्षेत्र; और पेसा, 1996।

भाग 1 राज्य पर रुका था। यह भाग एक स्तर नीचे गाँव तक जाता है, जहाँ पंचायती राज ग्रामीण भारत को उसकी अपनी निर्वाचित सरकार देता है। अनुच्छेद 40, जो राज्य की नीति के निदेशक तत्व में से एक है, राज्य से ग्राम पंचायतों का संगठन करने और उन्हें स्वशासन की इकाइयों के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ देने को कहता है, पर निदेशक तत्व होने के कारण इसे न्यायालय में लागू नहीं कराया जा सकता था। पंचायतें हों या न हों, उनके चुनाव कितनी बार हों और उनके पास कितना धन हो, यह प्रत्येक राज्य की सद्भावना पर निर्भर था, और अनेक पंचायतें वर्षों तक बिना चुनाव के रहीं। 1992 में 73वें संशोधन ने पंचायतों को संविधान में ही स्थान देकर यह बदल दिया। यह भाग वह इतिहास बताता है, फिर भाग 9 को अनुच्छेद-दर-अनुच्छेद देखता है और जनजातीय क्षेत्रों के लिए पेसा पर समाप्त होता है।

73वें संशोधन तक का मार्ग कई समितियों से होकर गया। 1952 का सामुदायिक विकास कार्यक्रम ऊपर से चलाया गया और उसमें कम ग्रामीण जुड़े। 1957 में प्रतिवेदन देने वाली बलवंत राय मेहता समिति ने इस कमज़ोरी को पहचाना और तीन जुड़े हुए स्तरों के माध्यम से 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण' की सिफ़ारिश की: ग्राम पंचायत, खंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद। राजस्थान ने सबसे पहले कदम उठाया और 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले में यह व्यवस्था आरंभ की, और आंध्र प्रदेश ने शीघ्र ही अनुसरण किया। उत्साह घटने पर अशोक मेहता समिति (प्रतिवेदन 1978) ने जिले तथा गाँवों के समूह के लिए मंडल पंचायत पर आधारित दो-स्तरीय मॉडल सुझाया। जी.वी.के. राव समिति (1985) ने जिले को नियोजन की मुख्य इकाई बनाया, और एल.एम. सिंघवी समिति (1986) ने पंचायतों के लिए संवैधानिक दर्जा माँगा। 1989 के 64वें संशोधन विधेयक ने उन्हें यह दर्जा देने का प्रयास किया पर राज्य सभा में विफल रहा। अंततः यह विचार 73वाँ संशोधन अधिनियम, 1992 बना, जो 24 अप्रैल 1993 को प्रवृत्त हुआ; यह तारीख अब राष्ट्रीय पंचायती राज दिवस के रूप में मनाई जाती है।

पंचायती राज पर समितियाँ
समिति (वर्ष)मुख्य सिफ़ारिश
बलवंत राय मेहता (1957)तीन स्तर (ग्राम, खंड, जिला); 'लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण'
अशोक मेहता (प्रतिवेदन 1978)दो स्तर: जिला और मंडल पंचायत
जी.वी.के. राव (1985)जिला नियोजन और विकास की मुख्य इकाई
एल.एम. सिंघवी (1986)पंचायतों को संवैधानिक दर्जा

73वें संशोधन ने भाग 9, अनुच्छेद 243 से 243ण, और एक नई ग्यारहवीं अनुसूची जोड़ी जिसमें 29 विषय हैं जो राज्य पंचायतों को सौंप सकते हैं। इसकी रचना राष्ट्रीय एकरूपता और राज्य के चुनाव के बीच एक समझौता है। कुछ उपबंध अनिवार्य हैं: प्रत्येक राज्य में ग्राम और जिला स्तर पर पंचायतें हों, सभी स्थानों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन हो, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए स्थान आरक्षित हों, पंचायतों का निश्चित पाँच वर्ष का कार्यकाल हो, राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग बनें, और ग्राम सभा को मान्यता मिले। अन्य उपबंध स्वैच्छिक हैं और राज्य विधान-मंडल पर छोड़े गए हैं: कितनी शक्ति और कौन-से कृत्य सौंपे जाएँ, पंचायतें कौन-से कर लगा सकें, पिछड़े वर्गों के लिए स्थान आरक्षित हों या नहीं, और सांसद तथा विधायक ऊपरी स्तरों में बैठें या नहीं। नीचे की सारणी में दिया गया यही विभाजन बताता है कि पंचायतें पूरे भारत में मोटे तौर पर एक जैसी दिखती हैं, फिर भी वास्तव में वे क्या नियंत्रित करती हैं इसमें बहुत अंतर है।

73वाँ संशोधन: अनिवार्य और स्वैच्छिक उपबंध
प्रत्येक राज्य के लिए अनिवार्यराज्य पर छोड़ा गया
प्रत्येक गाँव में ग्राम सभा (अनुच्छेद 243क)ग्राम सभा की शक्तियाँ
तीन स्तर; 20 लाख से कम जनसंख्या पर मध्यवर्ती स्तर वैकल्पिक (अनुच्छेद 243ख)ग्राम पंचायत का अध्यक्ष कैसे निर्वाचित हो
सभी स्थानों के लिए प्रत्यक्ष निर्वाचन (अनुच्छेद 243ग)ऊपरी स्तरों में सांसदों और विधायकों के लिए स्थान
अनुसूचित जातियों, जनजातियों और कम से कम एक-तिहाई महिलाओं के लिए आरक्षण (अनुच्छेद 243घ)पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण
पाँच वर्ष का कार्यकाल; विघटन के छह मास में चुनाव (अनुच्छेद 243ङ)ग्यारहवीं अनुसूची के कौन-से विषय सौंपे जाएँ (अनुच्छेद 243छ)
राज्य निर्वाचन आयोग और राज्य वित्त आयोग (अनुच्छेद 243ट, 243झ)पंचायतों के लिए कर और अनुदान (अनुच्छेद 243ज)

ढाँचे के आधार पर कोई निर्वाचित निकाय नहीं, बल्कि ग्राम सभा है। अनुच्छेद 243क इसे किसी पंचायत के क्षेत्र के भीतर गाँव की निर्वाचक नामावली में पंजीकृत सभी व्यक्तियों का निकाय बताता है, और इसे वे शक्तियाँ और कृत्य देता है जो राज्य विधान-मंडल विधि द्वारा उपबंधित करे। दूसरे शब्दों में, गाँव का हर वयस्क मतदाता इसका सदस्य है। यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि निर्वाचित प्रतिनिधि मतदाताओं से दूर जा सकते हैं; ग्राम सभा की बैठक वह स्थान है जहाँ ग्रामीण सरपंच से प्रश्न पूछ सकते हैं, लेखा देख सकते हैं और तय कर सकते हैं कि योजनाओं का लाभ किसे मिले। पर इसकी शक्ति पूरी तरह राज्य विधि पर निर्भर है, क्योंकि अनुच्छेद 243क स्वयं कोई विशिष्ट शक्ति नहीं बताता। इसे ग्राम पंचायत से न मिलाएँ, जो गाँव का निर्वाचित कार्यकारी निकाय है। इस भाग के अंत में आने वाली जनजातीय क्षेत्रों की विधि पेसा ग्राम सभा को कहीं अधिक मज़बूत शक्तियाँ देती है।

अनुच्छेद 243ख तीन स्तर बनाता है: ग्राम, मध्यवर्ती (प्रायः खंड) और जिला स्तर पर पंचायतें। जिस राज्य की जनसंख्या 20 लाख से अधिक न हो, उसमें मध्यवर्ती स्तर आवश्यक नहीं, इसीलिए कुछ छोटे राज्य दो स्तरों से काम चलाते हैं। अनुच्छेद 243ग के अधीन पंचायत के सभी स्थान प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा भरे जाते हैं, और पंचायत क्षेत्र की जनसंख्या तथा उसके स्थानों की संख्या का अनुपात, जहाँ तक साध्य हो, पूरे राज्य में एक समान होना चाहिए। अध्यक्ष अलग-अलग स्तरों पर अलग ढंग से चुने जाते हैं: ग्राम पंचायत का प्रमुख कैसे निर्वाचित हो यह राज्य विधि तय करती है (अनेक राज्य सरपंच को प्रत्यक्ष चुनते हैं), जबकि मध्यवर्ती और जिला पंचायतों के अध्यक्ष निर्वाचित सदस्यों द्वारा और उन्हीं में से चुने जाने चाहिए। राज्य सांसदों, विधायकों और निचली पंचायतों के अध्यक्षों को ऊपरी स्तरों में स्थान भी दे सकता है।

अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान पंचायत क्षेत्र की जनसंख्या में उनके अनुपात में आरक्षित होते हैं। कुल स्थानों के कम से कम एक-तिहाई, अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों को मिलाकर, महिलाओं के लिए आरक्षित होने चाहिए, और आरक्षित स्थान निर्वाचन-क्षेत्रों में चक्रानुक्रम से बदलते हैं। प्रत्येक स्तर पर अध्यक्षों के पद भी राज्य विधि के अधीन इसी प्रकार आरक्षित होते हैं। अनेक राज्यों ने तब से अपनी विधियों द्वारा महिलाओं का अंश बढ़ाकर आधा कर दिया है। पिछड़े वर्ग के लिए आरक्षण राज्य पर छोड़ा गया है (अनुच्छेद 243घ(6))। के. कृष्ण मूर्ति बनाम भारत संघ (2010) में उच्चतम न्यायालय ने इन उपबंधों को बनाए रखा, पर कहा कि राजनीतिक पिछड़ापन सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन से भिन्न है, उसके लिए कठोर जाँच चाहिए, और उससे आरक्षण सामान्यतः 50 प्रतिशत से आगे नहीं जाना चाहिए। विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य (2021) ने 'त्रिस्तरीय परीक्षण' तय किया: समर्पित आयोग, उसके निष्कर्षों पर आधारित अनुपात, और 50 प्रतिशत की सीमा।

1992 से पहले कोई राज्य पंचायत चुनाव यूँ ही टाल सकता था। अनुच्छेद 243ङ यह रास्ता बंद करता है: प्रत्येक पंचायत का कार्यकाल उसकी पहली बैठक से पाँच वर्ष है, और चुनाव कार्यकाल समाप्त होने से पहले, या पंचायत पहले विघटित होने पर विघटन के छह मास के भीतर, पूरे होने चाहिए; जल्दी विघटन के बाद बनी पंचायत केवल मूल कार्यकाल की शेष अवधि तक रहती है। अनुच्छेद 243च के अधीन वह व्यक्ति निरर्हित है जो किसी विधि के अधीन राज्य विधान-मंडल के लिए निरर्हित हो, सिवाय इसके कि 21 वर्ष पूरे कर चुके व्यक्ति के लिए 25 से कम आयु बाधा नहीं। चुनाव भारत निर्वाचन आयोग नहीं, बल्कि राज्य निर्वाचन आयोग कराता है (अनुच्छेद 243ट), जिसका प्रमुख राज्यपाल द्वारा नियुक्त राज्य निर्वाचन आयुक्त होता है। आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर लागू हैं, और उसकी सेवा शर्तें उसके लिए अहितकर रूप में नहीं बदली जा सकतीं। अनुच्छेद 243ण के अधीन परिसीमन और स्थानों के आवंटन संबंधी विधियों पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता, और पंचायत चुनाव को केवल निर्वाचन याचिका द्वारा चुनौती दी जा सकती है।

अनुच्छेद 243छ से 243ञ शक्तियों और वित्त से संबंधित हैं, अधिकतर आदेश देकर नहीं, बल्कि सक्षम बनाकर। अनुच्छेद 243छ के अधीन राज्य विधान-मंडल पंचायतों को स्वशासन की संस्थाओं के रूप में कार्य करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ दे सकता है, जिनमें ग्यारहवीं अनुसूची में दिए गए विषयों जैसे मामलों पर आर्थिक विकास और सामाजिक न्याय की योजनाएँ बनाना और लागू करना शामिल है। इसकी 29 प्रविष्टियों में कृषि, लघु सिंचाई, पेयजल, ग्रामीण सड़कें, गरीबी उन्मूलन, प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालय, स्वास्थ्य और स्वच्छता, महिला और बाल विकास तथा सार्वजनिक वितरण प्रणाली शामिल हैं। अनुच्छेद 243ज राज्य को पंचायतों को कर, शुल्क, पथकर और फ़ीस लगाने और वसूलने के लिए प्राधिकृत करने, उन्हें राज्य कर सौंपने और अनुदान देने देता है। प्रत्येक पाँच वर्ष में राज्यपाल को राज्य वित्त आयोग नियुक्त करना होता है (अनुच्छेद 243झ), जो पंचायतों के वित्त की समीक्षा करे और सिफ़ारिश करे कि राज्य के राजस्व उनके साथ कैसे बाँटे जाएँ; फिर संघ का वित्त आयोग इन सिफ़ारिशों के आधार पर पंचायतों की सहायता के लिए राज्य की संचित निधि बढ़ाने के उपाय सुझाता है (अनुच्छेद 280(3)(खख))। अनुच्छेद 243ञ पंचायत लेखाओं की संपरीक्षा राज्य विधि पर छोड़ता है।

भाग 9 हर जगह लागू नहीं होता। अनुच्छेद 243ड पाँचवीं और छठी अनुसूची के अनुसूचित क्षेत्र और जनजाति क्षेत्रों, नागालैंड, मेघालय और मिज़ोरम राज्यों, मणिपुर के उन पहाड़ी क्षेत्रों जहाँ जिला परिषदें हैं, और दार्जिलिंग जिले के उन पहाड़ी क्षेत्रों को जिनके लिए दार्जिलिंग गोरखा पहाड़ी परिषद है, बाहर रखता है। क्यों? इनमें से अनेक क्षेत्रों में पहले से अपनी संस्थाएँ थीं, जैसे पारंपरिक ग्राम परिषदें या छठी अनुसूची की स्वायत्त जिला परिषदें, और एक समान निर्वाचित पंचायत थोपने से वे प्रथाएँ दब सकती थीं जिनकी रक्षा का वचन संविधान अन्यत्र देता है। यह बहिष्कार स्थायी होने के लिए नहीं था। अनुच्छेद 243ड(4)(ख) संसद को विधि द्वारा, अपने द्वारा निर्दिष्ट अपवादों और उपांतरणों के साथ, भाग 9 को अनुसूचित और जनजाति क्षेत्रों पर विस्तारित करने देता है, और ऐसी विधि अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान का संशोधन नहीं मानी जाती। संसद ने 1996 में पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों के लिए ठीक इसी शक्ति का प्रयोग किया।

वह विस्तार पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 है, जिसे प्रायः पेसा कहा जाता है। यह दिलीप सिंह भूरिया की अध्यक्षता वाली समिति की सिफ़ारिशों के बाद आया और दस राज्यों के पाँचवीं अनुसूची के क्षेत्रों पर लागू है: आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा, राजस्थान और तेलंगाना। पेसा निर्वाचित पंचायत के बजाय ग्राम सभा को शक्ति का केंद्र बनाता है। इन क्षेत्रों के लिए राज्य विधियों को रूढ़िगत विधि, सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं और सामुदायिक संसाधनों के पारंपरिक प्रबंधन का सम्मान करना होगा। प्रत्येक ग्राम सभा अपने लोगों की परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा के लिए सक्षम है, और उसे योजनाओं का अनुमोदन तथा लाभार्थियों का चयन करना होता है। विकास परियोजनाओं के लिए भूमि अर्जन से पहले और लोगों के पुनर्वास से पहले उससे, या उपयुक्त स्तर की पंचायत से, परामर्श करना होगा; लघु खनिजों के पूर्वेक्षण अनुज्ञप्ति या खनन पट्टे देने से पहले उसकी सिफ़ारिश चाहिए; और उसे लघु वन उपज का स्वामित्व तथा मादक पदार्थों की बिक्री, भूमि अन्यसंक्रामण, ग्राम हाटों और साहूकारी पर शक्तियाँ दी गई हैं। प्रत्येक स्तर पर कम से कम आधे स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं, और हर अध्यक्ष का पद उन्हीं के लिए आरक्षित है।

73वें संशोधन ने पंचायती राज का ढाँचा सुनिश्चित किया, पर उसकी विषय-वस्तु राज्यों पर छोड़ दी। ढाँचा तय है: ग्राम सभा, तीन स्तर, स्वतंत्र राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा हर पाँच वर्ष में प्रत्यक्ष चुनाव, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए आरक्षित स्थान और अध्यक्ष पद, और राज्य वित्त आयोग। विषय-वस्तु (ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषयों में से पंचायतें वास्तव में कौन-से सँभालें, उन्हें कितना धन और कर्मचारी मिलें) राज्य विधि पर निर्भर है, इसीलिए पंचायतों की शक्ति एक राज्य से दूसरे राज्य में इतनी भिन्न है। पेसा और आगे जाता है, जनजातीय क्षेत्रों में वास्तविक प्राधिकार ग्राम सभा को सौंपता है। भाग 3 अध्याय को उसके नगरीय प्रतिरूप, नगरपालिकाओं पर 74वें संशोधन, से पूरा करता है, और फिर संघ राज्यक्षेत्रों तथा कुछ राज्यों के विशेष उपबंधों की ओर मुड़ता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. बलवंत राय मेहता प्रतिरूप पर पंचायती राज व्यवस्था सबसे पहले किस जिले में आरंभ हुई?

  1. नागौर, राजस्थान
  2. अनंतपुर, आंध्र प्रदेश
  3. पुणे, महाराष्ट्र
  4. खेड़ा, गुजरात
उत्तर देखें

उत्तर: A. नागौर, राजस्थान

राजस्थान ने 2 अक्टूबर 1959 को नागौर जिले में यह व्यवस्था आरंभ की। आंध्र प्रदेश ने राजस्थान के बाद अनुसरण किया, इसलिए वह पहला नहीं था; महाराष्ट्र और गुजरात ने यह व्यवस्था बाद में अपनाई और वे आरंभ-बिंदु नहीं थे।

Q2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. बलवंत राय मेहता समिति ने पंचायतों की तीन-स्तरीय व्यवस्था की सिफ़ारिश की।
2. अशोक मेहता समिति ने दो-स्तरीय व्यवस्था की सिफ़ारिश की।
3. पंचायतों पर 64वाँ संविधान संशोधन विधेयक 1989 में संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित हुआ।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है: 64वाँ संशोधन विधेयक राज्य सभा में विफल रहा, और संवैधानिक दर्जा केवल 1992 में 73वें संशोधन से मिला। 'केवल 1' सही कथन 2 को छोड़ देता है, और 3 वाले विकल्प गलत हैं।

Q3. अनुच्छेद 243च के अधीन किसी व्यक्ति के पंचायत का सदस्य चुने जाने के लिए न्यूनतम आयु क्या है?

  1. 18 वर्ष
  2. 21 वर्ष
  3. 25 वर्ष
  4. 30 वर्ष
उत्तर देखें

उत्तर: B. 21 वर्ष

अनुच्छेद 243च कहता है कि 21 वर्ष पूरे कर चुका व्यक्ति 25 से कम आयु के आधार पर निरर्हित नहीं होगा, इसलिए न्यूनतम आयु 21 है। 18 मतदान की आयु है, सदस्य बनने की नहीं; 25 विधान सभा के लिए न्यूनतम है; 30 विधान परिषद और राज्य सभा के लिए है।

Q4. राज्य निर्वाचन आयोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य निर्वाचन आयुक्त राज्यपाल द्वारा नियुक्त होता है।
2. राज्य निर्वाचन आयुक्त राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 अनुच्छेद 243ट(1) के अनुसार है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 243ट(2) कहता है कि आयुक्त को केवल उसी रीति और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पर लागू हैं, इसलिए राज्यपाल के प्रसादपर्यंत कार्यकाल नहीं है। अतः 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं, और 'कोई नहीं' सही कथन 1 को अनदेखा करता है।

Q5. अनुच्छेद 243ख के अधीन जिस राज्य की जनसंख्या कितनी से अधिक न हो, उसमें मध्यवर्ती स्तर पर पंचायतें गठित करना आवश्यक नहीं?

  1. 10 लाख
  2. 20 लाख
  3. 25 लाख
  4. 50 लाख
उत्तर देखें

उत्तर: B. 20 लाख

अनुच्छेद 243ख(2) सीमा बीस लाख रखता है। 10, 25 और 50 लाख के आँकड़े भाग 9 में नहीं हैं।

Q6. सूची I (अनुच्छेद) को सूची II (विषय) से सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. अनुच्छेद 243क
B. अनुच्छेद 243घ
C. अनुच्छेद 243झ
D. अनुच्छेद 243ट
सूची II
1. राज्य वित्त आयोग
2. ग्राम सभा
3. राज्य निर्वाचन आयोग
4. स्थानों का आरक्षण
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-2, B-4, C-1, D-3
  2. A-2, B-4, C-3, D-1
  3. A-4, B-2, C-1, D-3
  4. A-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-4, C-1, D-3

अनुच्छेद 243क ग्राम सभा है, 243घ आरक्षण, 243झ राज्य वित्त आयोग और 243ट राज्य निर्वाचन आयोग। दूसरा कूट दोनों आयोगों को अदल-बदल देता है; तीसरा ग्राम सभा और आरक्षण को; चौथा कोई भी सही नहीं मिलाता।

Q7. पंचायत उपबंध (अनुसूचित क्षेत्रों पर विस्तार) अधिनियम, 1996 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह छठी अनुसूची के जनजाति क्षेत्रों पर लागू होता है।
2. प्रत्येक स्तर की पंचायतों में कम से कम आधे स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित हैं।
3. यह ग्राम सभा को लघु वन उपज का स्वामित्व देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2 और 3

कथन 2 और 3 सही हैं। कथन 1 गलत है: पेसा भाग 9 को दस राज्यों के पाँचवीं अनुसूची (अनुसूचित) क्षेत्रों पर विस्तारित करता है; छठी अनुसूची के क्षेत्रों में इसके बजाय स्वायत्त जिला परिषदें हैं। 'केवल 3' सही कथन 2 को छोड़ देता है, और 1 वाले विकल्प गलत हैं।

Q8. अनुच्छेद 243ड के अधीन संविधान का भाग 9 निम्नलिखित में से किस राज्य पर लागू नहीं होता?

  1. त्रिपुरा
  2. नागालैंड
  3. सिक्किम
  4. असम
उत्तर देखें

उत्तर: B. नागालैंड

अनुच्छेद 243ड(2) नागालैंड, मेघालय और मिज़ोरम राज्यों को पूरी तरह बाहर रखता है। त्रिपुरा और असम राज्य के रूप में बाहर नहीं हैं; केवल उनके छठी अनुसूची के जनजाति क्षेत्र भाग 9 से बाहर हैं। सिक्किम का अनुच्छेद 243ड में उल्लेख नहीं, इसलिए वहाँ भाग 9 लागू है।

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