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समितियां और विशेषाधिकार

संसद · भाग 4 / 4 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

संसद समितियों के माध्यम से क्यों काम करती है, तीन वित्तीय समितियां, विभाग-संबंधित स्थायी समितियां और अन्य समितियां, और अनुच्छेद 105 के अधीन सदनों और उनके सदस्यों के विशेषाधिकार।

भाग 1 से 3 में दिखाया गया कि संसद कैसे बनती है, उसके सदन कैसे चलते हैं, और वह कैसे विधि बनाती है और धन स्वीकृत करती है। पर कई सौ सदस्यों का सदन, जो सीमित दिनों तक बैठता है, हर विधेयक, मंत्रालय और लेखे की विस्तार से जांच नहीं कर सकता। इसलिए अधिकांश विस्तृत कार्य संसदीय समितियां करती हैं: सदस्यों के छोटे समूह जो किसी विषय का गहराई से अध्ययन करते हैं, अधिकारियों और विशेषज्ञों का साक्ष्य लेते हैं, और सदन को प्रतिवेदन देते हैं। संविधान समितियों का उल्लेख करता है, उदाहरण के लिए अनुच्छेद 105 में, पर उन्हें स्थापित नहीं करता। वे प्रत्येक सदन के प्रक्रिया नियमों के अधीन या सदन के प्रस्ताव द्वारा बनाई जाती हैं; उनके सदस्य सदन द्वारा निर्वाचित या पीठासीन अधिकारी द्वारा नामनिर्दिष्ट होते हैं; और वे पीठासीन अधिकारी के निदेशन में काम करती हैं। यह भाग संसदीय विशेषाधिकारों को भी समझाता है, वे विशेष संरक्षण जिनसे सदन और उनके सदस्य स्वतंत्र होकर अपना काम कर पाते हैं।

समितियां मोटे तौर पर दो प्रकार की होती हैं। स्थायी समिति स्थायी प्रकृति की होती है: वह प्रतिवर्ष या समय-समय पर गठित होती है और निरंतर काम करती है। तदर्थ समितियां किसी विशेष कार्य के लिए बनाई जाती हैं और प्रतिवेदन देने के बाद समाप्त हो जाती हैं। तदर्थ समितियों के उदाहरण हैं: किसी विशेष विधेयक पर एक सदन की प्रवर समितियां और दोनों सदनों की संयुक्त समितियां, और जांच समितियां, जैसे बोफोर्स संविदा पर संयुक्त संसदीय समिति (1987)। स्थायी समितियों को उनके काम के आधार पर समझना आसान है। तीन समितियां धन पर नज़र रखती हैं: लोक लेखा, प्राक्कलन और सरकारी उपक्रम। विभाग-संबंधित स्थायी समितियां प्रत्येक कुछ मंत्रालयों के काम को परखती हैं। कुछ समितियां विशेष विषयों की जांच करती हैं, जैसे याचिका समिति और विशेषाधिकार समिति। कुछ सरकार पर निगरानी रखती हैं, जैसे सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति और अधीनस्थ विधान संबंधी समिति। बाकी सदन के अपने संचालन में मदद करती हैं, कार्य मंत्रणा समिति और नियम समिति से लेकर सदस्यों की सुविधाओं से जुड़ी समितियों तक। समिति का प्रतिवेदन सलाहकारी होता है: सरकार उसे मानने को बाध्य नहीं है, पर वह अपनी की गई कार्रवाई की जानकारी देती है।

लोक लेखा समिति सबसे पुरानी वित्तीय समिति है, जो पहली बार 1921 में भारत शासन अधिनियम, 1919 के अधीन गठित हुई। इसमें 22 सदस्य होते हैं, 15 लोक सभा से और 7 राज्य सभा से, जो प्रतिवर्ष प्रत्येक सदन के सदस्यों में से एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से निर्वाचित होते हैं। कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं हो सकता। इसका सभापति अध्यक्ष द्वारा इसके लोक सभा सदस्यों में से नियुक्त किया जाता है, और 1967 से परिपाटी के अनुसार सभापति विपक्ष का सदस्य होता है। लोक लेखा समिति संघ के विनियोग लेखाओं और वित्त लेखाओं तथा उन पर भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के संपरीक्षा प्रतिवेदनों की जांच करती है। वह देखती है कि धन उसी प्रकार व्यय हुआ जैसे संसद ने स्वीकृत किया था, उसी सेवा पर जिसके लिए स्वीकृत किया था, और नियमों के अनुसार; और वह अपव्यय, हानि और अधिक व्यय के मामलों की जांच करती है। चूंकि नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन इसकी मुख्य सामग्री हैं, उसे प्रायः इस समिति का मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक कहा जाता है।

प्राक्कलन समिति की उत्पत्ति 1921 की एक स्थायी वित्त समिति से मानी जाती है; स्वतंत्रता के बाद पहली प्राक्कलन समिति 1950 में वित्त मंत्री जॉन मथाई की सिफारिश पर गठित हुई। इसमें 30 सदस्य होते हैं, सभी लोक सभा से; राज्य सभा का इसमें कोई स्थान नहीं है। सदस्य प्रतिवर्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से निर्वाचित होते हैं, कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता, और सभापति अध्यक्ष द्वारा इसके सदस्यों में से, प्रायः सत्तारूढ़ दल से, नियुक्त किया जाता है। इसका कार्य मितव्ययिता, संगठन और दक्षता में सुधार, और दक्षता और मितव्ययिता लाने वाली वैकल्पिक नीतियां सुझाना है, और यह जांचना है कि प्राक्कलनों में निहित नीति की सीमाओं के भीतर धन ठीक से लगाया गया है या नहीं। क्योंकि यह हर वर्ष बचत के रास्ते खोजती रहती है, इसलिए इसे अक्सर 'सतत मितव्ययिता समिति' कहा जाता है। इसकी सीमाएं हैं: यह प्राक्कलनों की जांच उन पर मतदान हो जाने के बाद ही करती है, और संसद द्वारा निर्धारित नीति पर प्रश्न नहीं उठा सकती।

सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति 1964 में कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर बनाई गई। इसमें अब 22 सदस्य हैं, 15 लोक सभा से और 7 राज्य सभा से (1974 में इसकी सदस्य संख्या 15 से बढ़ाई गई), जो प्रतिवर्ष एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से निर्वाचित होते हैं; मंत्री सदस्य नहीं हो सकते। सभापति अध्यक्ष द्वारा इसके लोक सभा सदस्यों में से नियुक्त किया जाता है, इसलिए राज्य सभा का कोई सदस्य इसका सभापति नहीं हो सकता। यह सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के प्रतिवेदनों और लेखाओं तथा उन पर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों की जांच करती है, और देखती है कि क्या वे सुदृढ़ व्यावसायिक सिद्धांतों और विवेकपूर्ण वाणिज्यिक प्रथाओं के अनुसार चलाए जा रहे हैं। यह सरकारी नीति के बड़े प्रश्नों या उपक्रमों के दैनिक प्रशासन को नहीं लेती। नीचे की तालिका तीनों वित्तीय समितियों की तुलना करती है।

तीन वित्तीय समितियां
लोक लेखा समितिप्राक्कलन समितिसरकारी उपक्रमों संबंधी समिति
उत्पत्ति1921 (भारत शासन अधिनियम, 1919)1950 (जॉन मथाई की सिफारिश पर)1964 (कृष्ण मेनन समिति)
सदस्य22: 15 लोक सभा + 7 राज्य सभा30: सभी लोक सभा22: 15 लोक सभा + 7 राज्य सभा
सभापतिअध्यक्ष द्वारा नियुक्त; 1967 से परिपाटी के अनुसार विपक्ष सेअध्यक्ष द्वारा नियुक्त; प्रायः सत्तारूढ़ दल सेअध्यक्ष द्वारा इसके लोक सभा सदस्यों में से नियुक्त
मुख्य कार्यनियंत्रक-महालेखापरीक्षक के संपरीक्षा प्रतिवेदनों से व्यय की पश्चात् जांचप्राक्कलनों में मितव्ययिता और दक्षता सुझानासार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के कामकाज की जांच

विभाग-संबंधित स्थायी समितियां, जिनमें से प्रत्येक मंत्रालयों से जुड़ी एक स्थायी समिति है, 1993 में आरंभ हुईं, जब लोक सभा की नियम समिति की सिफारिश पर 17 समितियां बनाई गईं; 2004 में उनकी संख्या बढ़ाकर 24 कर दी गई। प्रत्येक में 31 सदस्य होते हैं, 21 लोक सभा से जिन्हें अध्यक्ष नामनिर्दिष्ट करता है और 10 राज्य सभा से जिन्हें सभापति नामनिर्दिष्ट करता है, और कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता। 24 में से 16 लोक सभा के अधीन और 8 राज्य सभा के अधीन काम करती हैं, और प्रत्येक एक या अधिक मंत्रालयों से संबंधित है। वे अपने मंत्रालयों की अनुदानों की मांगों की, लोक सभा में उन पर मतदान से पहले, जांच करती हैं; पीठासीन अधिकारी द्वारा सौंपे गए विधेयकों, मंत्रालयों के वार्षिक प्रतिवेदनों और दीर्घकालिक नीति दस्तावेजों की भी जांच करती हैं। वे दैनिक प्रशासन के मामलों को नहीं लेतीं और कटौती प्रस्ताव जैसी कोई बात नहीं सुझातीं। उनके प्रतिवेदन सलाहकारी होते हैं। उनका महत्व निरंतरता और गहराई में है: सदस्य एक क्षेत्र में विशेषज्ञता विकसित करते हैं, और किसी विधेयक का अध्ययन सदन के दबाव से दूर अधिकारियों और विशेषज्ञों के साथ हो सकता है।

अन्य स्थायी समितियां सरकार को उसके वचनों से बांधे रखती हैं और सदनों के अपने कामकाज की देखभाल करती हैं। याचिका समिति विधेयकों और सामान्य लोक हित के विषयों पर याचिकाओं की जांच करती है। सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति जांचती है कि मंत्रियों द्वारा सदन में दिए गए वचन और उपक्रम पूरे हुए या नहीं। अधीनस्थ विधान संबंधी समिति जांचती है कि संसद के अधिनियमों के अधीन कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियम, विनियम और उपविधियां संसद द्वारा प्रत्यायोजित शक्तियों की सीमा में हैं या नहीं। विशेषाधिकार समिति उसे सौंपे गए विशेषाधिकार भंग के मामलों की जांच करती है और कार्रवाई की सिफारिश करती है; इसके सदस्य पीठासीन अधिकारी द्वारा नामनिर्दिष्ट होते हैं। कार्य मंत्रणा समिति, जिसकी अध्यक्षता लोक सभा में अध्यक्ष करता है, सिफारिश करती है कि कार्य की प्रत्येक मद को कितना समय दिया जाए, और नियम समिति प्रक्रिया नियमों में परिवर्तनों पर विचार करती है। दोनों सदनों में आचार समितियां भी हैं जो सदस्यों के आचरण की जांच करती हैं।

संसदीय विशेषाधिकार वे विशेष अधिकार और उन्मुक्तियां हैं जो प्रत्येक सदन को सामूहिक रूप से और उसके सदस्यों को व्यक्तिगत रूप से प्राप्त हैं, क्योंकि इनके बिना वे अपना काम नहीं कर सकते। अनुच्छेद 105(1) संविधान और प्रक्रिया नियमों के अधीन रहते हुए संसद में वाक्-स्वातंत्र्य देता है। अनुच्छेद 105(2) कहता है कि संसद या उसकी किसी समिति में कही गई किसी बात या दिए गए किसी मत के संबंध में कोई सदस्य किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं होगा, और किसी सदन द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रकाशित किसी प्रतिवेदन, पत्र, मतों या कार्यवाहियों के लिए कोई व्यक्ति उत्तरदायी नहीं होगा। अनुच्छेद 105(3) के अधीन अन्य विशेषाधिकार वे हैं जो संसद विधि द्वारा परिभाषित करे, और तब तक वे जो 44वें संशोधन (1978) के प्रवृत्त होने से ठीक पहले सदनों को प्राप्त थे; उस संशोधन ने ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स का मूल संदर्भ हटा दिया, पर संसद ने अब तक विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध नहीं किया है। अनुच्छेद 105(4) यही विशेषाधिकार उन व्यक्तियों को भी देता है, जैसे मंत्री और महान्यायवादी, जिन्हें सदन में बोलने का अधिकार है। राष्ट्रपति, यद्यपि संसद का अंग है, इन्हें प्राप्त नहीं करता। अनुच्छेद 194 यही विशेषाधिकार राज्य विधान-मंडलों को देता है।

सदन को एक निकाय के रूप में क्या प्राप्त है? शुरुआत उसके अपने अभिलेख से करें: सदन तय करता है कि उसके वाद-विवाद और प्रतिवेदन प्रकाशित हों या नहीं, और वह दूसरों को उन्हें प्रकाशित करने से रोक सकता है। प्रेस के लिए 44वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 361क इसे नरम करता है: कार्यवाहियों की सारतः सही समाचारपत्र रिपोर्ट संरक्षित है, जब तक वह विद्वेषपूर्वक न की गई हो। सदन यह भी नियंत्रित करता है कि सभा-कक्ष में कौन बैठे, इसलिए वह अजनबियों को बाहर जाने को कह सकता है और गुप्त बैठक कर सकता है, और अपनी प्रक्रिया के नियम स्वयं बनाता है। जब किसी सदस्य की गिरफ्तारी, निरोध या रिहाई हो, तो सदन को तुरंत सूचना दी जानी चाहिए। अनुच्छेद 122 न्यायालयों को केवल प्रक्रिया की अनियमितता के आधार पर उसकी कार्यवाहियों को रद्द करने से रोकता है। व्यक्तिगत रूप से किसी सदस्य को सत्र के दौरान या उसके 40 दिन पहले या बाद तक सिविल मामले में गिरफ्तार नहीं किया जा सकता; यह कवच आपराधिक आरोपों या निवारक निरोध तक नहीं पहुंचता। अंत में, सदन सदस्यों और बाहरी व्यक्तियों दोनों को दंडित कर सकता है, और जिसके लिए वह दंड देता है उसके लिए दो शब्द प्रयुक्त होते हैं। मान लीजिए कोई समाचारपत्र वह वाद-विवाद छाप दे जिसे सदन ने गुप्त रखने का आदेश दिया था: एक विशिष्ट विशेषाधिकार टूटा है, यह विशेषाधिकार भंग है। इसके बजाय मान लीजिए कोई दर्शक दीर्घा से चिल्लाकर बैठक रुकवा दे: कोई सूचीबद्ध विशेषाधिकार नहीं टूटा, फिर भी सदन के काम में बाधा पड़ी है, यह सदन की अवमानना है। इसलिए हर विशेषाधिकार भंग अवमानना भी है, पर अवमानना व्यापक श्रेणी है।

न्यायालयों ने इन विशेषाधिकारों की सीमाएं तय की हैं। पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998) में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने बहुमत से निर्णय दिया कि जिन सदस्यों ने रिश्वत ली और फिर सदन में मत दिया, उन्हें अनुच्छेद 105(2) के अधीन अभियोजन से उन्मुक्ति है, जबकि रिश्वत देने वालों को नहीं। सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024) में सात न्यायाधीशों की पीठ ने सर्वसम्मति से वह मत उलट दिया: रिश्वतखोरी अनुच्छेद 105(2) या अनुच्छेद 194(2) द्वारा संरक्षित नहीं है, क्योंकि सदन में बोलने या मत देने के लिए रिश्वत लेना आवश्यक नहीं है, और अपराध रिश्वत स्वीकार करते ही पूर्ण हो जाता है, चाहे मत वादे के अनुसार दिया जाए या नहीं। राजा राम पाल बनाम अध्यक्ष, लोक सभा (2007) में न्यायालय ने प्रश्न के बदले नकद मामले में पकड़े गए सदस्यों के निष्कासन को विधिमान्य ठहराया, और यह भी कहा कि विशेषाधिकारों का प्रयोग सीमित आधारों पर न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है।

समितियां और विशेषाधिकार इस चित्र को पूरा करते हैं कि संसद सरकार को कैसे उत्तरदायी ठहराती है। सदन में प्रश्न, वाद-विवाद और प्रस्ताव मंत्रियों को सार्वजनिक रूप से उत्तर देने को बाध्य करते हैं (भाग 2)। बजट के माध्यम से लोक सभा तय करती है कि सरकार क्या व्यय कर सकती है (भाग 3)। समितियों में सदस्य मतदान से पहले विधेयकों और अनुदानों की मांगों का विस्तार से अध्ययन करते हैं, और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों की सहायता से बाद में जांचते हैं कि धन वास्तव में कैसे खर्च हुआ। विशेषाधिकार इस काम की रक्षा करते हैं: सदस्य न्यायालयों के भय के बिना बोल और मत दे सकते हैं, और प्रत्येक सदन अपने कामकाज की रक्षा कर सकता है। पर न्यायालयों ने स्पष्ट किया है कि विशेषाधिकार सदन के काम की रक्षा के लिए हैं, अलग-अलग सदस्यों को सामान्य आपराधिक विधि से बचाने के लिए नहीं।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. लोक लेखा समिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसमें लोक सभा और राज्य सभा दोनों के सदस्य होते हैं।
2. इसका सभापति लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा नियुक्त किया जाता है।
3. कोई मंत्री इसमें निर्वाचित हो सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 2

लोक लेखा समिति में 15 लोक सभा और 7 राज्य सभा सदस्य होते हैं, और अध्यक्ष इसके लोक सभा सदस्यों में से सभापति नियुक्त करता है, इसलिए कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है: कोई मंत्री सदस्य नहीं हो सकता। 'केवल 1' कथन 2 को छोड़ देता है, और 3 वाले विकल्प गलत हैं।

Q2. निम्नलिखित में से किस संसदीय समिति में केवल लोक सभा के सदस्य होते हैं?

  1. लोक लेखा समिति
  2. प्राक्कलन समिति
  3. सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति
  4. विभाग-संबंधित स्थायी समिति
उत्तर देखें

उत्तर: B. प्राक्कलन समिति

प्राक्कलन समिति के सभी 30 सदस्य लोक सभा से होते हैं। लोक लेखा समिति और सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति में 7-7 राज्य सभा सदस्य होते हैं, और प्रत्येक विभाग-संबंधित स्थायी समिति में 10 राज्य सभा सदस्य होते हैं।

Q3. सरकारी उपक्रमों संबंधी समिति के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह 1964 में कृष्ण मेनन समिति की सिफारिश पर बनाई गई।
2. राज्य सभा का कोई सदस्य इसका सभापति नियुक्त किया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: अध्यक्ष समिति के लोक सभा सदस्यों में से सभापति नियुक्त करता है, इसलिए राज्य सभा का सदस्य, समिति का सदस्य होते हुए भी, उसका सभापति नहीं हो सकता। कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं, और 'न तो' कथन 1 की अनदेखी करता है।

Q4. विभाग-संबंधित स्थायी समितियों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वे लोक सभा में मतदान से पहले अपने मंत्रालयों की अनुदानों की मांगों की जांच करती हैं।
2. वे मांगों पर कटौती प्रस्ताव सुझा सकती हैं।
3. प्रत्येक में दोनों सदनों से लिए गए 31 सदस्य होते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 3

कथन 1 और 3 सही हैं: ये समितियां मतदान से पहले मांगों की जांच करती हैं, और प्रत्येक में 21 लोक सभा और 10 राज्य सभा सदस्य होते हैं। कथन 2 गलत है क्योंकि उनके प्रतिवेदन कटौती प्रस्ताव जैसी कोई बात नहीं सुझा सकते। 'केवल 3' कथन 1 को छोड़ देता है, और 2 वाले विकल्प गलत हैं।

Q5. संविधान के अनुच्छेद 105 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद में वाक्-स्वातंत्र्य संविधान के उपबंधों और प्रक्रिया नियमों के अधीन है।
2. संसद ने एक विधि बनाई है जो सदनों के सभी विशेषाधिकारों को परिभाषित करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

अनुच्छेद 105(1) संसद में वाक्-स्वातंत्र्य को संविधान और नियमों के अधीन रखता है, इसलिए कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: संसद ने विशेषाधिकारों को संहिताबद्ध नहीं किया है, इसीलिए अनुच्छेद 105(3) अब भी 44वें संशोधन से पहले विद्यमान विशेषाधिकारों का उल्लेख करता है। कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं, और 'न तो' कथन 1 की अनदेखी करता है।

Q6. संसद सदस्य को गिरफ्तारी से उन्मुक्ति प्राप्त है

  1. संसद के सत्र के दौरान सभी मामलों में
  2. सत्र के दौरान और उसके 40 दिन पहले और बाद तक आपराधिक मामलों में
  3. सत्र के दौरान और उसके 40 दिन पहले और बाद तक सिविल मामलों में
  4. निवारक निरोध विधियों के अधीन हर समय
उत्तर देखें

उत्तर: C. सत्र के दौरान और उसके 40 दिन पहले और बाद तक सिविल मामलों में

गिरफ्तारी से उन्मुक्ति का व्यक्तिगत विशेषाधिकार केवल सिविल मामलों में, सत्र के दौरान और उसके 40 दिन पहले और बाद तक लागू है। यह आपराधिक मामलों या निवारक निरोध तक नहीं जाता, इसलिए 'सभी मामलों', आपराधिक मामलों या निवारक निरोध वाले विकल्प गलत हैं।

Q7. सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024) में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि

  1. सदन में मत देने के लिए रिश्वत लेने वाला विधायक उन्मुक्त है यदि मत वास्तव में दिया गया हो
  2. विधायक द्वारा रिश्वतखोरी अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के अधीन संसदीय विशेषाधिकार से संरक्षित नहीं है
  3. संसद को एक निश्चित समय के भीतर अपने विशेषाधिकार संहिताबद्ध करने होंगे
  4. कोई सदन अपने सदस्यों को निष्कासित नहीं कर सकता
उत्तर देखें

उत्तर: B. विधायक द्वारा रिश्वतखोरी अनुच्छेद 105(2) और 194(2) के अधीन संसदीय विशेषाधिकार से संरक्षित नहीं है

सात न्यायाधीशों की पीठ ने पी.वी. नरसिम्हा राव (1998) को उलटकर कहा कि रिश्वतखोरी अनुच्छेद 105(2) या 194(2) से संरक्षित नहीं है; रिश्वत स्वीकार करते ही अपराध पूर्ण हो जाता है। पहला विकल्प उलटा गया मत है, इस मामले में संहिताबद्ध करने का आदेश नहीं दिया गया, और निष्कासन की शक्ति राजा राम पाल (2007) में विधिमान्य ठहराई गई थी।

Q8. सूची I (समिति) को सूची II (कार्य) से सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति
B. अधीनस्थ विधान संबंधी समिति
C. कार्य मंत्रणा समिति
सूची II
1. जांचती है कि कार्यपालिका द्वारा बनाए गए नियम प्रत्यायोजित शक्तियों की सीमा में हैं या नहीं
2. कार्य की मदों के लिए दिए जाने वाले समय की सिफारिश करती है
3. जांचती है कि सदन में मंत्रियों द्वारा दिए गए वचन पूरे हुए या नहीं
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. A-3, B-1, C-2
  2. A-1, B-3, C-2
  3. A-3, B-2, C-1
  4. A-2, B-1, C-3
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-3, B-1, C-2

सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति मंत्रियों के वचनों पर नज़र रखती है (3), अधीनस्थ विधान संबंधी समिति प्रत्यायोजित शक्तियों के अधीन बने नियमों की जांच करती है (1), और कार्य मंत्रणा समिति समय के आवंटन की सिफारिश करती है (2)। अन्य कूट इनमें से कम से कम दो कार्यों को आपस में बदल देते हैं।

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स्रोत