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विधि-निर्माण और बजट
साधारण विधेयक विधि कैसे बनता है, राष्ट्रपति की अनुमति और वीटो के प्रकार, धन विधेयक और वित्त विधेयक, बजट कैसे पारित होता है, और संघ की तीन निधियां।
भाग 1 और 2 में बताया गया कि संसद में कौन बैठता है और सदन कैसे चलते हैं। यह भाग संसद की दो केंद्रीय शक्तियों से संबंधित है: विधि बनाना और लोक धन पर नियंत्रण। अनुच्छेद 265 कहता है कि विधि के प्राधिकार के बिना कोई कर न अधिरोपित किया जाएगा और न संगृहीत किया जाएगा, और अनुच्छेद 266(3) कहता है कि भारत की संचित निधि से कोई धन विधि के अनुसार ही निकल सकता है; इस प्रकार संसद कर लगाने और व्यय करने, दोनों की रक्षक है। संविधान चार प्रकार के विधेयकों से अलग-अलग ढंग से निपटता है: साधारण विधेयक (अनुच्छेद 107), धन विधेयक (अनुच्छेद 109 और 110), वित्त विधेयक (अनुच्छेद 117) और संविधान संशोधन विधेयक (अनुच्छेद 368)। मंत्री द्वारा प्रस्तुत विधेयक सरकारी विधेयक है; किसी अन्य सदस्य द्वारा प्रस्तुत विधेयक गैर-सरकारी सदस्य का विधेयक है।
साधारण विधेयक प्रत्येक सदन में तीन वाचनों से गुजरता है। प्रथम वाचन में सदस्य उसे पुरःस्थापित करने की अनुमति मांगता है, और फिर वह भारत के राजपत्र में प्रकाशित होता है, प्रायः बिना चर्चा के। द्वितीय वाचन सबसे महत्वपूर्ण है: सदन पहले विधेयक के सिद्धांतों पर चर्चा करता है और तय करता है कि उस पर तुरंत विचार करे, उसे उसी सदन की प्रवर समिति या दोनों सदनों की संयुक्त समिति को भेजे, या जनमत के लिए परिचालित करे; फिर वह विधेयक पर खंड-दर-खंड विचार करता है और संशोधनों पर मत लेता है। तृतीय वाचन में सदन केवल पूरे विधेयक को पारित या अस्वीकार करता है, और केवल औपचारिक या शाब्दिक संशोधन स्वीकार्य होते हैं। फिर दूसरा सदन उसे पारित कर सकता है, संशोधित कर सकता है, अस्वीकार कर सकता है, या उस पर कोई कार्यवाही न करे। अनुच्छेद 107(2) के अधीन विधेयक तभी पारित होता है जब दोनों सदन उस पर सहमत हों। यदि वे सहमत न हो सकें, तो राष्ट्रपति अनुच्छेद 108 के अधीन संयुक्त बैठक बुला सकता है। सत्रावसान से लंबित विधेयक समाप्त नहीं होता, पर लोक सभा का विघटन उसे समाप्त कर सकता है (अनुच्छेद 107(3) से (5))।
दोनों सदनों द्वारा पारित विधेयक अनुच्छेद 111 के अधीन राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति अनुमति दे सकता है, और विधेयक अधिनियम बन जाता है; अनुमति रोक सकता है, और विधेयक समाप्त हो जाता है; या धन विधेयक को छोड़कर, उसे एक संदेश के साथ लौटा सकता है कि सदन उस पर पुनर्विचार करें। यदि सदन उसे संशोधन सहित या रहित फिर पारित कर दें, तो अनुमति रोकी नहीं जा सकती। इन विकल्पों को सामान्यतः वीटो कहा जाता है, यद्यपि संविधान इस शब्द का प्रयोग नहीं करता। अनुमति रोकना आत्यंतिक वीटो है। विधेयक लौटाना निलंबनकारी वीटो है, जिसे साधारण बहुमत से निष्प्रभावी किया जा सकता है, जबकि संयुक्त राज्य अमेरिका की कांग्रेस में दो-तिहाई बहुमत चाहिए। चूंकि अनुच्छेद 111 कोई समय-सीमा नहीं रखता, राष्ट्रपति विधेयक को केवल लंबित भी रख सकता है, जिसे जेबी वीटो कहते हैं; राष्ट्रपति ज़ैल सिंह ने भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक, 1986 के साथ ऐसा किया। धन विधेयक लौटाया नहीं जा सकता। संविधान संशोधन विधेयक पर अनुमति देनी ही होगी, यह नियम 24वें संशोधन (1971) ने अनुच्छेद 368 में जोड़ा।
धन विधेयक की परिभाषा अनुच्छेद 110(1) में है: ऐसा विधेयक जिसमें केवल इन सभी या किन्हीं विषयों से संबंधित उपबंध हों: किसी कर का अधिरोपण, उत्सादन, परिहार, परिवर्तन या विनियमन; सरकार द्वारा उधार लेना या प्रत्याभूति देना; भारत की संचित निधि या आकस्मिकता निधि की अभिरक्षा तथा उनमें धन जमा करना या उनसे निकालना; संचित निधि से धन का विनियोग; किसी व्यय को उस निधि पर भारित घोषित करना या उसे बढ़ाना; संचित निधि या लोक लेखे में धन प्राप्त करना, या संघ या राज्य के लेखाओं की संपरीक्षा; और आनुषंगिक विषय। 'केवल' शब्द ही कुंजी है। अनुच्छेद 110(2) के अधीन कोई विधेयक केवल इस कारण धन विधेयक नहीं है कि वह जुर्मानों या शास्तियों, अनुज्ञप्तियों या सेवाओं की फीस, या स्थानीय करों का उपबंध करता है। यदि यह प्रश्न उठे कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, तो अध्यक्ष का विनिश्चय अंतिम होता है (अनुच्छेद 110(3)), और जब वह राज्य सभा और राष्ट्रपति के पास जाता है तो अध्यक्ष उस पर प्रमाणपत्र पृष्ठांकित करता है (अनुच्छेद 110(4))।
चूंकि धन विधेयक कर और व्यय तय करता है, अंतिम शब्द निर्वाचित सदन का होता है। वह केवल लोक सभा में और केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर पुरःस्थापित किया जा सकता है (अनुच्छेद 109(1) और 117(1))। राज्य सभा को उसे 14 दिन के भीतर अपनी सिफारिशों, यदि कोई हों, के साथ लौटाना होता है, जिन्हें लोक सभा स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है; समय पर न लौटाए जाने पर वह उसी रूप में दोनों सदनों द्वारा पारित समझा जाता है जिसमें लोक सभा ने उसे पारित किया (अनुच्छेद 109(5))। इसलिए राज्य सभा धन विधेयक को अधिक से अधिक 14 दिन रोक सकती है, उसे संशोधित या अस्वीकार नहीं कर सकती, और संयुक्त बैठक की कभी आवश्यकता नहीं पड़ती। इस मार्ग को न्यायालय में चुनौती दी गई है। के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018) में उच्चतम न्यायालय के बहुमत ने धन विधेयक के रूप में पारित आधार अधिनियम, 2016 को विधिमान्य ठहराया, जबकि एक न्यायाधीश इस बिंदु पर असहमत रहे; रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक (2019) में पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस तर्क पर संदेह व्यक्त किया और अनुच्छेद 110 के विस्तार का प्रश्न बड़ी पीठ को सौंप दिया।
अनुच्छेद 117 उन विधेयकों से संबंधित है जिनमें धन का प्रश्न है पर जो धन विधेयक नहीं हैं; ऐसा विधेयक वित्त विधेयक कहलाता है। अनुच्छेद 117(1) के अधीन, जिस विधेयक में धन विधेयक वाले कुछ विषयों के साथ अन्य उपबंध भी हों, और इसलिए जो 'केवल' धन के बारे में नहीं है, वह केवल लोक सभा में और केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर पुरःस्थापित हो सकता है, पर अन्यथा उससे साधारण विधेयक की तरह व्यवहार होता है: राज्य सभा उसे संशोधित या अस्वीकार कर सकती है, और गतिरोध संयुक्त बैठक तक जा सकता है। अनुच्छेद 117(3) के अधीन, धन विधेयक के किसी विषय से रहित, पर संचित निधि से व्यय अंतर्वलित करने वाला विधेयक बिना सिफारिश के किसी भी सदन में पुरःस्थापित हो सकता है, पर कोई भी सदन उसे तब तक पारित नहीं कर सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन से उस पर विचार करने की सिफारिश न की हो। धन से संबंधित प्रत्येक विधेयक धन विधेयक नहीं है, और केवल धन विधेयक पर अध्यक्ष का प्रमाणपत्र होता है।
| साधारण विधेयक | धन विधेयक (अनु. 110) | वित्त विधेयक (अनु. 117(1)) | वित्त विधेयक (अनु. 117(3)) | |
|---|---|---|---|---|
| कहां पुरःस्थापित | किसी भी सदन में | केवल लोक सभा में | केवल लोक सभा में | किसी भी सदन में |
| राष्ट्रपति की सिफारिश | आवश्यक नहीं | पुरःस्थापन के लिए आवश्यक | पुरःस्थापन के लिए आवश्यक | सदन द्वारा विचार से पहले आवश्यक |
| राज्य सभा की शक्ति | संशोधन या अस्वीकार कर सकती है | केवल सिफारिशें, 14 दिन के भीतर | संशोधन या अस्वीकार कर सकती है | संशोधन या अस्वीकार कर सकती है |
| संयुक्त बैठक | संभव | संभव नहीं | संभव | संभव |
| राष्ट्रपति लौटा सकता है | हां, एक बार | नहीं | हां, एक बार | हां, एक बार |
संविधान कहीं 'बजट' शब्द का प्रयोग नहीं करता। अनुच्छेद 112 के अनुसार प्रत्येक वित्तीय वर्ष संघ की प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय का वार्षिक वित्तीय विवरण दोनों सदनों के समक्ष रखा जाता है, जिसमें संचित निधि पर भारित व्यय और अन्य व्यय अलग-अलग, तथा राजस्व व्यय अन्य व्यय से अलग दिखाया जाता है। भारित व्यय (अनुच्छेद 112(3)) में शामिल हैं: राष्ट्रपति की उपलब्धियां; राज्य सभा के सभापति और उपसभापति तथा लोक सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन; ऋण भार; उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते और पेंशन तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन; नियंत्रक-महालेखापरीक्षक का वेतन; और न्यायालय के निर्णयों के अधीन देय राशियां। अनुच्छेद 113 के अधीन इस पर चर्चा हो सकती है पर मतदान नहीं होता, जिससे ये पद राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रहते हैं। अन्य व्यय अनुदानों की मांगों के रूप में लोक सभा के समक्ष आता है, जो केवल राष्ट्रपति की सिफारिश पर की जाती हैं; लोक सभा किसी मांग पर अनुमति दे सकती है, उसे अस्वीकार कर सकती है या घटा सकती है, पर बढ़ा नहीं सकती, और राज्य सभा मांगों पर मतदान नहीं करती।
2017 से संघ का बजट 1 फरवरी को प्रस्तुत किया जाता है, और उसी वर्ष रेल बजट इसमें मिला दिया गया। दोनों सदनों में सामान्य चर्चा के बाद सदन कुछ सप्ताह के लिए स्थगित होता है, जब विभाग-संबंधित स्थायी समितियां प्रत्येक मंत्रालय की अनुदानों की मांगों की जांच करती हैं। फिर लोक सभा मांगों पर मतदान करती है, और सदस्य कटौती प्रस्ताव रख सकते हैं: नीति कटौती (नीति से असहमति जताते हुए मांग को एक रुपया करना), मितव्ययिता कटौती (उसे एक निर्दिष्ट राशि से घटाना) या सांकेतिक कटौती (कोई शिकायत उठाने के लिए उसे सौ रुपये घटाना)। नियत अंतिम दिन अध्यक्ष शेष सभी मांगों को, चर्चा हुई हो या नहीं, एक साथ मतदान के लिए रखता है; इसे गिलोटिन कहते हैं। इसके बाद विनियोग विधेयक (अनुच्छेद 114) संचित निधि से स्वीकृत अनुदानों और भारित व्यय को निकालने का प्राधिकार देता है; कोई संशोधन किसी अनुदान की राशि या प्रयोजन नहीं बदल सकता। अंत में वित्त विधेयक कर प्रस्तावों को प्रभावी करता है। अनंतिम कर संग्रहण अधिनियम, 1931 के अधीन नई कर दरें तुरंत वसूल की जा सकती हैं, पर यह व्यवस्था समाप्त हो जाती है यदि वित्त विधेयक अपने पुरःस्थापन के 75 दिन के भीतर अधिनियमित न हो।
अनुच्छेद 115 और 116 उन बातों का उपबंध करते हैं जिन्हें बजट पहले से नहीं देख सकता। अनुच्छेद 115 के अधीन, अनुपूरक अनुदान चालू वर्ष में किसी सेवा के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुई राशि की पूर्ति करता है; अतिरिक्त अनुदान किसी ऐसी नई सेवा के लिए है जिसकी बजट में परिकल्पना नहीं थी; और अधिक अनुदान उस वर्ष के अनुदान से अधिक पहले ही व्यय हो चुके धन के लिए है, जो व्यवहार में लोक लेखा समिति की जांच के बाद ही लोक सभा में आता है। अनुच्छेद 116 के अधीन, लेखानुदान वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए अग्रिम अनुदान है जब पूरे बजट पर मतदान चल रहा हो, जो चुनाव वर्ष में आम है; प्रत्ययानुदान ऐसी अप्रत्याशित मांग को पूरा करता है जिसके परिमाण या अनिश्चित स्वरूप के कारण सामान्य ब्यौरा नहीं दिया जा सकता, कुछ-कुछ कोरे चेक की तरह; और अपवादानुदान ऐसे प्रयोजन के लिए है जो किसी वित्तीय वर्ष की चालू सेवा का भाग नहीं है। इनमें से प्रत्येक के लिए भी संचित निधि से धन निकालने को प्राधिकृत करने वाली विधि आवश्यक है।
संघ का धन तीन लेखाओं में रहता है। भारत की संचित निधि (अनुच्छेद 266(1)) में संघ के सभी राजस्व, उसके द्वारा लिए गए उधार और उधारों के प्रतिसंदाय जमा होते हैं; संसद की विधि के बिना इससे कुछ नहीं निकल सकता। भारत का लोक लेखा (अनुच्छेद 266(2)) में अन्य सभी लोक धन जमा होता है, जैसे भविष्य निधि जमा, अल्प बचत और न्यायिक जमा; चूंकि सरकार यह धन मुख्यतः दूसरों के लिए रखती है, इससे भुगतान संसद के विनियोग के बिना कार्यपालिका की कार्रवाई से होते हैं। भारत की आकस्मिकता निधि (अनुच्छेद 267), जो भारत की आकस्मिकता निधि अधिनियम, 1950 द्वारा स्थापित है, अग्रदाय के स्वरूप की निधि है जो राष्ट्रपति के व्ययनाधीन है, ताकि संसद के प्राधिकार की प्रतीक्षा में अप्रत्याशित व्यय तुरंत किया जा सके; व्यय की गई राशि बाद में संचित निधि से पूरी की जाती है। प्रत्येक राज्य की इन्हीं अनुच्छेदों के अधीन अपनी संचित निधि, लोक लेखा और आकस्मिकता निधि होती है।
ये सभी बातें एक सिद्धांत में बैठती हैं: निर्वाचित सदन ही धन पर नियंत्रण रखता है। अनुदानों की मांगों पर केवल लोक सभा मतदान करती है, धन विधेयक वहीं से आरंभ होता है और राज्य सभा उसे रोक नहीं सकती, और जो सरकार लोक सभा में अपना बजट पारित नहीं करा सकती वह शासन नहीं चला सकती, जो वित्तीय नियंत्रण को अनुच्छेद 75(3) के सामूहिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। राज्य सभा फिर भी बजट और प्रत्येक विधेयक पर चर्चा करती है, और साधारण विधेयकों तथा संविधान संशोधन विधेयकों पर बराबर की भागीदार है। राष्ट्रपति की अनुमति हर विधि को पूर्ण करती है, पर सीमाओं के भीतर: साधारण विधेयक केवल एक बार लौटाया जा सकता है, धन विधेयक बिल्कुल नहीं, और संविधान संशोधन विधेयक पर अनुमति देनी ही होती है। भाग 4 बताता है कि समितियां, विशेषकर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदनों का प्रयोग करने वाली लोक लेखा समिति, कैसे जांचती हैं कि धन कैसे खर्च हुआ।
परीक्षा में ध्यान दें
- संविधान में 'बजट' शब्द नहीं है; अनुच्छेद 112 इसे वार्षिक वित्तीय विवरण कहता है।
- धन विधेयक में केवल अनुच्छेद 110(1) में सूचीबद्ध विषय होने चाहिए। जिस विधेयक में अन्य उपबंध भी हों, वह अनुच्छेद 117(1) के अधीन वित्त विधेयक है, जिसे राज्य सभा संशोधित या अस्वीकार कर सकती है।
- राज्य सभा धन विधेयक को अधिक से अधिक 14 दिन रोक सकती है और केवल सिफारिशें कर सकती है; लोक सभा उन्हें अनदेखा करने को स्वतंत्र है।
- उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन राज्य की संचित निधि पर भारित हैं; केवल उनकी पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित है।
- लोक सभा अनुदान की मांग पर अनुमति दे सकती है, उसे घटा सकती है या अस्वीकार कर सकती है, पर बढ़ा नहीं सकती; राज्य सभा मांगों पर मतदान नहीं करती।
- नीति कटौती: मांग को एक रुपया करना। सांकेतिक कटौती: उसे सौ रुपये घटाना। मितव्ययिता कटौती: उसे एक निर्दिष्ट राशि से घटाना।
- राष्ट्रपति धन विधेयक नहीं लौटा सकता और संविधान संशोधन विधेयक पर अनुमति देने को बाध्य है (24वां संशोधन, 1971)। जेबी वीटो केवल इसलिए है कि अनुच्छेद 111 कोई समय-सीमा नहीं रखता।
- लोक लेखे से भुगतान के लिए संसद के विनियोग की आवश्यकता नहीं; आकस्मिकता निधि राष्ट्रपति के व्ययनाधीन है और बाद में संचित निधि से उसकी पूर्ति की जाती है।
पुनरावृत्ति
- अनुच्छेद 265 और 266(3): विधि के बिना कोई कर नहीं, विधि के बिना संचित निधि से कोई निकासी नहीं।
- साधारण विधेयक: प्रत्येक सदन में तीन वाचन; द्वितीय वाचन में खंड-दर-खंड विचार; गतिरोध संयुक्त बैठक में (अनुच्छेद 108)।
- अनुच्छेद 111: अनुमति, अनुमति रोकना (आत्यंतिक वीटो) या एक बार लौटाना (निलंबनकारी वीटो); समय-सीमा नहीं, इसलिए जेबी वीटो (1986)।
- धन विधेयक (अनुच्छेद 109–110): केवल सूचीबद्ध विषय; केवल लोक सभा में, राष्ट्रपति की सिफारिश पर; अध्यक्ष का प्रमाणपत्र अंतिम; राज्य सभा 14 दिन, केवल सिफारिशें।
- वित्त विधेयक (अनुच्छेद 117): 117(1) सिफारिश पर लोक सभा में आरंभ होता है पर अन्यथा साधारण है; 117(3) किसी भी सदन में आरंभ हो सकता है पर विचार के लिए सिफारिश चाहिए।
- बजट (अनुच्छेद 112–114): भारित व्यय पर चर्चा, मतदान नहीं; मांगों पर मतदान केवल लोक सभा में; कटौती प्रस्ताव; गिलोटिन; विनियोग विधेयक; 75 दिन के भीतर वित्त विधेयक।
- अनुच्छेद 115–116: अनुपूरक, अतिरिक्त और अधिक अनुदान; लेखानुदान, प्रत्ययानुदान, अपवादानुदान।
- निधियां: संचित निधि 266(1) (विधि आवश्यक), लोक लेखा 266(2) (विनियोग नहीं), आकस्मिकता निधि 267 (राष्ट्रपति, 1950 का अधिनियम)।
अभ्यास प्रश्न
Q1. धन विधेयक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वह केवल लोक सभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है।
2. राज्य सभा उसे 14 दिन के भीतर संशोधनों सहित लौटा सकती है।
3. यदि यह प्रश्न उठे कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, तो लोक सभा के अध्यक्ष का विनिश्चय अंतिम होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 1 और 3
कथन 1 और 3 अनुच्छेद 109(1) और 110(3) के अनुसार हैं। कथन 2 गलत है: राज्य सभा केवल सिफारिशें कर सकती है, संशोधन नहीं, और लोक सभा उन्हें स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है। इसलिए 'केवल 1' एक सही कथन छोड़ देता है, और 2 वाला कोई भी विकल्प गलत है।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत की संचित निधि पर भारित नहीं है?
- उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते
- उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की पेंशन
- उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते
- राष्ट्रपति की उपलब्धियां और भत्ते
उत्तर देखें
उत्तर: C. उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन और भत्ते
अनुच्छेद 112(3) उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की पेंशन और राष्ट्रपति की उपलब्धियों को भारत की संचित निधि पर भारित करता है। उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन राज्य की संचित निधि पर भारित हैं (अनुच्छेद 202(3)), इसलिए वही संघ की निधि पर भारित नहीं है।
Q3. भारत के राष्ट्रपति का 'जेबी वीटो' संभव है क्योंकि
- अनुच्छेद 111 राष्ट्रपति को यह शक्ति स्पष्ट रूप से देता है
- संविधान कोई समय-सीमा तय नहीं करता जिसके भीतर राष्ट्रपति को विधेयक पर कार्य करना हो
- राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है
- एक बार लौटाया गया विधेयक फिर लौटाया जा सकता है
उत्तर देखें
उत्तर: B. संविधान कोई समय-सीमा तय नहीं करता जिसके भीतर राष्ट्रपति को विधेयक पर कार्य करना हो
अनुच्छेद 111 किसी वीटो का नाम नहीं लेता और कोई समय-सीमा नहीं रखता, इसलिए राष्ट्रपति विधेयक को बस लंबित रख सकता है, जैसा राष्ट्रपति ज़ैल सिंह ने भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक, 1986 के साथ किया। धन विधेयक लौटाया नहीं जा सकता, और लौटाए जाने के बाद फिर पारित विधेयक पर अनुमति देनी होती है, इसलिए अन्य विकल्प गलत हैं।
Q4. सूची I (कटौती प्रस्ताव) को सूची II (उसका प्रस्ताव) से सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. नीति कटौती
B. मितव्ययिता कटौती
C. सांकेतिक कटौती
सूची II
1. मांग को सौ रुपये घटाना
2. मांग को एक रुपया करना
3. मांग को एक निर्दिष्ट राशि से घटाना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।
- A-2, B-3, C-1
- A-1, B-3, C-2
- A-2, B-1, C-3
- A-3, B-2, C-1
उत्तर देखें
उत्तर: A. A-2, B-3, C-1
नीति कटौती नीति के प्रति असहमति दिखाने के लिए मांग को एक रुपया करती है; मितव्ययिता कटौती उसे एक निर्दिष्ट राशि से घटाती है; सांकेतिक कटौती किसी विशेष शिकायत के लिए उसे सौ रुपये घटाती है। अन्य कूट नीति और सांकेतिक कटौती को आपस में बदल देते हैं या मितव्ययिता कटौती को गलत स्थान पर रखते हैं।
Q5. ऐसे विधेयक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए जो भारत की संचित निधि से व्यय अंतर्वलित करेगा पर जिसमें अनुच्छेद 110 में सूचीबद्ध कोई विषय नहीं है (अनुच्छेद 117(3)):
1. वह राज्य सभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है।
2. वह राष्ट्रपति की सिफारिश के बिना पुरःस्थापित नहीं किया जा सकता।
3. कोई भी सदन उसे तब तक पारित नहीं कर सकता जब तक राष्ट्रपति ने उस सदन से उस पर विचार करने की सिफारिश न की हो।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2 और 3
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: C. केवल 1 और 3
अनुच्छेद 117(3) का विधेयक किसी भी सदन में आरंभ हो सकता है और पुरःस्थापन के लिए सिफारिश आवश्यक नहीं, इसलिए कथन 2 गलत है; सिफारिश केवल किसी सदन द्वारा उस पर विचार और उसे पारित करने से पहले आवश्यक है, इसलिए कथन 3 सही है। 'केवल 1' कथन 3 को छोड़ देता है, और कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं।
Q6. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत की संचित निधि के बजाय भारत के लोक लेखे में जमा होता है?
- संघ द्वारा संगृहीत आय-कर
- राजकोष हुंडियां जारी करके जुटाया गया धन
- भविष्य निधि जमा
- संघ द्वारा दिए गए उधारों के प्रतिसंदाय में प्राप्त धन
उत्तर देखें
उत्तर: C. भविष्य निधि जमा
अनुच्छेद 266(1) सभी राजस्व (जैसे आय-कर), लिए गए सभी उधार (जैसे राजकोष हुंडियां) और उधारों के सभी प्रतिसंदाय संचित निधि में भेजता है। सरकार द्वारा रखा गया अन्य लोक धन, जैसे भविष्य निधि जमा, अनुच्छेद 266(2) के अधीन लोक लेखे में जाता है।
Q7. बजट पर मतदान पूरा होने तक वित्तीय वर्ष के एक भाग के लिए लोक सभा द्वारा अग्रिम रूप से दिया गया अनुदान कहलाता है
- प्रत्ययानुदान
- अपवादानुदान
- अनुपूरक अनुदान
- लेखानुदान
उत्तर देखें
उत्तर: D. लेखानुदान
अनुच्छेद 116(1)(क) लेखानुदान का उपबंध करता है। प्रत्ययानुदान ऐसी अप्रत्याशित मांग के लिए है जिसका सामान्य ब्यौरा नहीं दिया जा सकता; अपवादानुदान किसी वर्ष की चालू सेवा से बाहर के प्रयोजन के लिए है; अनुपूरक अनुदान (अनुच्छेद 115) वर्ष के दौरान अपर्याप्त अनुदान की पूर्ति करता है।
Q8. साधारण विधेयक के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य सभा में लंबित वह विधेयक, जिसे लोक सभा ने पारित नहीं किया है, लोक सभा के विघटन पर व्यपगत हो जाता है।
2. द्वितीय वाचन में विधेयक पर खंड-दर-खंड विचार होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 2
अनुच्छेद 107(4) कहता है कि ऐसा विधेयक विघटन पर व्यपगत नहीं होता, इसलिए कथन 1 गलत है। खंड-दर-खंड विचार और संशोधनों पर मतदान द्वितीय वाचन में होता है, इसलिए कथन 2 सही है। कथन 1 वाले विकल्प गलत हैं, और 'न तो' कथन 2 की अनदेखी करता है।
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ऐप में पढ़ें →स्रोत
- Constitution of India, Articles 75, 107–117, 202, 265–267 and 368 — https://legislative.gov.in/constitution-of-india/
- Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha (legislation, financial business, cut motions); Rules of Procedure and Conduct of Business in the Council of States — https://sansad.in
- Constitution (Twenty-fourth Amendment) Act, 1971; Contingency Fund of India Act, 1950; Provisional Collection of Taxes Act, 1931 — https://www.indiacode.nic.in
- Supreme Court of India: K.S. Puttaswamy v. Union of India (Aadhaar, 2018); Rojer Mathew v. South Indian Bank Ltd. (2019) — https://digiscr.sci.gov.in
- Ministry of Finance, Union Budget documents: Budget at a Glance and the Annual Financial Statement (presentation on 1 February and merger of the Railway Budget from 2017) — https://www.indiabudget.gov.in