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पीठासीन अधिकारी, सत्र और संसदीय साधन

संसद · भाग 2 / 4 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

अध्यक्ष और सभापति, सत्र कैसे आहूत और समाप्त होते हैं, गणपूर्ति और मतदान, संयुक्त बैठक, प्रश्नकाल और शून्यकाल, और वे प्रस्ताव जिनसे सरकार के विश्वास की परख होती है।

भाग 1 ने बताया कि संसद में कौन बैठता है। यह भाग बताता है कि सदन कैसे काम करते हैं: अध्यक्षता कौन करता है, वे कब मिलते हैं, कितने सदस्यों का उपस्थित होना आवश्यक है, किसी विधेयक पर गतिरोध कैसे सुलझता है, और सदस्य सरकार को उत्तरदायी ठहराने के लिए किन साधनों का उपयोग करते हैं। ये साधन इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि अनुच्छेद 75(3) के अधीन मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है: सरकार तभी तक टिकती है जब तक उसे सदन का विश्वास प्राप्त है, और प्रश्न, वाद-विवाद तथा प्रस्ताव ही वे तरीके हैं जिनसे उस विश्वास की रोज़ परख होती है। प्रक्रिया के अधिकांश ब्यौरे स्वयं संविधान में नहीं हैं। अनुच्छेद 118 प्रत्येक सदन को अपनी प्रक्रिया और कार्य संचालन के विनियमन के लिए नियम बनाने देता है, इसलिए यहाँ चर्चित अनेक साधन प्रत्येक सदन के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों से आते हैं, और उनमें से एक, शून्यकाल, नियमों में है ही नहीं।

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष लोक सभा द्वारा अपने सदस्यों में से चुने जाते हैं (अनुच्छेद 93)। अध्यक्ष सदस्य न रहने पर पद रिक्त करता है, उपाध्यक्ष को लिखकर त्यागपत्र दे सकता है, और कम से कम 14 दिन की सूचना के बाद प्रस्तावित, सदन के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है (अनुच्छेद 94)। जब ऐसा संकल्प विचाराधीन हो, अध्यक्ष पीठासीन नहीं होता पर बोल सकता है, और प्रथमतः मत दे सकता है, यद्यपि मत बराबर होने की दशा में नहीं (अनुच्छेद 96)। सदन का विघटन होने पर अध्यक्ष नए सदन के प्रथम अधिवेशन से ठीक पहले तक पद रिक्त नहीं करता, इसलिए यह पद कभी खाली नहीं रहता। अध्यक्ष की शक्तियों में यह तय करना शामिल है कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं, जो निर्णय अंतिम है (अनुच्छेद 110(3)); संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करना (अनुच्छेद 118(4)); और दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के मामले तय करना। सामान्यतः अध्यक्ष मत नहीं देता, पर मत बराबर होने पर उसका निर्णायक मत होता है (अनुच्छेद 100)। आम चुनाव के बाद राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त एक सामयिक अध्यक्ष, जो प्रायः वरिष्ठ सदस्य होता है, नए सदस्यों को शपथ दिलाता है और अध्यक्ष के चुने जाने तक अध्यक्षता करता है।

राज्य सभा की अध्यक्षता उसका सभापति करता है, जो भारत का उपराष्ट्रपति है और पदेन कार्य करता है (अनुच्छेद 64 और 89); सदन अपने सदस्यों में से एक उपसभापति चुनता है। चूँकि सभापति राज्य सभा का सदस्य नहीं है, वह प्रथमतः मत नहीं देता और मत बराबर होने पर केवल निर्णायक मत देता है। सभापति को केवल उपराष्ट्रपति को हटाकर ही हटाया जा सकता है: कम से कम 14 दिन की सूचना के बाद, राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित और लोक सभा द्वारा सहमत संकल्प से (अनुच्छेद 67(ख))। अध्यक्ष से एक अंतर ध्यान दें: जब सभापति को हटाने का संकल्प विचाराधीन हो, सभापति सदन में बोल सकता है पर उसे मत देने का बिल्कुल हक नहीं (अनुच्छेद 92)। अध्यक्ष की तरह सभापति राज्य सभा के लिए दल-बदल के मामले तय करता है। प्रत्येक सदन पीठासीन अधिकारी द्वारा नामनिर्देशित सदस्यों का एक पैनल भी रखता है, जो पीठासीन अधिकारी और उसके उपपदधारी दोनों के अनुपस्थित होने पर अध्यक्षता करते हैं।

लोक सभा का अध्यक्ष और राज्य सभा का सभापति
अध्यक्षसभापति
कौनलोक सभा द्वारा निर्वाचित सदस्य (अनुच्छेद 93)उपराष्ट्रपति, पदेन; सदस्य नहीं (अनुच्छेद 64, 89)
सामान्य मतदानप्रथमतः मत नहीं; बराबरी पर निर्णायक मतप्रथमतः मत नहीं; बराबरी पर निर्णायक मत
स्वयं को हटाने पर विचार के समयपीठासीन नहीं; बोल सकता है और प्रथमतः मत दे सकता है, बराबरी पर नहीं (अनुच्छेद 96)पीठासीन नहीं; बोल सकता है पर बिल्कुल मत नहीं दे सकता (अनुच्छेद 92)
हटाया जानालोक सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों का बहुमत, 14 दिन की सूचना (अनुच्छेद 94)उपराष्ट्रपति को हटाकर: राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों का बहुमत, लोक सभा की सहमति (अनुच्छेद 67(ख))
विशेष शक्तियाँधन विधेयक प्रमाणित करता है; संयुक्त बैठक की अध्यक्षता करता हैइनमें से कोई नहीं

अनुच्छेद 85 कहता है कि राष्ट्रपति समय-समय पर प्रत्येक सदन को अधिवेशन के लिए आहूत करेगा, पर एक सत्र की अंतिम बैठक और अगले सत्र की प्रथम बैठक की तारीख के बीच छह मास का अंतर नहीं होना चाहिए, इसलिए प्रत्येक सदन को वर्ष में कम से कम दो बार मिलना होता है। परंपरा से तीन सत्र होते हैं: बजट सत्र (लगभग फरवरी से मई), मानसून सत्र (लगभग जुलाई से सितंबर) और शीतकालीन सत्र (लगभग नवंबर से दिसंबर)। तीन अलग-अलग कार्य काम को रोकते हैं। स्थगन, पीठासीन अधिकारी द्वारा, किसी बैठक को घंटों या दिनों के लिए रोकता है; अनिश्चित काल के लिए स्थगन अगली बैठक का दिन तय किए बिना बैठक समाप्त करता है। सत्रावसान, राष्ट्रपति द्वारा, स्वयं सत्र को समाप्त करता है, पर सदन के समक्ष लंबित विधेयक व्यपगत नहीं होते। विघटन, वह भी राष्ट्रपति द्वारा, लोक सभा का जीवन समाप्त करता है; राज्य सभा का कभी विघटन नहीं होता। विघटन पर, लोक सभा में लंबित विधेयक, या उसके द्वारा पारित और राज्य सभा में लंबित विधेयक, व्यपगत हो जाता है। राज्य सभा में लंबित ऐसा विधेयक जिसे लोक सभा ने पारित नहीं किया है, व्यपगत नहीं होता, और न ही वह विधेयक जिसके लिए राष्ट्रपति ने विघटन से पहले संयुक्त बैठक की सूचना दे दी हो (अनुच्छेद 108(5))।

अनुच्छेद 100 के अधीन, प्रत्येक सदन में प्रश्नों का निर्धारण पीठासीन अधिकारी को छोड़कर उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से होता है, और गणपूर्ति सदन के कुल सदस्यों का दसवाँ भाग है, पीठासीन अधिकारी को गिनकर। यदि किसी समय गणपूर्ति न हो, तो पीठासीन अधिकारी को सदन स्थगित करना होता है या गणपूर्ति होने तक बैठक निलंबित करनी होती है। अनुच्छेद 87 राष्ट्रपति से अपेक्षा करता है कि वह लोक सभा के प्रत्येक साधारण निर्वाचन के बाद प्रथम सत्र के आरंभ में और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में एक साथ समवेत दोनों सदनों को संबोधित करे; फिर प्रत्येक सदन अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर वाद-विवाद करता है, और लोक सभा में उसका गिरना संकेत देगा कि सरकार सदन का विश्वास खो चुकी है। अनुच्छेद 88 प्रत्येक मंत्री और महान्यायवादी को किसी भी सदन, संयुक्त बैठक, या जिस समिति में वे नामित हों, उसकी कार्यवाही में बोलने और भाग लेने का अधिकार देता है, पर यह अनुच्छेद उन्हें मत देने का अधिकार नहीं देता। अनुच्छेद 120 के अधीन, कार्य हिंदी या अंग्रेज़ी में होता है, पर पीठासीन अधिकारी किसी ऐसे सदस्य को, जो इनमें से किसी में पर्याप्त रूप से अपनी बात नहीं कह सकता, अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकता है।

अनुच्छेद 108 के अधीन संयुक्त बैठक किसी साधारण विधेयक पर गतिरोध सुलझाती है। एक सदन द्वारा पारित विधेयक के दूसरे सदन में पहुँचने के बाद, राष्ट्रपति सदनों को संयुक्त बैठक में बुला सकता है यदि दूसरा सदन उसे अस्वीकार कर दे, या संशोधनों पर सदन अंतिम रूप से असहमत हों, या विधेयक की प्राप्ति से छह मास से अधिक बीत जाएँ और दूसरा सदन उसे पारित न करे। अध्यक्ष अध्यक्षता करता है (अनुच्छेद 118(4)); उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, और दोनों अनुपस्थित हों तो राज्य सभा का उपसभापति। विधेयक पारित होता है यदि दोनों सदनों के उपस्थित और मत देने वाले कुल सदस्यों का बहुमत सहमत हो। चूँकि लोक सभा के सदस्य दोगुने से भी अधिक हैं, प्रायः उसी का मत प्रबल रहता है। धन विधेयक के लिए संयुक्त बैठक नहीं होती, क्योंकि राज्य सभा उसे अस्वीकार नहीं कर सकती, और न ही संविधान संशोधन विधेयक के लिए, जिसे अनुच्छेद 368 के अधीन प्रत्येक सदन को विशेष बहुमत से अलग-अलग पारित करना होता है। संयुक्त बैठकें केवल तीन बार हुई हैं: दहेज प्रतिषेध विधेयक (1961), बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक (1978) और आतंकवाद निवारण विधेयक (2002) पर।

प्रश्नकाल सामान्यतः बैठक का पहला घंटा होता है, जब सदस्य मंत्रियों से प्रश्न पूछते हैं। तारांकित प्रश्न, जिस पर तारांक लगा होता है, का उत्तर सदन में मौखिक रूप से दिया जाता है, और उसके बाद अनुपूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं। अतारांकित प्रश्न का लिखित उत्तर मिलता है, इसलिए अनुपूरक प्रश्न नहीं पूछे जा सकते। अल्प सूचना प्रश्न अविलंबनीय लोक महत्व के किसी विषय से संबंधित होता है, साधारण प्रश्न से कम सूचना पर पूछा जा सकता है, और उसका उत्तर मौखिक दिया जाता है। शून्यकाल प्रश्नकाल के बाद आता है। यह एक भारतीय नवाचार है जो व्यवहार से विकसित हुआ और प्रक्रिया नियमों में उल्लिखित नहीं है: सदस्य पीठासीन अधिकारी की अनुमति से, सामान्य सूचना के बिना, तात्कालिक विषय उठाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र में पिछली रात कोई पुल गिर जाए, तो उसका सदस्य अगले दिन शून्यकाल में यह विषय उठा सकता है, जबकि पुलों की सुरक्षा पर विस्तृत तारांकित प्रश्न के लिए पूर्व सूचना चाहिए होगी। चूँकि मंत्रियों को सार्वजनिक रूप से और अभिलेख पर उत्तर देना होता है, ये साधन सदन द्वारा कार्यपालिका को उत्तरदायी ठहराने के सबसे सीधे तरीकों में से हैं।

प्रस्ताव सरकार की स्थिति की परख अधिक सीधे करते हैं। अविश्वास प्रस्ताव केवल लोक सभा में लाया जा सकता है, उस पर विचार के लिए कम से कम 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए, कारण बताना आवश्यक नहीं, और पारित होने पर पूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता है; संविधान इसका नाम नहीं लेता, यह अनुच्छेद 75(3) और लोक सभा के नियमों पर आधारित है। निंदा प्रस्ताव में कारण बताने होते हैं, यह किसी एक मंत्री, मंत्रियों के समूह या पूरी सरकार पर लक्षित हो सकता है, और इसके पारित होने से सरकार स्वयं त्यागपत्र देने को बाध्य नहीं होती, यद्यपि यह गंभीर राजनीतिक आघात है। स्थगन प्रस्ताव अविलंबनीय लोक महत्व के किसी निश्चित विषय पर चर्चा के लिए लोक सभा के सामान्य कार्य को रोक देता है; इसके लिए भी 50 सदस्यों का समर्थन चाहिए, यह राज्य सभा में नहीं लाया जा सकता, और इसमें सरकार की निंदा का तत्व माना जाता है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव से सदस्य किसी तात्कालिक विषय की ओर मंत्री का ध्यान खींचकर उससे प्राधिकृत वक्तव्य माँगता है; यह भी एक भारतीय नवाचार है, जो 1954 से नियमों का भाग है। ऊपर वर्णित, राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव मुख्य प्रस्तावों का समूह पूरा करता है।

तीन प्रस्तावों की तुलना
अविश्वास प्रस्तावनिंदा प्रस्तावस्थगन प्रस्ताव
कारण बतानाआवश्यक नहींबताने होते हैंअविलंबनीय लोक महत्व का एक निश्चित विषय
किस पर लक्षितपूरी मंत्रिपरिषदएक मंत्री, एक समूह या पूरी सरकारविषय पर सरकार का आचरण
क्या यह सरकार को हटा सकता है?हाँ, यदि लोक सभा में पारित होऐसा कोई विधिक प्रभाव नहींनहीं
पारित होने परपूरी मंत्रिपरिषद को त्यागपत्र देना होता हैत्यागपत्र का कोई विधिक दायित्व नहींसरकार की निंदा माना जाता है

साथ मिलाकर देखें तो ये नियम बताते हैं कि संसदीय सरकार को उत्तरदायी कैसे रखा जाता है। पीठासीन अधिकारी व्यवस्था बनाए रखते हैं और विवादित प्रश्न तय करते हैं, जैसे कि कोई विधेयक धन विधेयक है या नहीं और किसी सदस्य ने दल-बदल किया है या नहीं; छह मास का नियम और राष्ट्रपति का वार्षिक अभिभाषण संसद को नियमित रूप से मिलते रहने देते हैं; गणपूर्ति और बहुमत से मतदान निर्णयों को वैध बनाते हैं; संयुक्त बैठक साधारण विधेयकों पर गतिरोध तोड़ती है; और प्रश्न, शून्यकाल तथा प्रस्ताव मंत्रियों से सार्वजनिक रूप से जवाब माँगते हैं। सदनों के बीच की असमानता याद रखें: केवल लोक सभा का विश्वास तय करता है कि सरकार टिकेगी या नहीं, इसीलिए अविश्वास प्रस्ताव और स्थगन प्रस्ताव केवल वहीं होते हैं, जबकि राज्य सभा, जो सरकार को हटा नहीं सकती, उससे प्रश्न पूछती है और उस पर वाद-विवाद करती है। अगला भाग स्वयं विधि-निर्माण पर है: साधारण विधेयक, धन विधेयक और वित्त विधेयक, राष्ट्रपति की अनुमति, और बजट।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. लोक सभा के अध्यक्ष के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. अध्यक्ष को लोक सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा हटाया जा सकता है।
2. लोक सभा का विघटन होते ही अध्यक्ष पद रिक्त कर देता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है (अनुच्छेद 94(ग))। कथन 2 गलत है: विघटन पर अध्यक्ष नई लोक सभा के प्रथम अधिवेशन से ठीक पहले तक पद पर रहता है। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q2. संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक की अध्यक्षता कौन करता है?

  1. राष्ट्रपति
  2. उपराष्ट्रपति, राज्य सभा के सभापति के रूप में
  3. लोक सभा का अध्यक्ष
  4. किसी भी सदन का वरिष्ठतम सदस्य
उत्तर देखें

उत्तर: C. लोक सभा का अध्यक्ष

अनुच्छेद 118(4) अध्यक्षता अध्यक्ष को देता है; उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, और फिर राज्य सभा का उपसभापति। राष्ट्रपति संयुक्त बैठक बुलाता है पर अध्यक्षता नहीं करता; राज्य सभा के सभापति की इसकी अध्यक्षता में कोई भूमिका नहीं; वरिष्ठता से अध्यक्षता तय नहीं होती।

Q3. अनुच्छेद 108 के अधीन संसद की संयुक्त बैठक निम्नलिखित में से किस पर नहीं हो सकती?
1. धन विधेयक
2. संविधान संशोधन विधेयक
3. लोक सभा द्वारा पारित होने के बाद राज्य सभा द्वारा अस्वीकृत साधारण विधेयक
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 2

धन विधेयक पर गतिरोध नहीं हो सकता क्योंकि राज्य सभा उसे अस्वीकार नहीं कर सकती, और संविधान संशोधन विधेयक अनुच्छेद 368 के अधीन प्रत्येक सदन द्वारा अलग-अलग पारित होना चाहिए। दूसरे सदन द्वारा अस्वीकृत साधारण विधेयक ठीक वही स्थिति है जिसके लिए अनुच्छेद 108 है, इसलिए 3 वाला कोई भी विकल्प गलत है, और 'केवल 1' संशोधन विधेयक को छोड़ देता है।

Q4. संसद के किसी भी सदन का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति है

  1. सदन के कुल सदस्यों का दसवाँ भाग
  2. उपस्थित सदस्यों का चौथाई भाग
  3. सदन के कुल सदस्यों का एक-तिहाई
  4. सदन के कुल सदस्यों का बहुमत
उत्तर देखें

उत्तर: A. सदन के कुल सदस्यों का दसवाँ भाग

अनुच्छेद 100(3) गणपूर्ति को सदन के कुल सदस्यों का दसवाँ भाग तय करता है, पीठासीन अधिकारी सहित। अन्य अनुपात संविधान में नहीं हैं; कुल सदस्यता का बहुमत विशेष बहुमत से संबंधित है, गणपूर्ति से नहीं।

Q5. शून्यकाल के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका उपबंध लोक सभा के प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों में है।
2. यह प्रश्नकाल के बाद आता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 2 सही है। कथन 1 गलत है: शून्यकाल एक भारतीय प्रथा है जिसका प्रक्रिया नियमों में उल्लेख नहीं है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q6. निम्नलिखित में से कौन-सा केवल लोक सभा में लाया जा सकता है?

  1. अविश्वास प्रस्ताव
  2. ध्यानाकर्षण प्रस्ताव
  3. राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव
  4. तारांकित प्रश्न
उत्तर देखें

उत्तर: A. अविश्वास प्रस्ताव

मंत्रिपरिषद लोक सभा के प्रति उत्तरदायी है (अनुच्छेद 75(3)), इसलिए केवल वही सदन उसके प्रति अविश्वास व्यक्त कर सकता है। ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, धन्यवाद प्रस्ताव और तारांकित प्रश्न दोनों सदनों में प्रयुक्त होते हैं।

Q7. अनुच्छेद 120 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद में कार्य हिंदी में या अंग्रेज़ी में किया जाएगा।
2. पीठासीन अधिकारी किसी ऐसे सदस्य को, जो हिंदी या अंग्रेज़ी में पर्याप्त रूप से अपनी बात नहीं कह सकता, अपनी मातृभाषा में सदन को संबोधित करने की अनुज्ञा दे सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों कथन अनुच्छेद 120(1) को दोहराते हैं। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q8. निम्नलिखित में से कौन-से विधेयक संसद की संयुक्त बैठक में पारित हुए?
1. दहेज प्रतिषेध विधेयक, 1961
2. आतंकवाद निवारण विधेयक, 2002
3. संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1978
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

तीन संयुक्त बैठकें दहेज प्रतिषेध विधेयक (1961), बैंककारी सेवा आयोग (निरसन) विधेयक (1978) और आतंकवाद निवारण विधेयक (2002) पर हुईं। संविधान संशोधन विधेयक कभी संयुक्त बैठक में नहीं जा सकता, इसलिए 3 वाला हर विकल्प गलत है।

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