English · हिन्दी · తెలుగు · தமிழ் · മലയാളം · मराठी · ಕನ್ನಡ
गठन, सदस्यता और दल-बदल विरोधी कानून
लोक सभा और राज्य सभा कैसे बनती हैं, कितने समय तक रहती हैं, कौन सदस्य बन सकता है, और सदस्य अपना स्थान कैसे खोता है: स्थान रिक्त होना, निरर्हता, दोषसिद्धि और दसवीं अनुसूची।
भारत संसदीय प्रणाली अपनाता है: सरकार विधायिका में से बनती है और तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे लोक सभा का विश्वास प्राप्त है। अनुच्छेद 79 कहता है कि संघ के लिए एक संसद होगी, जो राष्ट्रपति और दो सदनों, राज्यों की परिषद (राज्य सभा) और लोक सभा, से मिलकर बनेगी। राष्ट्रपति किसी सदन का सदस्य नहीं है और उनमें नहीं बैठता, फिर भी संसद का अंग है: राष्ट्रपति की अनुमति के बिना कोई विधेयक कानून नहीं बनता, और राष्ट्रपति ही सदनों को आहूत करता है, उनका सत्रावसान करता है और लोक सभा का विघटन करता है। संसद संबंधी उपबंध संविधान के भाग V, अध्याय II (अनुच्छेद 79 से 122) में हैं। यह भाग बताता है कि प्रत्येक सदन में कौन बैठता है और कितने समय के लिए, कौन सदस्य बन सकता है, और कोई सदस्य अपना स्थान कैसे खोता है, दल-बदल विरोधी कानून सहित।
अनुच्छेद 80 राज्य सभा की सदस्य संख्या अधिकतम 250 तय करता है: 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा ऐसे व्यक्तियों में से नामनिर्देशित, जिन्हें साहित्य, विज्ञान, कला और समाज सेवा का विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव है, और राज्यों तथा संघ राज्यक्षेत्रों के अधिकतम 238 प्रतिनिधि। किसी राज्य के प्रतिनिधि उसकी विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा, एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति से, चुने जाते हैं। चौथी अनुसूची प्रत्येक राज्य को मोटे तौर पर जनसंख्या के आधार पर स्थान देती है, इसलिए उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के पास छोटे राज्य से कहीं अधिक स्थान हैं; यह संयुक्त राज्य अमेरिका की सीनेट से भिन्न है, जहाँ हर राज्य के दो स्थान हैं। संघ राज्यक्षेत्रों के प्रतिनिधि उस रीति से चुने जाते हैं जो संसद विधि द्वारा तय करे, और व्यवहार में केवल विधानमंडल वाले संघ राज्यक्षेत्र (दिल्ली, पुडुचेरी, और जम्मू-कश्मीर) सदस्य भेजते हैं। नामनिर्देशित सदस्य दलीय शक्ति के बजाय विशेषज्ञता लाते हैं, इसलिए यह सदन कानूनों पर दूसरी, अधिक विचारशील दृष्टि डालने के लिए है।
लोक सभा सार्वभौम वयस्क मताधिकार (अनुच्छेद 326) के आधार पर प्रत्यक्ष निर्वाचन से चुनी जाती है। अनुच्छेद 81 राज्यों के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से अधिकतम 530 और संघ राज्यक्षेत्रों से अधिकतम 20 सदस्यों की अनुमति देता है। राज्यों को स्थान इस प्रकार आवंटित होते हैं कि स्थानों और जनसंख्या का अनुपात, जहाँ तक साध्य हो, हर राज्य के लिए समान रहे। अनुच्छेद 331 पहले राष्ट्रपति को आंग्ल-भारतीय समुदाय के अधिकतम दो सदस्य नामनिर्देशित करने देता था; 104वें संशोधन (2019) ने इसे जनवरी 2020 से समाप्त कर दिया। अनुच्छेद 82 प्रत्येक जनगणना के बाद स्थानों और निर्वाचन-क्षेत्रों के पुनः समायोजन का उपबंध करता है। फिर भी, ताकि जनसंख्या वृद्धि नियंत्रित करने वाले राज्य स्थान न खोएँ, 42वें संशोधन (1976) ने राज्यों के बीच स्थानों के आवंटन को 1971 की जनगणना के आधार पर स्थिर कर दिया, और 84वें संशोधन (2001) ने इस रोक को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया। अनुच्छेद 330 के अधीन अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थान आरक्षित हैं।
अनुच्छेद 83 प्रत्येक सदन की अवधि तय करता है। राज्य सभा एक स्थायी निकाय है और इसका विघटन नहीं होता; जहाँ तक संभव हो, इसके एक-तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं, और सदस्य का छह वर्ष का कार्यकाल संविधान नहीं, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तय करता है। लोक सभा अपने प्रथम अधिवेशन की तारीख से पाँच वर्ष तक बनी रहती है, और उस अवधि की समाप्ति उसका विघटन होती है; राष्ट्रपति इसका विघटन पहले भी कर सकता है (अनुच्छेद 85)। जब आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो, संसद विधि द्वारा इसकी अवधि एक बार में अधिकतम एक वर्ष बढ़ा सकती है, और उद्घोषणा समाप्त होने के बाद छह मास से आगे नहीं। 42वें संशोधन (1976) ने अवधि छह वर्ष कर दी थी; 44वें संशोधन (1978) ने पाँच वर्ष बहाल किए। अनुच्छेद 84 अर्हताएँ तय करता है: सदस्य भारत का नागरिक हो, निर्वाचन आयोग द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष तीसरी अनुसूची में दिए प्रारूप में शपथ या प्रतिज्ञान करे और उस पर हस्ताक्षर करे, और राज्य सभा के लिए कम से कम 30 वर्ष तथा लोक सभा के लिए 25 वर्ष का हो।
| लोक सभा | राज्य सभा | |
|---|---|---|
| अधिकतम सदस्य संख्या | 550 (राज्यों से 530, संघ राज्यक्षेत्रों से 20) | 250 (राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों से 238, 12 नामनिर्देशित) |
| चयन कैसे | मतदाताओं द्वारा प्रत्यक्ष निर्वाचन | निर्वाचित विधायकों द्वारा (एकल संक्रमणीय मत); 12 राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित |
| न्यूनतम आयु | 25 वर्ष | 30 वर्ष |
| सदन की अवधि | 5 वर्ष, यदि पहले विघटन न हो | स्थायी; हर दूसरे वर्ष एक-तिहाई सेवानिवृत्त |
| सदस्य का कार्यकाल | सदन के विघटन तक | 6 वर्ष (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951) |
| पीठासीन अधिकारी | अध्यक्ष, सदन द्वारा निर्वाचित | सभापति: उपराष्ट्रपति, पदेन |
संसद ने लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा और अर्हताएँ जोड़ी हैं: उम्मीदवार किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचक के रूप में पंजीकृत हो, और अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थान का उम्मीदवार उसी वर्ग का हो। 2003 के एक संशोधन ने यह पुरानी शर्त हटा दी कि राज्य सभा का उम्मीदवार उसी राज्य का निर्वाचक हो जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है, और उच्चतम न्यायालय ने कुलदीप नैयर बनाम भारत संघ (2006) में इस बदलाव को सही ठहराया। अनुच्छेद 101 स्थानों के रिक्त होने से संबंधित है। कोई व्यक्ति दोनों सदनों का सदस्य नहीं हो सकता, और संसद तथा किसी राज्य के विधानमंडल दोनों में चुना गया व्यक्ति संसद का स्थान खो देता है, यदि वह राष्ट्रपति के नियमों में तय अवधि के भीतर राज्य का स्थान नहीं छोड़ता। सदस्य अध्यक्ष या सभापति को लिखकर त्यागपत्र दे सकता है, पर 33वें संशोधन (1974) के बाद से त्यागपत्र तभी स्वीकार होता है जब पीठासीन अधिकारी का समाधान हो जाए कि वह स्वैच्छिक और असली है। यदि कोई सदस्य अनुमति के बिना साठ दिन तक सभी बैठकों से अनुपस्थित रहे, तो सदन उसका स्थान रिक्त घोषित कर सकता है।
अनुच्छेद 102 निरर्हता के आधार गिनाता है: भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करना, उस पद को छोड़कर जिसे संसद ने विधि द्वारा निरर्हित न करने वाला घोषित किया हो; सक्षम न्यायालय द्वारा विकृतचित्त घोषित होना; अनुन्मोचित दिवालिया होना; भारत का नागरिक न होना, या किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर लेना या उसके प्रति निष्ठा अभिस्वीकार करना; और संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के अधीन निरर्हित होना। लाभ के पद का नियम सदस्यों की स्वतंत्रता की रक्षा करता है: सरकार से लाभ लेने वाला सदस्य उससे प्रश्न पूछने में हिचक सकता है। संसद ने संसद (निरर्हता निवारण) अधिनियम, 1959 द्वारा अनेक पदों को छूट दी है। जया बच्चन बनाम भारत संघ (2006) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि महत्व इस बात का है कि पद से लाभ मिल सकता है या नहीं, इसका नहीं कि सदस्य ने वास्तव में धन लिया या नहीं। अनुच्छेद 103 के अधीन, यदि यह प्रश्न उठे कि किसी सदस्य पर इनमें से कोई निरर्हता लागू हुई है या नहीं, तो राष्ट्रपति निर्णय करता है, पर उसे पहले निर्वाचन आयोग की राय लेनी होती है और उसी के अनुसार कार्य करना होता है। अनुच्छेद 104 शपथ लेने से पहले, या यह जानते हुए कि वह अर्हित नहीं है या निरर्हित है, बैठने या मत देने वाले व्यक्ति पर प्रत्येक दिन के लिए पाँच सौ रुपये की शास्ति लगाता है।
अनुच्छेद 102(1)(ङ) के अधीन बनी मुख्य विधि लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 है। इसकी धारा 8 के अधीन, किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध और दो वर्ष या अधिक के कारावास से दंडित व्यक्ति को दोषसिद्धि की तारीख से और रिहाई के बाद आगे छह वर्ष तक निरर्हता लगती है। धारा 8(4) पहले वर्तमान सदस्यों को संरक्षण देती थी: यदि वे तीन मास के भीतर अपील करते, तो निरर्हता अपील के निर्णय तक रुकी रहती। लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने धारा 8(4) को निरस्त कर दिया और कहा कि संसद वर्तमान सदस्यों को ऐसा संरक्षण नहीं दे सकती जो अन्य उम्मीदवारों के पास नहीं है। मान लीजिए किसी वर्तमान संसद सदस्य को दोषसिद्ध कर दो वर्ष के कारावास का दंड दिया जाता है: अब उसका स्थान दोषसिद्धि की तारीख से रिक्त हो जाता है, जब तक कि अपील न्यायालय दोषसिद्धि पर ही रोक न लगा दे। यह अधिनियम अन्य आधारों पर भी निरर्हित करता है, उदाहरण के लिए निर्वाचन में भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया गया व्यक्ति, या वह व्यक्ति जिसे निर्वाचन आयोग निर्वाचन व्यय का लेखा दाखिल न करने के लिए निरर्हित करे।
52वें संशोधन (1985) द्वारा जोड़ी गई दसवीं अनुसूची दल परिवर्तन के आधार पर निरर्हता से संबंधित है। 1960 और 1970 के दशकों में पद के लिए पाला बदलने वाले सदस्यों ने बार-बार सरकारें गिराई थीं, इसलिए यह विधि सदस्य को उस दल से बाँधती है जिसके टिकट पर वह चुना गया। किसी दल का सदस्य निरर्हित होता है यदि वह स्वेच्छा से उस दल की सदस्यता छोड़ दे, या दल की पूर्व अनुमति के बिना उसके निदेश के विरुद्ध सदन में मत दे या मतदान से विरत रहे, जब तक कि दल 15 दिन के भीतर इसे माफ न कर दे। निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी दल में शामिल होने पर निरर्हित होता है। नामनिर्देशित सदस्य स्थान ग्रहण करने के छह मास के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है, पर उसके बाद शामिल होने पर निरर्हित होता है। जहाँ मूल दल किसी अन्य दल में विलय कर ले और सदन में उसके कम से कम दो-तिहाई सदस्य विलय से सहमत हों, वहाँ निरर्हता नहीं होती। अनुसूची मूलतः विधानमंडल दल के एक-तिहाई सदस्यों के 'विभाजन' को भी संरक्षण देती थी; 91वें संशोधन (2003) ने यह अपवाद हटा दिया, क्योंकि इसका उपयोग किस्तों में दल-बदल कराने के लिए हो रहा था।
दल-बदल का मामला कौन तय करता है? दसवीं अनुसूची का पैरा 6 यह निर्णय सदन के पीठासीन अधिकारी को देता है: लोक सभा में अध्यक्ष और राज्य सभा में सभापति। पैरा 7 ने न्यायालयों को पूरी तरह बाहर रखने का प्रयास किया था, पर किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हु (1992) में उच्चतम न्यायालय ने अनुसूची को वैध ठहराते हुए वह रोक निरस्त कर दी: पीठासीन अधिकारी अधिकरण के रूप में कार्य करता है, और उसका निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है। कैशाम मेघचंद्र सिंह (2020) में न्यायालय ने कहा कि ऐसी याचिकाएँ सामान्यतः तीन मास के भीतर तय होनी चाहिए। 91वाँ संशोधन यह भी उपबंध करता है कि दल-बदल के कारण निरर्हित सदस्य अपने कार्यकाल की समाप्ति तक या पुनः निर्वाचित होने तक, जो भी पहले हो, न मंत्री नियुक्त हो सकता है (अनुच्छेद 75(1ख)) और न कोई लाभप्रद राजनीतिक पद धारण कर सकता है (अनुच्छेद 361ख)। कुल मिलाकर, संसद की सदस्यता तीन परतों पर टिकी है: संविधान (अनुच्छेद 84 और 101 से 104 तथा दसवीं अनुसूची), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, और दोनों की न्यायालयों द्वारा की गई व्याख्या।
परीक्षा में ध्यान दें
- राष्ट्रपति संसद का अंग है (अनुच्छेद 79), पर किसी सदन का सदस्य नहीं।
- संविधान कहता है कि राज्य सभा के एक-तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं; सदस्य का छह वर्ष का कार्यकाल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 से आता है।
- न्यूनतम आयु: लोक सभा के लिए 25, राज्य सभा के लिए 30। इन्हें राष्ट्रपति की 35 वर्ष की आयु से न मिलाएँ।
- अनुच्छेद 102(1) के अधीन निरर्हता (लाभ का पद आदि) का निर्णय राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की बाध्यकारी राय पर करता है (अनुच्छेद 103)। दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के मामले अध्यक्ष या सभापति तय करते हैं।
- केवल दो-तिहाई सदस्यों की सहमति वाला विलय ही दल-बदल विरोधी कानून से बचता है। एक-तिहाई 'विभाजन' का अपवाद 91वें संशोधन (2003) ने हटा दिया।
- नामनिर्देशित सदस्य स्थान ग्रहण करने के छह मास के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है; निर्दलीय सदस्य कभी नहीं।
- राज्यों के बीच लोक सभा के स्थान अब भी 1971 की जनगणना पर आधारित हैं (84वें संशोधन द्वारा 2026 के बाद की पहली जनगणना तक स्थिर), 2011 की जनगणना पर नहीं।
पुनरावृत्ति
- अनुच्छेद 79: संसद = राष्ट्रपति + राज्य सभा + लोक सभा।
- राज्य सभा: अधिकतम 250 (12 नामनिर्देशित); निर्वाचित विधायकों द्वारा एकल संक्रमणीय मत से निर्वाचन; स्थायी, हर दो वर्ष पर एक-तिहाई सेवानिवृत्त।
- लोक सभा: प्रत्यक्ष निर्वाचन से अधिकतम 530 + 20; पाँच वर्ष की अवधि; स्थानों का आवंटन 1971 की जनगणना पर स्थिर; आंग्ल-भारतीय नामनिर्देशन 2020 में समाप्त।
- अर्हताएँ (अनुच्छेद 84): नागरिक, शपथ, आयु 25 (लोक सभा) या 30 (राज्य सभा); लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 द्वारा और शर्तें।
- स्थानों का रिक्त होना (अनुच्छेद 101): दोहरी सदस्यता नहीं; त्यागपत्र स्वैच्छिक और असली हो; साठ दिन की अनुपस्थिति।
- निरर्हता (अनुच्छेद 102): लाभ का पद, विकृतचित्तता, दिवालियापन, विदेशी नागरिकता, संसद की विधि; राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय पर निर्णय करता है (अनुच्छेद 103)।
- दो वर्ष के कारावास वाली दोषसिद्धि निरर्हित करती है; लिली थॉमस (2013) ने वर्तमान सदस्यों का कवच हटा दिया।
- दसवीं अनुसूची (52वाँ संशोधन, 1985): पीठासीन अधिकारी निर्णय करता है, न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन (किहोतो होलोहन, 1992); विलय के लिए दो-तिहाई; विभाजन का अपवाद हटाया गया (91वाँ संशोधन, 2003)।
अभ्यास प्रश्न
Q1. राज्य सभा के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका विघटन नहीं होता।
2. इसके सदस्यों का छह वर्ष का कार्यकाल संविधान में दिया गया है।
3. किसी राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्य उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों द्वारा चुने जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 1 और 3
कथन 1 सही है (अनुच्छेद 83(1))। कथन 3 सही है (अनुच्छेद 80(4))। कथन 2 गलत है: संविधान केवल यह कहता है कि एक-तिहाई सदस्य हर दूसरे वर्ष सेवानिवृत्त होते हैं; छह वर्ष का कार्यकाल लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तय करता है। इसलिए कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं।
Q2. यह प्रश्न उठता है कि लोक सभा का एक वर्तमान सदस्य भारत सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करता है या नहीं। इसका निर्णय कौन करता है?
- लोक सभा का अध्यक्ष
- राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करते हुए
- उच्चतम न्यायालय, अपनी आरंभिक अधिकारिता में
- निर्वाचन आयोग, किसी अन्य को संदर्भित किए बिना
उत्तर देखें
उत्तर: B. राष्ट्रपति, निर्वाचन आयोग की राय के अनुसार कार्य करते हुए
अनुच्छेद 103: अनुच्छेद 102(1) के अधीन निरर्हता के प्रश्न राष्ट्रपति के पास जाते हैं, जिसका निर्णय अंतिम है, पर उसे निर्वाचन आयोग की राय लेनी होती है और उसी के अनुसार कार्य करना होता है। अध्यक्ष केवल दसवीं अनुसूची के अधीन दल-बदल के मामले तय करता है; यहाँ उच्चतम न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता नहीं है; निर्वाचन आयोग केवल राय देता है।
Q3. दसवीं अनुसूची के अधीन, निम्नलिखित में से कौन-सा निरर्हता का कारण नहीं बनता?
- एक निर्दलीय सदस्य चुनाव के बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है
- एक नामनिर्देशित सदस्य स्थान ग्रहण करने के चार मास बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है
- एक दलीय सदस्य बिना अनुमति दल के निदेश के विरुद्ध मत देता है, और दल इसे माफ नहीं करता
- एक दलीय सदस्य स्वेच्छा से दल की सदस्यता छोड़ देता है
उत्तर देखें
उत्तर: B. एक नामनिर्देशित सदस्य स्थान ग्रहण करने के चार मास बाद किसी राजनीतिक दल में शामिल होता है
नामनिर्देशित सदस्य स्थान ग्रहण करने के छह मास के भीतर किसी दल में शामिल हो सकता है, इसलिए चार मास बाद शामिल होना अनुमत है। निर्दलीय सदस्य किसी भी दल में शामिल होने पर निरर्हित होता है; बिना अनुमति दल के निदेश के विरुद्ध मत देना, यदि 15 दिन में माफ न हो, और स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना, दोनों निरर्हता के आधार हैं।
Q4. किहोतो होलोहन बनाम जाचिल्हु (1992) में उच्चतम न्यायालय ने क्या धारित किया?
- दसवीं अनुसूची पूर्णतः असंवैधानिक है
- दल-बदल पर पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है
- दल-बदल के मामले निर्वाचन आयोग को तय करने चाहिए
- विधानमंडल दल का एक-तिहाई विभाजन सदैव संरक्षित है
उत्तर देखें
उत्तर: B. दल-बदल पर पीठासीन अधिकारी का निर्णय न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है
न्यायालय ने दसवीं अनुसूची को वैध ठहराया पर पैरा 7 को, जो न्यायालयों को रोकता था, निरस्त कर दिया, इसलिए अध्यक्ष या सभापति के निर्णय का पुनर्विलोकन हो सकता है। पूरी अनुसूची निरस्त नहीं हुई; दल-बदल के मामलों में निर्वाचन आयोग की कोई भूमिका नहीं; और विभाजन का अपवाद बाद में 91वें संशोधन (2003) ने हटा दिया, स्थायी नहीं बनाया।
Q5. आपात की उद्घोषणा के दौरान लोक सभा की अवधि के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद विधि द्वारा इसे एक बार में अधिकतम एक वर्ष के लिए बढ़ा सकती है।
2. यह विस्तार उद्घोषणा के प्रवर्तन में न रहने के बाद छह मास से आगे नहीं चल सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: C. 1 और 2 दोनों
दोनों अनुच्छेद 83(2) के परंतुक के अनुसार हैं: विधि द्वारा विस्तार, एक बार में एक वर्ष, और किसी भी दशा में उद्घोषणा समाप्त होने के बाद छह मास से आगे नहीं। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q6. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. 52वाँ संशोधन (1985) — दसवीं अनुसूची जोड़ी
2. 91वाँ संशोधन (2003) — एक-तिहाई विभाजन का अपवाद हटाया
3. 84वाँ संशोधन (2001) — लोक सभा में आंग्ल-भारतीयों का नामनिर्देशन समाप्त किया
4. 33वाँ संशोधन (1974) — त्यागपत्र तभी स्वीकार जब स्वैच्छिक और असली हो
उपर्युक्त में से कितने युग्म सही सुमेलित हैं?
- केवल एक
- केवल दो
- केवल तीन
- सभी चार
उत्तर देखें
उत्तर: C. केवल तीन
युग्म 1, 2 और 4 सही हैं। युग्म 3 गलत है: 84वें संशोधन ने स्थानों के आवंटन पर रोक 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाई; आंग्ल-भारतीय नामनिर्देशन 104वें संशोधन (2019) ने समाप्त किया। इसलिए केवल तीन युग्म सुमेलित हैं।
Q7. लिली थॉमस बनाम भारत संघ (2013) में उच्चतम न्यायालय ने कौन-सा उपबंध निरस्त किया?
- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4)
- दसवीं अनुसूची का पैरा 7
- संविधान का अनुच्छेद 331
- अधिवास संबंधी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 3
उत्तर देखें
उत्तर: A. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 8(4)
धारा 8(4) दोषसिद्ध वर्तमान सदस्यों को तीन मास में दायर अपील लंबित रहने तक स्थान बनाए रखने देती थी; न्यायालय ने इसे निरस्त किया। पैरा 7 किहोतो होलोहन (1992) में निरस्त हुआ; अनुच्छेद 331 का नामनिर्देशन 104वें संशोधन से समाप्त हुआ; और अधिवास नियम में 2003 का बदलाव कुलदीप नैयर (2006) में निरस्त नहीं, बल्कि वैध ठहराया गया।
Q8. राज्यों के बीच लोक सभा के स्थानों का आवंटन इस समय किस जनगणना पर आधारित है?
- 1951
- 1971
- 2001
- 2011
उत्तर देखें
उत्तर: B. 1971
42वें संशोधन (1976) ने आवंटन को 1971 की जनगणना पर स्थिर किया, और 84वें संशोधन (2001) ने इस रोक को 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ाया। 1951 की जनगणना केवल आरंभ में प्रयुक्त हुई; 2001 और 2011 की जनगणना का उपयोग राज्यों के बीच स्थानों के पुनः आवंटन के लिए नहीं हुआ।
ऐप में यही अध्याय पढ़ें: अपनी भाषा में मदद, अभ्यास प्रश्नों पर स्कोर, नोट्स और सेव, और परीक्षा की तिथि तक की योजना।
ऐप में पढ़ें →स्रोत
- Constitution of India, Part V, Chapter II (Articles 79–104), Articles 326, 330, 331, 361B, 75(1B), Third, Fourth and Tenth Schedules — https://legislative.gov.in/constitution-of-india/
- Constitution (Thirty-third Amendment) Act, 1974; (Forty-second) 1976; (Forty-fourth) 1978; (Fifty-second) 1985; (Eighty-fourth) 2001; (Ninety-first) 2003; (One Hundred and Fourth) 2019 — https://www.indiacode.nic.in
- Representation of the People Act, 1951 (Sections 3, 4, 8, 10A, 154) and Representation of the People (Amendment) Act, 2003; Parliament (Prevention of Disqualification) Act, 1959 — https://www.indiacode.nic.in
- Supreme Court of India: Kihoto Hollohan v. Zachillhu (1992); Kuldip Nayar v. Union of India (2006); Jaya Bachchan v. Union of India (2006); Lily Thomas v. Union of India (2013); Keisham Meghachandra Singh v. Speaker, Manipur Legislative Assembly (2020) — https://digiscr.sci.gov.in
- Parliament of India (Lok Sabha and Rajya Sabha): composition and members' handbooks — https://sansad.in