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मुद्रास्फीति के कारण, प्रभाव और नियंत्रण: मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण और मौद्रिक नीति समिति

मुद्रास्फीति · भाग 2 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

कीमतें क्यों बढ़ती हैं (माँगजनित, लागतजनित, आयातित और संरचनात्मक), गति के अनुसार मुद्रास्फीति, अपस्फीति, अवस्फीति, पुनःस्फीति और मुद्रास्फीतिजनित मंदी, फिलिप्स वक्र, किसे लाभ और किसे हानि, आरबीआई अधिनियम के अंतर्गत मुद्रास्फीति लक्ष्य (धारा 45ZA, 45ZN), मौद्रिक नीति समिति (धारा 45ZB) और नियंत्रण के मौद्रिक, राजकोषीय और आपूर्ति-पक्षीय उपाय।

भाग 1 ने दिखाया कि मुद्रास्फीति कैसे मापी जाती है। यह भाग तीन और प्रश्न पूछता है। कीमतें क्यों बढ़ती हैं? जब वे बढ़ती हैं तो किसे लाभ होता है और किसे हानि? और भारत मुद्रास्फीति को कम और स्थिर रखने का प्रयास कैसे करता है? 2016 से अंतिम प्रश्न के भारत के उत्तर का एक वैधानिक रूप है जिसे मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण कहते हैं: केंद्रीय सरकार उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति के लिए एक संख्यात्मक लक्ष्य तय करती है, और आरबीआई में एक मौद्रिक नीति समिति उसे पाने के लिए नीतिगत ब्याज दर तय करती है। फिर भी आरबीआई अकेला कर्ता नहीं है। भारत में कई मूल्य झटके भोजन या ईंधन से शुरू होते हैं, और इन्हें मुख्य रूप से सरकार बफ़र स्टॉक, व्यापार नियमों और करों के माध्यम से संभालती है।

माँगजनित मुद्रास्फीति तब पैदा होती है जब अर्थव्यवस्था में कुल माँग वस्तुओं और सेवाओं की आपूर्ति करने की अर्थव्यवस्था की क्षमता से तेज़ी से बढ़ती है। माँग इसलिए बढ़ सकती है कि सरकार अपनी वसूली से अधिक खर्च करती है, कि बैंक कम ब्याज दरों पर खुलकर ऋण देते हैं, कि आय तेज़ी से बढ़ती है, या कि मुद्रा आपूर्ति उत्पादन से तेज़ी से बढ़ती है। जब कारखाने और खेत पहले से ही क्षमता के निकट काम कर रहे हों, तो अतिरिक्त खर्च को अतिरिक्त उत्पादन से पूरा नहीं किया जा सकता, इसलिए विक्रेता उसकी जगह कीमतें बढ़ा देते हैं। चूँकि माँगजनित मुद्रास्फीति खर्च से आती है, इसलिए यह खर्च को ठंडा करने वाले उपायों पर प्रतिक्रिया करती है, जैसे ऊँची ब्याज दरें और सख़्त सरकारी बजट।

लागतजनित मुद्रास्फीति आपूर्ति पक्ष से शुरू होती है। जब वस्तुओं के उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो फ़र्में उसे खरीदारों पर डाल देती हैं, भले ही माँग न बदली हो। सामान्य कारण हैं कच्चे तेल की कीमत में वृद्धि, महँगा कच्चा माल, ऐसी ऊँची मज़दूरी जिसके साथ उत्पादकता नहीं बढ़ी, और रुपये में गिरावट जो आयात को महँगा करती है, जिसे आयातित मुद्रास्फीति कहते हैं। सूखा, बाढ़ या कीट प्रकोप जैसे आपूर्ति झटके फ़सलों का उत्पादन घटाते हैं और खाद्य कीमतें बढ़ाते हैं। भारत में खाद्य मुद्रास्फीति के कई दौर संरचनात्मक भी होते हैं: कमज़ोर भंडारण, शीत शृंखला और परिवहन में कमियाँ, और दालों जैसी फ़सलों की कम उपज आपूर्ति को जल्दी प्रतिक्रिया करने से रोकती हैं। लागतजनित और माँगजनित दबाव एक मज़दूरी-कीमत चक्र में एक-दूसरे को बढ़ा सकते हैं, जिसमें श्रमिक कीमतों के साथ चलने के लिए ऊँची मज़दूरी माँगते हैं और फ़र्में फिर ऊँचे वेतन बिल को पूरा करने के लिए कीमतें बढ़ाती हैं।

मुद्रास्फीति को उसकी गति से भी बताया जाता है। रेंगती मुद्रास्फीति हल्की होती है, हर वर्ष एक अंक की कम वृद्धि जिसे अधिकांश लोग मुश्किल से देखते हैं। चलती या दौड़ती मुद्रास्फीति मध्यम पर ध्यान देने योग्य होती है और निर्णयों को प्रभावित करने लगती है। सरपट मुद्रास्फीति वर्ष में दो या तीन अंकों तक पहुँचती है, और मुद्रा मूल्य संचय के साधन के रूप में अपनी उपयोगिता खोने लगती है। अति-मुद्रास्फीति एक चरम स्थिति है जिसमें कीमतें इतनी तेज़ी से बढ़ती हैं कि लोग पैसा मिलते ही उसे खर्च करने दौड़ते हैं; 1923 में जर्मनी और 2008 में ज़िम्बाब्वे इसके प्रसिद्ध उदाहरण हैं। अधिकांश अर्थशास्त्री कम और स्थिर मुद्रास्फीति को हानिकारक नहीं बल्कि स्वस्थ मानते हैं। इसीलिए भारत का लक्ष्य शून्य नहीं, बल्कि एक धनात्मक संख्या, 4 प्रतिशत, है।

कई संबंधित शब्दों में भ्रम होना आसान है। अपस्फीति कीमतों के सामान्य स्तर में गिरावट है, अर्थात ऋणात्मक मुद्रास्फीति। यह सुनने में सुखद लगती है पर खतरनाक है: लोग कम कीमतों की आशा में खरीद टालते हैं, फ़र्में उत्पादन और नौकरियाँ घटाती हैं, और ऋणों का वास्तविक बोझ बढ़ता है क्योंकि ऋण ऐसे पैसे में चुकाने पड़ते हैं जिसका मूल्य अधिक है; जापान 1990 के दशक के अंत से वर्षों तक गिरती कीमतों से जूझता रहा। अवस्फीति अलग है: मुद्रास्फीति अब भी धनात्मक है पर उसकी दर घट रही है, उदाहरण के लिए 7 प्रतिशत से 4 प्रतिशत, इसलिए कीमतें धीमी गति से बढ़ रही हैं। पुनःस्फीति एक सोचा-समझा नीतिगत प्रयास है, कम ब्याज दरों या अधिक सार्वजनिक खर्च के माध्यम से, ताकि मंदी या अपस्फीति के दौर के बाद कीमतों और उत्पादन को फिर ऊपर उठाया जाए। मुद्रास्फीतिजनित मंदी ऊँची मुद्रास्फीति को ठहरे हुए उत्पादन और ऊँची बेरोज़गारी के साथ जोड़ती है। 1970 के दशक के तेल मूल्य झटकों के बाद कई देशों का यही अनुभव था, और इसका उपचार विशेष रूप से कठिन है क्योंकि एक समस्या का इलाज दूसरी को बिगाड़ देता है।

मुद्रास्फीति और उससे मिलते-जुलते शब्द
शब्दकीमतों के साथ क्या होता हैउत्पादन के साथ क्या होता हैउदाहरण
मुद्रास्फीतिसामान्य स्तर बढ़ता हैबदलता रहता हैसीपीआई का वर्ष में 5 प्रतिशत बढ़ना
अवस्फीतिअब भी बढ़ती हैं, पर धीमेबदलता रहता हैमुद्रास्फीति का 7 से 4 प्रतिशत पर आना
अपस्फीतिसामान्य स्तर गिरता हैप्रायः कमज़ोर1990 के दशक के अंत से जापान
पुनःस्फीतिनीति द्वारा फिर ऊपर धकेली जाती हैंउबरता हुआमंदी के बाद दर कटौती और खर्च
मुद्रास्फीतिजनित मंदीतेज़ी से बढ़ती हैंठहरा हुआ, ऊँची बेरोज़गारी1970 के दशक के तेल झटकों के बाद कई देश
अति-मुद्रास्फीतिअत्यंत तेज़ी से बढ़ती हैंढह जाता हैजर्मनी 1923, ज़िम्बाब्वे 2008

मुद्रास्फीति और रोज़गार के बीच के संबंध को फिलिप्स वक्र में समेटा जाता है। 1958 में अर्थशास्त्री ए.डब्ल्यू. फिलिप्स ने ब्रिटिश आँकड़ों का अध्ययन करते हुए पाया कि कम बेरोज़गारी वाले वर्ष प्रायः तेज़ी से बढ़ती मौद्रिक मज़दूरी वाले वर्ष होते थे, और इसका उलटा भी। एक विकल्प-सूची की तरह पढ़ने पर इसका संकेत था कि सरकार कुछ अधिक मुद्रास्फीति की कीमत पर कम बेरोज़गारी खरीद सकती है। 1970 के दशक की मुद्रास्फीतिजनित मंदी ने यह विचार तोड़ दिया: मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी साथ-साथ बढ़ीं। बाद के अर्थशास्त्रियों ने यह सबक निकाला कि यह समझौता, यदि है भी, तो केवल अल्पकाल में टिकता है। एक बार लोग ऊँची मुद्रास्फीति की अपेक्षा करने लगें, तो वे उसे मज़दूरी की माँगों और कीमतों में शामिल कर लेते हैं, और बेरोज़गारी अपने पहले के स्तर पर लौट आती है जबकि मुद्रास्फीति ऊँची बनी रहती है। इसीलिए आधुनिक केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति की अपेक्षाओं को स्थिर रखने पर इतना ज़ोर देते हैं, और एक स्पष्ट, सार्वजनिक संख्यात्मक लक्ष्य के पीछे यही सोच है।

मुद्रास्फीति सबको बराबर चोट नहीं पहुँचाती; यह क्रय शक्ति को कुछ लोगों से दूसरों की ओर ले जाती है। जब मुद्रास्फीति अपेक्षा से अधिक निकलती है, तो ऋण लेने वालों को प्रायः लाभ और ऋण देने वालों को हानि होती है, क्योंकि ऋण ऐसे रुपयों में चुकाया जाता है जो ऋण लेते समय से कम खरीद पाते हैं। स्थिर मौद्रिक आय वाले लोग, जैसे मूल्य-आधारित वृद्धि के बिना पेंशनभोगी या वे श्रमिक जिनकी मज़दूरी कभी-कभार संशोधित होती है, हानि उठाते हैं। बचत करने वालों को हानि होती है जब उनकी जमा पर ब्याज मुद्रास्फीति दर से कम हो। वास्तविक ब्याज दर लगभग नाममात्र दर घटा मुद्रास्फीति होती है: 5 प्रतिशत मुद्रास्फीति के समय 7 प्रतिशत देने वाली जमा पर वास्तविक प्रतिफल केवल लगभग 2 प्रतिशत है। गरीब, जो अपनी संपत्ति का बड़ा हिस्सा नकद रखते हैं और अपनी आय का अधिकांश भोजन पर खर्च करते हैं, सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, इसीलिए मुद्रास्फीति को कभी-कभी गरीबों पर कर कहा जाता है।

उर्जित पटेल की अध्यक्षता वाली मौद्रिक नीति ढाँचे को संशोधित और सुदृढ़ करने वाली विशेषज्ञ समिति ने 2014 में सिफ़ारिश की कि सीपीआई (संयुक्त) मुद्रास्फीति को नाममात्र आधार बनाया जाए, जिसका लक्ष्य 4 प्रतिशत हो और दोनों ओर 2 प्रतिशत अंक का दायरा हो। फ़रवरी 2015 में सरकार और आरबीआई ने इन्हीं आधारों पर एक मौद्रिक नीति ढाँचा समझौते पर हस्ताक्षर किए, और फिर वित्त अधिनियम, 2016 ने मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण को भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 में लिख दिया। धारा 45ZA के अंतर्गत केंद्रीय सरकार, आरबीआई के परामर्श से, हर पाँच वर्ष में एक बार सीपीआई के रूप में मुद्रास्फीति लक्ष्य निर्धारित करती है और उसे राजपत्र में अधिसूचित करती है। 4 प्रतिशत सीपीआई (संयुक्त) मुद्रास्फीति का लक्ष्य, 6 प्रतिशत की ऊपरी और 2 प्रतिशत की निचली सहन सीमा के साथ, पहली बार 2016 में अधिसूचित हुआ, 2021 में बनाए रखा गया, और 2026 में 1 अप्रैल 2026 से 31 मार्च 2031 की अवधि के लिए फिर बनाए रखा गया।

लक्ष्य के लिए सफलता की एक कसौटी और विफलता की व्याख्या करने का कर्तव्य चाहिए। केंद्रीय सरकार ने विफलता को इस रूप में परिभाषित किया है कि औसत सीपीआई मुद्रास्फीति किन्हीं भी लगातार तीन तिमाहियों तक ऊपरी सहन सीमा से ऊपर या निचली सहन सीमा से नीचे रहे; एक खराब महीना विफलता नहीं है। विफलता होने पर आरबीआई अधिनियम की धारा 45ZN आरबीआई से अपेक्षा करती है कि वह केंद्रीय सरकार को एक रिपोर्ट भेजे जिसमें विफलता के कारण, उसके प्रस्तावित सुधारात्मक कदम, और उस समय का अनुमान हो जिसके भीतर लक्ष्य प्राप्त होगा। इस प्रावधान का पहली बार प्रयोग नवंबर 2022 में हुआ, जब 2022 की पहली तीन तिमाहियों में से हर एक में औसत मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत से ऊपर रही।

दर का निर्णय स्वयं मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) का है, जो आरबीआई अधिनियम की धारा 45ZB के अंतर्गत गठित है; इसकी पहली बैठक अक्तूबर 2016 में हुई। इसके छह सदस्य हैं: अध्यक्ष के रूप में आरबीआई गवर्नर, मौद्रिक नीति के प्रभारी डिप्टी गवर्नर, आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामित आरबीआई का एक अधिकारी, और केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त तीन व्यक्ति। तीन बाहरी सदस्य चार वर्ष तक पद पर रहते हैं और पुनर्नियुक्त नहीं किए जा सकते। एमपीसी को वर्ष में कम से कम चार बार बैठक करनी होती है; व्यवहार में यह लगभग हर दो महीने में बैठती है। चार सदस्यों से गणपूर्ति होती है, हर सदस्य का एक मत होता है, और मत बराबर होने पर गवर्नर का दूसरा या निर्णायक मत होता है। हर बैठक के बाद आरबीआई संकल्प प्रकाशित करता है, और कार्यवृत्त, जिसमें हर सदस्य का मत और वक्तव्य शामिल है, चौदहवें दिन प्रकाशित होता है। आरबीआई हर छह महीने में एक मौद्रिक नीति रिपोर्ट भी प्रकाशित करता है।

मुद्रास्फीति घटाने के लिए एमपीसी नीतिगत रेपो दर बढ़ाती है, वह दर जिस पर आरबीआई बैंकों को कम अवधि के लिए उधार देता है। तब बैंक ऋणों पर अधिक लेते हैं और जमा पर अधिक देते हैं, इसलिए परिवार और फ़र्में कम उधार लेती और कम खर्च करती हैं, और माँग ठंडी पड़ती है। सरकार के अपने साधन हैं। राजकोषीय पक्ष पर वह अपना खर्च या घाटा घटा सकती है, या ईंधन जैसी वस्तुओं पर अप्रत्यक्ष कर घटा सकती है। आपूर्ति पक्ष पर वह खाद्यान्न के बफ़र स्टॉक रखती है और भारतीय खाद्य निगम के माध्यम से उन्हें खुले बाज़ार में बेचती है, मूल्य स्थिरीकरण कोष के माध्यम से प्याज़ और दालों का भंडार बनाती है, आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत व्यापारियों पर भंडार सीमा लगाती है, शुल्क घटाकर आयात आसान करती है, और निर्यात पर रोक लगाती है, जैसे जुलाई 2023 में गैर-बासमती सफ़ेद चावल के निर्यात पर प्रतिबंध।

अब टुकड़े आपस में जुड़ जाते हैं। भारत का उत्तर कानून में तय एक श्रम-विभाजन है: केंद्रीय सरकार हर पाँच वर्ष में 2 से 6 प्रतिशत के दायरे के साथ 4 प्रतिशत सीपीआई (संयुक्त) मुद्रास्फीति का लक्ष्य तय करती है; छह सदस्यों वाली एमपीसी रेपो दर का प्रयोग करके माँग को उसकी ओर ले जाती है, और लगातार तीन तिमाहियों तक चलने वाली किसी भी विफलता की व्याख्या करती है; और सरकार खाद्य भंडार, करों और व्यापार उपायों से आपूर्ति पक्ष संभालती है। मौद्रिक और आपूर्ति उपाय साथ मिलकर सबसे अच्छा काम करते हैं, क्योंकि ब्याज दरें दालें नहीं उगा सकतीं और बफ़र स्टॉक ज़रूरत से ज़्यादा गर्म अर्थव्यवस्था को ठंडा नहीं कर सकते।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 के अंतर्गत मुद्रास्फीति लक्ष्य कौन निर्धारित करता है?

  1. मौद्रिक नीति समिति
  2. आरबीआई का केंद्रीय बोर्ड
  3. आरबीआई के परामर्श से केंद्रीय सरकार
  4. संसद एक संकल्प द्वारा
उत्तर देखें

उत्तर: C. आरबीआई के परामर्श से केंद्रीय सरकार

धारा 45ZA यह शक्ति केंद्रीय सरकार को, आरबीआई के परामर्श से, हर पाँच वर्ष में एक बार देती है। एमपीसी लक्ष्य पाने के लिए नीतिगत दर तय करती है पर लक्ष्य तय नहीं करती; आरबीआई के केंद्रीय बोर्ड की इसे तय करने में कोई भूमिका नहीं; और संसद इस पर कोई संकल्प पारित नहीं करती।

Q2. मौद्रिक नीति समिति के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसके छह सदस्य हैं, जिनमें से तीन केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त होते हैं।
2. मत बराबर होने पर आरबीआई गवर्नर का दूसरा या निर्णायक मत होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों कथन सही हैं: एमपीसी में गवर्नर, एक डिप्टी गवर्नर और आरबीआई का एक अधिकारी तथा केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त तीन सदस्य होते हैं, और गवर्नर निर्णायक मत से बराबरी तोड़ते हैं। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'न तो 1, न ही 2' तीनों गलत हैं।

Q3. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I: A. अपस्फीति B. अवस्फीति C. मुद्रास्फीतिजनित मंदी
सूची II: 1. मुद्रास्फीति दर घटती है पर धनात्मक रहती है 2. ठहरे उत्पादन के साथ ऊँची मुद्रास्फीति 3. कीमतों के सामान्य स्तर में गिरावट
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-1, B-3, C-2
  2. A-3, B-1, C-2
  3. A-3, B-2, C-1
  4. A-2, B-1, C-3
उत्तर देखें

उत्तर: B. A-3, B-1, C-2

अपस्फीति कीमत स्तर में गिरावट है (A-3), अवस्फीति धीमी पर धनात्मक मुद्रास्फीति दर (B-1), और मुद्रास्फीतिजनित मंदी ठहराव के साथ ऊँची मुद्रास्फीति (C-2)। पहला कूट अपस्फीति और अवस्फीति को उलट देता है; तीसरा अवस्फीति और मुद्रास्फीतिजनित मंदी को; चौथा अपस्फीति को मुद्रास्फीतिजनित मंदी का अर्थ दे देता है।

Q4. मुद्रास्फीति लक्ष्यीकरण ढाँचे के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यदि किसी एक महीने में सीपीआई मुद्रास्फीति 6 प्रतिशत से अधिक हो, तो आरबीआई विफल माना जाता है।
2. विफलता पर आरबीआई को केंद्रीय सरकार को कारण, प्रस्तावित सुधारात्मक कदम और लक्ष्य प्राप्त होने का समय बताना होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: विफलता का अर्थ है लगातार तीन तिमाहियों तक औसत मुद्रास्फीति का 2-6 प्रतिशत के दायरे से बाहर रहना। कथन 2 धारा 45ZN के अंतर्गत सही है। इसलिए 'केवल 1' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 2 को छोड़ देता है।

Q5. अपेक्षा से अधिक निकलने वाली मुद्रास्फीति सामान्यतः किसे लाभ पहुँचाती है?

  1. स्थिर दर पर ऋण देने वाले ऋणदाता
  2. स्थिर दर पर ऋण लेने वाले
  3. स्थिर मौद्रिक पेंशन वाले पेंशनभोगी
  4. नकद रखने वाले बचतकर्ता
उत्तर देखें

उत्तर: B. स्थिर दर पर ऋण लेने वाले

ऋण लेने वाले ऐसे रुपयों में चुकाते हैं जो कम खरीद पाते हैं, इसलिए उन्हें लाभ होता है। ऋणदाताओं को कम वास्तविक मूल्य की वापसी मिलती है, स्थिर मौद्रिक पेंशन वाले उतनी ही राशि से कम खरीद पाते हैं, और नकद की क्रय शक्ति घटती है, इसलिए बाकी तीनों को हानि होती है।

Q6. निम्नलिखित में से कौन-सा लागतजनित मुद्रास्फीति का उदाहरण है?

  1. वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ाती है
  2. लाखों कर्मचारियों की बड़ी वेतन वृद्धि खर्च बढ़ाती है
  3. बैंक कम ब्याज दरों पर खुलकर ऋण देते हैं
  4. आयकर में कटौती परिवारों का उपभोग बढ़ाती है
उत्तर देखें

उत्तर: A. वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ाती है

कच्चे तेल की लागत में वृद्धि उत्पादन लागत बढ़ाती है, जो लागतजनित है। बाकी तीन खर्च या माँग बढ़ाते हैं: वेतन वृद्धि, सस्ता ऋण और कर कटौती सभी माँगजनित मुद्रास्फीति के स्रोत हैं।

Q7. फिलिप्स वक्र किसके बीच के संबंध का वर्णन करता है?

  1. कर दरों और कर राजस्व
  2. बेरोज़गारी और मुद्रास्फीति की दर
  3. आय और खर्च में भोजन का हिस्सा
  4. ब्याज दरों और विनिमय दरों
उत्तर देखें

उत्तर: B. बेरोज़गारी और मुद्रास्फीति की दर

फिलिप्स वक्र बेरोज़गारी को मज़दूरी और कीमतों की मुद्रास्फीति दर से जोड़ता है, जो अल्पकालिक समझौते का संकेत देता है। कर दरों और राजस्व का संबंध लाफ़र वक्र है; आय बढ़ने पर भोजन का घटता हिस्सा एंगेल का नियम है; ब्याज और विनिमय दरें बाह्य क्षेत्र का अलग विषय हैं।

Q8. खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रित करने के लिए निम्नलिखित में से कौन-से आपूर्ति-पक्षीय उपाय हैं?
1. भारतीय खाद्य निगम द्वारा खाद्यान्न की खुले बाज़ार में बिक्री
2. नीतिगत रेपो दर में वृद्धि
3. आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 के अंतर्गत व्यापारियों पर भंडार सीमा
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 3

खुले बाज़ार में बिक्री और भंडार सीमा भोजन की आपूर्ति पर काम करती हैं, इसलिए 1 और 3 आपूर्ति-पक्षीय हैं। ऊँची रेपो दर एक मौद्रिक उपाय है जो माँग पर काम करता है, इसलिए 2 वाला हर विकल्प गलत है।

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