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उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्रिपरिषद और महान्यायवादी

संघ की कार्यपालिका · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, हटाया जाना और राष्ट्रपति के रूप में कार्य; प्रधानमंत्री की नियुक्ति; मंत्रिपरिषद, उसके आकार की सीमा और लोक सभा के प्रति सामूहिक उत्तरदायित्व; सरकारी कार्य का संचालन; और महान्यायवादी।

भाग 1 में देखा गया कि राष्ट्रपति संघ की कार्यपालिका का औपचारिक प्रमुख है पर सलाह पर कार्य करता है। यह भाग भाग 5 के अन्य कार्यपालक पदों पर आसीन व्यक्तियों की ओर मुड़ता है। उपराष्ट्रपति दूसरा सर्वोच्च पद है, मुख्यतः राज्य सभा के पीठासीन अधिकारी के रूप में और राष्ट्रपति के स्थानापन्न के रूप में। वास्तविक कार्यपालिका प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली मंत्रिपरिषद है, जो राष्ट्रपति के नाम से शासन करती है और तभी तक पद पर रहती है जब तक उसे लोक सभा का विश्वास प्राप्त है। अंत में, महान्यायवादी सरकार का मुख्य विधि सलाहकार है। इनमें से प्रत्येक को कौन चुनता है, कौन हटा सकता है और वे किसके प्रति उत्तरदायी हैं, यही इस भाग का सार है।

अनुच्छेद 63 कहता है कि भारत का एक उपराष्ट्रपति होगा, और अनुच्छेद 64 उपराष्ट्रपति को राज्य सभा का पदेन सभापति बनाता है; इस पद का अपना कोई अलग वेतन नहीं है, और उपराष्ट्रपति को सभापति के रूप में वेतन मिलता है। अनुच्छेद 66 के अधीन उपराष्ट्रपति का निर्वाचन संसद के दोनों सदनों के सदस्यों से मिलकर बने निर्वाचकगण द्वारा, आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा और गुप्त मतदान से होता है। इससे राष्ट्रपति के निर्वाचन से दो अंतर निकलते हैं: संसद के नामनिर्देशित सदस्य मत देते हैं, और राज्य विधान सभाओं के सदस्य मत नहीं देते। 11वें संशोधन (1961) ने मूल शब्दों, अर्थात दोनों सदनों की संयुक्त बैठक, के स्थान पर यह निर्वाचकगण रखा। राष्ट्रपति की तरह, निर्वाचन संबंधी विवाद केवल उच्चतम न्यायालय में जाते हैं (अनुच्छेद 71)।

उपराष्ट्रपति बनने के लिए व्यक्ति को भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष का और राज्य सभा का सदस्य निर्वाचित होने के योग्य होना चाहिए (अनुच्छेद 66(3)), और वह कोई लाभ का पद धारण न करता हो। संसद या किसी राज्य विधान-मंडल का कोई सदस्य निर्वाचित होने पर पद ग्रहण करते ही वह स्थान रिक्त कर देता है। शपथ राष्ट्रपति के समक्ष ली जाती है (अनुच्छेद 69)। पदावधि पाँच वर्ष है, पर उपराष्ट्रपति उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक पद पर बना रहता है, और राष्ट्रपति को लिखकर पद त्याग सकता है। अनुच्छेद 67(ख) के अधीन हटाना महाभियोग से सरल है: राज्य सभा का ऐसा संकल्प जो उसके तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित हो और जिससे लोक सभा सहमत हो, जिसे कम से कम 14 दिन की सूचना के बाद प्रस्तावित किया गया हो। संविधान हटाने का कोई आधार नहीं बताता। 1952 के निर्वाचन अधिनियम के अधीन किसी नामांकन के लिए 20 निर्वाचक प्रस्तावक और 20 समर्थक चाहिए।

अनुच्छेद 65 उपराष्ट्रपति को दो स्थितियों में राष्ट्रपति का स्थानापन्न बनाता है। जब राष्ट्रपति का पद मृत्यु, पदत्याग, पद से हटाए जाने या अन्य कारण से रिक्त होता है, तब उपराष्ट्रपति नए राष्ट्रपति के, जिसका निर्वाचन छह मास के भीतर होना है, पद ग्रहण करने तक राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। जब राष्ट्रपति अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो, तब उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के कार्यभार फिर से सँभालने तक उनका निर्वहन करता है। उस अवधि में उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और उपलब्धियाँ प्राप्त होती हैं, वह राज्य सभा के सभापति के कर्तव्यों का पालन नहीं करता और सभापति का वेतन नहीं लेता; उसके स्थान पर उपसभापति पीठासीन होता है। यह पद अमेरिकी उपराष्ट्रपति के पद जैसा है, पर एक मुख्य अंतर के साथ: भारत का उपराष्ट्रपति शेष पदावधि के लिए राष्ट्रपति नहीं बन जाता, केवल नए राष्ट्रपति के निर्वाचन तक कार्य करता है।

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की तुलना
बिंदुराष्ट्रपतिउपराष्ट्रपति
निर्वाचकगणनिर्वाचित सांसद और राज्यों, दिल्ली व पुडुचेरी के निर्वाचित विधायक (अनु. 54)संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्य (अनु. 66)
नामनिर्देशित सांसद मत देते हैं?नहींहाँ
किसके निर्वाचन के योग्यलोक सभा (अनु. 58)राज्य सभा (अनु. 66)
शपथ किसके समक्षभारत का मुख्य न्यायमूर्ति (अनु. 60)राष्ट्रपति (अनु. 69)
पदत्याग किसे संबोधितउपराष्ट्रपतिराष्ट्रपति
पद से हटानासंविधान के अतिक्रमण पर महाभियोग, प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई (अनु. 61)राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से संकल्प, लोक सभा की सहमति; कोई आधार नहीं बताया (अनु. 67)
प्रस्तावक और समर्थक (1952 अधिनियम)50 और 5020 और 20

अनुच्छेद 75(1) केवल यह कहता है कि प्रधानमंत्री की नियुक्ति राष्ट्रपति करेगा; संविधान कोई प्रक्रिया नहीं बताता। परिपाटी के अनुसार राष्ट्रपति उस दल या गठबंधन के नेता को आमंत्रित करता है जिसे लोक सभा में बहुमत प्राप्त हो। जब किसी को स्पष्ट बहुमत न हो, तब राष्ट्रपति अपने निर्णय का प्रयोग करता है और नियुक्त व्यक्ति से नियत समय में सदन में बहुमत सिद्ध करने को कह सकता है। जुलाई 1979 में राष्ट्रपति एन. संजीव रेड्डी ने चरण सिंह को नियुक्त किया, जिन्होंने लोक सभा का सामना किए बिना अगले ही महीने पद त्याग दिया। प्रधानमंत्री किसी भी सदन का सदस्य हो सकता है: 1966 में इंदिरा गांधी और मनमोहन सिंह राज्य सभा के सदस्य थे। जो व्यक्ति किसी भी सदन का सदस्य नहीं है उसे नियुक्त किया जा सकता है, पर उसे छह मास के भीतर सदस्य बनना होगा (अनुच्छेद 75(5)); 1996 में एच.डी. देवेगौड़ा इसी प्रकार नियुक्त हुए थे।

प्रधानमंत्री राष्ट्रपति और मंत्रिपरिषद के बीच की कड़ी है। अनुच्छेद 78 प्रधानमंत्री पर तीन कर्तव्य डालता है: संघ के प्रशासन संबंधी और विधान विषयक प्रस्थापनाओं संबंधी मंत्रिपरिषद के सभी विनिश्चय राष्ट्रपति को संसूचित करना; इनके बारे में ऐसी जानकारी देना जो राष्ट्रपति माँगे; और, यदि राष्ट्रपति अपेक्षा करे, किसी ऐसे विषय को मंत्रिपरिषद के विचार के लिए रखना जिस पर किसी मंत्री ने विनिश्चय कर दिया है पर मंत्रिपरिषद ने विचार नहीं किया है। इन लिखित कर्तव्यों के अलावा, प्रधानमंत्री की शक्ति स्वयं संसदीय प्रणाली से आती है: अन्य मंत्री प्रधानमंत्री की सलाह पर नियुक्त किए और हटाए जाते हैं, विभाग प्रधानमंत्री आवंटित करता है, और प्रधानमंत्री मंत्रिमंडल की अध्यक्षता करता है। चूँकि मंत्रिपरिषद अपने प्रधान के इर्द-गिर्द बनी होती है, प्रधानमंत्री की मृत्यु या पदत्याग से पूरी मंत्रिपरिषद समाप्त हो जाती है।

संविधान केवल मंत्रिपरिषद की बात करता है; इसकी श्रेणियाँ व्यवहार से बनी हैं। कैबिनेट मंत्री सबसे महत्वपूर्ण मंत्रालयों के प्रमुख होते हैं और मिलकर मंत्रिमंडल बनाते हैं, जो बड़े निर्णय लेने वाला आंतरिक निकाय है। राज्य मंत्री किसी मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार रख सकते हैं या किसी कैबिनेट मंत्री के अधीन काम कर सकते हैं, और उप मंत्री अन्य मंत्रियों की सहायता करते हैं। 'मंत्रिमंडल' शब्द संविधान में केवल 44वें संशोधन (1978) से अनुच्छेद 352 में आया, जो राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा से पहले मंत्रिमंडल के लिखित विनिश्चय की अपेक्षा करता है। मंत्रियों की नियुक्ति राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर करता है (अनुच्छेद 75(1)) और वे राष्ट्रपति के समक्ष शपथ लेते हैं। जो मंत्री लगातार छह मास तक किसी भी सदन का सदस्य नहीं रहता, वह मंत्री नहीं रहता (अनुच्छेद 75(5)), और एस.आर. चौधरी बनाम पंजाब राज्य (2001) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि ऐसे व्यक्ति को निर्वाचित हुए बिना बार-बार फिर से नियुक्त नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 88 के अधीन हर मंत्री दोनों सदनों में बोल सकता है पर मत केवल उसी सदन में देता है जिसका वह सदस्य है।

91वें संशोधन (2003) ने मंत्रालयों पर दो सीमाएँ लगाईं। पहली, अनुच्छेद 75(1क) प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या को लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत तक सीमित करता है; अनुच्छेद 164(1क) किसी राज्य के लिए उसकी विधान सभा के आधार पर यही 15 प्रतिशत की सीमा रखता है, और न्यूनतम 12 मंत्री। दूसरी, अनुच्छेद 75(1ख) कहता है कि किसी भी सदन का जो सदस्य दल परिवर्तन के कारण दसवीं अनुसूची के अधीन निरर्हित हो, उसे अपनी पदावधि की समाप्ति तक या फिर से निर्वाचित होने तक, जो भी पहले हो, मंत्री नियुक्त नहीं किया जा सकता। उद्देश्य यह था कि बहुत बड़े मंत्रालयों का उपयोग दल बदलने वालों को पुरस्कृत करने और अस्थिर गठबंधनों को बाँधे रखने के लिए न हो। मान लीजिए किसी राज्य की विधान सभा में 60 सदस्य हैं: 15 प्रतिशत से केवल 9 मंत्री होते, इसलिए उसके स्थान पर न्यूनतम 12 की सीमा लागू होती है।

अनुच्छेद 75(3) मंत्रिपरिषद को लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है, और यह सामूहिक उत्तरदायित्व संसदीय प्रणाली का केंद्र है। इसका अर्थ है कि मंत्री साथ टिकते हैं या साथ गिरते हैं: यदि लोक सभा अविश्वास प्रस्ताव पारित कर दे, या विश्वास प्रस्ताव या सरकार का कोई बड़ा विधेयक अस्वीकार कर दे, तो केवल संबंधित मंत्री नहीं, पूरी मंत्रिपरिषद को पद त्यागना होता है। इसका यह भी अर्थ है कि मंत्रिमंडल का निर्णय हर मंत्री को बाँधता है, उन्हें भी जिन्होंने निजी तौर पर उसका विरोध किया था; जो मंत्री सार्वजनिक रूप से उसका बचाव न कर सके, उससे पद त्यागने की अपेक्षा की जाती है। उत्तरदायित्व केवल लोक सभा के प्रति है, क्योंकि उसे जनता सीधे चुनती है; राज्य सभा सरकार को नहीं हटा सकती। पहला अविश्वास प्रस्ताव अगस्त 1963 में नेहरू सरकार के विरुद्ध लाया गया था, और अप्रैल 1999 में वाजपेयी सरकार एक मत से विश्वास मत हारकर गिर गई।

सामूहिक उत्तरदायित्व के साथ व्यक्तिगत उत्तरदायित्व भी चलता है। अनुच्छेद 75(2) के अधीन मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं, और चूँकि राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह पर कार्य करता है, प्रधानमंत्री किसी भी मंत्री से पद त्यागने को कह सकता है या उसे बर्खास्त करवा सकता है, उदाहरण के लिए उस मंत्री के विभाग की किसी विफलता पर। किंतु भारत में मंत्रियों का कोई विधिक उत्तरदायित्व नहीं है। ब्रिटेन में क्राउन के आदेश पर किसी मंत्री का प्रतिहस्ताक्षर आवश्यक है, जो फिर विधि में उसके लिए उत्तरदायी होता है; भारतीय संविधान में ऐसी कोई अपेक्षा नहीं है, और अनुच्छेद 74(2) न्यायालयों को यह पूछने से रोकता है कि मंत्रियों ने क्या सलाह दी। काम का बँटवारा अनुच्छेद 77 से होता है: सारी कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की हुई कही जाती है, आदेश नियमों में बताई रीति से अधिप्रमाणित होते हैं, और राष्ट्रपति कार्य के सुविधापूर्वक संव्यवहार और मंत्रियों में उसके आवंटन के लिए नियम बनाता है। ये भारत सरकार (कार्य आवंटन) नियम, 1961 और भारत सरकार (कार्य संव्यवहार) नियम, 1961 हैं।

अनुच्छेद 76 महान्यायवादी का पद सृजित करता है, जो भारत सरकार का सर्वोच्च विधि अधिकारी है। राष्ट्रपति ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करता है जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य हो, अर्थात ऐसा नागरिक जो पाँच वर्ष उच्च न्यायालय का न्यायाधीश या दस वर्ष उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो, या राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता हो। महान्यायवादी राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित विधिक विषयों पर भारत सरकार को सलाह देता है, विधिक स्वरूप के अन्य कर्तव्य करता है, उसे भारत के सभी न्यायालयों में सुनवाई का अधिकार है, और वह राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है; संविधान में कोई नियत पदावधि नहीं है। अनुच्छेद 88 के अधीन महान्यायवादी किसी भी सदन, संयुक्त बैठक या समिति की कार्यवाही में बोल और भाग ले सकता है, पर उसे मत का अधिकार नहीं है, और अनुच्छेद 105(4) संसदीय विशेषाधिकार इस पद पर भी लागू करता है। महान्यायवादी मंत्रिमंडल का सदस्य नहीं होता। महासॉलिसिटर और अपर महासॉलिसिटर महान्यायवादी की सहायता करते हैं, पर उनके पद संविधान द्वारा सृजित नहीं हैं; राज्य में इसका समकक्ष महाधिवक्ता है (अनुच्छेद 165)।

कुल मिलाकर, भाग 5 एक स्पष्ट श्रृंखला वाली संसदीय कार्यपालिका बनाता है। जनता लोक सभा चुनती है; प्रधानमंत्री वह नेता है जिसे उसका बहुमत प्राप्त है; मंत्रिपरिषद राष्ट्रपति के नाम से शासन करती है पर लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी है और उसके द्वारा कभी भी हटाई जा सकती है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति परोक्ष रूप से चुने जाते हैं और नियत पदावधि धारण करते हैं, जो उन्हें दिन-प्रतिदिन की राजनीति से ऊपर रखता है, जबकि महान्यायवादी सरकार को स्वतंत्र विधिक सलाह देता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत के उपराष्ट्रपति के निर्वाचन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद के नामनिर्देशित सदस्यों को निर्वाचन में मत का अधिकार है।
2. राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को निर्वाचन में मत का अधिकार है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

अनुच्छेद 66 संसद के दोनों सदनों के सभी सदस्यों को, नामनिर्देशित सदस्यों सहित, मत देता है, इसलिए कथन 1 सही है। राज्य विधायक राष्ट्रपति के लिए मत देते हैं, उपराष्ट्रपति के लिए नहीं, इसलिए कथन 2 गलत है। अतः 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q2. भारत के उपराष्ट्रपति को पद से हटाया जा सकता है:

  1. संविधान के अतिक्रमण के आधार पर दोनों सदनों द्वारा महाभियोग से
  2. राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित और लोक सभा द्वारा सहमत संकल्प से
  3. लोक सभा के दो-तिहाई बहुमत से पारित और राज्य सभा द्वारा सहमत संकल्प से
  4. मंत्रिपरिषद की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा
उत्तर देखें

उत्तर: B. राज्य सभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित और लोक सभा द्वारा सहमत संकल्प से

अनुच्छेद 67(ख): संकल्प राज्य सभा में आरंभ होता है, उसके तत्कालीन समस्त सदस्यों का बहुमत चाहिए, लोक सभा की सहमति चाहिए, और 14 दिन की सूचना चाहिए। महाभियोग राष्ट्रपति पर लागू होता है, उपराष्ट्रपति पर नहीं; लोक सभा संकल्प आरंभ नहीं कर सकती; और राष्ट्रपति को उपराष्ट्रपति को हटाने की कोई शक्ति नहीं है।

Q3. संविधान (इक्यानबेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2003 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्रधानमंत्री सहित मंत्रियों की कुल संख्या संसद के दोनों सदनों के सदस्यों की कुल संख्या के 15 प्रतिशत से अधिक नहीं होगी।
2. किसी राज्य में मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों की संख्या 12 से कम नहीं होगी।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 75(1क) 15 प्रतिशत की सीमा केवल लोक सभा के आधार पर मापता है, दोनों सदनों के आधार पर नहीं। अनुच्छेद 164(1क) के परंतुक के अधीन कथन 2 सही है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q4. भारत के संविधान के अधीन मंत्रिपरिषद सामूहिक रूप से उत्तरदायी है:

  1. राष्ट्रपति के प्रति
  2. संपूर्ण संसद के प्रति
  3. लोक सभा के प्रति
  4. प्रधानमंत्री के प्रति
उत्तर देखें

उत्तर: C. लोक सभा के प्रति

अनुच्छेद 75(3) मंत्रिपरिषद को केवल लोक सभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी बनाता है। मंत्री राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करते हैं (अनुच्छेद 75(2)), पर वह व्यक्तिगत पदावधि है, सामूहिक उत्तरदायित्व नहीं; राज्य सभा सरकार को नहीं हटा सकती, इसलिए 'संपूर्ण संसद' गलत है; और प्रधानमंत्री मंत्रिपरिषद का प्रधान है, वह निकाय नहीं जिसके प्रति वह उत्तरदायी है।

Q5. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 67
B. अनुच्छेद 75(5)
C. अनुच्छेद 76
D. अनुच्छेद 78
सूची II (विषय)
1. भारत का महान्यायवादी
2. राष्ट्रपति को जानकारी देने के बारे में प्रधानमंत्री के कर्तव्य
3. उपराष्ट्रपति की पदावधि और पद से हटाया जाना
4. वह मंत्री जो लगातार छह मास तक संसद का सदस्य नहीं है
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-3, B-4, C-1, D-2
  2. A-4, B-3, C-1, D-2
  3. A-3, B-4, C-2, D-1
  4. A-1, B-4, C-3, D-2
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-3, B-4, C-1, D-2

अनुच्छेद 67 उपराष्ट्रपति की पदावधि और हटाने, 75(5) गैर-सदस्य मंत्रियों के छह मास के नियम, 76 महान्यायवादी और 78 प्रधानमंत्री के कर्तव्यों से संबंधित है। दूसरा कूट 67 और 75(5) को आपस में बदल देता है, तीसरा 76 और 78 को, और चौथा महान्यायवादी को अनुच्छेद 67 के सामने रखता है।

Q6. भारत के महान्यायवादी के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महान्यायवादी पाँच वर्ष की नियत पदावधि के लिए पद धारण करता है।
2. महान्यायवादी संसद के किसी भी सदन की कार्यवाही में भाग ले सकता है पर उसे मत देने का अधिकार नहीं है।
3. महान्यायवादी को उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने के योग्य होना चाहिए।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2 और 3

कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 76(4) कहता है कि महान्यायवादी राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत पद धारण करता है, कोई नियत पदावधि नहीं है। कथन 2 अनुच्छेद 88 से और कथन 3 अनुच्छेद 76(1) से आता है। इसलिए 1 वाला हर कूट गलत है।

Q7. 'मंत्रिमंडल' शब्द भारत के संविधान में जोड़ा गया:

  1. 42वें संशोधन द्वारा, अनुच्छेद 74 में
  2. 44वें संशोधन द्वारा, अनुच्छेद 352 में
  3. 91वें संशोधन द्वारा, अनुच्छेद 75 में
  4. यह 1950 से अनुच्छेद 75 में है
उत्तर देखें

उत्तर: B. 44वें संशोधन द्वारा, अनुच्छेद 352 में

44वें संशोधन (1978) ने अनुच्छेद 352 के अधीन राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा से पहले संघ के मंत्रिमंडल के लिखित विनिश्चय की अपेक्षा रखी, जिससे यह शब्द संविधान में आया। 42वें संशोधन ने अनुच्छेद 74 में इस शब्द के बिना मंत्रियों की सलाह को बाध्यकारी बनाया; 91वें संशोधन ने मंत्रिपरिषद का आकार सीमित किया; और मूल संविधान केवल मंत्रिपरिषद की बात करता था।

Q8. जब भारत का उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा हो, तब उपराष्ट्रपति:

  1. राज्य सभा में पीठासीन रहता है
  2. राज्य सभा के सभापति का वेतन लेता है
  3. राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और उपलब्धियाँ रखता है
  4. पूर्व राष्ट्रपति की शेष पदावधि के लिए राष्ट्रपति बन जाता है
उत्तर देखें

उत्तर: C. राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और उपलब्धियाँ रखता है

अनुच्छेद 65(3) कार्यरत उपराष्ट्रपति को राष्ट्रपति की सभी शक्तियाँ, उन्मुक्तियाँ और उपलब्धियाँ देता है। अनुच्छेद 64 के अधीन उस अवधि में उपराष्ट्रपति सभापति के कर्तव्य नहीं करता और सभापति का वेतन नहीं लेता, और अनुच्छेद 62 छह मास के भीतर नए राष्ट्रपति का निर्वाचन अपेक्षित करता है, इसलिए उपराष्ट्रपति पूर्व राष्ट्रपति की पदावधि पूरी नहीं करता।

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