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राष्ट्रपति
राष्ट्रपति का निर्वाचन कैसे होता है, कौन खड़ा हो सकता है, पद कैसे रिक्त और भरा जाता है, महाभियोग, राष्ट्रपति की कार्यपालिका और विधायी शक्तियाँ, वीटो, अध्यादेश, क्षमादान शक्ति और अनुच्छेद 74 के अधीन राष्ट्रपति की वास्तविक स्थिति।
भाग 5 का अध्याय 1 (अनुच्छेद 52 से 78) संघ की कार्यपालिका स्थापित करता है। अनुच्छेद 52 कहता है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा, और अनुच्छेद 53 संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित करता है, जिसका प्रयोग वह स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के द्वारा करेगा; रक्षा बलों का सर्वोच्च समादेश भी राष्ट्रपति में निहित है। फिर भी भारत ने ब्रिटिश प्रतिमान पर संसदीय प्रणाली चुनी, जिसमें राज्य का प्रमुख सत्ता का औपचारिक स्रोत होता है जबकि लोक सभा के प्रति उत्तरदायी मंत्री वास्तव में शासन करते हैं। यह भाग बताता है कि राष्ट्रपति कैसे चुना और हटाया जाता है, और उसकी व्यापक शक्तियाँ वास्तव में कितनी उसकी अपनी हैं।
राष्ट्रपति का निर्वाचन अप्रत्यक्ष रूप से एक निर्वाचकगण (अनुच्छेद 54) द्वारा होता है, जिसमें संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य और राज्यों की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य होते हैं। 70वें संशोधन (1992) ने राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली और संघ राज्यक्षेत्र पुडुचेरी की विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को जोड़ा। संसद के नामनिर्देशित सदस्यों और राज्य विधान परिषदों के सदस्यों को मत का अधिकार नहीं है। राज्य विधान सभाओं को शामिल करने से राष्ट्रपति संघ के साथ राज्यों का भी प्रतिनिधि बनता है, जबकि अप्रत्यक्ष निर्वाचन राज्य के प्रमुख को ऐसा जन-जनादेश देने से बचाता है जो लोक सभा के प्रति उत्तरदायी मंत्रियों से होड़ कर सके। मतदान आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा, गुप्त मतदान से होता है (अनुच्छेद 55(3))। निर्वाचन संबंधी विवादों का निर्णय केवल उच्चतम न्यायालय करता है (अनुच्छेद 71)।
अनुच्छेद 55 मतों के मूल्य में दो प्रकार का संतुलन माँगता है। राज्यों के बीच एकरूपता होनी चाहिए: किसी विधायक के मत का मूल्य राज्य की जनसंख्या को उसकी विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या से भाग देकर, फिर 1,000 से भाग देने पर मिलता है। राज्यों और संघ के बीच समतुल्यता होनी चाहिए: सभी विधायकों के मतों के कुल मूल्य को संसद के निर्वाचित सदस्यों की कुल संख्या से भाग देने पर एक सांसद के मत का मूल्य मिलता है। इसलिए उत्तर प्रदेश जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य का विधायक सिक्किम के विधायक से भारी मत डालता है, फिर भी संसद का कुल भार लगभग सभी विधान सभाओं के बराबर रहता है। 84वें संशोधन (2001) से, पहली ऐसी जनगणना के आँकड़े प्रकाशित होने तक जो 2026 के बाद हो, 1971 की जनगणना की जनसंख्या का प्रयोग होता है। राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति निर्वाचन अधिनियम, 1952 के अधीन किसी नामांकन के लिए कम से कम 50 निर्वाचक प्रस्तावक और 50 समर्थक चाहिए।
अनुच्छेद 58 बताता है कि कौन खड़ा हो सकता है: भारत का नागरिक, कम से कम 35 वर्ष की आयु का, लोक सभा के सदस्य के रूप में निर्वाचित होने के लिए अर्हित, और भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के अधीन कोई लाभ का पद धारण न करने वाला। इस प्रयोजन के लिए राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, राज्यपाल और संघ या राज्य के मंत्री के पद लाभ के पद नहीं माने जाते। अनुच्छेद 59 के अधीन राष्ट्रपति संसद या किसी राज्य विधान-मंडल का सदस्य नहीं हो सकता; निर्वाचित होने वाला सदस्य पद ग्रहण करने पर अपना स्थान रिक्त कर देता है। अनुच्छेद 60 के अधीन शपथ भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष ली जाती है, और राष्ट्रपति संविधान और विधि के परिरक्षण, संरक्षण और प्रतिरक्षण की शपथ लेता है। पदावधि पद ग्रहण की तारीख से पाँच वर्ष है (अनुच्छेद 56)। राष्ट्रपति उपराष्ट्रपति को लिखकर पद त्याग सकता है। अनुच्छेद 57 पुनर्निर्वाचन की अनुमति देता है; राजेंद्र प्रसाद एकमात्र राष्ट्रपति हैं जो पुनः निर्वाचित हुए।
पदावधि समाप्त होने से पहले राष्ट्रपति को हटाने का एकमात्र मार्ग अनुच्छेद 61 के अधीन महाभियोग है, और इसका एकमात्र आधार 'संविधान का अतिक्रमण' है। आरोप किसी भी सदन में आरंभ हो सकता है। संकल्प केवल कम से कम 14 दिन की लिखित सूचना के बाद प्रस्तावित किया जा सकता है, जिस पर उस सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम एक-चौथाई सदस्यों के हस्ताक्षर हों, और उसे सदन की कुल सदस्य संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए। फिर दूसरा सदन आरोप का अन्वेषण करता है, और राष्ट्रपति को उपस्थित होने और प्रतिनिधित्व कराने का अधिकार है। यदि वह सदन भी अपनी कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई से संकल्प पारित करे कि आरोप सिद्ध है, तो राष्ट्रपति उस संकल्प की तारीख से पद से हट जाता है। राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य, जो राष्ट्रपति के निर्वाचन में भाग लेते हैं, इसमें भाग नहीं लेते, जबकि संसद के नामनिर्देशित सदस्य, जिन्हें निर्वाचन में मत नहीं मिलता, इसमें भाग लेते हैं। अब तक भारत के किसी राष्ट्रपति पर महाभियोग नहीं चला है।
जब पद रिक्त होता है, तो अनुच्छेद 62 समय-सारणी तय करता है। पदावधि की समाप्ति से होने वाली रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचन पदावधि समाप्त होने से पहले पूरा होना चाहिए। मृत्यु, पदत्याग, पद से हटाए जाने या अन्यथा होने वाली रिक्ति छह महीने के भीतर भरी जानी चाहिए, और निर्वाचित व्यक्ति पद ग्रहण की तारीख से पूरे पाँच वर्ष के लिए पद धारण करता है। इस बीच, अनुच्छेद 65 के अधीन उपराष्ट्रपति राष्ट्रपति की शक्तियों और उपलब्धियों के साथ राष्ट्रपति के रूप में कार्य करता है। यदि दोनों पद रिक्त हों, तो राष्ट्रपति (कृत्यों का निर्वहन) अधिनियम, 1969 उपबंध करता है कि भारत का मुख्य न्यायमूर्ति राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करेगा। ऐसा 1969 में हुआ, जब राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन की मृत्यु और उपराष्ट्रपति वी.वी. गिरि के राष्ट्रपति निर्वाचन लड़ने के लिए पदत्याग के बाद मुख्य न्यायमूर्ति एम. हिदायतुल्ला ने राष्ट्रपति के रूप में कार्य किया।
कागज पर राष्ट्रपति की शक्तियाँ व्यापक हैं। भारत सरकार की समस्त कार्यपालिका कार्रवाई राष्ट्रपति के नाम से की हुई कही जाती है (अनुच्छेद 77)। राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की और प्रधानमंत्री की सलाह पर अन्य मंत्रियों की नियुक्ति करता है, और महान्यायवादी, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, निर्वाचन आयुक्तों, राज्यपालों, उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों और वित्त आयोग की भी नियुक्ति करता है। राष्ट्रपति संसद के सदनों को आहूत और सत्रावसित करता है और लोक सभा का विघटन कर सकता है (अनुच्छेद 85), प्रत्येक साधारण निर्वाचन के बाद प्रथम सत्र और प्रत्येक वर्ष के प्रथम सत्र के आरंभ में दोनों सदनों को संबोधित करता है (अनुच्छेद 87), और राज्य सभा में 12 सदस्यों को नामनिर्देशित करता है। धन विधेयक और नए राज्यों के निर्माण संबंधी विधेयक जैसे कुछ विधेयकों के लिए राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक है।
जब दोनों सदनों द्वारा पारित कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है, तो अनुच्छेद 111 राष्ट्रपति को तीन विकल्प देता है: अनुमति देना, अनुमति रोकना, या धन विधेयक से भिन्न विधेयक को सदनों से पुनर्विचार का अनुरोध करने वाले संदेश के साथ लौटाना। यदि सदन उसे फिर पारित कर दें, तो राष्ट्रपति को अनुमति देनी होगी। अनुमति रोकना आत्यंतिक वीटो कहलाता है: विधेयक विधि नहीं बनता। विधेयक लौटाना निलंबनकारी वीटो है, जिसे संसद साधारण बहुमत से विधेयक फिर पारित करके निष्प्रभावी कर सकती है। क्योंकि संविधान संघ के विधेयक पर राष्ट्रपति के निर्णय के लिए कोई समय-सीमा नियत नहीं करता, राष्ट्रपति विधेयक को लंबित भी रख सकता है, जिसे जेबी वीटो कहते हैं; राष्ट्रपति ज़ैल सिंह ने भारतीय डाकघर (संशोधन) विधेयक, 1986 के साथ ऐसा किया। धन विधेयक, जो राष्ट्रपति की सिफारिश से पुरःस्थापित होता है, लौटाया नहीं जा सकता, और 24वें संशोधन (1971) से राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक पर अनुमति देनी ही होती है। राज्यपाल द्वारा आरक्षित किसी राज्य विधेयक के लिए अनुच्छेद 201 राष्ट्रपति को अनुमति देने, अनुमति रोकने या धन विधेयक से भिन्न विधेयक को लौटवाने देता है, और राज्य विधान-मंडल के उसे फिर पारित करने पर भी राष्ट्रपति अनुमति देने के लिए बाध्य नहीं है।
| प्रकार | राष्ट्रपति क्या करता है | क्या संसद उसे निष्प्रभावी कर सकती है? | भारत में? |
|---|---|---|---|
| आत्यंतिक वीटो | अनुमति रोकता है; विधेयक विधि नहीं बनता | नहीं | हाँ |
| निलंबनकारी वीटो | धन विधेयक से भिन्न विधेयक पुनर्विचार के लिए लौटाता है | हाँ, साधारण बहुमत से फिर पारित करके | हाँ |
| जेबी वीटो | कोई निर्णय नहीं लेता; संघ के विधेयकों के लिए कोई समय-सीमा नियत नहीं | नहीं | हाँ |
| अर्हित वीटो | ऐसा विधेयक लौटाता है जो केवल उच्चतर बहुमत से फिर पारित हो सकता है | हाँ, विशेष बहुमत से | नहीं |
अनुच्छेद 123 कार्यपालिका को विधि बनाने की शक्ति देता है। उस समय को छोड़कर जब दोनों सदन सत्र में हों, यदि राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनमें तुरंत कार्रवाई आवश्यक है, तो वह अध्यादेश प्रख्यापित कर सकता है। उसका वही बल होता है जो संसद के अधिनियम का, और वही सीमाएँ: वह केवल उन विषयों पर हो सकता है जिन पर संसद विधि बना सकती है, और वह संविधान का संशोधन नहीं कर सकता। उसे दोनों सदनों के समक्ष रखना होता है और वह उनके पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद प्रवर्तन में नहीं रहता, या उससे पहले यदि दोनों सदन उसके अननुमोदन के संकल्प पारित कर दें। क्योंकि दो सत्रों के बीच का अंतर छह महीने से अधिक नहीं हो सकता, अध्यादेश संसद के अनुमोदन के बिना अधिकतम लगभग छह महीने और छह सप्ताह चल सकता है। 38वें संशोधन (1975) ने राष्ट्रपति के समाधान को अंतिम बना दिया था; 44वें संशोधन (1978) ने वह खंड हटा दिया। डी.सी. वाधवा बनाम बिहार राज्य (1987) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि अध्यादेशों को विधान-मंडल के समक्ष रखे बिना बार-बार पुनः प्रख्यापित करना संविधान के साथ कपट है, और कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार राज्य (2017) में कहा कि अध्यादेश के पीछे का समाधान न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है।
अनुच्छेद 72 राष्ट्रपति को तीन प्रकार के मामलों में क्षमा और संबंधित राहत देने की शक्ति देता है: जहाँ दंड सेना न्यायालय द्वारा दिया गया हो, जहाँ अपराध ऐसे विषय से संबंधित विधि के विरुद्ध हो जिस पर संघ की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार है, और मृत्यु दंडादेश के प्रत्येक मामले में। इस शक्ति के पाँच रूप हैं। क्षमा दंडादेश और दोषसिद्धि दोनों को मिटा देती है; लघुकरण दंड के स्थान पर हल्का रूप रखता है; परिहार दंडादेश की अवधि को उसकी प्रकृति बदले बिना घटाता है; विराम किसी विशेष तथ्य के कारण हल्का दंड देता है; और प्रविलंबन दंडादेश के निष्पादन को कुछ समय के लिए रोकता है। अनुच्छेद 161 के अधीन राज्यपाल की शक्ति राज्य के विषयों से संबंधित विधियों के विरुद्ध अपराधों तक है और उसमें सेना न्यायालय का खंड नहीं है, यद्यपि अनुच्छेद 72(3) मृत्यु दंडादेश के निलंबन, परिहार या लघुकरण की राज्यपाल की शक्ति को बनाए रखता है। राष्ट्रपति इस शक्ति का प्रयोग मंत्रिपरिषद की सलाह पर करता है (मारू राम बनाम भारत संघ, 1980); दोषी को मौखिक सुनवाई का अधिकार नहीं है (केहर सिंह बनाम भारत संघ); और निर्णय सीमित न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है, उदाहरण के लिए असद्भाव या असंगत विचारों के आधार पर (एपुरु सुधाकर, 2006)।
| रूप | प्रभाव | उदाहरण |
|---|---|---|
| क्षमा | दंडादेश और दोषसिद्धि दोनों को मिटा देती है | दोषी सभी दंड और निरर्हताओं से मुक्त |
| लघुकरण | दंड के स्थान पर उसका हल्का रूप | मृत्यु दंडादेश को कठोर कारावास में बदलना |
| परिहार | प्रकृति बदले बिना अवधि घटाना | दो वर्ष का कठोर कारावास घटाकर एक वर्ष का कठोर कारावास |
| विराम | किसी विशेष तथ्य के कारण कम दंड | दोषी का गर्भवती होना या शारीरिक निःशक्तता |
| प्रविलंबन | दंडादेश के निष्पादन को कुछ समय के लिए रोकना | दया याचिका लंबित रहने तक मृत्यु दंडादेश के निष्पादन पर रोक |
अनुच्छेद 74(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए एक मंत्रिपरिषद का उपबंध करता है जिसका प्रधान प्रधानमंत्री होता है। 42वें संशोधन (1976) ने सलाह को बाध्यकारी बनाया, और 44वें संशोधन (1978) ने जोड़ा कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से सलाह पर एक बार पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकता है, पर पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेगा। अनुच्छेद 74(2) के अधीन न्यायालय यह जाँच नहीं कर सकते कि कोई सलाह दी गई थी या नहीं, और दी गई थी तो क्या। समशेर सिंह बनाम पंजाब राज्य (1974) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि राष्ट्रपति और राज्यपाल सांविधानिक प्रमुख हैं जो कुछ असाधारण स्थितियों को छोड़कर मंत्रियों की सलाह पर कार्य करते हैं। ये स्थितियाँ थोड़ा परिस्थितिजन्य विवेक छोड़ती हैं: जब लोक सभा में किसी दल या गठबंधन का स्पष्ट बहुमत न हो तब प्रधानमंत्री चुनना, लोक सभा का विश्वास खो चुके मंत्रालय से निपटना, जेबी वीटो, और अनुच्छेद 78 के अधीन प्रधानमंत्री से जानकारी पाने का अधिकार।
परीक्षा में ध्यान दें
- संसद के नामनिर्देशित सदस्य राष्ट्रपति के निर्वाचन में मत नहीं देते पर महाभियोग में भाग लेते हैं; निर्वाचित विधायक निर्वाचन में मत देते हैं पर महाभियोग में भाग नहीं लेते।
- राज्य विधान परिषदों के सदस्यों को राष्ट्रपति निर्वाचन में मत नहीं मिलता; दिल्ली और पुडुचेरी विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को मिलता है (70वाँ संशोधन, 1992)।
- महाभियोग के लिए प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई चाहिए, उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाई नहीं, और इसका एकमात्र आधार 'संविधान का अतिक्रमण' है।
- राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष शपथ लेता है पर उपराष्ट्रपति को लिखकर पद त्यागता है।
- राष्ट्रपति निर्वाचन संबंधी विवादों का निर्णय उच्चतम न्यायालय करता है (अनुच्छेद 71), निर्वाचन आयोग नहीं।
- अध्यादेश तब भी जारी हो सकता है जब केवल एक सदन सत्र में न हो, और वह संसद के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद समाप्त होता है, छह महीने बाद नहीं।
- सेना न्यायालय के दंड को केवल राष्ट्रपति क्षमा कर सकता है; अनुच्छेद 72 प्रत्येक मृत्यु दंडादेश को समेटता है।
- धन विधेयक पुनर्विचार के लिए लौटाया नहीं जा सकता, और राष्ट्रपति को संविधान संशोधन विधेयक पर अनुमति देनी होती है (24वाँ संशोधन)।
पुनरावृत्ति
- अनुच्छेद 53: संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित, जो संसदीय प्रणाली में सांविधानिक प्रमुख है।
- संसद के निर्वाचित सदस्यों और राज्यों, दिल्ली तथा पुडुचेरी के निर्वाचित विधायकों द्वारा अप्रत्यक्ष निर्वाचन; एकल संक्रमणीय मत द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व; विवाद उच्चतम न्यायालय में।
- मतों का मूल्य: राज्यों के बीच एकरूपता, संघ के साथ समतुल्यता; 2026 के बाद पहली जनगणना तक 1971 की जनगणना।
- अर्हताएँ: नागरिक, 35 वर्ष, लोक सभा के लिए अर्हित, कोई लाभ का पद नहीं; मुख्य न्यायमूर्ति के समक्ष शपथ; पाँच वर्ष की पदावधि; उपराष्ट्रपति को पदत्याग।
- संविधान के अतिक्रमण पर महाभियोग: प्रत्येक सदन की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई; नामनिर्देशित सांसद भाग लेते हैं।
- रिक्ति छह महीने में भरी जाती है; उपराष्ट्रपति कार्य करता है, फिर मुख्य न्यायमूर्ति (1969 का अधिनियम)।
- वीटो: आत्यंतिक, निलंबनकारी और जेबी, पर अर्हित वीटो नहीं; अनुच्छेद 123 के अध्यादेश पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद समाप्त।
- मंत्रियों की सलाह पर अनुच्छेद 72 के अधीन क्षमा; अनुच्छेद 74 एक बार पुनर्विचार के बाद सलाह को बाध्यकारी बनाता है (42वाँ और 44वाँ संशोधन)।
अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित में से कौन भारत के राष्ट्रपति के निर्वाचन के लिए निर्वाचकगण के सदस्य हैं?
1. लोक सभा और राज्य सभा के निर्वाचित सदस्य
2. राज्य विधान परिषदों के निर्वाचित सदस्य
3. राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र दिल्ली की विधान सभा के निर्वाचित सदस्य
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: C. केवल 1 और 3
अनुच्छेद 54 में संसद के दोनों सदनों और राज्य विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्य शामिल हैं; 70वें संशोधन ने दिल्ली और पुडुचेरी विधान सभाओं के निर्वाचित सदस्यों को जोड़ा। विधान परिषदों के सदस्यों को मत नहीं मिलता, इसलिए 2 वाले विकल्प गलत हैं, और 'केवल 1' दिल्ली को छोड़ देता है।
Q2. राष्ट्रपति पर महाभियोग के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. आरोप संसद के किसी भी सदन द्वारा लगाया जा सकता है।
2. संसद के नामनिर्देशित सदस्य महाभियोग में भाग नहीं ले सकते।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: A. केवल 1
अनुच्छेद 61(1) के अधीन कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: महाभियोग संसद के सदन करते हैं, और नामनिर्देशित सदस्य, यद्यपि निर्वाचन में मत नहीं देते, इसमें भाग लेते हैं। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q3. अनुच्छेद 123 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा प्रख्यापित अध्यादेश, यदि पहले अनुमोदित न हो, तो प्रवर्तन में नहीं रहता:
- प्रख्यापन के छह महीने बाद
- प्रख्यापन के छह सप्ताह बाद
- संसद के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद
- उस सत्र के अंत में जिसमें उसे रखा गया
उत्तर देखें
उत्तर: C. संसद के पुनः समवेत होने के छह सप्ताह बाद
अनुच्छेद 123(2)(क): अध्यादेश संसद के पुनः समवेत होने से छह सप्ताह बाद, या दोनों सदनों के अननुमोदन पर उससे पहले, प्रवर्तन में नहीं रहता। गणना प्रख्यापन से नहीं होती, और सत्र का अंत कसौटी नहीं है; 'छह महीने' सत्रों के बीच का अधिकतम अंतर है, अध्यादेश की नियत आयु नहीं।
Q4. अनुच्छेद 72 के अधीन एक प्रकार के दंड के स्थान पर उसका हल्का रूप रखना, जैसे मृत्यु दंडादेश के स्थान पर कठोर कारावास, कहलाता है:
- परिहार
- लघुकरण
- प्रविलंबन
- विराम
उत्तर देखें
उत्तर: B. लघुकरण
लघुकरण दंड का रूप बदलता है। परिहार उसकी प्रकृति बदले बिना अवधि घटाता है; प्रविलंबन केवल कुछ समय के लिए निष्पादन रोकता है; विराम गर्भावस्था जैसे विशेष तथ्य के कारण कम दंड देता है।
Q5. भारत का राष्ट्रपति संसद द्वारा पारित विधेयक पर 'जेबी वीटो' का प्रयोग कर सकता है क्योंकि:
- संविधान कोई समय-सीमा नियत नहीं करता जिसके भीतर राष्ट्रपति को विधेयक पर निर्णय लेना हो
- राष्ट्रपति धन विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है
- किसी भी वीटो को निष्प्रभावी करने के लिए संसद को दो-तिहाई बहुमत चाहिए
- अनुच्छेद 111 राष्ट्रपति को विधेयक उच्चतम न्यायालय को निर्दिष्ट करने देता है
उत्तर देखें
उत्तर: A. संविधान कोई समय-सीमा नियत नहीं करता जिसके भीतर राष्ट्रपति को विधेयक पर निर्णय लेना हो
अनुच्छेद 111 संघ के विधेयक पर राष्ट्रपति के निर्णय के लिए कोई समय-सीमा नहीं देता, जिससे जेबी वीटो संभव होता है। धन विधेयक लौटाया नहीं जा सकता; लौटाया गया विधेयक साधारण बहुमत से फिर पारित करके निष्प्रभावी होता है, दो-तिहाई से नहीं; अनुच्छेद 111 उच्चतम न्यायालय को निर्देश के बारे में कुछ नहीं कहता (वह अनुच्छेद 143 है)।
Q6. यदि राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति दोनों के पद एक साथ रिक्त हो जाएँ, तो राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन कौन करता है?
- लोक सभा का अध्यक्ष
- प्रधानमंत्री
- भारत का मुख्य न्यायमूर्ति
- राज्य सभा का उपसभापति
उत्तर देखें
उत्तर: C. भारत का मुख्य न्यायमूर्ति
राष्ट्रपति (कृत्यों का निर्वहन) अधिनियम, 1969 के अधीन भारत का मुख्य न्यायमूर्ति, या उसके न होने पर उच्चतम न्यायालय का उपलब्ध ज्येष्ठतम न्यायाधीश, राष्ट्रपति के कृत्यों का निर्वहन करता है; ऐसा 1969 में हुआ। अध्यक्ष, प्रधानमंत्री और उपसभापति की ऐसी कोई भूमिका नहीं है।
Q7. अनुच्छेद 74 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद से एक बार सलाह पर पुनर्विचार करने की अपेक्षा कर सकता है।
2. न्यायालय यह जाँच कर सकते हैं कि मंत्रियों ने राष्ट्रपति को क्या सलाह दी।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: A. केवल 1
कथन 1 44वें संशोधन (1978) द्वारा जोड़े गए परंतुक को दर्शाता है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 74(2) न्यायालयों को यह जाँचने से रोकता है कि कोई सलाह दी गई या नहीं, और दी गई तो क्या। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q8. राष्ट्रपति के निर्वाचन के संबंध में उत्पन्न शंकाओं और विवादों की जाँच और विनिश्चय कौन करता है?
- भारत निर्वाचन आयोग
- उच्चतम न्यायालय
- दिल्ली उच्च न्यायालय
- संसद के दोनों सदनों की संयुक्त समिति
उत्तर देखें
उत्तर: B. उच्चतम न्यायालय
अनुच्छेद 71(1) यह शक्ति केवल उच्चतम न्यायालय को देता है। निर्वाचन आयोग निर्वाचन संचालित करता है पर उसके विवादों का निर्णय नहीं करता; किसी उच्च न्यायालय या संसदीय समिति की यह भूमिका नहीं है।
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ऐप में पढ़ें →स्रोत
- Constitution of India, Part V, Chapter I (Articles 52–78) and Articles 3, 85, 87, 111, 117, 123, 143, 161, 201 and 267 — https://legislative.gov.in/constitution-of-india/
- Presidential and Vice-Presidential Elections Act, 1952 (as amended in 1997); President (Discharge of Functions) Act, 1969; Constitution (Twenty-fourth Amendment) Act, 1971; (Thirty-eighth Amendment) Act, 1975; (Forty-second Amendment) Act, 1976; (Forty-fourth Amendment) Act, 1978; (Seventieth Amendment) Act, 1992; (Eighty-fourth Amendment) Act, 2001 — https://www.indiacode.nic.in
- Supreme Court of India: Samsher Singh v. State of Punjab (1974); Maru Ram v. Union of India (1980); D.C. Wadhwa v. State of Bihar (1987); Kehar Singh v. Union of India; Epuru Sudhakar v. Government of Andhra Pradesh (2006); Krishna Kumar Singh v. State of Bihar (2017) — https://digiscr.sci.gov.in