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स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19–22)
अनुच्छेद 19 की छह स्वतंत्रताएँ और उनकी सीमाएँ, आपराधिक मामलों में संरक्षण (अनुच्छेद 20), प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार और न्यायालयों ने इसे कैसे विस्तृत किया (अनुच्छेद 21), शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21क), और गिरफ्तारी तथा निवारक निरोध से जुड़े रक्षोपाय (अनुच्छेद 22)।
अनुच्छेद 19 से 22 मिलकर स्वतंत्रता का अधिकार बनाते हैं, जो संविधान के स्वतंत्रता संबंधी विचार का केंद्र है। अनुच्छेद 19 छह स्वतंत्रताएँ गिनाता है जो हर नागरिक को प्राप्त हैं। अनुच्छेद 20 अपराध के आरोपी लोगों की रक्षा करता है। अनुच्छेद 21 प्राण और दैहिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, और वर्षों में न्यायालयों ने इसमें कई अन्य अधिकार पढ़े हैं। अनुच्छेद 21क बच्चों को शिक्षा का अधिकार देता है, और अनुच्छेद 22 किसी की गिरफ्तारी या निरोध पर रक्षोपाय तय करता है। इन अनुच्छेदों को एक समूह के रूप में पढ़िए: मिलकर ये तय करते हैं कि राज्य कहाँ तक नियंत्रित कर सकता है कि व्यक्ति क्या कहे, कहाँ जाए, और क्या उसे बंद किया जा सकता है।
अनुच्छेद 19(1) नागरिकों को छह स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है: (क) वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य; (ख) शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन; (ग) संगम या संघ या सहकारी सोसाइटी बनाना; (घ) भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण; (ङ) भारत के किसी भी भाग में निवास करना और बस जाना; और (छ) कोई वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारबार करना। मूल संविधान में सात स्वतंत्रताएँ थीं। खंड (च), संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन की स्वतंत्रता, 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटा दिया गया, इसीलिए सूची (ङ) से सीधे (छ) पर जाती है। ये स्वतंत्रताएँ केवल नागरिकों के लिए हैं और राज्य की कार्रवाई से उनकी रक्षा करती हैं।
वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य छह में सबसे व्यापक है। न्यायालयों ने माना है कि इसमें प्रेस की स्वतंत्रता शामिल है, हालाँकि प्रेस का अलग से उल्लेख नहीं है, और सूचना पाने का अधिकार भी। यह किसी भी माध्यम में अभिव्यक्ति को शामिल करता है, समाचार पत्रों और फिल्मों से लेकर इंटरनेट पर पोस्ट तक। श्रेया सिंघल बनाम भारत संघ (2015) में उच्चतम न्यायालय ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 66क को रद्द कर दिया, जो 'घोर आपत्तिजनक' या 'खीज' पैदा करने वाले ऑनलाइन संदेशों को दंडित करती थी। न्यायालय ने कहा कि ऐसे अस्पष्ट शब्द वैध अभिव्यक्ति को भी दंडित कर सकते हैं, और कोई निर्बंधन तभी वैध है जब वह अनुच्छेद 19(2) में गिनाए गए आधारों के भीतर आए।
अनुच्छेद 19(1) की हर स्वतंत्रता सीमित की जा सकती है, पर केवल ऐसी विधि द्वारा जो खंड (2) से (6) में गिनाए गए आधारों पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाए। वाक् के लिए अनुच्छेद 19(2) आठ आधार गिनाता है: भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि, और अपराध-उद्दीपन। यह सूची समय के साथ बढ़ी। रोमेश थापर (1950) में उच्चतम न्यायालय ने एक पत्रिका पर प्रतिबंध रद्द कर दिया क्योंकि तब 'लोक व्यवस्था' आधार नहीं था; पहले संशोधन (1951) ने लोक व्यवस्था, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और अपराध-उद्दीपन जोड़े। 16वें संशोधन (1963) ने भारत की प्रभुता और अखंडता जोड़ी। कोई निर्बंधन 'युक्तियुक्त' है या नहीं, यह न्यायालय तय करते हैं: उसे आधार से जुड़ा होना चाहिए और आवश्यकता से आगे नहीं जाना चाहिए।
सम्मेलन और संगम की स्वतंत्रताओं की अपनी सीमाएँ हैं। नागरिक केवल शांतिपूर्वक और निरायुध सम्मेलन कर सकते हैं, और राज्य भारत की प्रभुता और अखंडता या लोक व्यवस्था के हित में सम्मेलनों पर निर्बंधन लगा सकता है; इसीलिए अधिकारी हिंसक होने की आशंका वाली सभा रोक सकते हैं। संगम या संघ बनाने की स्वतंत्रता 97वें संशोधन (2011) से बढ़ाई गई, जिसने अनुच्छेद 19(1)(ग) में सहकारी सोसाइटी जोड़ी। इस पर भारत की प्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था या सदाचार के आधार पर निर्बंधन लगाया जा सकता है। संघ बनाने की स्वतंत्रता के साथ हड़ताल का मूल अधिकार नहीं आता: टी.के. रंगराजन (2003) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों को हड़ताल करने का कोई मूल अधिकार नहीं है।
भारत में सर्वत्र संचरण और कहीं भी निवास करने और बसने की स्वतंत्रताएँ अपने नागरिकों के लिए भारत को एक राज्यक्षेत्र बनाती हैं। इन पर साधारण जनता के हित में या किसी अनुसूचित जनजाति के हितों के संरक्षण के लिए निर्बंधन लगाया जा सकता है; इसी प्रकार जनजातीय भूमि और संस्कृति की रक्षा के लिए जनजातीय क्षेत्रों में प्रवेश और बसने को विनियमित किया जा सकता है। कोई वृत्ति करने या कोई व्यापार या कारबार चलाने की स्वतंत्रता पर साधारण जनता के हित में निर्बंधन लगाया जा सकता है। राज्य वृत्तिक या तकनीकी अर्हताएँ भी निर्धारित कर सकता है, इसलिए केवल योग्य चिकित्सक ही चिकित्सा कर सकता है, और राज्य स्वयं नागरिकों को अपवर्जित करके कोई व्यापार या उद्योग चला सकता है, जिससे सरकारी एकाधिकार और राष्ट्रीयकरण संभव होते हैं।
| स्वतंत्रता | खंड | युक्तियुक्त निर्बंधन के आधार |
|---|---|---|
| (क) वाक् और अभिव्यक्ति | 19(2) | भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध, लोक व्यवस्था, शिष्टाचार या सदाचार, न्यायालय-अवमान, मानहानि, अपराध-उद्दीपन |
| (ख) सम्मेलन | 19(3) | भारत की प्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था |
| (ग) संगम, संघ, सहकारी सोसाइटी | 19(4) | भारत की प्रभुता और अखंडता, लोक व्यवस्था, सदाचार |
| (घ) संचरण और (ङ) निवास | 19(5) | साधारण जनता के हित, किसी अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण |
| (छ) वृत्ति, व्यापार, कारबार | 19(6) | साधारण जनता के हित; वृत्तिक या तकनीकी अर्हताएँ; राज्य द्वारा चलाया जाने वाला व्यापार या उद्योग |
अनुच्छेद 19 वह अधिकार है जो राष्ट्रीय आपात में अपने-आप निलंबित हो जाता है। अनुच्छेद 358 के अधीन, जब युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा होती है, तो उद्घोषणा रहने तक राज्य अनुच्छेद 19 की सीमाओं से मुक्त हो जाता है: वह ऐसी विधियाँ बना सकता है और ऐसी कार्यपालिका कार्रवाई कर सकता है जो अन्यथा इन स्वतंत्रताओं का उल्लंघन करती। 44वें संशोधन (1978) के बाद, यह स्वतः निलंबन सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित आपात पर लागू नहीं होता, और केवल वे विधियाँ संरक्षित हैं जो यह उल्लेख करती हैं कि वे आपात से संबंधित हैं। अनुच्छेद 359, जो अन्य अधिकारों से संबंधित है, भाग 4 में समझाया गया है।
अनुच्छेद 20 अपराध के किसी भी आरोपी की, चाहे नागरिक हो या विदेशी, तीन तरह से रक्षा करता है। पहला, कोई कार्योत्तर आपराधिक विधि नहीं: किसी व्यक्ति को केवल उस विधि के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराया जा सकता है जो कार्य के समय प्रवृत्त थी, और उसे उस विधि में अनुमत दंड से अधिक दंड नहीं दिया जा सकता। यह केवल आपराधिक विधियों पर लागू है, सिविल या कर विधियों पर नहीं। दूसरा, दोहरा दंड नहीं: किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक बार अभियोजित और दंडित नहीं किया जा सकता। यह न्यायालय के समक्ष कार्यवाही पर लागू है; दोषसिद्धि के बाद विभागीय जाँच वर्जित नहीं है। तीसरा, आत्म-अभिशंसन नहीं: अपराध के आरोपी किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। सेल्वी बनाम कर्नाटक राज्य (2010) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि सहमति के बिना किए गए नार्को-विश्लेषण, पॉलीग्राफ और ब्रेन-मैपिंग परीक्षण इस संरक्षण का उल्लंघन करते हैं।
अनुच्छेद 21 कहता है: किसी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं। यह वाक्यांश अमेरिकी 'विधि की सम्यक् प्रक्रिया' के स्थान पर चुना गया, जो न्यायालयों को यह परखने देती है कि स्वयं विधि न्यायसंगत है या नहीं। ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को संकीर्ण रूप से पढ़ा: किसी वैध विधि द्वारा निर्धारित कोई भी प्रक्रिया पर्याप्त थी, और अनुच्छेद 19 और 21 अलग-अलग थे। मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में, जो पासपोर्ट जब्त करने का मामला था, न्यायालय ने दिशा बदली। उसने कहा कि प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, मनमानी या दमनकारी नहीं, और अनुच्छेद 14, 19 और 21 को साथ पढ़ा जाना चाहिए। वास्तव में, इसने सम्यक् प्रक्रिया का सार अनुच्छेद 21 में ला दिया।
| ए.के. गोपालन (1950) | मेनका गांधी (1978) | |
|---|---|---|
| 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' के लिए क्या आवश्यक | किसी वैध विधि द्वारा निर्धारित कोई भी प्रक्रिया | ऐसी प्रक्रिया जो न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त हो |
| अनुच्छेद 14, 19 और 21 | अलग-अलग; प्रत्येक स्वतंत्र रूप से पढ़ा गया | साथ पढ़े गए; विधि को तीनों को संतुष्ट करना होगा |
| प्रभाव | विधायिका के विरुद्ध संकीर्ण संरक्षण | सम्यक् प्रक्रिया का सार अनुच्छेद 21 में आया |
मेनका गांधी के बाद से उच्चतम न्यायालय ने 'प्राण' का अर्थ गरिमापूर्ण जीवन माना है, केवल पशुवत अस्तित्व नहीं, और अनुच्छेद 21 के भीतर कई अधिकार पाए हैं। इनमें निजता का अधिकार शामिल है, जिसे के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में नौ न्यायाधीशों की पीठ ने मूल अधिकार घोषित किया; आजीविका का अधिकार, ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन (1985) में, जो बेदखली का सामना कर रहे फुटपाथवासियों का मामला था; शीघ्र विचारण का अधिकार, हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) में, जिसने वर्षों से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों की स्थिति उजागर की; वकील का खर्च न उठा सकने वालों के लिए निःशुल्क विधिक सहायता; और आश्रय, स्वास्थ्य तथा स्वच्छ पर्यावरण के अधिकार। कॉमन कॉज़ बनाम भारत संघ (2018) में न्यायालय ने गरिमा के साथ मरने के अधिकार को मान्यता दी और निष्क्रिय इच्छामृत्यु तथा अग्रिम निर्देश (लिविंग विल) की अनुमति दी।
86वें संशोधन (2002) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 21क कहता है कि राज्य छह से चौदह वर्ष की आयु के सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उस रीति से उपलब्ध कराएगा जो राज्य विधि द्वारा निर्धारित करे। संसद ने यह विधि निःशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 के रूप में बनाई। उसी संशोधन ने दो और काम किए: उसने निदेशक तत्व अनुच्छेद 45 को बदलकर राज्य से छह वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा की व्यवस्था करने को कहा, और एक नया कर्तव्य, अनुच्छेद 51क(ट), जोड़ा, जो माता-पिता और संरक्षकों से छह से चौदह वर्ष के अपने बच्चों को शिक्षा के अवसर देने को कहता है। इस प्रकार इस आयु वर्ग के लिए शिक्षा नीति के लक्ष्य से एक प्रवर्तनीय अधिकार बन गई।
अनुच्छेद 22 गिरफ्तारी और निरोध को दो भागों में देखता है। सामान्य गिरफ्तारी में, व्यक्ति को यथाशीघ्र गिरफ्तारी के आधार बताए जाने चाहिए, उसे अपनी पसंद के वकील से परामर्श करने और प्रतिरक्षा कराने का अधिकार है, और उसे यात्रा का समय छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना चाहिए; मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उसे अधिक समय तक नहीं रखा जा सकता। ये रक्षोपाय किसी शत्रु विदेशी पर या निवारक निरोध की किसी विधि के अधीन रखे गए व्यक्ति पर लागू नहीं होते। निवारक निरोध का अर्थ है किसी संभावित भावी अपराध को रोकने के लिए किसी को रोककर रखना, किसी पिछले अपराध के लिए दंड देना नहीं। यहाँ भी संविधान सीमाएँ तय करता है: तीन महीने से अधिक निरोध नहीं, जब तक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश बनने की अर्हता रखने वाले व्यक्तियों का सलाहकार बोर्ड पर्याप्त कारण की रिपोर्ट न दे; निरुद्ध व्यक्ति को आधार बताए जाने चाहिए, सिवाय उन तथ्यों के जिन्हें प्राधिकारी प्रकट करना लोकहित के विरुद्ध समझे, और उसे अभ्यावेदन करने का शीघ्रतम अवसर दिया जाना चाहिए। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 जैसी विधियाँ इन्हीं सीमाओं के भीतर काम करती हैं।
परीक्षा में ध्यान दें
- अनुच्छेद 19(1) में अब छह स्वतंत्रताएँ हैं; संपत्ति संबंधी 19(1)(च) 44वें संशोधन (1978) द्वारा हटाया गया।
- प्रेस की स्वतंत्रता का अनुच्छेद 19 में नाम नहीं है; न्यायालयों ने इसे 19(1)(क) में पढ़ा है।
- 'लोक व्यवस्था', 'विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध' और 'अपराध-उद्दीपन' पहले संशोधन (1951) से आए; 'भारत की प्रभुता और अखंडता' 16वें (1963) से।
- अनुच्छेद 358 केवल अनुच्छेद 19 को, स्वतः, और केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित आपात में निलंबित करता है, सशस्त्र विद्रोह में नहीं।
- कार्योत्तर विधियों के विरुद्ध अनुच्छेद 20 का संरक्षण केवल आपराधिक विधियों पर लागू है, सिविल या कर विधियों पर नहीं।
- दोहरा दंड न्यायालय द्वारा दूसरे अभियोजन और दंड को रोकता है; विभागीय कार्यवाही को नहीं।
- भारत 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया' (जापान से) अपनाता है, 'विधि की सम्यक् प्रक्रिया' (अमेरिका) नहीं; मेनका गांधी (1978) ने प्रक्रिया की कसौटी न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त बनाई।
- अनुच्छेद 22 के गिरफ्तारी संबंधी रक्षोपाय शत्रु विदेशियों या निवारक निरोध में रखे व्यक्तियों पर लागू नहीं होते; तीन महीने से अधिक निरोध के लिए सलाहकार बोर्ड की रिपोर्ट चाहिए।
पुनरावृत्ति
- अनुच्छेद 19(1): नागरिकों के लिए छह स्वतंत्रताएँ: वाक् और अभिव्यक्ति, सम्मेलन, संगम, संचरण, निवास, वृत्ति।
- निर्बंधन केवल विधि द्वारा और केवल 19(2)–(6) के आधारों पर; युक्तियुक्तता न्यायालय परखते हैं।
- श्रेया सिंघल (2015): अस्पष्टता के कारण धारा 66क रद्द।
- अनुच्छेद 358: युद्ध या बाह्य आक्रमण वाले आपात में अनुच्छेद 19 स्वतः निलंबित।
- अनुच्छेद 20: कोई कार्योत्तर आपराधिक विधि नहीं, दोहरा दंड नहीं, आत्म-अभिशंसन नहीं (सेल्वी 2010)।
- अनुच्छेद 21: 'विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया'; गोपालन (1950) संकीर्ण, मेनका गांधी (1978) न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त।
- अनुच्छेद 21 में पढ़े गए: निजता (पुट्टस्वामी 2017), आजीविका (ओल्गा टेलिस 1985), शीघ्र विचारण (हुसैनारा खातून 1979), विधिक सहायता, पर्यावरण, गरिमापूर्ण मृत्यु (कॉमन कॉज़ 2018)।
- अनुच्छेद 21क: 6–14 वर्ष के लिए शिक्षा (86वाँ संशोधन 2002, आरटीई अधिनियम 2009)। अनुच्छेद 22: गिरफ्तारी के रक्षोपाय; सलाहकार बोर्ड के बिना निवारक निरोध 3 महीने तक सीमित।
अभ्यास प्रश्न
Q1. निम्नलिखित में से कौन-सा वह आधार नहीं है जिस पर अनुच्छेद 19(2) के अधीन वाक्-स्वातंत्र्य और अभिव्यक्ति-स्वातंत्र्य पर निर्बंधन लगाया जा सकता है?
- न्यायालय-अवमान
- विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध
- किसी अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण
- मानहानि
उत्तर देखें
उत्तर: C. किसी अनुसूचित जनजाति के हितों का संरक्षण
अनुसूचित जनजातियों के हितों का संरक्षण अनुच्छेद 19(5) में संचरण और निवास की स्वतंत्रताओं के लिए आधार है। न्यायालय-अवमान, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध और मानहानि सभी अनुच्छेद 19(2) के आधार हैं।
Q2. संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन की स्वतंत्रता अनुच्छेद 19 से किस संशोधन द्वारा हटाई गई?
- पहला संशोधन, 1951
- 24वाँ संशोधन, 1971
- 42वाँ संशोधन, 1976
- 44वाँ संशोधन, 1978
उत्तर देखें
उत्तर: D. 44वाँ संशोधन, 1978
44वें संशोधन (1978) ने अनुच्छेद 19(1)(च) और अनुच्छेद 31 को हटाया और संपत्ति को अनुच्छेद 300क के अधीन विधिक अधिकार बनाया। पहले संशोधन ने निर्बंधन और अनुच्छेद 31ख जोड़े, 24वाँ संशोधन शक्ति से संबंधित था, और 42वें ने मूल कर्तव्य जोड़े।
Q3. अनुच्छेद 20 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कार्योत्तर विधियों के विरुद्ध संरक्षण आपराधिक विधियों के साथ-साथ कर विधियों पर भी लागू है।
2. दोहरे दंड का निषेध उसी कृत्य के लिए आपराधिक दोषसिद्धि के बाद विभागीय जाँच को रोकता है।
3. अपराध के आरोपी किसी व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी बनने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 3
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: A. केवल 3
केवल कथन 3 सही है (अनुच्छेद 20(3))। कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 20(1) केवल आपराधिक विधियों पर लागू है। कथन 2 गलत है: दोहरा दंड न्यायालय द्वारा अभियोजन और दंड पर लागू है, विभागीय कार्यवाही पर नहीं।
Q4. मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 21 के बारे में क्या कहा?
- विधिवत अधिनियमित विधि द्वारा निर्धारित कोई भी प्रक्रिया पर्याप्त है
- प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, और अनुच्छेद 14, 19 और 21 को साथ पढ़ा जाना चाहिए
- अनुच्छेद 21 केवल नागरिकों की रक्षा करता है
- अनुच्छेद 21 किसी भी आपात में निलंबित किया जा सकता है
उत्तर देखें
उत्तर: B. प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए, और अनुच्छेद 14, 19 और 21 को साथ पढ़ा जाना चाहिए
मेनका गांधी ने न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त प्रक्रिया की अपेक्षा की और अनुच्छेद 14, 19 और 21 को जोड़ा। विकल्प 1 ए.के. गोपालन (1950) का संकीर्ण दृष्टिकोण था। अनुच्छेद 21 हर व्यक्ति की रक्षा करता है, और 44वें संशोधन के बाद आपात में इसे निलंबित नहीं किया जा सकता।
Q5. अधिकारों और उन मामलों के निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए जिनमें उच्चतम न्यायालय ने उन्हें अनुच्छेद 21 के अधीन मान्यता दी:
1. निजता का अधिकार — के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ
2. आजीविका का अधिकार — ओल्गा टेलिस बनाम बॉम्बे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन
3. शीघ्र विचारण का अधिकार — ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य
ऊपर दिए गए युग्मों में से कौन-सा/से सही सुमेलित है/हैं?
- केवल 1
- केवल 1 और 2
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 1 और 2
युग्म 1 और 2 सही हैं। युग्म 3 गलत है: शीघ्र विचारण का अधिकार हुसैनारा खातून बनाम बिहार राज्य (1979) से आया; ए.के. गोपालन (1950) ने अनुच्छेद 21 का संकीर्ण दृष्टिकोण अपनाया था।
Q6. 86वें संविधान संशोधन (2002) के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने अनुच्छेद 21क जोड़ा, जिससे 6 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा मूल अधिकार बनी।
2. इसने जन्म से 14 वर्ष तक की शिक्षा को मूल अधिकार बनाया।
3. इसने शिक्षा से संबंधित एक मूल कर्तव्य जोड़ा।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?
- केवल 1 और 2
- केवल 1 और 3
- केवल 2 और 3
- 1, 2 और 3
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 1 और 3
कथन 1 और 3 सही हैं: अनुच्छेद 21क 6 से 14 वर्ष की आयु को शामिल करता है, और अनुच्छेद 51क(ट) जोड़ा गया। कथन 2 गलत है: छह वर्ष से कम के बच्चों के लिए संशोधन ने निदेशक तत्व अनुच्छेद 45 को बदला, जो मूल अधिकार नहीं है।
Q7. अनुच्छेद 22(1) और 22(2) के रक्षोपाय, जैसे 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाना, निम्नलिखित में से किसे उपलब्ध नहीं हैं?
- मित्र देशों के विदेशी नागरिक
- शत्रु विदेशी और निवारक निरोध की विधि के अधीन रखे गए व्यक्ति
- अजमानतीय अपराधों के लिए गिरफ्तार व्यक्ति
- शांतिकाल में सशस्त्र बलों के सदस्य
उत्तर देखें
उत्तर: B. शत्रु विदेशी और निवारक निरोध की विधि के अधीन रखे गए व्यक्ति
अनुच्छेद 22(3) शत्रु विदेशियों और निवारक निरोध की व्यवस्था करने वाली विधि के अधीन गिरफ्तार या निरुद्ध व्यक्तियों को बाहर रखता है। मित्र देशों के विदेशियों और गंभीर अपराधों के लिए गिरफ्तार लोगों को ये रक्षोपाय फिर भी मिलते हैं; अनुच्छेद 22 सशस्त्र बलों को इस प्रकार बाहर नहीं रखता।
Q8. अनुच्छेद 358 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा होने पर यह अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं को स्वतः निलंबित करता है।
2. यह सशस्त्र विद्रोह के आधार पर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा होने पर भी लागू होता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: A. केवल 1
कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: 44वें संशोधन (1978) के बाद से अनुच्छेद 358 केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर घोषित आपात पर लागू होता है, सशस्त्र विद्रोह पर नहीं।
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ऐप में पढ़ें →स्रोत
- Constitution of India, Articles 19–22, 45, 51A and 358 — https://legislative.gov.in/constitution-of-india/
- Constitution (First Amendment) Act, 1951; (Sixteenth) 1963; (Forty-fourth) 1978; (Eighty-sixth) 2002; (Ninety-seventh) 2011 — https://www.indiacode.nic.in
- Supreme Court of India: A.K. Gopalan v. State of Madras (1950); Romesh Thappar v. State of Madras (1950); Maneka Gandhi v. Union of India (1978); Hussainara Khatoon v. State of Bihar (1979); Olga Tellis v. Bombay Municipal Corporation (1985); T.K. Rangarajan v. Government of Tamil Nadu (2003); Selvi v. State of Karnataka (2010); Shreya Singhal v. Union of India (2015); K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017); Common Cause v. Union of India (2018) — https://digiscr.sci.gov.in
- Right of Children to Free and Compulsory Education Act, 2009; National Security Act, 1980 — https://www.indiacode.nic.in