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आपात उपबंध

संघवाद और केंद्र-राज्य संबंध · भाग 3 / 3 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352): आधार, अनुमोदन, प्रतिसंहरण, 1962, 1971 और 1975 की उद्घोषणाएँ, और संघवाद तथा मूल अधिकारों पर प्रभाव (अनुच्छेद 358, 359); राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356, 357), उसकी समय-सीमाएँ और एस.आर. बोम्मई (1994); वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360); और तीनों की तुलना।

भाग 1 और 2 ने सामान्य समय के संघ का वर्णन किया। संविधान का भाग 18 (अनुच्छेद 352 से 360) असामान्य समय से संबंधित है, जब संघ ऐसी शक्तियाँ ले सकता है जो सामान्यतः राज्यों की होती हैं और कुछ स्थितियों में मूल अधिकारों को सीमित कर सकता है। आपात तीन प्रकार की है: युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352); किसी राज्य में सांविधानिक तंत्र की विफलता, जिसे लोकप्रिय रूप से राष्ट्रपति शासन कहते हैं (अनुच्छेद 356); और वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)। संविधान निर्माता चाहते थे कि संकट में संघ देश को एक रख सके, और आपात के दौरान अधिकारों का निलंबन जर्मनी के वाइमर संविधान के आधार पर रखा गया। 1975 के अनुभव ने दिखाया कि इन शक्तियों का दुरुपयोग कैसे हो सकता है, और 44वें संशोधन (1978) ने इस भाग में पढ़े जाने वाले अधिकांश रक्षोपाय जोड़े।

अनुच्छेद 352 के अधीन राष्ट्रपति, यदि उसका समाधान हो जाए कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से संकट में है, राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा कर सकता है, और यदि संकट आसन्न हो तो वास्तविक घटना से पहले भी ऐसा कर सकता है। 44वें संशोधन ने अधिक अस्पष्ट 'आंतरिक अशांति' के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' आधार रखा, क्योंकि 1975 का आपात उसी व्यापक आधार पर घोषित हुआ था। उसी संशोधन ने अपेक्षा की कि राष्ट्रपति केवल संघ के मंत्रिमंडल के लिखित विनिश्चय पर कार्य करे, ताकि अकेला प्रधानमंत्री इसकी सलाह न दे सके। 42वें संशोधन के बाद से उद्घोषणा पूरे भारत या केवल किसी भाग पर लागू हो सकती है। 38वें संशोधन (1975) ने राष्ट्रपति के समाधान को न्यायालयों से मुक्त कर दिया था; 44वें संशोधन ने वह खंड हटा दिया, इसलिए अब उद्घोषणा को असद्भाव जैसे आधारों पर चुनौती दी जा सकती है।

संसद राष्ट्रीय आपात पर कड़ा नियंत्रण रखती है। उद्घोषणा का अनुमोदन दोनों सदनों द्वारा एक मास के भीतर (44वें संशोधन से पहले दो मास) होना चाहिए, प्रत्येक सदन विशेष बहुमत से मत देता है: उसकी कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई। अनुमोदन के बाद यह छह मास चलती है और हर छह मास पर नए अनुमोदन से बढ़ाई जा सकती है, बिना किसी अधिकतम सीमा के। यदि उस समय लोक सभा विघटित हो, तो राज्य सभा का अनुमोदन उद्घोषणा को तब तक जीवित रखता है जब तक नई लोक सभा अपनी पहली बैठक के 30 दिन के भीतर उसका अनुमोदन न कर दे। प्रतिसंहरण अनुमोदन से आसान है। राष्ट्रपति किसी भी समय उद्घोषणा का प्रतिसंहरण कर सकता है, और यदि लोक सभा साधारण बहुमत से उसे अस्वीकार करने का संकल्प पारित करे तो उसे ऐसा करना ही होगा। लोक सभा के दसवें भाग सदस्य इस प्रयोजन के लिए विशेष बैठक की माँग कर सकते हैं, जो उनकी सूचना के 14 दिन के भीतर होनी चाहिए।

भारत में राष्ट्रीय आपात की तीन उद्घोषणाएँ हुई हैं। पहली अक्टूबर 1962 में चीनी आक्रमण के दौरान हुई और 1968 तक लागू रही। दूसरी दिसंबर 1971 में पाकिस्तान से युद्ध के दौरान, बाह्य आक्रमण के आधार पर हुई। तीसरी 25 जून 1975 को आंतरिक अशांति के आधार पर तब हुई जब 1971 की उद्घोषणा अभी लागू थी, इसलिए दो आपात साथ-साथ चले; दोनों मार्च 1977 में प्रतिसंहृत हुईं। 1975 का आपात, जिसमें बड़े पैमाने पर निवारक निरोध और प्रेस पर सेंसरशिप हुई, 44वें संशोधन का कारण है। इसकी सीख सरल रूप में: पहले दो आपात भारत के बाहर के संकटों के सामने थे, जबकि तीसरा देश के भीतर की अशांति के विरुद्ध घोषित हुआ, ऐसे आधार पर जो राजनीतिक विरोध को भी समेट सकता था। इसी कारण 'आंतरिक अशांति' को संकुचित करके 'सशस्त्र विद्रोह' किया गया।

राष्ट्रीय आपात राज्यों की सरकारों को निलंबित किए बिना संघ को लगभग एकात्मक राज्य बना देता है। अनुच्छेद 353 के अधीन संघ की कार्यपालिका शक्ति किसी भी राज्य को किसी भी विषय पर निदेश देने तक विस्तृत हो जाती है। अनुच्छेद 250 के अधीन संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है; ऐसी विधियाँ आपात समाप्त होने के छह मास बाद व्यपगत हो जाती हैं। अनुच्छेद 354 के अधीन राष्ट्रपति आदेश द्वारा संघ और राज्यों के बीच राजस्व के वितरण को उपांतरित कर सकता है, पर केवल उस वित्तीय वर्ष के अंत तक जिसमें आपात समाप्त होता है, और आदेश संसद के समक्ष रखना होता है। लोक सभा की पाँच वर्ष की अवधि संसद की विधि द्वारा एक बार में एक वर्ष बढ़ाई जा सकती है, पर आपात समाप्त होने के छह मास से आगे नहीं; राज्य विधान सभा की अवधि भी इसी प्रकार बढ़ सकती है। मान लीजिए पश्चिमी सीमा पर युद्ध हो: संघ सीमावर्ती राज्य को उसकी निर्वाचित सरकार हटाए बिना पुलिस व्यवस्था और आपूर्ति पर निदेश दे सकता है।

मूल अधिकार पर प्रभाव दो अनुच्छेदों में है जो अलग-अलग ढंग से काम करते हैं। अनुच्छेद 358 के अधीन, युद्ध या बाह्य आक्रमण के आधार पर राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा होते ही अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ अपने आप निलंबित हो जाती हैं; 44वें संशोधन के बाद सशस्त्र विद्रोह के लिए घोषित आपात में ऐसा नहीं होता। अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति आदेश द्वारा आदेश में नामित अधिकारों को लागू कराने के लिए किसी न्यायालय में जाने का अधिकार निलंबित कर सकता है, पर 44वें संशोधन ने अनुच्छेद 20 और 21, यानी अपराधों के लिए दोषसिद्धि के संबंध में संरक्षण और प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार, तब भी अछूते कर दिए। दोनों अनुच्छेद केवल उन विधियों को संरक्षण देते हैं जो यह कहती हैं कि वे आपात से संबंधित हैं। एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि 1975 का आदेश लागू रहते निरुद्ध व्यक्ति बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका नहीं दे सकता; के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में न्यायालय ने उस मत को गलत घोषित कर उलट दिया।

अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति शासन सबसे अधिक प्रयुक्त आपात है। यदि राष्ट्रपति का, राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा, समाधान हो जाए कि राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकती, तो राष्ट्रपति राज्य के कार्यपालिका कृत्य अपने हाथ में ले सकता है, घोषित कर सकता है कि राज्य विधान-मंडल की शक्तियाँ संसद द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन प्रयोग होंगी, और अन्य आवश्यक उपबंध कर सकता है। व्यवहार में राज्यपाल, सामान्यतः सलाहकारों की सहायता से, राष्ट्रपति के लिए राज्य का प्रशासन करता है। निर्वाचित विधान सभा को रोककर रखा जा सकता है या समाप्त किया जा सकता है, फिर भी अनुच्छेद 356 में ऐसा कुछ नहीं है जिससे राष्ट्रपति उच्च न्यायालय की कोई शक्ति अपने हाथ में ले सके। अनुच्छेद 357 के अधीन संसद राज्य के लिए अपनी विधि बनाने की शक्ति राष्ट्रपति को सौंप सकती है, और जब लोक सभा सत्र में न हो तो राष्ट्रपति संसद की मंज़ूरी लंबित रहते राज्य की संचित निधि से व्यय प्राधिकृत कर सकता है। यह उपबंध पहली बार 1951 में पंजाब में प्रयुक्त हुआ और तब से अनेक राज्यों में अनेक बार लागू हुआ है।

राष्ट्रपति शासन पर समय-सीमाओं से नियंत्रण रहता है। उद्घोषणा का अनुमोदन संसद के दोनों सदनों द्वारा दो मास के भीतर, साधारण बहुमत से, होना चाहिए, और फिर यह एक बार में छह मास चलती है, अधिकतम तीन वर्ष तक। 44वें संशोधन के अधीन इसे एक वर्ष से आगे तभी जारी रखा जा सकता है जब दोनों शर्तें पूरी हों: पूरे भारत में या पूरे राज्य या उसके किसी भाग में राष्ट्रीय आपात लागू हो, और निर्वाचन आयोग प्रमाणित करे कि कठिनाइयों के कारण राज्य विधान सभा के निर्वाचन नहीं कराए जा सकते। इसे अनुच्छेद 352 के साथ रखें तो तीन अंतर दिखते हैं। यहाँ संसद को अधिक समय मिलता है (एक नहीं, दो मास), मत देने वालों का साधारण बहुमत पर्याप्त है, और तीन वर्ष की ऊपरी सीमा जैसी कोई सीमा राष्ट्रीय आपात के लिए नहीं है, जिसे अनिश्चित काल तक बढ़ाया जा सकता है। भाग 2 में देखा गया अनुच्छेद 365 एक और मार्ग जोड़ता है: राज्य द्वारा संघ के निदेशों का पालन न करना अपने आप में राष्ट्रपति शासन का आधार माना जा सकता है।

दशकों तक अनुच्छेद 356 का प्रयोग विरोधी दलों की राज्य सरकारें बर्खास्त करने में हुआ, और न्यायालय हस्तक्षेप में धीमे रहे। एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) से यह बदला, जिसका निर्णय नौ न्यायाधीशों की पीठ ने किया। न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है: उसके पीछे की सामग्री सुसंगत होनी चाहिए, और असंगत या असद्भावपूर्ण आधारों पर आधारित उद्घोषणा रद्द की जा सकती है। मंत्रिपरिषद के पास अब भी बहुमत है या नहीं, यह स्वयं विधान सभा में मतदान से तय होना है, राज्यपाल के निजी आकलन से नहीं। संसद द्वारा उद्घोषणा के अनुमोदन तक विधान सभा का विघटन नहीं होना चाहिए, और यदि उद्घोषणा गिर जाए तो न्यायालय बर्खास्त सरकार को बहाल कर सकता है। न्यायालय ने पंथनिरपेक्षता को भी मूल ढांचे का भाग माना। रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006) में न्यायालय ने इन सिद्धांतों को लागू कर 2005 में बिहार विधान सभा के विघटन को असंवैधानिक ठहराया। सरकारिया और पुंछी आयोगों ने भी आग्रह किया कि अनुच्छेद 356 केवल अंतिम उपाय के रूप में प्रयोग हो।

तीसरा प्रकार, अनुच्छेद 360 के अधीन वित्तीय आपात, तब घोषित हो सकता है जब राष्ट्रपति का समाधान हो जाए कि भारत या उसके किसी भाग का वित्तीय स्थायित्व या प्रत्यय संकट में है। प्रत्येक सदन को दो मास के भीतर साधारण बहुमत से इसका अनुमोदन करना होता है, और अनुमोदन के बाद यह प्रतिसंहरण तक चलता है, बिना समय-सीमा और बिना बार-बार अनुमोदन के। इसके दौरान संघ किसी भी राज्य को वित्तीय औचित्य के सिद्धांतों का पालन करने का निदेश दे सकता है, और राज्य से अपने कर्मचारियों के वेतन और भत्ते घटाने तथा अपने धन विधेयकों और वित्त विधेयकों को पारित होने के बाद राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखने की अपेक्षा कर सकता है। राष्ट्रपति संघ के कर्मचारियों के वेतन में कटौती का आदेश भी दे सकता है, जिनमें उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश भी शामिल हैं, जिनका वेतन अन्यथा संरक्षित रहता है। अनुच्छेद 360 का प्रयोग कभी नहीं हुआ। इसे घर के उस नियम की तरह समझिए कि पैसे के संकट में परिवार के हर सदस्य के खर्च के लिए मुखिया की मंज़ूरी चाहिए।

साथ रखने पर तीनों आपात अपने प्रयोजन और उन पर लगे नियंत्रणों में भिन्न हैं (तालिका देखें)। राष्ट्रीय आपात सबसे भारी है: इसके लिए मंत्रिमंडल का लिखित विनिश्चय, एक मास में विशेष बहुमत और हर छह मास पर नया अनुमोदन चाहिए, और केवल यही अनुच्छेद 358 और 359 के माध्यम से मूल अधिकारों को छूता है। राष्ट्रपति शासन एक राज्य की सरकार पर लक्षित है, इसके लिए दो मास में केवल साधारण बहुमत चाहिए, और इसकी सीमा तीन वर्ष है। वित्तीय आपात के लिए दो मास में साधारण बहुमत चाहिए, पर फिर यह बिना सीमा चलता है। तीनों वही बनावट दिखाते हैं जो इस अध्याय के बाकी भाग में है: सामान्य समय का संघ, जिसे संविधान संकट में लगभग एकात्मक होने देता है, और दुरुपयोग के विरुद्ध मूल ढांचा सिद्धांत, बोम्मई के बाद का न्यायिक पुनर्विलोकन और 44वें संशोधन के रक्षोपाय पहरा देते हैं। इससे अध्याय पूरा होता है; त्वरित पुनरावृत्ति तीनों भागों को संक्षेप में रखती है।

तीनों आपातों की तुलना
विशेषताराष्ट्रीय आपात (अनु. 352)राष्ट्रपति शासन (अनु. 356)वित्तीय आपात (अनु. 360)
आधारयुद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (वास्तविक या आसन्न)राज्य की सरकार संविधान के अनुसार नहीं चलाई जा सकतीभारत या उसके किसी भाग के वित्तीय स्थायित्व या प्रत्यय को संकट
संसद का अनुमोदनएक मास के भीतरदो मास के भीतरदो मास के भीतर
प्रत्येक सदन में बहुमतविशेष: कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मत देने वालों का दो-तिहाईसाधारणसाधारण
अवधिएक बार में छह मास, अधिकतम सीमा नहींएक बार में छह मास, अधिकतम तीन वर्षप्रतिसंहरण तक, अधिकतम सीमा नहीं
मूल अधिकारों पर प्रभावअनुच्छेद 19 निलंबित (केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण); अनुच्छेद 359 के अधीन अन्य अधिकार, 20 और 21 कभी नहींसीधे कोई नहींसीधे कोई नहीं
कितनी बार प्रयुक्ततीन: 1962, 1971, 1975अनेक बार, पहली बार 1951 में पंजाब मेंकभी नहीं

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. अनुच्छेद 352 के अधीन राष्ट्रीय आपात के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 'आंतरिक अशांति' वर्तमान में उन आधारों में से एक है जिन पर इसकी उद्घोषणा हो सकती है।
2. इसकी उद्घोषणा भारत के राज्यक्षेत्र के केवल किसी भाग के लिए भी हो सकती है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: 44वें संशोधन (1978) ने 'आंतरिक अशांति' के स्थान पर 'सशस्त्र विद्रोह' रखा। कथन 2 सही है: 42वें संशोधन के बाद से उद्घोषणा भारत के किसी भाग के लिए हो सकती है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q2. राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा का अनुमोदन संसद के प्रत्येक सदन द्वारा होना चाहिए:

  1. एक मास के भीतर, विशेष बहुमत से
  2. दो मास के भीतर, साधारण बहुमत से
  3. एक मास के भीतर, साधारण बहुमत से
  4. छह मास के भीतर, कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई बहुमत से
उत्तर देखें

उत्तर: A. एक मास के भीतर, विशेष बहुमत से

44वें संशोधन के बाद प्रत्येक सदन को एक मास के भीतर अपनी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित व मत देने वालों के दो-तिहाई से अनुमोदन करना होता है। दो मास में साधारण बहुमत राष्ट्रपति शासन और वित्तीय आपात का नियम है; अनुच्छेद 352 के लिए साधारण बहुमत पर्याप्त नहीं; और छह मास अनुमोदित उद्घोषणा के चलने की अवधि है, अनुमोदन की समय-सीमा नहीं।

Q3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सशस्त्र विद्रोह के आधार पर घोषित राष्ट्रीय आपात के दौरान अनुच्छेद 358 अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं को निलंबित करता है।
2. अनुच्छेद 359 के अधीन राष्ट्रपति अनुच्छेद 21 के अधीन प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का प्रवर्तन निलंबित नहीं कर सकता।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: 44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 358 केवल युद्ध या बाह्य आक्रमण के लिए घोषित आपात में लागू होता है। कथन 2 सही है: उसी संशोधन ने अनुच्छेद 20 और 21 को अनुच्छेद 359 की पहुँच से बाहर रखा। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q4. अनुच्छेद 356 के अधीन किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन अधिकतम कितनी अवधि तक लागू रह सकता है?

  1. एक वर्ष
  2. दो वर्ष
  3. तीन वर्ष
  4. कोई अधिकतम सीमा नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: C. तीन वर्ष

अनुच्छेद 356(4) तीन वर्ष तक छह-छह मास के विस्तार की अनुमति देता है। एक वर्ष केवल वह बिंदु है जिसके बाद 44वें संशोधन की दो अतिरिक्त शर्तें लागू होती हैं; दो वर्ष का अनुच्छेद में कोई आधार नहीं; और 'कोई अधिकतम सीमा नहीं' राष्ट्रीय या वित्तीय आपात का वर्णन है, राष्ट्रपति शासन का नहीं।

Q5. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (वाद)
A. एडीएम जबलपुर बनाम शिवकांत शुक्ला (1976)
B. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994)
C. रामेश्वर प्रसाद बनाम भारत संघ (2006)
D. के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
सूची II (निर्णय)
1. 2005 में बिहार विधान सभा का विघटन असंवैधानिक था
2. अनुच्छेद 359 के अधीन 1975 का आदेश लागू रहते बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ नहीं चल सकती थीं
3. अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन के अधीन है और बहुमत की परीक्षा सदन के पटल पर होती है
4. एडीएम जबलपुर का मत गलत था और उलट दिया गया है
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-2, B-3, C-1, D-4
  2. A-3, B-2, C-1, D-4
  3. A-2, B-1, C-3, D-4
  4. A-4, B-3, C-1, D-2
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-3, C-1, D-4

एडीएम जबलपुर 1975 के आपात में बंदी प्रत्यक्षीकरण से, बोम्मई अनुच्छेद 356 के न्यायिक पुनर्विलोकन और शक्ति परीक्षण से, रामेश्वर प्रसाद बिहार के विघटन से संबंधित है, और पुट्टस्वामी ने एडीएम जबलपुर को उलटा। दूसरा कूट A और B को बदलता है, तीसरा B और C को, और चौथा A और D को।

Q6. अनुच्छेद 360 के अधीन वित्तीय आपात के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संसद के अनुमोदन के बाद यह बार-बार अनुमोदन के बिना प्रतिसंहरण तक चलता है।
2. इसके दौरान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के वेतन घटाए जा सकते हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों कथन अनुच्छेद 360 के अधीन सही हैं: अनुमोदन के बाद कोई अधिकतम अवधि या नवीकरण की आवश्यकता नहीं, और खंड (4) उच्चतम और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों सहित वेतन में कटौती की अनुमति देता है। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q7. राष्ट्रपति को राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा का प्रतिसंहरण करना ही होगा यदि:

  1. लोक सभा साधारण बहुमत से उसे अस्वीकार करने का संकल्प पारित करे
  2. राज्य सभा विशेष बहुमत से उसे अस्वीकार करने का संकल्प पारित करे
  3. अधिकांश राज्य विधान-मंडल उसके विरुद्ध संकल्प पारित करें
  4. अंतरराज्य परिषद प्रतिसंहरण की सिफ़ारिश करे
उत्तर देखें

उत्तर: A. लोक सभा साधारण बहुमत से उसे अस्वीकार करने का संकल्प पारित करे

44वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 352(7) लोक सभा के साधारण बहुमत से अस्वीकार करने पर राष्ट्रपति को प्रतिसंहरण के लिए बाध्य करता है। राज्य सभा के पास ऐसी शक्ति नहीं, राज्य विधान-मंडलों की प्रतिसंहरण में कोई भूमिका नहीं, और अंतरराज्य परिषद केवल सलाहकारी है।

Q8. राष्ट्रीय आपात के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसके लागू रहते संसद राज्य सूची के विषयों पर विधि बना सकती है।
2. इस प्रकार बनी विधियाँ आपात समाप्त होने के बाद अनिश्चित काल तक लागू रहती हैं।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 अनुच्छेद 250 के अधीन सही है। कथन 2 गलत है: ऐसी विधियाँ आपात समाप्त होने के छह मास बाद प्रभावहीन हो जाती हैं, पहले की गई बातों को छोड़कर। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

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