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भारतीय संघवाद की प्रकृति और विधायी संबंध
भारत 'राज्यों का संघ' क्यों है, उसकी संघीय और एकात्मक विशेषताएँ, विधियों का राज्यक्षेत्रीय विस्तार, सातवीं अनुसूची की तीन सूचियाँ, अवशिष्ट शक्तियाँ, विरोध, संसद राज्य के विषयों पर कब विधि बना सकती है, और सूचियों को पढ़ने के लिए न्यायालयों के सिद्धांत।
संघवाद का अर्थ है कि संविधान शक्ति को शासन के दो स्तरों में बाँटता है, और प्रत्येक अपने क्षेत्र में सर्वोच्च होता है। भारत में संघ सरकार और राज्य सरकारें हैं, और भाग 11 (अनुच्छेद 245 से 263) बताता है कि विधि बनाने और प्रशासन चलाने में उनके संबंध कैसे हैं; उनके बीच वित्तीय विषय भाग 12 में और आपात उपबंध भाग 18 में हैं। इस अध्याय के तीन भाग हैं: यह पहला भाग बताता है कि भारत किस प्रकार का संघ है और विधि बनाने की शक्ति कैसे बँटी है; दूसरा प्रशासनिक और वित्तीय संबंधों तथा अंतरराज्यिक निकायों को लेता है; तीसरा आपात उपबंधों को, जब संतुलन तेज़ी से केंद्र की ओर झुक जाता है। केंद्र-राज्य के अधिकांश प्रश्न यहाँ सिखाए गए एक विचार पर लौटते हैं: विभाजन वास्तविक है, पर संविधान संघ को अधिक शक्तिशाली रखता है।
अनुच्छेद 1 घोषित करता है कि भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा; 'परिसंघ' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। संविधान सभा में इसे समझाते हुए बी.आर. आंबेडकर ने कहा कि संघ राज्यों के बीच किसी करार का परिणाम नहीं है, और किसी राज्य को इससे अलग होने का अधिकार नहीं है। फिर भी संविधान में संघ की मुख्य विशेषताएँ हैं। सरकारों के दो समूह हैं; संविधान लिखित और सर्वोच्च है, जो दोनों को बाँधता है; शक्तियाँ तीन सूचियों द्वारा उनमें बँटी हैं; उस विभाजन संबंधी उपबंधों का संशोधन कम से कम आधे राज्य विधान-मंडलों के अनुसमर्थन से ही हो सकता है (अनुच्छेद 368(2) का परंतुक); एक स्वतंत्र न्यायपालिका, जिसके शीर्ष पर उच्चतम न्यायालय है, संघ और राज्यों के विवाद सुलझाती है; और संसद का एक दूसरा सदन, राज्य सभा, राज्यों का प्रतिनिधित्व करता है।
इनके साथ मज़बूत एकात्मक विशेषताएँ भी हैं। शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में है; संघ और राज्यों के लिए एक ही संविधान और एकल नागरिकता है; न्यायपालिका एकीकृत है, उच्च न्यायालय उच्चतम न्यायालय के अधीन हैं; अखिल भारतीय सेवाएँ दोनों स्तरों पर काम करती हैं; राज्यपाल राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है; और अनुच्छेद 3 के अधीन संसद साधारण विधि से नए राज्य बना सकती है या वर्तमान राज्यों के क्षेत्र, सीमाएँ या नाम बदल सकती है, केवल संबंधित राज्य के विचार जानने के बाद। आपात के दौरान प्रणाली लगभग एकात्मक की तरह काम कर सकती है। इन कारणों से के.सी. व्हेयर ने संविधान को 'अर्ध-संघीय' कहा, और प्रायः कहा जाता है कि संघ कभी तोड़ा नहीं जा सकता, यद्यपि संसद उसके राज्यों को नए सिरे से गढ़ सकती है। फिर भी एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि संघवाद संविधान की आधारभूत विशेषता है, और मूल ढांचा सिद्धांत के कारण कोई संशोधन इसे नष्ट नहीं कर सकता।
अनुच्छेद 245 विधि-निर्माण की राज्यक्षेत्रीय सीमाएँ तय करता है। संसद भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकती है, और किसी राज्य का विधान-मंडल संपूर्ण राज्य या उसके किसी भाग के लिए। संघ की विधि केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होती कि उसका प्रवर्तन भारत के बाहर होता है (अनुच्छेद 245(2)), इसलिए संसद, उदाहरण के लिए, विदेश में भारतीय नागरिकों द्वारा किए गए अपराधों पर भारतीय दंड विधि लागू कर सकती है। इसके विपरीत, राज्य की विधि का राज्य से वास्तविक राज्यक्षेत्रीय संबंध होना चाहिए; वह सामान्यतः राज्य की सीमाओं के बाहर के विषयों को शासित नहीं कर सकती। पर राज्यक्षेत्र केवल आधा प्रश्न है। दूसरा आधा, कि प्रत्येक विधान-मंडल किन विषयों पर विधि बना सकता है, अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची से उत्तरित होता है।
अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची विधि-निर्माण के विषयों को तीन सूचियों में बाँटते हैं। संघ सूची (सूची 1) में वे विषय हैं जिनके लिए एक राष्ट्रीय नीति चाहिए, जैसे रक्षा, विदेश कार्य, रेल, मुद्रा, बैंककारी और परमाणु ऊर्जा; उन पर केवल संसद विधि बना सकती है। राज्य सूची (सूची 2) में स्थानीय महत्व के विषय हैं, जैसे लोक व्यवस्था, पुलिस, लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता, कृषि और स्थानीय शासन; सामान्यतः उन पर केवल राज्य का विधान-मंडल विधि बना सकता है। समवर्ती सूची (सूची 3) में वे विषय हैं जिन पर दोनों विधि बना सकते हैं, जैसे दंड विधि, विवाह और विवाह-विच्छेद, संविदा, वन, शिक्षा और विद्युत। जहाँ एक सूची की कोई प्रविष्टि दूसरी से टकराती लगे, वहाँ अनुच्छेद 246 संघ सूची को अन्य दो पर, और समवर्ती सूची को राज्य सूची पर प्राथमिकता देता है।
| सूची | कौन विधि बनाता है | उदाहरण | टकराव की स्थिति में |
|---|---|---|---|
| सूची 1: संघ सूची | केवल संसद | रक्षा, विदेश कार्य, रेल, मुद्रा, बैंककारी, परमाणु ऊर्जा | सूची 2 और 3 पर अभिभावी |
| सूची 2: राज्य सूची | राज्य विधान-मंडल (विशेष स्थितियों में ही संसद) | लोक व्यवस्था, पुलिस, लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता, कृषि, स्थानीय शासन | सूची 1 और 3 के अधीन |
| सूची 3: समवर्ती सूची | संसद और राज्य विधान-मंडल दोनों | दंड विधि, विवाह और विवाह-विच्छेद, संविदा, वन, शिक्षा, विद्युत | संघ की विधि अभिभावी (अनुच्छेद 254), 254(2) के अधीन रहते हुए |
| अवशिष्ट विषय | केवल संसद (अनुच्छेद 248) | सूची 2 और 3 में न आने वाला कोई भी विषय या कर | लागू नहीं |
सूचियाँ स्थिर नहीं हैं। 42वें संशोधन (1976) ने पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाले: शिक्षा, वन, बाट और माप, वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण, और न्याय प्रशासन (उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को छोड़कर सभी न्यायालयों का गठन और संगठन)। कारण यह बताया गया कि इनके लिए एकरूप राष्ट्रीय मानक चाहिए, पर प्रभाव यह हुआ कि संसद उन क्षेत्रों पर विधि बना सकी जो केवल राज्यों के थे। इसलिए आज शिक्षा और वन जैसे विषयों पर संसद और राज्य विधान-मंडल दोनों विधि बना सकते हैं। ऐसे परिवर्तन के लिए संविधान संशोधन चाहिए, और चूँकि यह सातवीं अनुसूची बदलता है, इसके लिए आधे राज्यों का अनुसमर्थन भी चाहिए।
कोई भी सूची हर विषय का पूर्वानुमान नहीं कर सकती, इसलिए अनुच्छेद 248 संसद को ऐसे किसी विषय पर विधि बनाने की अनन्य शक्ति देता है जो राज्य सूची या समवर्ती सूची में नहीं है, जिसमें ऐसा कोई कर लगाने की शक्ति भी शामिल है जिसका उल्लेख इन दोनों सूचियों में से किसी में नहीं है; संघ सूची की प्रविष्टि 97 भी यही कहती है। ये अवशिष्ट शक्तियाँ हैं। यह चुनाव संविधान निर्माताओं की मज़बूत केंद्र की पसंद दिखाता है: अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास हैं, जबकि भारत ने कनाडा का अनुसरण कर उन्हें केंद्र को दिया। कोई नया विषय किसी वर्तमान प्रविष्टि में आता है या अवशिष्ट है, इसका अंतिम निर्णय न्यायालय करते हैं। मान लीजिए कोई नई तकनीक ऐसा प्रश्न उठाती है जिसका वर्णन किसी सूची की किसी प्रविष्टि में नहीं है: उसे विनियमित करने की शक्ति संसद की होगी, राज्य विधान-मंडलों की नहीं।
चूँकि प्रविष्टियाँ व्यापक शब्दों में लिखी हैं, विधियाँ अक्सर एक से अधिक सूची को छूती हैं, और न्यायालयों ने यह तय करने के लिए सिद्धांत बनाए हैं कि शक्ति किस विधान-मंडल की थी। सार और तत्व के सिद्धांत के अधीन न्यायालय विधि की वास्तविक प्रकृति और स्वरूप देखता है; यदि वह विधि बनाने वाले विधान-मंडल की सूची में आता है, तो विधि विधिमान्य है, भले ही वह आनुषंगिक रूप से किसी अन्य सूची के विषय को छूती हो। बंबई राज्य बनाम एफ.एन. बलसारा (1951) में बंबई मद्यनिषेध अधिनियम को मादक मदिरा पर राज्य की विधि के रूप में बनाए रखा गया, यद्यपि उसने आनुषंगिक रूप से आयात को, जो संघ का विषय है, प्रभावित किया। छद्म विधान का सिद्धांत उलटी दिशा में काम करता है: कोई विधान-मंडल अप्रत्यक्ष रूप से वह नहीं कर सकता जो वह प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकता, इसलिए ऐसी विधि जो दिखने में एक विषय पर हो पर वास्तव में किसी दूसरे, विधान-मंडल की शक्ति से बाहर के, विषय को लक्ष्य करती हो, अविधिमान्य है; उच्चतम न्यायालय ने यह कसौटी के.सी. गजपति नारायण देव बनाम उड़ीसा राज्य (1953) में लागू की। न्यायालय प्रविष्टियों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से भी पढ़ते हैं, ताकि हर एक को अर्थ मिले और कोई एक दूसरी को निगल न जाए।
समवर्ती सूची के विषय पर संसद और राज्य दोनों विधि बना सकते हैं, इसलिए अनुच्छेद 254 टकराव सुलझाता है। यदि किसी समवर्ती विषय पर राज्य की विधि संसद द्वारा बनाई गई विधि के विरुद्ध हो, तो संघ की विधि अभिभावी होती है और राज्य की विधि विरोध की मात्रा तक शून्य होती है। इसका एक अपवाद है। अनुच्छेद 254(2) के अधीन, किसी समवर्ती विषय पर राज्य की ऐसी विधि जो संघ की किसी पूर्ववर्ती विधि के विरुद्ध हो, उस राज्य में अभिभावी होती है यदि उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया हो और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति मिल गई हो। तब भी अंतिम शब्द संसद का रहता है, क्योंकि वह बाद में उसी विषय पर ऐसी विधि बना सकती है जो राज्य की विधि में कुछ जोड़े, उसका संशोधन करे, उसमें परिवर्तन करे या उसे निरसित करे। मान लीजिए कोई राज्य किसी समवर्ती विषय पर संघ के अधिनियम से अधिक कड़े नियम चाहता है: वह उन्हें केवल राष्ट्रपति की अनुमति से पा सकता है, जिसका व्यवहार में अर्थ संघ सरकार की सहमति है।
दो स्थितियों में संसद राज्य सूची के विषयों पर भी विधि बना सकती है। अनुच्छेद 249 के अधीन, यदि राज्य सभा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई द्वारा समर्थित संकल्प से घोषित करे कि राष्ट्रीय हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो संसद संकल्प में उल्लिखित राज्य सूची के विषय पर विधि बना सकती है। संकल्प अधिकतम एक वर्ष तक प्रवृत्त रहता है और एक बार में एक वर्ष के लिए कितनी भी बार नवीकृत किया जा सकता है, और विधि संकल्प की समाप्ति के छह मास बाद प्रभावी नहीं रहती। निर्णय राज्य सभा करती है क्योंकि वह राज्यों का सदन है। अनुच्छेद 250 के अधीन, जब राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में हो, संसद राज्य सूची के किसी भी विषय पर विधि बना सकती है, और ऐसी विधि आपात की समाप्ति के छह मास बाद प्रभावी नहीं रहती। दोनों स्थितियों में राज्य का विधान-मंडल अपनी शक्ति नहीं खोता, पर दोनों विधियों में विरोध हो तो संघ की विधि अभिभावी होती है।
दो और मार्ग सहमति या संधियों पर निर्भर हैं। अनुच्छेद 252 के अधीन, यदि दो या अधिक राज्यों के विधान-मंडल संकल्प पारित कर संसद से किसी राज्य सूची के विषय पर विधि बनाने को कहें, तो संसद उन राज्यों के लिए ऐसा कर सकती है, और कोई अन्य राज्य बाद में अपने संकल्प से उस विधि को अंगीकार कर सकता है; ऐसी विधि का संशोधन या निरसन फिर केवल संसद कर सकती है, वे राज्य नहीं जिन्होंने उसे माँगा था। वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और जल (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1974 इसी प्रकार पारित हुए। अनुच्छेद 253 के अधीन, संसद किसी संधि, करार या अभिसमय को या किसी अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में किए गए विनिश्चय को लागू करने के लिए भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए कोई भी विधि बना सकती है, राज्य के विषय पर भी। वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 अपने उद्देश्य के रूप में स्टॉकहोम में 1972 के संयुक्त राष्ट्र मानव पर्यावरण सम्मेलन के विनिश्चयों का उल्लेख करता है।
| अनुच्छेद | आधार | विधि कब तक रहती है |
|---|---|---|
| 249 | राज्य सभा का संकल्प, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई, राष्ट्रीय हित | संकल्प (एक वर्ष, नवीकरणीय) की समाप्ति के छह मास बाद तक |
| 250 | राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा प्रवर्तन में | आपात की समाप्ति के छह मास बाद तक |
| 252 | दो या अधिक राज्य विधान-मंडलों के संकल्प | संसद द्वारा संशोधित या निरसित होने तक |
| 253 | किसी संधि, करार, अभिसमय या अंतरराष्ट्रीय विनिश्चय को लागू करना | संघ की किसी भी विधि की तरह |
| 356/357 | किसी राज्य में राष्ट्रपति शासन (भाग 3) | राष्ट्रपति शासन के बाद राज्य विधान-मंडल द्वारा परिवर्तित किए जाने तक |
संघ के पास स्वयं राज्य के विधान पर भी नियंत्रण हैं। राज्यपाल किसी राज्य विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकता है (अनुच्छेद 200), और तब राष्ट्रपति अनुमति रोक सकता है (अनुच्छेद 201); राज्य के भीतर व्यापार पर युक्तियुक्त निर्बंधन लगाने वाले विधेयकों को पुरःस्थापित करने से पहले राष्ट्रपति की पूर्व मंज़ूरी चाहिए (अनुच्छेद 304(ख) का परंतुक); और वित्तीय आपात के दौरान राष्ट्रपति राज्य के धन विधेयकों को आरक्षित रखने की अपेक्षा कर सकता है (अनुच्छेद 360(4))। कुल मिलाकर, विधायी संबंध एक ही ढाँचे का पालन करते हैं: संविधान राज्यों को राज्य सूची में अपना वास्तविक क्षेत्र देता है, पर उसके चारों ओर संघ की ऐसी शक्तियाँ रखता है जिनका प्रयोग राष्ट्रीय हित में, आपात में, सहमति से या संधि के लिए हो सकता है। इसी कारण भारतीय संघवाद को मज़बूत केंद्र वाला कहा जाता है, और इसी कारण अगले भाग देखते हैं कि यही संतुलन प्रशासन, वित्त और आपात में कैसे काम करता है।
परीक्षा में ध्यान दें
- अनुच्छेद 1 भारत को 'राज्यों का संघ' कहता है; 'परिसंघ' शब्द नहीं आता, और कोई राज्य अलग नहीं हो सकता।
- अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास हैं (अनुच्छेद 248), कनाडा की तरह, न कि अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया की तरह राज्यों के पास।
- 42वें संशोधन ने शिक्षा, वन, बाट और माप, वन्य जीव और पक्षी, और न्याय प्रशासन को राज्य सूची से समवर्ती सूची में डाला, संघ सूची में नहीं।
- अनुच्छेद 249 के लिए राज्य सभा के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई चाहिए, कुल सदस्य संख्या का नहीं, और लोक सभा की कोई भूमिका नहीं है।
- अनुच्छेद 252 के अधीन बनी विधि का संशोधन या निरसन केवल संसद कर सकती है, वे राज्य नहीं जिन्होंने उसे माँगा था।
- अनुच्छेद 254(2) के अधीन समवर्ती विषय पर राज्य की विधि संघ की पूर्ववर्ती विधि पर तभी अभिभावी होती है जब उसे राष्ट्रपति की अनुमति मिली हो, और संसद बाद में भी उसे निष्प्रभावी कर सकती है।
- सातवीं अनुसूची बदलने के लिए ऐसा संविधान संशोधन चाहिए जिसका कम से कम आधे राज्य विधान-मंडल अनुसमर्थन करें।
- सार और तत्व का सिद्धांत उस विधि को बचाता है जो आनुषंगिक रूप से दूसरी सूची को छूती है; छद्म विधान का सिद्धांत उस विधि को रद्द करता है जो अप्रत्यक्ष रूप से वह करती है जो विधान-मंडल प्रत्यक्ष रूप से नहीं कर सकता।
पुनरावृत्ति
- अनुच्छेद 1: भारत राज्यों का संघ है; किसी करार का परिणाम नहीं, अलग होने का अधिकार नहीं।
- संघीय विशेषताएँ: दो सरकारें, लिखित सर्वोच्च संविधान, शक्तियों का विभाजन, कठोर संशोधन, स्वतंत्र न्यायपालिका, राज्य सभा।
- एकात्मक विशेषताएँ: मज़बूत केंद्र, एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, अखिल भारतीय सेवाएँ, अनुच्छेद 3, नियुक्त राज्यपाल, आपात; 'अर्ध-संघीय' (के.सी. व्हेयर); संघवाद मूल ढाँचा है (एस.आर. बोम्मई, 1994)।
- अनुच्छेद 245: राज्यक्षेत्रीय विस्तार; संघ की विधियाँ भारत के बाहर भी प्रवर्तित हो सकती हैं।
- अनुच्छेद 246 और सातवीं अनुसूची: संघ, राज्य और समवर्ती सूचियाँ, टकराव में संघ सूची अभिभावी।
- 42वाँ संशोधन (1976): पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में।
- अवशिष्ट शक्तियाँ संसद के पास (अनुच्छेद 248, प्रविष्टि 97); अनुच्छेद 254: समवर्ती विषयों पर संघ की विधि अभिभावी, 254(2) को छोड़कर।
- राज्य के विषयों पर संसद: अनुच्छेद 249, 250, 252, 253; संघ के नियंत्रण अनुच्छेद 200–201, 304(ख) और 360(4) से।
अभ्यास प्रश्न
Q1. 42वें संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा निम्नलिखित में से कौन-सा विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में नहीं डाला गया?
- शिक्षा
- वन
- पुलिस
- वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण
उत्तर देखें
उत्तर: C. पुलिस
पुलिस राज्य सूची में ही है। 42वें संशोधन ने शिक्षा, वन, बाट और माप, वन्य जीवों और पक्षियों का संरक्षण, और न्याय प्रशासन समवर्ती सूची में डाले, इसलिए अन्य तीनों विकल्प स्थानांतरित किए गए थे।
Q2. भारत में विधि-निर्माण की अवशिष्ट शक्तियाँ निहित हैं:
- राज्य विधान-मंडलों में
- संसद में
- संसद और राज्य विधान-मंडलों दोनों में समवर्ती रूप से
- राष्ट्रपति में
उत्तर देखें
उत्तर: B. संसद में
अनुच्छेद 248 और संघ सूची की प्रविष्टि 97 संसद को ऐसे किसी भी विषय पर, जिसमें कोई कर भी शामिल है, अनन्य शक्ति देते हैं जो राज्य या समवर्ती सूची में नहीं है। भारत इसमें कनाडा का अनुसरण करता है; अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में अवशिष्ट शक्तियाँ राज्यों के पास हैं। राष्ट्रपति के पास ऐसे विषयों पर अध्यादेश के सिवा कोई विधायी शक्ति नहीं है, और अध्यादेश भी संसद के ही क्षेत्रों तक सीमित है।
Q3. अनुच्छेद 249 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संकल्प राज्य सभा द्वारा उसकी कुल सदस्य संख्या के दो-तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए।
2. इसके अधीन बनी विधि संकल्प के प्रवृत्त न रहने के छह मास बाद प्रभावी नहीं रहती।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 2
कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 249 के लिए उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई चाहिए, कुल सदस्य संख्या के नहीं। अनुच्छेद 249(3) के अधीन कथन 2 सही है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दो राज्यों के अनुरोध पर अनुच्छेद 252 के अधीन संसद द्वारा पारित विधि को उन राज्यों के विधान-मंडल निरसित कर सकते हैं।
2. कोई अन्य राज्य अपने विधान-मंडल में संकल्प पारित कर ऐसी विधि को अंगीकार कर सकता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 2
कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 252(2) के अधीन ऐसी विधि का संशोधन या निरसन केवल संसद के अधिनियम से हो सकता है। कथन 2 सही है: कोई अन्य राज्य संकल्प द्वारा उसे अंगीकार कर सकता है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q5. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 248
B. अनुच्छेद 253
C. अनुच्छेद 254
D. अनुच्छेद 250
सूची II (विषय)
1. अंतरराष्ट्रीय करारों को प्रभावी करने के लिए विधियाँ
2. समवर्ती विषयों पर संघ और राज्य की विधियों में विरोध
3. विधि-निर्माण की अवशिष्ट शक्तियाँ
4. राष्ट्रीय आपात के दौरान राज्य के विषयों पर संसद की विधि बनाने की शक्ति
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:
- A-3, B-1, C-2, D-4
- A-1, B-3, C-2, D-4
- A-3, B-2, C-1, D-4
- A-3, B-1, C-4, D-2
उत्तर देखें
उत्तर: A. A-3, B-1, C-2, D-4
अनुच्छेद 248 अवशिष्ट शक्ति, 253 अंतरराष्ट्रीय करारों को लागू करना, 254 विरोध और 250 राष्ट्रीय आपात के दौरान विधान से संबंधित है। दूसरा कूट 248 और 253 को बदलता है, तीसरा 253 और 254 को, और चौथा 254 और 250 को।
Q6. समवर्ती सूची के किसी विषय पर राज्य की विधि संसद द्वारा बनाई गई पूर्ववर्ती विधि के विरुद्ध है। उस राज्य में राज्य की विधि अभिभावी होगी यदि:
- वह राज्य विधान सभा के दो-तिहाई बहुमत से पारित हो
- उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया हो और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति मिल गई हो
- राज्यपाल उस पर अनुमति दे
- राज्य सभा उसके समर्थन में संकल्प पारित करे
उत्तर देखें
उत्तर: B. उसे राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया हो और उस पर राष्ट्रपति की अनुमति मिल गई हो
अनुच्छेद 254(2) ऐसी राज्य विधि को उस राज्य में तभी अभिभावी होने देता है जब उसे राष्ट्रपति के लिए आरक्षित कर राष्ट्रपति की अनुमति मिल जाए; तब भी संसद बाद में उसका संशोधन या निरसन कर सकती है। विधान सभा का विशेष बहुमत, राज्यपाल की अनुमति या राज्य सभा का संकल्प विरोध को दूर नहीं करता।
Q7. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. भारत के संविधान के अनुच्छेद 1 में 'परिसंघ' शब्द का प्रयोग हुआ है।
2. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) में उच्चतम न्यायालय ने संघवाद को संविधान की मूल विशेषता माना।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
- केवल 1
- केवल 2
- 1 और 2 दोनों
- न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें
उत्तर: B. केवल 2
कथन 1 गलत है: अनुच्छेद 1 कहता है कि भारत 'राज्यों का संघ' होगा, और 'परिसंघ' शब्द का प्रयोग नहीं हुआ है। कथन 2 सही है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।
Q8. वह सिद्धांत जिसके अधीन किसी विधि को इसलिए विधिमान्य रखा जाता है कि उसकी वास्तविक प्रकृति और स्वरूप उसे बनाने वाले विधान-मंडल की क्षमता में आता है, भले ही वह आनुषंगिक रूप से किसी अन्य सूची के विषय को छूती हो, कहलाता है:
- छद्म विधान
- सार और तत्व
- आच्छादन
- पृथक्करणीयता
उत्तर देखें
उत्तर: B. सार और तत्व
सार और तत्व विधि के वास्तविक स्वरूप को देखता है, जैसे बंबई राज्य बनाम एफ.एन. बलसारा (1951) में। छद्म विधान उलटा काम करता है, ऐसी विधि को रद्द करता है जो अप्रत्यक्ष रूप से वह करती है जो प्रत्यक्ष रूप से नहीं हो सकता; आच्छादन और पृथक्करणीयता मूल अधिकारों और आंशिक रूप से अविधिमान्य विधियों से जुड़े सिद्धांत हैं, सूचियों के विभाजन से नहीं।
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ऐप में पढ़ें →स्रोत
- Constitution of India, Articles 1, 3, 200–201, 245–254, 304, 360(4), 368(2) and the Seventh Schedule — https://legislative.gov.in/constitution-of-india/
- Constitution (Forty-second Amendment) Act, 1976; Wild Life (Protection) Act, 1972; Water (Prevention and Control of Pollution) Act, 1974; Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981 — https://www.indiacode.nic.in
- Supreme Court of India: State of Bombay v. F.N. Balsara (1951); K.C. Gajapati Narayan Deo v. State of Orissa (1953); S.R. Bommai v. Union of India (1994) — https://digiscr.sci.gov.in
- Constituent Assembly Debates, 4 November 1948 (Dr B.R. Ambedkar moving the Draft Constitution) — https://eparlib.nic.in