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बैंकिंग प्रणाली: बैंकों के प्रकार, डूबे ऋण और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार

मुद्रा और बैंकिंग · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

भारतीय बैंकिंग का विनियमन और संगठन, राष्ट्रीयकरण (1949, 1955, 1969, 1980) और 2020 के विलय, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भुगतान और लघु वित्त बैंक, डीआईसीजीसी निक्षेप बीमा, एनपीए की परिभाषा और श्रेणियाँ, डूबे ऋण का चक्र और उसके कानून (ऋण वसूली न्यायाधिकरण, सरफ़ेसी, दिवाला संहिता), और 2025 के लक्ष्यों और प्रमाणपत्रों सहित प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार।

भाग 1 ने दिखाया कि बैंक उधार देकर मुद्रा को कैसे कई गुना करते हैं। यह भाग स्वयं बैंकों को देखता है। यह बताता है कि भारतीय बैंकिंग कैसे संगठित और विनियमित है, यह कुछ निजी बैंकों से बढ़कर राष्ट्रीयकरण और बाद में सुधारों से आकार लेने वाली प्रणाली कैसे बनी, और उन लोगों तक पहुँचने के लिए कौन-से नए प्रकार के बैंक जोड़े गए जिन्हें साधारण बैंक छोड़ देते थे। फिर यह उन दो विषयों पर आता है जिन पर प्रारंभिक परीक्षा बार-बार लौटती है। पहला है डूबा ऋण, या अनर्जक आस्ति: उसकी परिभाषा क्या है, 2010 के दशक में डूबे ऋणों का ढेर क्यों लगा और उनकी वसूली के लिए कौन-से कानून बने। दूसरा है प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार, वह नियम जो बैंक ऋण का एक निश्चित भाग कृषि, छोटे उद्यमों और कमज़ोर वर्गों की ओर मोड़ता है। निक्षेप बीमा, जो किसी बैंक के विफल होने पर छोटे बचतकर्ताओं की रक्षा करता है, चित्र को पूरा करता है।

भारत में बैंक मुख्यतः बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 से शासित होते हैं, जिसे आरबीआई लागू करता है। यह तय करता है कि बैंकिंग कौन कर सकता है, नए बैंकों और शाखाओं को लाइसेंस देता है, और बैंकों के संचालन का पर्यवेक्षण करता है। आरबीआई अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध बैंक अनुसूचित बैंक है। शामिल होने के लिए बैंक को पूँजी और अपने कामकाज के ठोस संचालन संबंधी आरबीआई की शर्तें पूरी करनी होती हैं; बदले में वह आरबीआई से उधार ले सकता है और उसे धारा 42 के अंतर्गत सीआरआर आरबीआई के पास रखना होता है। बैंक दो बड़े परिवारों में आते हैं। वाणिज्यिक बैंक लाभ के लिए चलने वाली कंपनियाँ या सांविधिक निकाय हैं; सहकारी बैंक अपने सदस्यों के स्वामित्व में होते हैं और लंबे समय तक आरबीआई और राज्यों के सहकारी समिति रजिस्ट्रारों के दोहरे नियंत्रण में रहे, जिसे बैंककारी विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 ने आरबीआई को उन पर अधिक शक्तियाँ देकर कम किया।

वाणिज्यिक बैंक स्वयं कई प्रकार के होते हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक वे हैं जिनमें सरकार की बहुमत हिस्सेदारी है, जैसे भारतीय स्टेट बैंक और राष्ट्रीयकृत बैंक। निजी क्षेत्र के बैंक मुख्यतः निजी शेयरधारकों के स्वामित्व में हैं; नरसिंहम समिति (1991) के बाद हुए सुधारों के पश्चात 1990 के दशक से नए निजी बैंकों की एक लहर को लाइसेंस मिले। विदेशी बैंक भारत में शाखाओं या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनियों के माध्यम से काम करते हैं। क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक छोटे किसानों, ग्रामीण कारीगरों और मज़दूरों तक ऋण पहुँचाने के लिए बनाए गए: पहले बैंक 2 अक्टूबर 1975 को स्थापित हुए और अब क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 उन्हें शासित करता है, जिनकी शेयर पूँजी केंद्र सरकार (50 प्रतिशत), एक प्रायोजक बैंक (35 प्रतिशत) और राज्य सरकार (15 प्रतिशत) के पास होती है। दो नए प्रकार, भुगतान बैंक और लघु वित्त बैंक, आगे बताए गए हैं; तालिका उनकी तुलना करती है।

भारतीय बैंकिंग का स्वरूप काफ़ी हद तक राष्ट्रीयकरण की देन है। 1935 में शेयरधारकों के स्वामित्व वाले बैंक के रूप में स्थापित आरबीआई का 1 जनवरी 1949 को राष्ट्रीयकरण हुआ। इंपीरियल बैंक ऑफ़ इंडिया 1 जुलाई 1955 को भारतीय स्टेट बैंक बना। 19 जुलाई 1969 को सरकार ने 14 सबसे बड़े निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, जिनमें से हर एक की जमाएँ ₹50 करोड़ या अधिक थीं, और 15 अप्रैल 1980 को छह और का, जिनमें से हर एक की जमाएँ ₹200 करोड़ या अधिक थीं। उद्देश्य सामाजिक बैंकिंग था: शाखाओं को गाँवों तक ले जाना, कुछ व्यावसायिक घरानों में ऋण के केंद्रीकरण को समाप्त करना, और ऋण को किसानों और छोटे उत्पादकों की ओर मोड़ना। शाखाओं का जाल और ग्रामीण जमाएँ तेज़ी से बढ़ीं, पर समय के साथ निर्देशित ऋण, ऊँची आरक्षित अपेक्षाओं और कमज़ोर प्रबंधन ने लाभ को चोट पहुँचाई। 1990 के दशक के सुधारों ने विवेकपूर्ण मानदंडों, नए निजी बैंकों और ब्याज दरों पर अधिक स्वतंत्रता से इसका उत्तर दिया। फिर एकीकरण हुआ: 2017 से 2020 के बीच विलयों के बाद 1 अप्रैल 2020 से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की संख्या घटकर 12 रह गई।

उन लोगों तक पहुँचने के लिए जिन्हें सेवा देना पूर्ण-सेवा बैंकों को बहुत महँगा लगता था, आरबीआई ने नवंबर 2014 में दो प्रकार के विभेदित बैंकों के लिए दिशानिर्देश जारी किए और 2015 में सैद्धांतिक अनुमोदन दिए। भुगतान बैंक बचत और चालू खाते की जमाएँ स्वीकार कर सकता है, डेबिट कार्ड जारी कर सकता है, धनप्रेषण संभाल सकता है और बीमा जैसे सरल तृतीय-पक्ष उत्पाद बेच सकता है, पर वह ऋण नहीं दे सकता और क्रेडिट कार्ड जारी नहीं कर सकता। उसकी जमाएँ प्रति ग्राहक सीमित हैं, जिस सीमा को आरबीआई ने 2021 में ₹1 लाख से बढ़ाकर ₹2 लाख किया, और उसे अपनी अधिकांश निधि सुरक्षित सरकारी प्रतिभूतियों में रखनी होती है; विचार यह है कि प्रवासी मज़दूरों और छोटे बचतकर्ताओं के लिए पैसा रखने और भेजने का सस्ता, सुरक्षित स्थान हो। लघु वित्त बैंक जमा और ऋण दोनों का काम करता है, पर उसका व्यवसाय छोटे उधारकर्ताओं पर केंद्रित होता है: लघु और सीमांत किसान, सूक्ष्म और लघु उद्यम और असंगठित क्षेत्र। उसे अपने ऋण का बड़ा भाग प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को देना होता है, और उसके ऋण पोर्टफ़ोलियो का कम से कम आधा भाग ₹25 लाख तक के ऋणों का होना चाहिए।

बैंकों के प्रकारों की तुलना
बैंकजमाएँऋणकेंद्र
वाणिज्यिक बैंक (सार्वजनिक, निजी, विदेशी)सभी प्रकार कीसभी प्रकार केसभी प्रकार के ग्राहक
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (1976 का अधिनियम)हाँहाँछोटे किसान, ग्रामीण कारीगर और मज़दूर
लघु वित्त बैंक (2014 के दिशानिर्देश)हाँहाँ, मुख्यतः छोटे ऋणछोटे उधारकर्ता, सूक्ष्म और लघु उद्यम
भुगतान बैंक (2014 के दिशानिर्देश)बचत और चालू, प्रति ग्राहक ₹2 लाख तकअनुमति नहींभुगतान और धनप्रेषण, छोटे बचतकर्ता

चूँकि बैंक जो पाता है उसका अधिकांश उधार दे देता है, इसलिए उसके विफल होने पर जमाकर्ताओं को सुरक्षा चाहिए। यह काम निक्षेप बीमा का है, जो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम (डीआईसीजीसी) देता है, जो डीआईसीजीसी अधिनियम, 1961 के अंतर्गत स्थापित आरबीआई की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक संस्था है। यह वाणिज्यिक बैंकों, जिनमें क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, लघु वित्त बैंक और भुगतान बैंक शामिल हैं, और सहकारी बैंकों में बचत, चालू, सावधि और आवर्ती खातों की जमाओं का बीमा करता है। 4 फ़रवरी 2020 से बीमा राशि हर बैंक में प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख है, मूलधन और ब्याज को मिलाकर; इससे पहले यह ₹1 लाख थी। प्रीमियम बैंक चुकाते हैं, जमाकर्ता नहीं। मान लीजिए किसी परिवार के ₹7 लाख एक ऐसे बैंक में हैं जो विफल हो जाता है: ₹5 लाख बीमित हैं, और शेष इस पर निर्भर करता है कि बैंक की आस्तियों से कितनी वसूली होती है।

ऋण तब बैंक के लिए कमाई बंद कर देता है जब उधारकर्ता भुगतान बंद कर देता है। आरबीआई के विवेकपूर्ण मानदंडों के अंतर्गत कोई मीयादी ऋण तब अनर्जक आस्ति (एनपीए) बन जाता है जब ब्याज या मूलधन की किस्त 90 दिनों से अधिक समय तक अतिदेय रहती है; यह 90-दिन नियम 2004 से लागू है। उस बिंदु से पहले, बैंकों को तनाव को विशेष उल्लेख खातों के रूप में जल्दी चिह्नित करना होता है: भुगतान 30 दिनों तक अतिदेय हो तो एसएमए-0, 31 से 60 दिन के लिए एसएमए-1 और 61 से 90 दिन के लिए एसएमए-2। फिर एनपीए को उसकी आयु के अनुसार श्रेणीबद्ध किया जाता है। एनपीए के रूप में पहले 12 महीनों तक वह अवमानक होता है, 12 महीने अवमानक रहने के बाद संदिग्ध, और हानि आस्ति तब जब बैंक, उसके लेखा परीक्षक या आरबीआई उसे वसूली योग्य न मानें पर उसे अभी बट्टे खाते में न डाला गया हो। बैंकों को प्रावधान, अर्थात अपने लाभ से अलग रखा धन, करना होता है जो हर श्रेणी के साथ बढ़ता है। सकल एनपीए ऐसे सभी ऋण हैं; निवल एनपीए सकल एनपीए में से वे प्रावधान घटाकर मिलते हैं, इसलिए निवल आँकड़े वह हानि दिखाते हैं जो अभी ढकी नहीं गई है।

2010 के दशक में डूबे ऋण भारतीय बैंकिंग की सबसे बड़ी समस्या बन गए। 2000 के दशक के उछाल में अवसंरचना और औद्योगिक कंपनियों को दिए गए बड़े ऋण परियोजनाओं के अटकने और माँग धीमी पड़ने से बिगड़ गए। आर्थिक समीक्षा 2016-17 ने इस परिणाम को दोहरे तुलन-पत्र की समस्या कहा: बहुत अधिक कर्ज़ वाली कंपनियों ने नई परियोजनाएँ टाल दीं, जबकि दबावग्रस्त ऋण सँभाल रहे बैंक नया उधार देने से हिचकने लगे। 2015 में आरबीआई की आस्ति गुणवत्ता समीक्षा ने बैंकों को छिपा तनाव स्वीकार करने को विवश किया, और मार्च 2018 तक अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों का सकल एनपीए अनुपात 11 प्रतिशत से ऊपर चढ़ गया। वसूली के उपाय परतों में बने थे: 1993 के एक अधिनियम के अंतर्गत ऋण वसूली न्यायाधिकरण; सरफ़ेसी अधिनियम, 2002, जो सुरक्षित ऋणदाताओं को न्यायालय गए बिना चूककर्ता की प्रतिभूति अपने कब्ज़े में लेने और बेचने देता है और डूबे ऋण खरीदने वाली आस्ति पुनर्निर्माण कंपनियों का प्रावधान करता है; और दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016, जो चूककर्ता कंपनी को समयबद्ध समाधान प्रक्रिया को सौंप देती है। पहचान, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के पुनर्पूंजीकरण और इन कानूनों के साथ, सितंबर 2025 तक यह अनुपात घटकर 2.1 प्रतिशत रह गया (आरबीआई वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट, दिसंबर 2025)।

प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार वह नियम है कि बैंक को अपने ऋण का एक निश्चित भाग उन क्षेत्रों को देना होता है जो अन्यथा उससे वंचित रह सकते हैं। यह विचार राष्ट्रीयकरण के युग से उपजा; आज यह आरबीआई के प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार संबंधी मास्टर निदेशों से शासित है, जो 1 अप्रैल 2025 से संशोधित हुए। आठ श्रेणियाँ हैं: कृषि, सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम, निर्यात ऋण, शिक्षा, आवास, सामाजिक अवसंरचना, नवीकरणीय ऊर्जा और अन्य। घरेलू वाणिज्यिक बैंकों और 20 या अधिक शाखाओं वाले विदेशी बैंकों को समायोजित निवल बैंक ऋण (एएनबीसी) या तुलन-पत्र से इतर एक्सपोज़र के ऋण समतुल्य, जो भी अधिक हो, का 40 प्रतिशत प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र को देना होता है। इसके भीतर 18 प्रतिशत कृषि को (जिसमें 10 प्रतिशत लघु और सीमांत किसानों को), 7.5 प्रतिशत सूक्ष्म उद्यमों को और 12 प्रतिशत कमज़ोर वर्गों को जाना चाहिए। 20 से कम शाखाओं वाले विदेशी बैंकों का भी 40 प्रतिशत लक्ष्य है, जिसका अधिकांश भाग निर्यात ऋण हो सकता है; क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों का 75 प्रतिशत, जबकि लघु वित्त बैंकों और शहरी सहकारी बैंकों का 60 प्रतिशत लक्ष्य है।

1 अप्रैल 2025 से प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र लक्ष्य (एएनबीसी या सीईओबीई, जो भी अधिक हो, का भाग)
बैंक का प्रकारकुल लक्ष्यमुख्य उप-लक्ष्य
घरेलू वाणिज्यिक बैंक; 20 या अधिक शाखाओं वाले विदेशी बैंक40%कृषि 18% (लघु और सीमांत किसान 10%), सूक्ष्म उद्यम 7.5%, कमज़ोर वर्ग 12%
20 से कम शाखाओं वाले विदेशी बैंक40%32% तक निर्यात ऋण, कम से कम 8% अन्य प्राथमिकता क्षेत्र
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक75%कृषि 18%, सूक्ष्म उद्यम 7.5%, कमज़ोर वर्ग 15%
लघु वित्त बैंक60% (2024-25 तक 75%; जून 2025 में आरबीआई ने घटाया)कृषि 18%, सूक्ष्म उद्यम 7.5%, कमज़ोर वर्ग 12%
शहरी सहकारी बैंक60%सूक्ष्म उद्यम 7.5%, कमज़ोर वर्ग 12%

जो बैंक अपने प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र लक्ष्य से पीछे रह जाता है, उस पर सामान्य ढंग से जुर्माना नहीं लगता। इसके बजाय उसे कमी की राशि नाबार्ड, सिडबी और अन्य निकायों द्वारा चलाई जाने वाली निधियों में, जैसे ग्रामीण अवसंरचना विकास निधि, जमा करनी होती है, जिन पर कम प्रतिफल मिलता है। प्रणाली को अधिक लचीला बनाने के लिए आरबीआई ने 2016 में प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार प्रमाणपत्र (पीएसएलसी) शुरू किए। जिस बैंक ने, मान लीजिए, लघु और सीमांत किसानों को अपने लक्ष्य से अधिक ऋण दिया है, वह आधिक्य के लिए आरबीआई के व्यापार मंच पर प्रमाणपत्र बेच सकता है, और जिस बैंक ने बहुत कम ऋण दिया है वह उसे खरीदकर अपने लक्ष्य में गिन सकता है। कोई ऋण हस्तांतरित नहीं होता; केवल प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र का श्रेय बेचा-खरीदा जाता है।

समग्र रूप से, बैंकिंग प्रणाली संतुलनों का एक समूह है जिसे राज्य लगातार समायोजित करता रहता है। राष्ट्रीयकरण और निर्देशित ऋण ने बैंकों को गाँवों और किसानों तक पहुँचाया पर उनके तुलन-पत्रों को कमज़ोर किया; सुधार प्रतिस्पर्धा और विवेकपूर्ण मानदंड लाए; 2010 के दशक के डूबे ऋणों ने दिखाया कि जब ऋण देना विवेक से आगे निकल जाए तो क्या होता है, और एनपीए नियम, सरफ़ेसी और दिवाला संहिता उसी का उत्तर हैं। विभेदित बैंक और निक्षेप बीमा सुरक्षा के साथ समावेशन का लक्ष्य रखते हैं, जबकि प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के लक्ष्य कृषि, सूक्ष्म उद्यमों और कमज़ोर वर्गों को ऋण की एक न्यूनतम सीमा बनाए रखते हैं। इस भाग को भाग 1 से जोड़ें: सीआरआर और एसएलआर तय करते हैं कि बैंक जमा का कितना भाग उधार दे सकता है, और प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र के नियम तय करते हैं कि उस उधार का एक भाग कहाँ जाना चाहिए। अगला अध्याय, आरबीआई और मौद्रिक नीति, दिखाता है कि केंद्रीय बैंक रेपो दर और अपने चलनिधि उपायों से इस ऋण की कीमत और मात्रा कैसे बदलता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत में भुगतान बैंकों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वे अपने ग्राहकों को डेबिट कार्ड जारी कर सकते हैं।
2. वे अपने ग्राहकों को छोटे ऋण दे सकते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: भुगतान बैंक डेबिट कार्ड जारी कर सकते हैं। कथन 2 गलत है: वे ऋण बिल्कुल नहीं दे सकते, जो लघु वित्त बैंकों से उनका मुख्य अंतर है। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

Q2. आरबीआई के विवेकपूर्ण मानदंडों के अंतर्गत कोई मीयादी ऋण अनर्जक आस्ति के रूप में वर्गीकृत होता है जब ब्याज या मूलधन की किस्त कितने से अधिक समय तक अतिदेय रहती है?

  1. 30 दिन
  2. 60 दिन
  3. 90 दिन
  4. 180 दिन
उत्तर देखें

उत्तर: C. 90 दिन

मानदंड 90 दिनों से अधिक है। 30 और 60 दिन विशेष उल्लेख चरणों एसएमए-0 और एसएमए-1 को दर्शाते हैं, एनपीए को नहीं; 180 दिन एक पुराना, ढीला मानदंड था जिसकी जगह 2004 से 90-दिन नियम आया।

Q3. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. 1969 — 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण
2. 1980 — भारतीय स्टेट बैंक की स्थापना
3. 1975 — पहले क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों की स्थापना
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. तीनों
  4. कोई नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल दो

युग्म 1 और 3 सही हैं। युग्म 2 गलत है: भारतीय स्टेट बैंक 1955 में बना; 1980 वह वर्ष है जब छह और बैंकों का राष्ट्रीयकरण हुआ। इसलिए 'केवल एक', 'तीनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q4. भारत में निक्षेप बीमा के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हर बैंक में प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख तक की जमाओं का बीमा होता है।
2. बीमा प्रीमियम जमाकर्ता चुकाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: 4 फ़रवरी 2020 से डीआईसीजीसी बीमा हर बैंक में प्रति जमाकर्ता ₹5 लाख है। कथन 2 गलत है: प्रीमियम बीमित बैंक चुकाते हैं। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

Q5. घरेलू अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों द्वारा प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कुल लक्ष्य समायोजित निवल बैंक ऋण या तुलन-पत्र से इतर एक्सपोज़र के ऋण समतुल्य, जो भी अधिक हो, का 40 प्रतिशत है।
2. कृषि का उप-लक्ष्य 18 प्रतिशत है।
3. कमज़ोर वर्गों का उप-लक्ष्य 12 प्रतिशत है।
उपर्युक्त कथनों में से कितने सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. तीनों
  4. कोई नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: C. तीनों

तीनों आरबीआई के 2025 के मास्टर निदेशों से मेल खाते हैं: कुल 40 प्रतिशत, कृषि 18 प्रतिशत और कमज़ोर वर्ग 12 प्रतिशत (सूक्ष्म उद्यम 7.5 प्रतिशत के साथ)। इसलिए 'केवल एक', 'केवल दो' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q6. भारत में 'अनुसूचित बैंक' वह बैंक है जो निम्नलिखित में से किसकी दूसरी अनुसूची में शामिल है?

  1. बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949
  2. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934
  3. बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970
  4. भारत का संविधान
उत्तर देखें

उत्तर: B. भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934

अनुसूचित बैंक आरबीआई अधिनियम, 1934 की दूसरी अनुसूची में सूचीबद्ध हैं। बैंककारी विनियमन अधिनियम मुख्य विनियामक कानून है पर उसमें यह सूची नहीं है, 1970 के अधिनियम ने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया, और संविधान की दूसरी अनुसूची संवैधानिक पदधारियों की परिलब्धियों से संबंधित है।

Q7. निम्नलिखित में से कौन-सा एक कानून सुरक्षित ऋणदाताओं को न्यायालय के हस्तक्षेप के बिना चूककर्ता उधारकर्ता की प्रतिभूति अपने कब्ज़े में लेने और बेचने देता है?

  1. सरफ़ेसी अधिनियम, 2002
  2. दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता, 2016
  3. बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को देय ऋण वसूली अधिनियम, 1993
  4. डीआईसीजीसी अधिनियम, 1961
उत्तर देखें

उत्तर: A. सरफ़ेसी अधिनियम, 2002

सरफ़ेसी अधिनियम सुरक्षित लेनदारों को अपनी प्रतिभूति सीधे लागू करने देता है। दिवाला संहिता पूरी कंपनी के लिए समयबद्ध समाधान प्रक्रिया चलाती है, 1993 के अधिनियम ने ऋण वसूली न्यायाधिकरण बनाए (एक न्यायिक मार्ग), और डीआईसीजीसी अधिनियम निक्षेप बीमा से संबंधित है।

Q8. प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्र उधार प्रमाणपत्रों (पीएसएलसी) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जो बैंक किसी प्राथमिकता क्षेत्र लक्ष्य से पीछे है, वह उसमें गिनने के लिए पीएसएलसी खरीद सकता है।
2. पीएसएलसी बेचे जाने पर अंतर्निहित ऋण खरीदार को हस्तांतरित हो जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: पीछे रहने वाला बैंक अधिशेष प्राथमिकता ऋण वाले बैंक से पीएसएलसी खरीदता है। कथन 2 गलत है: केवल प्राथमिकता क्षेत्र का श्रेय बेचा-खरीदा जाता है, ऋण बेचने वाले बैंक के पास ही रहते हैं। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

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