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घाटे, लोक ऋण और एफ़आरबीएम अधिनियम

बजट और राजकोषीय नीति · भाग 2 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

घाटे का हर माप (राजकोषीय, राजस्व, प्रभावी राजस्व, प्राथमिक, मौद्रीकृत और पुराना बजट घाटा) अपने सूत्र और अर्थ के साथ, घाटे की पूर्ति कैसे होती है और उनका असर (निष्कासन प्रभाव, मुद्रास्फीति, ब्याज भार), लोक ऋण कब संधारणीय है और राज्य अनुच्छेद 293 के अधीन कैसे उधार लेते हैं, और 2003 के एफ़आरबीएम अधिनियम से उसके संशोधनों, निर्गम खंड और एन. के. सिंह समिति होते हुए वर्तमान समेकन मार्ग और ऋण आधार तक भारत के राजकोषीय नियम।

भाग 1 ने हर प्राप्ति और व्यय की हर मद को राजस्व और पूँजी में छाँटा। यह भाग उनके बीच के अंतर को मापता है। घाटा अपने आप में गलत नहीं है: रेल लाइनें बनाने के लिए उधार लेने वाली सरकार देश को अधिक समृद्ध छोड़ सकती है। पर हर वर्ष उधार लेने से लोक ऋण बढ़ता है, उस ऋण का ब्याज भविष्य के राजस्व का बढ़ता हिस्सा माँगता है, और भारी उधार बाकी सबके लिए ब्याज दरें ऊपर धकेल सकता है। इसलिए अर्थशास्त्री अंतर के कई माप देखते हैं, हर एक अलग प्रश्न का उत्तर देता है, और भारत का राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम उन पर वैधानिक सीमाएँ लगाता है। यह भाग राजकोषीय घाटा और उससे जुड़े मापों, घाटे की पूर्ति कैसे होती है और वे अर्थव्यवस्था पर क्या असर डालते हैं, लोक ऋण कब संधारणीय है, और 2003 से अब लागू ऋण लक्ष्य तक के राजकोषीय नियमों को समझाता है।

राजकोषीय घाटा मुख्य आँकड़ा है। यह कुल व्यय में से राजस्व प्राप्तियों और गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियों का योग घटाने पर मिलता है। चूँकि प्राप्तियों की ओर उधार को छोड़ दिया जाता है, जो शेष बचता है वह ठीक वह राशि है जो सरकार को वर्ष के दौरान उधार और अन्य देयताओं से जुटानी पड़ती है; इसीलिए इसे प्रायः सरकार की कुल उधार आवश्यकता कहा जाता है। मान लीजिए केंद्र ₹100 खर्च करता है, राजस्व प्राप्तियों में ₹70 और विनिवेश तथा ऋण वसूली से ₹3 जुटाता है: राजकोषीय घाटा ₹27 है, और वह ₹27 उधार लिया जाता है। इसे प्रायः सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात के रूप में बताया जाता है, क्योंकि ₹27 के अंतर का अर्थ बड़ी और छोटी अर्थव्यवस्था में बहुत अलग होता है। राजकोषीय घाटा अपने आप यह नहीं बताता कि उधार का धन कैसे उपयोग हुआ; अगले दो माप इसका उत्तर देने में मदद करते हैं।

राजस्व घाटा राजस्व व्यय में से राजस्व प्राप्तियाँ घटाने पर मिलता है। यह दिखाता है कि सरकार अपनी नियमित आय से वेतन, ब्याज और सब्सिडी जैसी चालू लागतें भी कहाँ तक पूरी नहीं कर पाती, और उनके लिए उसे उधार लेना पड़ता है। उपभोग के लिए उधार चिंताजनक है, क्योंकि इससे ऋण तो बनता है पर बदले में कोई परिसंपत्ति नहीं, जैसे महीने का किराने का बिल चुकाने के लिए कर्ज़ लेना। पर भाग 1 ने एक पेच बताया था: राज्यों को अनुदान राजस्व व्यय गिने जाते हैं, भले ही राज्य उनसे परिसंपत्तियाँ बनाएँ। इसे सुधारने के लिए एफ़आरबीएम अधिनियम के 2012 के संशोधन ने प्रभावी राजस्व घाटा शुरू किया, जो राजस्व घाटे में से पूँजीगत परिसंपत्तियों के सृजन के लिए अनुदान घटाने पर मिलता है। यह संघ और राज्यों में उपभोग के लिए होने वाले उधार की अधिक सच्ची तस्वीर है। ध्यान दें कि शून्य राजस्व घाटे का अर्थ शून्य राजकोषीय घाटा नहीं है: सरकार तब भी उधार ले सकती है, पर केवल निवेश के लिए।

प्राथमिक घाटा राजकोषीय घाटे में से ब्याज भुगतान घटाने पर मिलता है। ब्याज अतीत में लिए गए ऋण पर चुकाया जाता है, इसलिए उसे हटाने से पता चलता है कि इस वर्ष के उधार का कितना भाग इस वर्ष की नीतियों के कारण है। यदि प्राथमिक घाटा शून्य है, तो सरकार केवल पुराने ऋण का ब्याज चुकाने के लिए उधार ले रही है; यदि प्राथमिक अधिशेष है, तो उसकी चालू आय उसके चालू गैर-ब्याज व्यय से अधिक है। पहले वाला उदाहरण लें: ₹27 के राजकोषीय घाटे और ₹20 के ब्याज भुगतान पर प्राथमिक घाटा ₹7 है। यह माप ऋण की संधारणीयता के लिए महत्वपूर्ण है, जिसे आगे समझाया गया है, क्योंकि ऋण अनुपात बढ़ेगा या घटेगा यह आंशिक रूप से इसी प्राथमिक संतुलन पर निर्भर है। राजकोषीय और प्राथमिक घाटे के बीच बड़ा अंतर अपने आप में चेतावनी है: इसका अर्थ है कि पिछला उधार पहले ही बजट का बड़ा हिस्सा खा रहा है।

दो पुराने माप अब भी प्रश्नों में आते हैं। बजट घाटा कुल व्यय में से कुल प्राप्तियाँ घटाने पर मिलता था, जहाँ प्राप्तियों में सामान्य उधार शामिल था; बचा हुआ अंतर आरबीआई को तदर्थ ट्रेज़री बिल जारी करके भरा जाता था, जिससे वस्तुतः सरकार के लिए अपने आप मुद्रा छपती थी। सरकार और आरबीआई के बीच एक समझौते ने 1 अप्रैल 1997 से तदर्थ ट्रेज़री बिल समाप्त कर दिए और उनकी जगह अर्थोपाय अग्रिम आए, जिनकी सीमाएँ हैं और जिन्हें लौटाना पड़ता है, और बजट घाटा उपयोगी आँकड़ा नहीं रहा। मौद्रीकृत घाटा घाटे का वह भाग है जो सरकार को आरबीआई के शुद्ध ऋण में वृद्धि से पूरा होता है। यह इसलिए मायने रखता है कि ऐसा ऋण सीधे आरक्षित मुद्रा में जुड़ता है और मुद्रास्फीति बढ़ा सकता है, इसीलिए एफ़आरबीएम अधिनियम ने बाद में आरबीआई को सीमित परिस्थितियों को छोड़कर सरकारी प्रतिभूतियों के पहली बार जारी होने पर उन्हें खरीदने से रोक दिया। नीचे की तालिका सभी मापों को एक साथ रखती है।

घाटे के माप एक दृष्टि में
मापसूत्रक्या दिखाता है
राजकोषीय घाटाकुल व्यय − (राजस्व प्राप्तियाँ + गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ)वर्ष की कुल उधार आवश्यकता
राजस्व घाटाराजस्व व्यय − राजस्व प्राप्तियाँचालू लागतों के लिए उधार
प्रभावी राजस्व घाटा (2012)राजस्व घाटा − पूँजीगत परिसंपत्तियों के सृजन के लिए अनुदानपरिसंपत्ति-निर्माण अनुदान घटाकर उपभोग के लिए उधार
प्राथमिक घाटाराजकोषीय घाटा − ब्याज भुगतानइस वर्ष की नीतियों से हुआ उधार
मौद्रीकृत घाटासरकार को आरबीआई के शुद्ध ऋण में वृद्धिघाटे का वह भाग जो केंद्रीय बैंक पूरा करता है
बजट घाटा (1997 के बाद छोड़ा गया)कुल व्यय − कुल प्राप्तियाँअंतर जो पहले तदर्थ ट्रेज़री बिलों से भरा जाता था

केंद्र के राजकोषीय घाटे का अधिकांश भाग घरेलू बाज़ार से पूरा होता है: आरबीआई द्वारा संचालित नीलामियों से बेची गई दिनांकित सरकारी प्रतिभूतियाँ, अल्पकालिक ट्रेज़री बिल, राष्ट्रीय लघु बचत कोष का धन और थोड़ी मात्रा में विदेशी ऋण। इतने बड़े पैमाने पर उधार के प्रभाव होते हैं। जब सरकार बचत के उसी भंडार के लिए फर्मों से प्रतिस्पर्धा करती है, तो ब्याज दरें बढ़ सकती हैं और कुछ निजी निवेश, जो अन्यथा होता, नहीं होता; यही निष्कासन प्रभाव है। यदि उधार केंद्रीय बैंक द्वारा मुद्रा सृजन से पूरा हो, तो जोखिम मुद्रास्फीति की ओर चला जाता है। और क्योंकि आज का घाटा कल का ऋण बनता है, ब्याज भुगतान बढ़ते हैं और विद्यालयों, स्वास्थ्य और सड़कों की गुंजाइश घटाते हैं। ये प्रभाव निश्चित नहीं हैं: गहरी मंदी में, जब फर्में वैसे भी निवेश नहीं कर रहीं, सार्वजनिक उधार बहुत कम निजी निवेश हटा सकता है और माँग को बहुत सहारा दे सकता है, जो भाग 1 में पढ़ाई गई प्रति-चक्रीय नीति का तर्क है।

हर वर्ष का घाटा लोक ऋण के भंडार में जुड़ता है। केंद्र का ऋण अधिकतर आंतरिक है (भारत में बैंकों, बीमा कंपनियों, आरबीआई और अन्य का), थोड़ा बाहरी भाग है, और उसकी व्यापक देयताओं में लोक लेखे के माध्यम से देय धन भी आता है, जैसे लघु बचत और भविष्य निधि। सामान्य सरकारी ऋण में राज्यों का ऋण भी जुड़ता है। मायने रुपयों में राशि के नहीं, ऋण-जीडीपी अनुपात के हैं। यह अनुपात तब स्थिर रहता है या घटता है जब अर्थव्यवस्था की सांकेतिक वृद्धि दर सरकार द्वारा चुकाई जाने वाली ब्याज दर से अधिक हो और प्राथमिक घाटा छोटा हो; यदि लंबे समय तक ब्याज दरें वृद्धि से अधिक रहें, तो नए व्यय के बिना भी ऋण बढ़ता जा सकता है। राज्यों की अपनी सीमाएँ हैं। अनुच्छेद 293 के अधीन कोई राज्य केवल भारत के भीतर अपनी संचित निधि की प्रतिभूति पर उधार ले सकता है, और जिस राज्य पर केंद्र का धन बकाया है उसे नया ऋण लेने के लिए केंद्र की सहमति चाहिए।

नियम 1980 और 1990 के दशकों में घाटे के लंबे बढ़ाव के बाद आए, जिसने 1991 के संकट में योगदान दिया था। राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम 2003 में पारित हुआ, और उसके नियम जुलाई 2004 में लागू हुए। इसका लक्ष्य अंतर-पीढ़ीगत समता था: वर्तमान पीढ़ी को अपने बिल अगली पीढ़ी पर नहीं छोड़ने चाहिए। इसके मूल लक्ष्य थे जीडीपी के 3 प्रतिशत का राजकोषीय घाटा और राजस्व घाटे का उन्मूलन, पहले 31 मार्च 2008 तक और 2004 के एक संशोधन के बाद 31 मार्च 2009 तक। इसने सरकार के लिए हर बजट के साथ राजकोषीय नीति विवरण रखना और मध्यम-अवधि मार्ग बताना अनिवार्य किया, और निर्दिष्ट मामलों को छोड़कर आरबीआई को सरकारी प्रतिभूतियों के प्राथमिक निर्गमों में अभिदान करने से रोका। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान जब सरकार ने अर्थव्यवस्था को सहारा देने के लिए अधिक खर्च किया, तो यह मार्ग रुक गया। 2012 के संशोधन ने प्रभावी राजस्व घाटा और मध्यम-अवधि व्यय ढाँचा विवरण जोड़ा और समय-सीमा 2015 तक बढ़ाई; 2015 के एक और संशोधन ने उसे 2018 तक बढ़ाया।

2016 में सरकार ने एन. के. सिंह की अध्यक्षता में एफ़आरबीएम समीक्षा समिति बनाई, जिसने जनवरी 2017 में रिपोर्ट दी। इसने तर्क दिया कि वार्षिक घाटा नहीं, बल्कि ऋण राजकोषीय नीति का मुख्य आधार होना चाहिए, जीडीपी के 60 प्रतिशत की सामान्य सरकारी ऋण सीमा सुझाई (केंद्र के लिए 40 और राज्यों के लिए 20 प्रतिशत), और एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद का प्रस्ताव रखा; ऐसी कोई परिषद नहीं बनी है। 2018 के वित्त अधिनियम ने लक्ष्य इसी के अनुसार फिर से लिखे: 2024-25 के अंत तक केंद्र का ऋण जीडीपी के 40 प्रतिशत और सामान्य सरकारी ऋण 60 प्रतिशत पर लाना था, राजकोषीय घाटा 31 मार्च 2021 तक 3 प्रतिशत पर, और राजस्व तथा प्रभावी राजस्व घाटे के लक्ष्य हटा दिए गए। इसने विधि में एक निर्गम खंड भी जोड़ा। राष्ट्रीय सुरक्षा, युद्ध, राष्ट्रीय आपदा, कृषि का ध्वस्त होना, दूरगामी संरचनात्मक सुधार या वास्तविक उत्पादन वृद्धि में तीव्र गिरावट जैसे आधारों पर सरकार दोनों सदनों को कारण बताने के बाद घाटे के लक्ष्य को जीडीपी के 0.5 प्रतिशत तक पार कर सकती है। फ़रवरी 2020 में प्रस्तुत बजट में इस खंड का उपयोग किया गया।

महामारी ने मार्ग तोड़ दिया: राजस्व गिर गया और राहत व्यय बढ़ा, और 2020-21 के लिए केंद्र का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 9 प्रतिशत से ऊपर चला गया। फिर 2021-22 के बजट ने राजकोषीय समेकन का नया मार्ग तय किया, जिसका लक्ष्य 2025-26 तक घाटे को जीडीपी के 4.5 प्रतिशत से नीचे लाना था। संघ बजट 2026-27 के अनुसार 2025-26 का घाटा संशोधित अनुमानों में जीडीपी का 4.4 प्रतिशत रहा, जिससे वह लक्ष्य पूरा हुआ, और 2026-27 का बजट अनुमान 4.3 प्रतिशत है। 2025-26 के बजट ने समीक्षा समिति की सलाह के अनुरूप आधार में बदलाव की घोषणा भी की: 2026-27 से वार्षिक घाटा इस तरह तय होना है कि केंद्र का ऋण घटता रहे और 31 मार्च 2031 तक जीडीपी के 50 प्रतिशत, धन-ऋण 1 प्रतिशत अंक, पर पहुँचे। बजट 2026-27 ने उस वर्ष के लिए केंद्र का ऋण जीडीपी का लगभग 55.6 प्रतिशत रखा। इस बीच राज्यों के अपने राजकोषीय उत्तरदायित्व कानून हैं, जो उन्होंने बारहवें वित्त आयोग द्वारा ऋण राहत को ऐसे कानून से जोड़ने के बाद पारित किए।

ये माप एक शृंखला की तरह जुड़ते हैं। राजकोषीय घाटा बताता है कि सरकार कितना उधार लेती है; राजस्व घाटा और प्रभावी राजस्व घाटा बताते हैं कि उस उधार का कितना भाग परिसंपत्तियों के बजाय उपभोग पर जाता है; प्राथमिक घाटा बताता है कि कितना भाग पिछले ऋण के बजाय वर्तमान नीति से आता है; और जीडीपी के सापेक्ष मापा गया लोक ऋण का भंडार बताता है कि पूरा मार्ग टिक सकता है या नहीं। भारत के नियम भी इसी शृंखला पर चले हैं, 2003 के वार्षिक घाटा लक्ष्यों से आज के ऋण आधार तक, वास्तविक आघातों के लिए निर्गम खंड के साथ। परीक्षा के लिए सूत्र सटीक रखें, जानें कि किस संशोधन ने कौन-सा लक्ष्य जोड़ा या हटाया, और इस भाग को भाग 1 के राजस्व-पूँजी विभाजन, ऋण प्रबंधक के रूप में आरबीआई की भूमिका, और वित्त आयोग से जोड़ें, जो तय करता है कि केंद्र के राजस्व का कितना भाग राज्यों को जाता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. किसी वर्ष सरकार की राजस्व प्राप्तियाँ ₹60, गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ ₹5, राजस्व व्यय ₹70, पूँजीगत व्यय ₹20 और ब्याज भुगतान ₹15 हैं। उसका प्राथमिक घाटा कितना है?

  1. ₹10
  2. ₹25
  3. ₹15
  4. ₹5
उत्तर देखें

उत्तर: A. ₹10

राजकोषीय घाटा = 90 − (60 + 5) = ₹25; प्राथमिक घाटा = 25 − 15 = ₹10। ₹25 स्वयं राजकोषीय घाटा है, ₹15 ब्याज भुगतान है, और ₹5 केवल गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ हैं।

Q2. प्रभावी राजस्व घाटे के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह राजस्व घाटे में से पूँजीगत परिसंपत्तियों के सृजन के लिए अनुदान घटाने पर मिलता है।
2. यह 2003 में मूल रूप से पारित एफ़आरबीएम अधिनियम का भाग था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही परिभाषा है। कथन 2 गलत है: यह अवधारणा 2012 के संशोधन से जोड़ी गई, और इसका लक्ष्य 2018 में हटाया गया। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

Q3. निम्नलिखित में से कौन-सा संघ सरकार के राजकोषीय घाटे का सबसे अच्छा वर्णन करता है?

  1. राजस्व प्राप्तियों पर राजस्व व्यय का आधिक्य
  2. एक वर्ष में सरकार की कुल उधार आवश्यकता
  3. कुल व्यय में से उधार सहित कुल प्राप्तियाँ घटाने पर
  4. सरकार को आरबीआई के शुद्ध ऋण में वृद्धि
उत्तर देखें

उत्तर: B. एक वर्ष में सरकार की कुल उधार आवश्यकता

राजकोषीय घाटा कुल व्यय में से राजस्व और गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ घटाने पर मिलता है, जो उधार ली जाने वाली राशि के बराबर है। पहला विकल्प राजस्व घाटा है, तीसरा पुराना बजट घाटा है, और चौथा मौद्रीकृत घाटा है।

Q4. 2018 में संशोधित एफ़आरबीएम अधिनियम के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 2024-25 के अंत तक केंद्र सरकार का ऋण जीडीपी के 40 प्रतिशत पर लाना था।
2. राजस्व घाटे के उन्मूलन का लक्ष्य बनाए रखा गया।
3. निर्गम खंड राजकोषीय घाटे के लक्ष्य से जीडीपी के 0.5 प्रतिशत तक के विचलन की अनुमति देता है।
उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. सभी तीन
  4. कोई नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल दो

कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 गलत है: 2018 के संशोधन ने राजस्व घाटे और प्रभावी राजस्व घाटे के लक्ष्य हटा दिए। इसलिए 'केवल एक', 'सभी तीन' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. निष्कासन प्रभाव का अर्थ है भारी सरकारी उधार से ब्याज दरें बढ़ने पर निजी निवेश में गिरावट।
2. मौद्रीकृत घाटा राजकोषीय घाटे का वह भाग है जो राष्ट्रीय लघु बचत कोष से पूरा होता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: मौद्रीकृत घाटा वह भाग है जो सरकार को आरबीआई के शुद्ध ऋण में वृद्धि से पूरा होता है, लघु बचत से नहीं। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

Q6. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. राजकोषीय घाटा
B. राजस्व घाटा
C. प्राथमिक घाटा
D. प्रभावी राजस्व घाटा
सूची II
1. राजकोषीय घाटा घटा ब्याज भुगतान
2. राजस्व व्यय घटा राजस्व प्राप्तियाँ
3. राजस्व घाटा घटा पूँजीगत परिसंपत्तियों के सृजन के लिए अनुदान
4. कुल व्यय घटा राजस्व प्राप्तियाँ और गैर-ऋण पूँजीगत प्राप्तियाँ
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-4, B-2, C-1, D-3
  2. A-4, B-3, C-1, D-2
  3. A-1, B-2, C-4, D-3
  4. A-2, B-4, C-1, D-3
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-4, B-2, C-1, D-3

राजकोषीय घाटा सूत्र 4 है, राजस्व घाटा 2, प्राथमिक घाटा 1 और प्रभावी राजस्व घाटा 3। दूसरा कूट राजस्व और प्रभावी राजस्व घाटे को उलटता है, तीसरा राजकोषीय और प्राथमिक घाटे को, और चौथा राजकोषीय और राजस्व घाटे को।

Q7. संविधान के अनुच्छेद 293 के अधीन राज्यों के उधार के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कोई राज्य केवल भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर अपनी संचित निधि की प्रतिभूति पर उधार ले सकता है।
2. जिस राज्य पर भारत सरकार का धन बकाया है, वह भारत सरकार की सहमति के बिना नया ऋण नहीं ले सकता।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों सही हैं: अनुच्छेद 293(1) राज्य के उधार को भारत के भीतर राज्य की संचित निधि की प्रतिभूति तक सीमित करता है, और अनुच्छेद 293(3) केंद्र का कोई ऋण बकाया रहने पर केंद्र की सहमति अनिवार्य करता है। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'न तो 1, न ही 2' गलत हैं।

Q8. एफ़आरबीएम समीक्षा समिति, जिसने ऋण को राजकोषीय नीति का मुख्य आधार बनाने और एक स्वतंत्र राजकोषीय परिषद की सिफ़ारिश की, के अध्यक्ष थे:

  1. बिमल जालान
  2. वाई. वी. रेड्डी
  3. एन. के. सिंह
  4. उर्जित पटेल
उत्तर देखें

उत्तर: C. एन. के. सिंह

एन. के. सिंह एफ़आरबीएम समीक्षा समिति (रिपोर्ट जनवरी 2017) के अध्यक्ष थे। बिमल जालान ने आरबीआई के आर्थिक पूँजी ढाँचे पर 2019 की समिति की अध्यक्षता की, वाई. वी. रेड्डी चौदहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष थे, और उर्जित पटेल ने मौद्रिक नीति ढाँचे पर 2014 की विशेषज्ञ समिति की अध्यक्षता की।

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