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उच्चतम न्यायालय

न्यायपालिका · भाग 1 / 3 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

उच्चतम न्यायालय कैसे गठित होता है, कौन न्यायाधीश बन सकता है, कॉलेजियम और एनजेएसी मामला, न्यायाधीशों को हटाना, न्यायालय की आरंभिक, रिट, अपीली और परामर्शी अधिकारिता, अभिलेख न्यायालय के रूप में उसकी शक्तियाँ, और उसकी स्वतंत्रता के रक्षोपाय।

भारत में एकल, एकीकृत न्यायपालिका है। संयुक्त राज्य अमेरिका के विपरीत, जहाँ संघीय और राज्य न्यायालय अलग-अलग व्यवस्थाएँ हैं, न्यायालयों का एक ही पदानुक्रम संघ और राज्य दोनों की विधियाँ लागू करता है: जिलों में अधीनस्थ न्यायालय, प्रत्येक राज्य या राज्यों के समूह के लिए एक उच्च न्यायालय, और शिखर पर उच्चतम न्यायालय। उच्चतम न्यायालय का उद्घाटन 28 जनवरी 1950 को हुआ, संविधान लागू होने के दो दिन बाद। उसने भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन स्थापित संघीय न्यायालय का स्थान लिया, और लंदन में प्रिवी काउंसिल को अपीलें समाप्त हो गईं। इसके उपबंध भाग 5, अध्याय 4, अनुच्छेद 124 से 147 में हैं। यह भाग उसके गठन, न्यायाधीशों, अधिकारिता और स्वतंत्रता को समझाता है। अनुच्छेद 50, एक निदेशक तत्व, राज्य से न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने की अपेक्षा करता है।

अनुच्छेद 124(1) एक ऐसे उच्चतम न्यायालय का उपबंध करता है जो भारत का मुख्य न्यायमूर्ति और, जब तक संसद विधि द्वारा अधिक संख्या विहित न करे, सात से अनधिक अन्य न्यायाधीशों से मिलकर बनेगा। संसद ने उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम, 1956 द्वारा ऐसा किया; 2019 के संशोधन के बाद से यह अधिनियम मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त 33 न्यायाधीशों का उपबंध करता है, कुल 34। न्यायालय दिल्ली में बैठता है, पर अनुच्छेद 130 के अधीन वह मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा राष्ट्रपति के अनुमोदन से तय किए गए अन्य स्थानों पर भी बैठ सकता है। तीन उपबंध कमी की स्थिति से निपटते हैं। जब मुख्य न्यायमूर्ति का पद रिक्त हो या मुख्य न्यायमूर्ति कार्य न कर सके, तो राष्ट्रपति किसी अन्य न्यायाधीश को कार्यकारी मुख्य न्यायमूर्ति नियुक्त करता है (अनुच्छेद 126)। यदि स्थायी न्यायाधीशों की गणपूर्ति न हो, तो मुख्य न्यायमूर्ति राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करके किसी अर्हित उच्च न्यायालय न्यायाधीश से तदर्थ न्यायाधीश के रूप में बैठने का अनुरोध कर सकता है (अनुच्छेद 127)। सेवानिवृत्त न्यायाधीशों से भी बैठने का अनुरोध किया जा सकता है (अनुच्छेद 128)।

अनुच्छेद 124(3) के अधीन न्यायाधीश को भारत का नागरिक होना चाहिए और उसे कम से कम पाँच वर्ष उच्च न्यायालय का न्यायाधीश, या कम से कम दस वर्ष उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहना चाहिए, या राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता होना चाहिए। कोई न्यूनतम आयु तय नहीं है। न्यायाधीश 65 वर्ष की आयु तक पद धारण करता है। पद ग्रहण करने से पहले न्यायाधीश तीसरी अनुसूची के प्ररूप में शपथ लेता है (अनुच्छेद 124(6)) कि वह संविधान और विधियों को बनाए रखेगा और पद के कर्तव्यों का भय या पक्षपात के बिना पालन करेगा। अनुच्छेद 125 के अधीन संसद विधि द्वारा वेतन तय करती है, और नियुक्ति के बाद न्यायाधीश के विशेषाधिकारों, भत्तों, छुट्टी और पेंशन संबंधी अधिकारों में उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जा सकता। अनुच्छेद 124(7) के अधीन उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत में किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं कर सकता। विधिवेत्ता वाला मार्ग ऐसे व्यक्ति के लिए भी खुला है जिसने कभी वकालत नहीं की या न्यायाधीश नहीं रहा; अब तक इसके द्वारा किसी की नियुक्ति नहीं हुई है।

अनुच्छेद 124(2) कहता है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श के बाद करेगा जिनसे परामर्श वह आवश्यक समझे; मुख्य न्यायमूर्ति से भिन्न किसी न्यायाधीश के लिए भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से सदैव परामर्श किया जाएगा। एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981), प्रथम न्यायाधीश मामले में कहा गया कि परामर्श का अर्थ सहमति नहीं है, जिससे अंतिम निर्णय कार्यपालिका के पास रहा। द्वितीय न्यायाधीश मामले (सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, 1993) में न्यायालय ने इसे उलट दिया: दो वरिष्ठतम न्यायाधीशों के साथ बनी मुख्य न्यायमूर्ति की राय को प्रधानता मिलेगी। तृतीय न्यायाधीश मामले (1998) में, जो अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति का निर्देश था, न्यायालय ने मुख्य न्यायमूर्ति के लिए चार वरिष्ठतम न्यायाधीशों के कॉलेजियम से परामर्श आवश्यक किया। कॉलेजियम संविधान के पाठ में नहीं है; यह न्यायिक निर्वचन से आया है। परंपरा से वरिष्ठतम न्यायाधीश मुख्य न्यायमूर्ति बनता है; 1973 और 1977 में इस परंपरा से हटा गया था।

संसद ने कॉलेजियम को बदलने का प्रयास किया। 99वें संशोधन अधिनियम, 2014 ने अनुच्छेद 124क जोड़कर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) बनाया। इसके छह सदस्य होने थे: भारत का मुख्य न्यायमूर्ति (अध्यक्ष), उच्चतम न्यायालय के उसके बाद के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, संघ का विधि मंत्री, और प्रधानमंत्री, मुख्य न्यायमूर्ति तथा लोक सभा में विपक्ष के नेता द्वारा चुने गए दो प्रख्यात व्यक्ति। साथ में बने एनजेएसी अधिनियम, 2014 के अधीन कोई भी दो सदस्य किसी सिफारिश को रोक सकते थे। 16 अक्टूबर 2015 को, सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ, चतुर्थ न्यायाधीश मामले, में पाँच न्यायाधीशों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से संशोधन और अधिनियम को निरस्त कर दिया। उसने कहा कि नियुक्तियों में न्यायिक प्रधानता न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए अनिवार्य है, जो संविधान के मूल ढांचा का भाग है। कॉलेजियम पुनः बहाल हो गया।

अनुच्छेद 124(4) के अधीन न्यायाधीश को केवल राष्ट्रपति के आदेश से हटाया जा सकता है, जब साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर प्रत्येक सदन का समावेदन, जो उस सदन की कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई द्वारा समर्थित हो, उसी सत्र में प्रस्तुत किया गया हो। न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 प्रक्रिया तय करता है। प्रस्ताव की सूचना पर लोक सभा के कम से कम 100 या राज्य सभा के 50 हस्ताक्षर चाहिए, और अध्यक्ष या सभापति उसे स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है। स्वीकार होने पर तीन सदस्यों की समिति जाँच करती है: भारत का मुख्य न्यायमूर्ति या उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश, किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति, और एक पारंगत विधिवेत्ता। सदन तभी आगे बढ़ता है जब समिति न्यायाधीश को दोषी या असमर्थ पाए। यह कठिनाई जानबूझकर है, ताकि कोई सरकार किसी अप्रिय निर्णय के कारण न्यायाधीश को न हटा सके। उच्चतम न्यायालय का कोई न्यायाधीश नहीं हटाया गया है; न्यायमूर्ति वी. रामास्वामी के विरुद्ध प्रस्ताव 1993 में लोक सभा में गिर गया। संविधान 'महाभियोग' शब्द केवल राष्ट्रपति के लिए प्रयुक्त करता है (अनुच्छेद 61)।

अनुच्छेद 131 के अधीन न्यायालय की आरंभिक अधिकारिता अनन्य है: केवल वही भारत सरकार और एक या अधिक राज्यों के बीच, या राज्यों के बीच विवाद तय कर सकता है। विवाद में विधिक अधिकार अंतर्ग्रस्त होना चाहिए, इसलिए केवल राजनीतिक झगड़ा इसमें नहीं आता, और कोई निजी नागरिक या कंपनी अनुच्छेद 131 के अधीन वाद नहीं ला सकती। दो प्रकार के विवाद बाहर हैं: परंतुक में आने वाली संविधान-पूर्व संधि, करार या समरूप लिखत से उत्पन्न विवाद, और अंतरराज्यिक नदी जल विवाद, जिन्हें संसद ने अनुच्छेद 262 के अधीन अंतरराज्यिक नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 द्वारा न्यायालयों से अलग रखा है। अनुच्छेद 32 के अधीन न्यायालय की रिट अधिकारिता भी आरंभिक है, क्योंकि जिस व्यक्ति का मूल अधिकार भंग हुआ है वह सीधे उसके पास आ सकता है। पर यह अनन्य नहीं है: उच्च न्यायालय अनुच्छेद 226 के अधीन रिट जारी कर सकते हैं, और अधिक प्रयोजनों के लिए।

न्यायालय की अपीली अधिकारिता उसे सर्वोच्च अपील न्यायालय बनाती है। सांविधानिक मामलों में (अनुच्छेद 132), अपील तब होती है जब उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणित करे कि मामले में संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का सारवान प्रश्न अंतर्ग्रस्त है। सिविल मामलों में (अनुच्छेद 133), प्रमाणपत्र में कहा जाना चाहिए कि मामले में व्यापक महत्व का विधि का सारवान प्रश्न है जिसका उच्चतम न्यायालय द्वारा विनिश्चय आवश्यक है; धन-मूल्य की पुरानी कसौटी 30वें संशोधन (1972) ने हटा दी। दांडिक मामलों में (अनुच्छेद 134), प्रमाणपत्र आवश्यक नहीं यदि उच्च न्यायालय ने अपील में दोषमुक्ति उलटकर अभियुक्त को मृत्युदंड दिया हो, या किसी निचले न्यायालय से मामला मंगाकर मृत्युदंड दिया हो; अन्यथा प्रमाणपत्र आवश्यक है। इन सबसे ऊपर अनुच्छेद 136 है: न्यायालय अपने विवेकानुसार भारत के किसी न्यायालय या अधिकरण के किसी निर्णय या आदेश के विरुद्ध अपील के लिए विशेष इजाजत दे सकता है, सिवाय सशस्त्र बल विधियों के अधीन बने न्यायालयों या अधिकरणों के। विशेष इजाजत विवेक है, अधिकार नहीं।

अनुच्छेद 143(1) के अधीन राष्ट्रपति लोक महत्व का विधि या तथ्य का ऐसा प्रश्न, जो उत्पन्न हुआ है या जिसके उत्पन्न होने की संभावना है, न्यायालय को निर्देशित कर सकता है, और न्यायालय सुनवाई के बाद अपनी राय प्रतिवेदित कर सकता है। यह उसकी परामर्शी अधिकारिता है। 'सकता है' दो बार महत्वपूर्ण है: न्यायालय उत्तर देने से मना कर सकता है, और उसकी राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं है। अनुच्छेद 143(2) के अधीन राष्ट्रपति अनुच्छेद 131 से बाहर रखे गए प्रकार का संविधान-पूर्व संधि विवाद निर्देशित कर सकता है, और यहाँ न्यायालय राय 'प्रतिवेदित करेगा'। अनुच्छेद 145(3) ऐसे निर्देशों के लिए और संविधान के निर्वचन के सारवान प्रश्न वाले मामलों के लिए कम से कम पाँच न्यायाधीशों की पीठ, अर्थात संविधान पीठ, अपेक्षित करता है। प्रसिद्ध निर्देशों में केरल शिक्षा विधेयक (1958), अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थाओं पर, और बेरुबारी यूनियन मामला (1960) हैं, जिसमें न्यायालय ने सलाह दी कि पाकिस्तान को राज्यक्षेत्र देने के लिए अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन चाहिए, अनुच्छेद 3 के अधीन साधारण विधि नहीं।

उच्चतम न्यायालय की अधिकारिताएँ एक नज़र में
अधिकारिताअनुच्छेदकौन आता है या क्या सुना जाता हैमुख्य बात
आरंभिक (संघीय)131संघ और राज्यों, या राज्यों के बीच विवादअनन्य; विधिक अधिकार अंतर्ग्रस्त होना चाहिए; निजी पक्षकारों के लिए नहीं
रिट32कोई भी व्यक्ति जिसका मूल अधिकार भंग हुआ होआरंभिक पर उच्च न्यायालयों के साथ साझा (अनुच्छेद 226)
अपीली132–134, 136उच्च न्यायालयों से अपीलें; किसी भी न्यायालय या अधिकरण से विशेष इजाजतअनुच्छेद 134क के अधीन प्रमाणपत्र, या विशेष इजाजत; सशस्त्र बलों से संबंधित विधि के अधीन न्यायालयों या अधिकरणों से विशेष इजाजत नहीं (अनु. 136(2))
परामर्शी143राष्ट्रपति द्वारा निर्देशित प्रश्न143(1) में न्यायालय मना कर सकता है; राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं
अभिलेख न्यायालय129उसका अपना अभिलेख और स्वयं का अवमानअभिलेख निश्चायक साक्ष्य; अवमान के लिए दंड की शक्ति

अनुच्छेद 129 उच्चतम न्यायालय को अभिलेख न्यायालय बनाता है: उसके निर्णय स्थायी अभिलेख के रूप में रखे जाते हैं, उनका साक्ष्यिक मूल्य है और किसी न्यायालय में प्रस्तुत होने पर उन पर प्रश्न नहीं उठाया जा सकता, और वह अपने न्यायालय का अवमान के लिए दंड दे सकता है। न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 सिविल अवमान को न्यायालय के निर्णय, आदेश या आदेशिका की जानबूझकर अवज्ञा, या न्यायालय को दिए गए वचनबंध के जानबूझकर भंग के रूप में; और आपराधिक अवमान को ऐसे किसी प्रकाशन या कार्य के रूप में परिभाषित करता है जो न्यायालय को कलंकित करे या उसके प्राधिकार को कम करे, न्यायिक कार्यवाहियों में हस्तक्षेप करे, या न्याय प्रशासन में बाधा डाले। अनुच्छेद 141 के अधीन उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत के सभी न्यायालयों पर आबद्धकर है; अनुच्छेद 144 के अधीन सभी सिविल और न्यायिक प्राधिकारी न्यायालय की सहायता में कार्य करेंगे। अनुच्छेद 142 उसे किसी मामले में पूर्ण न्याय के लिए आवश्यक कोई भी आदेश पारित करने देता है। अनुच्छेद 137 उसे अपने निर्णयों के पुनर्विलोकन की शक्ति देता है, और पुनर्विलोकन विफल होने के बाद रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा (2002) ने घोर न्याय-हानि सुधारने के लिए उपचारात्मक याचिका बनाई।

ये उपबंध मिलकर न्यायालय को उस सरकार से स्वतंत्र रखते हैं जिसके विरुद्ध वह प्रायः निर्णय देता है। अनुच्छेद 124(4) के अधीन न्यायाधीशों को पद की सुरक्षा है। उनके वेतन, भत्ते और पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित हैं (अनुच्छेद 112(3)(घ)), इसलिए उन पर हर वर्ष मतदान नहीं होता, और नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तें बिगाड़ी नहीं जा सकतीं। अनुच्छेद 121 संसद में कर्तव्य निर्वहन में किसी न्यायाधीश के आचरण पर, हटाने के प्रस्ताव के सिवाय, चर्चा वर्जित करता है। न्यायालय के प्रशासनिक व्यय, कर्मचारियों के वेतन सहित, भी भारित हैं (अनुच्छेद 146(3)), और उसके कर्मचारी मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नियुक्त होते हैं (अनुच्छेद 146(1)), इसलिए सरकार न उसके कार्यालय को साधनहीन कर सकती है न उसमें अपने लोग भर सकती है। सेवानिवृत्ति के बाद वकालत पर रोक और अवमान की शक्ति अतिरिक्त सुरक्षा देते हैं। इस भाग को याद रखें: कौन बैठता है (अनुच्छेद 124–128), कहाँ और कैसे (अनुच्छेद 129, 130 और 145), क्या सुनता है (अनुच्छेद 131–143), और उस पर स्वयं राज्य का न्याय करने का भरोसा क्यों किया जा सकता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत के संविधान के अधीन, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के अतिरिक्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या कौन निर्धारित करता है?

  1. राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से
  2. संसद, विधि द्वारा
  3. स्वयं संविधान, जो संख्या स्थायी रूप से तय करता है
  4. उच्चतम न्यायालय का कॉलेजियम
उत्तर देखें

उत्तर: B. संसद, विधि द्वारा

अनुच्छेद 124(1) संसद को विधि द्वारा मूल सात से अधिक संख्या विहित करने देता है; उसने ऐसा उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीश संख्या) अधिनियम, 1956 द्वारा किया। राष्ट्रपति उच्च न्यायालयों के लिए संख्या तय करता है (अनुच्छेद 216), उच्चतम न्यायालय के लिए नहीं। संविधान ने केवल मूल संख्या सात तय की थी, जिसे संसद बदल सकती है। कॉलेजियम नामों की सिफारिश करता है; वह संख्या तय नहीं करता।

Q2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. जो व्यक्ति राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता है, उसे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है।
2. जो व्यक्ति राष्ट्रपति की राय में पारंगत विधिवेत्ता है, उसे किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया जा सकता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: अनुच्छेद 124(3)(ग) उच्चतम न्यायालय के लिए पारंगत विधिवेत्ता का मार्ग देता है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 217(2) दस वर्ष न्यायिक पद या दस वर्ष उच्च न्यायालय में अधिवक्ता होना अपेक्षित करता है, विधिवेत्ता श्रेणी नहीं है। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q3. किस मामले में उच्चतम न्यायालय ने संविधान (निन्यानवेवाँ संशोधन) अधिनियम, 2014 और राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 को निरस्त किया?

  1. एस.पी. गुप्ता बनाम भारत संघ (1981)
  2. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (1993)
  3. विशेष निर्देश संख्या 1, 1998 के विषय में
  4. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015)
उत्तर देखें

उत्तर: D. सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन बनाम भारत संघ (2015)

चतुर्थ न्यायाधीश मामले ने, जिसका निर्णय 16 अक्टूबर 2015 को 4:1 बहुमत से हुआ, एनजेएसी को निरस्त किया। एस.पी. गुप्ता (1981) ने कार्यपालिका को प्रधानता दी; 1993 के मामले ने न्यायिक प्रधानता स्थापित की; 1998 के निर्देश ने पाँच सदस्यीय कॉलेजियम तय किया। इन तीनों में से कोई 2014 की विधि पर विचार नहीं कर सकता था।

Q4. उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश को हटाए जाने के संदर्भ में, निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. हटाने के प्रस्ताव की सूचना पर लोक सभा के कम से कम 100 सदस्यों या राज्य सभा के कम से कम 50 सदस्यों के हस्ताक्षर होने चाहिए।
2. समावेदन को प्रत्येक सदन में उसकी कुल सदस्य संख्या के बहुमत और उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई का समर्थन मिलना चाहिए।
3. राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की सिफारिश पर संसद के किसी समावेदन के बिना न्यायाधीश को हटा सकता है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 न्यायाधीश (जाँच) अधिनियम, 1968 से है, और कथन 2 अनुच्छेद 124(4) को दोहराता है। कथन 3 गलत है: अनुच्छेद 124(4) कहता है कि दोनों सदनों के समावेदन के बिना न्यायाधीश को हटाया नहीं जा सकता, इसलिए कथन 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q5. निम्नलिखित में से कौन-से विवाद अनुच्छेद 131 की आरंभिक अधिकारिता के अधीन उच्चतम न्यायालय के समक्ष लाए जा सकते हैं?
1. किसी विधिक अधिकार पर दो राज्यों के बीच विवाद
2. किसी संविदा पर भारत सरकार के विरुद्ध किसी निजी कंपनी का वाद
3. किसी अंतरराज्यिक नदी के जल पर दो राज्यों के बीच विवाद, जहाँ संसद ने न्यायालयों की अधिकारिता अपवर्जित कर दी है
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

अनुच्छेद 131 विधिक अधिकार से जुड़े सरकारों के बीच विवादों को समाविष्ट करता है, इसलिए 1 आता है। निजी कंपनी अनुच्छेद 131 में मान्य पक्षकार नहीं है, इसलिए 2 बाहर है। अनुच्छेद 262 और अंतरराज्यिक नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 न्यायालयों को जल विवादों से वर्जित करते हैं, इसलिए 3 बाहर है। 'केवल 1' के अतिरिक्त हर विकल्प में 2 या 3 है।

Q6. अनुच्छेद 143(1) के अधीन राष्ट्रपति द्वारा उच्चतम न्यायालय को किए गए निर्देश के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उच्चतम न्यायालय निर्देशित प्रत्येक प्रश्न पर अपनी राय देने के लिए बाध्य है।
2. उच्चतम न्यायालय द्वारा दी गई राय राष्ट्रपति पर बाध्यकारी है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: D. न तो 1, न ही 2

दोनों गलत हैं। अनुच्छेद 143(1) कहता है कि न्यायालय राय 'प्रतिवेदित कर सकता है', इसलिए वह मना कर सकता है; केवल अनुच्छेद 143(2) में उसे प्रतिवेदन करना ही है। राय परामर्शी है और राष्ट्रपति पर बाध्यकारी नहीं। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं।

Q7. निम्नलिखित अनुच्छेदों का उनके विषयों से मिलान कीजिए:
A. अनुच्छेद 129 — 1. उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि सभी न्यायालयों पर आबद्धकर
B. अनुच्छेद 136 — 2. उच्चतम न्यायालय का अभिलेख न्यायालय होना
C. अनुच्छेद 141 — 3. राष्ट्रपति के निर्देश पर परामर्शी राय
D. अनुच्छेद 143 — 4. अपील के लिए विशेष इजाजत
सही कूट चुनिए।

  1. A-2, B-4, C-1, D-3
  2. A-1, B-4, C-2, D-3
  3. A-2, B-3, C-1, D-4
  4. A-4, B-2, C-3, D-1
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-4, C-1, D-3

अनुच्छेद 129 न्यायालय को अभिलेख न्यायालय बनाता है (A-2), अनुच्छेद 136 विशेष इजाजत है (B-4), अनुच्छेद 141 उसकी विधि को आबद्धकर बनाता है (C-1) और अनुच्छेद 143 परामर्शी अधिकारिता है (D-3)। दूसरा विकल्प अनुच्छेद 129 और 141 को आपस में बदलता है; तीसरा 136 और 143 को; चौथे में कोई मिलान सही नहीं।

Q8. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतन, भत्ते और पेंशन भारत की संचित निधि पर भारित हैं।
2. उच्चतम न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश भारत के किसी भी उच्च न्यायालय के समक्ष अभिवचन कर सकता है।
3. कर्तव्य निर्वहन में उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश के आचरण पर संसद में केवल उसे हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा हो सकती है।
ऊपर दिए गए कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 3

कथन 1 अनुच्छेद 112(3)(घ) से और कथन 3 अनुच्छेद 121 से है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 124(7) उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश को भारत के किसी न्यायालय या प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन से रोकता है, इसलिए कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं। (इसके विपरीत, उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त न्यायाधीश केवल उसी न्यायालय में वर्जित है जहाँ उसने सेवा की।)

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