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भाग 4 विस्तार से: निदेशक तत्व और उन्हें कैसे लागू किया जाता है

निदेशक तत्व और मूल कर्तव्य · भाग 1 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

संविधान का भाग 4: निदेशक तत्वों का न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय पर मूलभूत स्वरूप, उनके समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक समूह, बाद के संशोधनों से जोड़े गए तत्व, भाग 4 से बाहर के निदेश, उन्हें लागू करने वाली विधियाँ और योजनाएँ, और न्यायालय उनका प्रयोग कैसे करते हैं।

संविधान का भाग 3 राज्य को बताता है कि उसे क्या नहीं करना है: वह समता से इनकार न करे और बिना कारण वाक्-स्वातंत्र्य पर रोक न लगाए। भाग 4, अर्थात राज्य की नीति के निदेशक तत्व, राज्य को बताता है कि उसे किस दिशा में काम करना चाहिए: ऐसा समाज जहाँ धन कुछ हाथों में केंद्रित न हो, कामगारों को उचित पारिश्रमिक मिले, बच्चे शिक्षित हों और कमजोरों की रक्षा हो। इस अध्याय के दो भाग हैं। यह पहला भाग स्वयं भाग 4 का अध्ययन करता है: उसकी विधिक प्रकृति, वे तीन समूह जिनमें उसके तत्व प्रायः बाँटे जाते हैं, बाद में जोड़े गए तत्व, भाग 4 से बाहर पाए जाने वाले निदेश, और वे विधियाँ तथा योजनाएँ जिन्होंने इन्हें लागू किया। भाग 2 इन तत्वों और मूल अधिकार के बीच के तनाव को, और फिर मूल कर्तव्यों को लेता है।

भाग 4 अनुच्छेद 36 से अनुच्छेद 51 तक है। अनुच्छेद 36 'राज्य' को वही अर्थ देता है जो अनुच्छेद 12 में है, जिसमें सरकारें, विधान-मंडल और स्थानीय तथा अन्य प्राधिकारी आते हैं। अनुच्छेद 37 उनका विधिक स्वरूप बताता है: 'इस भाग में अंतर्विष्ट उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे किंतु फिर भी इनमें अधिकथित तत्व देश के शासन में मूलभूत हैं और विधि बनाने में इन तत्वों को लागू करना राज्य का कर्तव्य होगा।' इसलिए ये न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय हैं: कोई नागरिक राज्य को, मान लीजिए, निर्वाह मजदूरी देने के लिए बाध्य करने न्यायालय नहीं जा सकता। निर्माताओं ने यह इसलिए चुना क्योंकि एक नव-स्वतंत्र और निर्धन देश न्यायालय में वह वचन नहीं दे सकता था जिसका खर्च वह अभी उठा नहीं सकता था। यह विचार आयरलैंड के संविधान से आया, और संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर ने इन तत्वों की तुलना भारत शासन अधिनियम, 1935 के अधीन राज्यपालों को दिए गए अनुदेश-पत्र से की, जो अब जनता द्वारा चुनी गई किसी भी सरकार को संबोधित हैं।

संविधान स्वयं इन तत्वों का वर्गीकरण नहीं करता, पर विद्यार्थी उन्हें उनके पीछे के विचारों के अनुसार प्रायः तीन परिवारों में बाँटते हैं: समाजवादी, गांधीवादी और उदार-बौद्धिक। समाजवादी परिवार का लक्ष्य आर्थिक न्याय है। अनुच्छेद 38 राज्य से ऐसी सामाजिक व्यवस्था सुनिश्चित करने को कहता है जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की हर संस्था को अनुप्राणित करे, और 44वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 38(2) उससे आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताएँ कम करने को कहता है। अनुच्छेद 39 फिर ठोस लक्ष्य गिनाता है: पुरुषों और स्त्रियों को समान रूप से जीविका के पर्याप्त साधन; समुदाय के भौतिक संसाधनों का स्वामित्व और नियंत्रण इस प्रकार बँटा हो कि सामूहिक हित सधे; ऐसी आर्थिक व्यवस्था जो धन और उत्पादन-साधनों को सर्वसाधारण के अहित में केंद्रित न करे; पुरुषों और स्त्रियों को समान कार्य के लिए समान वेतन; कामगारों के स्वास्थ्य और बच्चों की दुरुपयोग से रक्षा; और खंड (च) में बच्चों को स्वतंत्रता और गरिमा के वातावरण में विकसित होने के अवसर।

समाजवादी परिवार काम और कल्याण के तत्वों के साथ आगे बढ़ता है। 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 39क राज्य से यह सुनिश्चित करने को कहता है कि विधिक तंत्र समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ाए और वह निःशुल्क विधिक सहायता दे, ताकि कोई नागरिक आर्थिक या अन्य निर्योग्यता के कारण न्याय से वंचित न रहे। अनुच्छेद 41 राज्य से कहता है कि वह अपनी आर्थिक सामर्थ्य की सीमाओं के भीतर काम पाने, शिक्षा पाने और बेकारी, बुढ़ापा, बीमारी और निःशक्तता की दशा में लोक सहायता पाने का अधिकार सुनिश्चित करे। अनुच्छेद 42 काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं और प्रसूति सहायता की बात करता है। अनुच्छेद 43 सभी कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी और शिष्ट जीवन-स्तर माँगता है, और 42वें संशोधन से ही आया अनुच्छेद 43क उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी। अनुच्छेद 47 पोषाहार और जीवन-स्तर को ऊँचा करने तथा लोक स्वास्थ्य सुधारने को राज्य के प्राथमिक कर्तव्यों में गिनता है। अनुच्छेद 41 के शब्द 'अपनी आर्थिक सामर्थ्य की सीमाओं के भीतर' दिखाते हैं कि ऐसे लक्ष्य न्यायालयों के बजाय नीति पर क्यों छोड़े गए।

गांधीवादी परिवार राष्ट्रीय आंदोलन के कार्यक्रम और गांधी के ग्राम-केंद्रित भारत के स्वप्न को दर्शाता है। अनुच्छेद 40 राज्य से ग्राम पंचायतों का संगठन करने और उन्हें स्वायत्त शासन की इकाइयों के रूप में काम करने के लिए आवश्यक शक्तियाँ देने को कहता है; 1992 के 73वें संशोधन ने बाद में इस निदेश को पंचायती राज की संवैधानिक व्यवस्था में बदल दिया। अनुच्छेद 43 राज्य से ग्रामों में व्यक्तिगत या सहकारी आधार पर कुटीर उद्योगों को बढ़ाने को कहता है, और 97वें संशोधन (2011) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 43ख सहकारी सोसाइटियों के स्वैच्छिक गठन, स्वायत्त कार्यकरण, लोकतांत्रिक नियंत्रण और व्यावसायिक प्रबंधन को बढ़ाने को। अनुच्छेद 46 राज्य से दुर्बल वर्गों के, विशेषकर अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के, शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की विशेष सावधानी से अभिवृद्धि करने और सामाजिक अन्याय और शोषण से उनकी रक्षा करने को कहता है। अनुच्छेद 47 उससे औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकर मादक पेयों और औषधियों का प्रतिषेध करने को कहता है। अनुच्छेद 48 उससे गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू और वाहक पशुओं के वध का प्रतिषेध करने को कहता है।

उदार-बौद्धिक परिवार एक आधुनिक, तर्कसंगत राज्य की दृष्टि दर्शाता है। अनुच्छेद 44 राज्य से भारत के समस्त राज्यक्षेत्र में नागरिकों के लिए समान सिविल संहिता प्राप्त कराने का प्रयास करने को कहता है, अर्थात अलग-अलग स्वीय विधियों के स्थान पर विवाह, विवाह-विच्छेद, उत्तराधिकार और दत्तक-ग्रहण पर एक ही सिविल विधि। अनुच्छेद 45, जो अपने वर्तमान रूप में 86वें संशोधन (2002) से है, राज्य से सभी बालकों के लिए छह वर्ष की आयु पूरी करने तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा देने को कहता है। अनुच्छेद 48 राज्य से कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने और नस्लों को सुधारने को कहता है। 42वें संशोधन द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 48क उससे पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन करने तथा वनों और वन्यजीवों की रक्षा करने को कहता है। अनुच्छेद 49 उससे संसद द्वारा राष्ट्रीय महत्व के घोषित कलात्मक या ऐतिहासिक अभिरुचि वाले संस्मारकों और स्थानों की रक्षा करने को कहता है। अनुच्छेद 50 उससे राज्य की लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने को कहता है। अनुच्छेद 51 उससे अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा, राष्ट्रों के बीच सम्मानपूर्ण संबंध, अंतरराष्ट्रीय विधि के प्रति आदर और माध्यस्थम् द्वारा विवादों के निपटारे को बढ़ाने को कहता है।

निदेशक तत्वों के तीन परिवार (अध्ययन हेतु वर्गीकरण, संविधान में नहीं)
परिवारपीछे का विचारअनुच्छेद
समाजवादीआर्थिक न्याय, कल्याण, कामगारों से उचित व्यवहार38, 39, 39क, 41, 42, 43, 43क, 47 (पोषाहार, लोक स्वास्थ्य)
गांधीवादीग्राम स्वशासन, ग्रामीण उद्योग, कमजोरों की रक्षा40, 43 (कुटीर उद्योग), 43ख, 46, 47 (मद्यनिषेध), 48 (पशु)
उदार-बौद्धिकआधुनिक, तर्कसंगत और शांतिप्रिय राज्य44, 45, 48 (वैज्ञानिक कृषि), 48क, 49, 50, 51

भाग 4 स्थिर नहीं रहा; कई संशोधन अधिनियमों ने इसमें जोड़ा है। 42वें संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 39(च) का पुनर्लेखन किया और तीन नए अनुच्छेद जोड़े: समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता पर 39क, प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी पर 43क, और पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों पर 48क। 44वें संशोधन (1978) ने आय, प्रतिष्ठा, सुविधाओं और अवसरों की असमानताएँ कम करने पर अनुच्छेद 38 में खंड (2) जोड़ा। 86वें संशोधन (2002) ने छह से चौदह वर्ष के बालकों के लिए प्रारंभिक शिक्षा को अनुच्छेद 21क के अधीन मूल अधिकार बनाया और साथ ही अनुच्छेद 45 को दोबारा लिखा, ताकि वह अब छह वर्ष की आयु तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा की बात करे। 97वें संशोधन (2011) ने अनुच्छेद 19(1)(ग) में सहकारी सोसाइटियाँ बनाने के अधिकार और नए भाग 9ख के साथ सहकारी सोसाइटियों पर अनुच्छेद 43ख जोड़ा। यह प्रवृत्ति ध्यान देने योग्य है: जब देश किसी तत्व की गारंटी दे सकने योग्य हो जाता है, तो वह भाग 4 से भाग 3 में जा सकता है, जैसे शिक्षा गई।

राज्य के लिए हर निदेश भाग 4 में नहीं है। संविधान में अन्यत्र रखे गए तीन और निदेश भी न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय हैं, पर उन्हें प्रायः राज्य की नीति के निदेशक तत्व के साथ परखा जाता है। अनुच्छेद 335 कहता है कि संघ या किसी राज्य के कार्यकलाप से संबंधित सेवाओं और पदों के लिए नियुक्तियाँ करने में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों के दावों का, प्रशासन की दक्षता बनाए रखने की संगति के अनुसार, ध्यान रखा जाएगा। अनुच्छेद 350क प्रत्येक राज्य और प्रत्येक स्थानीय प्राधिकारी से भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों को शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा की पर्याप्त सुविधाओं की व्यवस्था करने का प्रयास करने को कहता है। अनुच्छेद 351 संघ का यह कर्तव्य बनाता है कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए और उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके। इसलिए अनुच्छेद 350क को भाग 4 में बताने वाला कथन गलत है: यह निदेश है, पर भाग 17 में है।

चूँकि इन तत्वों को न्यायालय में प्रवर्तित नहीं कराया जा सकता, वे विधियों और योजनाओं से ही साकार होते हैं। मध्यवर्तियों को समाप्त करने और जोतों पर अधिकतम सीमा तय करने वाली भूमि सुधार विधियों ने अनुच्छेद 39(ख) और (ग) को पूरा किया। न्यूनतम मजदूरी और समान वेतन की विधियाँ अनुच्छेद 43 और 39(घ) को पूरा करती हैं, और प्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961 अनुच्छेद 42 को। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987, जिसने विधिक सेवा प्राधिकरण और लोक अदालतें स्थापित कीं, अनुच्छेद 39क को लागू करता है। 73वें संशोधन ने अनुच्छेद 40 के अधीन पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा दिया। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 ग्रामीण परिवारों को मजदूरी रोजगार की वैधानिक गारंटी देता है, जो अनुच्छेद 41 के काम के अधिकार की दिशा में एक कदम है, और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 अनुच्छेद 47 को पूरा करता है। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 अनुच्छेद 48क को; प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 अनुच्छेद 49 को पूरा करते हैं; और दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 ने, जैसा अनुच्छेद 50 कहता है, न्यायिक मजिस्ट्रेटों को कार्यपालिका से अलग किया।

तत्व और उन्हें लागू करने वाली विधियाँ
अनुच्छेदतत्वविधि या उठाया गया कदम
39(ख), (ग)सामूहिक हित के लिए संसाधन; धन का संकेंद्रण नहींभूमि सुधार विधियाँ: मध्यवर्तियों का उन्मूलन, भूमि की अधिकतम सीमा
39कसमान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायताविधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987
40ग्राम पंचायतें73वाँ संशोधन, 1992
41काम का अधिकारमहात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005
42प्रसूति सहायताप्रसूति प्रसुविधा अधिनियम, 1961
47पोषाहार और लोक स्वास्थ्यराष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013
48कपर्यावरण, वन, वन्यजीववन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972; पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986
49राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकप्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958
50न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करणदंड प्रक्रिया संहिता, 1973

न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय होने का अर्थ यह नहीं कि न्यायालय में उनका कोई महत्व नहीं। न्यायाधीश नियमित रूप से इन तत्वों को मूल अधिकार के, विशेषकर अनुच्छेद 21 के प्राण के अधिकार के, अर्थ में पढ़ते हैं। हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979) में, जो वर्षों से जेल में बंद विचाराधीन कैदियों का मामला था, उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 39क का सहारा लिया और कहा कि निःशुल्क विधिक सहायता और शीघ्र विचारण प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का भाग हैं। जे.पी. उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993) में न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को शिक्षा संबंधी तत्वों के साथ पढ़ा और कहा कि बालकों को चौदह वर्ष की आयु पूरी करने तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है; 86वें संशोधन ने बाद में इसे अनुच्छेद 21क में लिख दिया। न्यायालय यह परखने में भी इन तत्वों का प्रयोग करते हैं कि किसी अधिकार पर लगा निर्बंधन युक्तियुक्त है या नहीं, इसलिए ये तत्व परोक्ष रूप से परिणामों को आकार देते हैं, यद्यपि केवल उनकी अनदेखी के लिए कोई राज्य पर वाद नहीं ला सकता।

भाग 4 को किसी संहिता के बजाय एक कार्यक्रम के रूप में पढ़ना सबसे अच्छा है। अनुच्छेद 37 इसे न्यायालय द्वारा अप्रवर्तनीय पर शासन में मूलभूत बनाता है; इसके तीन परिवार आर्थिक कल्याण, ग्राम स्वशासन और आधुनिक राज्य का खाका देते हैं; संशोधन इसमें जोड़ते रहते हैं; विधियाँ और योजनाएँ इसे लागू करती हैं; और न्यायालय इसका प्रयोग मूल अधिकार को गहराई देने में करते हैं। एक कठिन प्रश्न बचता है: जब किसी राज्य की नीति के निदेशक तत्व के लक्ष्य को पूरा करने वाली विधि किसी मूल अधिकार से टकराए तो क्या होता है? वह प्रश्न, और मूल कर्तव्य, भाग 2 का विषय हैं।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत के संविधान का कौन-सा अनुच्छेद घोषित करता है कि निदेशक तत्व किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं होंगे पर देश के शासन में मूलभूत हैं?

  1. अनुच्छेद 36
  2. अनुच्छेद 37
  3. अनुच्छेद 38
  4. अनुच्छेद 51
उत्तर देखें

उत्तर: B. अनुच्छेद 37

अनुच्छेद 37 दोनों बातें कहता है। अनुच्छेद 36 केवल भाग 4 के लिए 'राज्य' को परिभाषित करता है; अनुच्छेद 38 न्याय पर आधारित सामाजिक व्यवस्था माँगता है; अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा से संबंधित है।

Q2. निम्नलिखित में से कौन-से निदेशक तत्व संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा जोड़े गए?
1. समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता
2. उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों की भागीदारी
3. सहकारी सोसाइटियों का संवर्धन
4. पर्यावरण का संरक्षण और संवर्धन
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1, 2 और 4
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1, 2 और 4

42वें संशोधन ने अनुच्छेद 39क, 43क और 48क जोड़े। सहकारी सोसाइटियों पर अनुच्छेद 43ख 97वें संशोधन (2011) से आया, इसलिए मद 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q3. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान का अनुच्छेद 45, अपने वर्तमान रूप में, राज्य को सभी बालकों के लिए छह वर्ष की आयु पूरी करने तक प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा देने का निदेश देता है।
2. छह से चौदह वर्ष के बालकों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा अनुच्छेद 41 के अधीन एक निदेशक तत्व है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: 86वें संशोधन (2002) ने अनुच्छेद 45 को इन्हीं शब्दों में दोबारा लिखा। कथन 2 गलत है: उसी संशोधन ने छह से चौदह वर्ष के बालकों की शिक्षा को अनुच्छेद 21क के अधीन मूल अधिकार बनाया। इसलिए 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 1 की अनदेखी करता है।

Q4. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (अनुच्छेद)
A. अनुच्छेद 40
B. अनुच्छेद 44
C. अनुच्छेद 48क
D. अनुच्छेद 50
सूची II (विषय)
1. समान सिविल संहिता
2. न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण
3. ग्राम पंचायतों का संगठन
4. पर्यावरण, वनों और वन्यजीवों की रक्षा
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. A-3, B-1, C-4, D-2
  2. A-1, B-3, C-4, D-2
  3. A-3, B-1, C-2, D-4
  4. A-2, B-1, C-4, D-3
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-3, B-1, C-4, D-2

अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतें, 44 समान सिविल संहिता, 48क पर्यावरण और 50 न्यायपालिका का पृथक्करण है। दूसरा विकल्प अनुच्छेद 40 और 44 को बदल देता है; तीसरा 48क और 50 को; चौथा 40 और 50 को।

Q5. निम्नलिखित में से किसे सामान्यतः गांधीवादी निदेशक तत्वों में नहीं गिना जाता?

  1. ग्राम पंचायतों का संगठन (अनुच्छेद 40)
  2. ग्रामों में कुटीर उद्योगों का संवर्धन (अनुच्छेद 43)
  3. स्वास्थ्य के लिए हानिकर मादक पेयों का प्रतिषेध (अनुच्छेद 47)
  4. न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण (अनुच्छेद 50)
उत्तर देखें

उत्तर: D. न्यायपालिका का कार्यपालिका से पृथक्करण (अनुच्छेद 50)

अनुच्छेद 50 उदार-बौद्धिक समूह में आता है, जो स्वतंत्र न्यायपालिका के आधुनिक राज्य के विचार को दर्शाता है। ग्राम पंचायतें, कुटीर उद्योग और मद्यनिषेध सभी गांधी के कार्यक्रम से आते हैं, इसलिए पहले तीन विकल्प गांधीवादी हैं।

Q6. भारत के संविधान के संदर्भ में, राज्य के लिए निम्नलिखित में से कौन-से निदेश भाग 4 से बाहर पाए जाते हैं?
1. भाषाई अल्पसंख्यक वर्गों के बालकों के लिए प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा में शिक्षा
2. हिंदी भाषा का विकास
3. अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

मातृभाषा में शिक्षा अनुच्छेद 350क है और हिंदी का विकास अनुच्छेद 351, दोनों भाग 17 में। अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा अनुच्छेद 51 है, जो भाग 4 के भीतर है, इसलिए मद 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q7. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 : अनुच्छेद 39क
2. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, 2005 : अनुच्छेद 41
3. प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 : अनुच्छेद 48क
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

युग्म 1 और 2 सही हैं: विधिक सहायता अनुच्छेद 39क को और ग्रामीण रोजगार अनुच्छेद 41 के काम के अधिकार को पूरा करते हैं। युग्म 3 गलत है: संस्मारक विधि अनुच्छेद 49 को पूरा करती है; अनुच्छेद 48क पर्यावरण है। इसलिए युग्म 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q8. किस मामले में उच्चतम न्यायालय ने अनुच्छेद 39क का सहारा लेकर कहा कि निःशुल्क विधिक सहायता और शीघ्र विचारण अनुच्छेद 21 के प्राण और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार का भाग हैं?

  1. हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979)
  2. जे.पी. उन्नीकृष्णन बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (1993)
  3. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973)
  4. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980)
उत्तर देखें

उत्तर: A. हुसैनारा खातून बनाम गृह सचिव, बिहार राज्य (1979)

हुसैनारा खातून (1979), जो लंबे समय से बंद विचाराधीन कैदियों पर था, सही मामला है। उन्नीकृष्णन (1993) शिक्षा के अधिकार से संबंधित था; केशवानंद (1973) ने मूल ढांचे का सिद्धांत दिया; मिनर्वा मिल्स (1980) ने अनुच्छेद 368(4) और (5) अमान्य किए और अधिकारों तथा तत्वों के संतुलन पर बल दिया।

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