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त्वरित पुनरावृत्ति: एक पृष्ठ पर संवैधानिक निकाय

संवैधानिक निकाय · त्वरित पुनरावृत्ति · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

संवैधानिक निकायों के दोनों भाग त्वरित पुनरावृत्ति के लिए संक्षेप में: निर्वाचन आयोग, लोक सेवा आयोग, वित्त आयोग, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के राष्ट्रीय आयोग, भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी, महाधिवक्ता और मुख्य सांविधिक तथा कार्यपालक निकाय, एक दृष्टि वाली तालिका और आठ मिश्रित प्रश्नों के साथ।

संवैधानिक निकाय स्वयं संविधान द्वारा बनाया जाता है, इसलिए केवल संशोधन उसे समाप्त कर सकता है या उसकी शक्तियाँ घटा सकता है। उसकी स्वतंत्रता सुरक्षित पदावधि, कठिन हटाने की प्रक्रिया, नियुक्ति के बाद अलाभकारी रूप से न बदली जा सकने वाली सेवा-शर्तों और, कुछ के लिए, संचित निधि पर भारित व्यय पर टिकी है। निर्वाचन आयोग (अनुच्छेद 324) संसद, राज्य विधान-मंडलों तथा राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के पदों के निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण करता है; पंचायत और नगरपालिका निर्वाचन राज्य निर्वाचन आयोगों के हैं। 1993 से यह बहु-सदस्यीय है। अनुच्छेद 325–329 एक साधारण निर्वाचक नामावली, 18 वर्ष पर वयस्क मताधिकार (61वाँ संशोधन, 1988), निर्वाचन विधियाँ और निर्वाचन के दौरान न्यायालयों पर रोक जोड़ते हैं।

निर्वाचन आयुक्तों को राष्ट्रपति 2023 के अधिनियम के अधीन एक चयन समिति की सलाह पर नियुक्त करता है, जिसमें प्रधानमंत्री, लोक सभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री होते हैं; इसने अनूप बरनवाल (2023) में बनी अंतरिम समिति का स्थान लिया, जिसमें भारत के मुख्य न्यायमूर्ति थे। उनकी पदावधि छह वर्ष या 65 वर्ष की आयु तक है। मुख्य निर्वाचन आयुक्त को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह हटाया जा सकता है, और किसी अन्य निर्वाचन आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त की सिफ़ारिश के बिना नहीं हटाया जा सकता (अनुच्छेद 324(5))। टी.एन. शेषन (1995) के बाद से सदस्य बराबर हैं और बहुमत से निर्णय करते हैं।

प्रत्येक लोक सेवा आयोग (अनुच्छेद 315–323) राष्ट्रपति (संघ और संयुक्त आयोग) या राज्यपाल (राज्य आयोग) द्वारा नियुक्त होता है; आधे सदस्यों के पास दस वर्ष की सरकारी सेवा होनी चाहिए। पदावधि छह वर्ष या संघ लोक सेवा आयोग में 65 वर्ष और राज्य तथा संयुक्त आयोगों में 62 वर्ष की आयु तक है (41वाँ संशोधन, 1976)। केवल राष्ट्रपति किसी सदस्य को हटा सकता है, और कदाचार के लिए केवल उच्चतम न्यायालय की जाँच के बाद। संघ लोक सेवा आयोग का अध्यक्ष आगे कोई सरकारी नौकरी नहीं ले सकता, और व्यय संचित निधि पर भारित हैं। सरकारें भर्ती, पदोन्नति और अनुशासन पर आयोगों से परामर्श करती हैं, पर आरक्षण पर नहीं (अनुच्छेद 320(4)), और उनकी सलाह बाध्यकारी नहीं है (मनबोधन लाल श्रीवास्तव, 1957)।

वित्त आयोग (अनुच्छेद 280–281) राष्ट्रपति द्वारा प्रत्येक पाँच वर्ष या उससे पहले गठित किया जाता है, जिसमें एक अध्यक्ष और चार सदस्य होते हैं, जिनकी अर्हताएँ वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951 से आती हैं। यह सिफ़ारिश करता है कि बाँटे जाने वाले करों के शुद्ध आगम संघ और राज्यों के बीच तथा राज्यों के बीच कैसे बँटें, अनुच्छेद 275 के अधीन सहायता-अनुदान के सिद्धांत क्या हों, और पंचायतों तथा नगरपालिकाओं की सहायता के उपाय क्या हों। इसका प्रतिवेदन और सरकार का व्याख्यात्मक ज्ञापन संसद के समक्ष रखे जाते हैं; सलाह बाध्यकारी नहीं है। पहले आयोग के अध्यक्ष के.सी. नियोगी थे; पंद्रहवें (एन.के. सिंह) ने राज्यों का हिस्सा 41 प्रतिशत रखा, और सोलहवाँ (अरविंद पनगढ़िया) 2026–31 के लिए है।

भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक (अनुच्छेद 148–151) राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त होता है और केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह हटाया जा सकता है; 1971 का अधिनियम छह वर्ष या 65 वर्ष तक की पदावधि देता है, व्यय भारित हैं, और आगे कोई सरकारी पद नहीं। वह संघ, राज्यों, विधान-मंडल वाले संघ राज्यक्षेत्रों, सरकारी कंपनियों और सरकार द्वारा पर्याप्त रूप से वित्तपोषित निकायों की लेखापरीक्षा करता है, पर संचित निधि से धन जारी करने पर उसका कोई नियंत्रण नहीं। प्रतिवेदन राष्ट्रपति (संघ) या राज्यपाल (राज्य) को जाते हैं, विधान-मंडल के समक्ष रखे जाते हैं और लोक लेखा समिति उनकी जाँच करती है। लेखापरीक्षा नियमितता, औचित्य और निष्पादन को देखती है; वह प्रतिवेदन देता है पर दंड नहीं दे सकता।

तीन राष्ट्रीय आयोग कमज़ोर वर्गों का संरक्षण करते हैं। 65वें संशोधन (1990) ने अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए एक संयुक्त आयोग बनाया, जिसे 89वें संशोधन (2003) ने राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग (अनुच्छेद 338) और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (अनुच्छेद 338क) में बाँटा। राष्ट्रीय पिछड़े वर्ग आयोग इंद्रा साहनी के बाद 1993 के अधिनियम से बना और 102वें संशोधन (2018) से अनुच्छेद 338ख के अधीन संवैधानिक बना; मराठा मामले (2021) के बाद 105वें संशोधन ने राज्यों की अपनी सूचियाँ लौटाईं। प्रत्येक को अन्वेषण के समय सिविल न्यायालय की शक्तियाँ हैं और वह राष्ट्रपति को प्रतिवेदन देता है। भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी (अनुच्छेद 350ख, 7वाँ संशोधन 1956) को राष्ट्रपति नियुक्त करता है और वह राष्ट्रपति को ही प्रतिवेदन देता है।

एक दृष्टि में संवैधानिक निकाय
निकायअनुच्छेदनियुक्तिहटानाप्रतिवेदन किसे
निर्वाचन आयोग324राष्ट्रपति (2023 अधिनियम की समिति)मुख्य निर्वाचन आयुक्त उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरह; अन्य केवल उसकी सिफ़ारिश परसीधे कार्य करता है
संघ / राज्य लोक सेवा आयोग315–323राष्ट्रपति / राज्यपालकेवल राष्ट्रपति द्वाराराष्ट्रपति / राज्यपाल (वार्षिक प्रतिवेदन)
वित्त आयोग280राष्ट्रपतिकोई विशेष प्रक्रिया नहींराष्ट्रपति (संसद के समक्ष रखा जाता है)
नियंत्रक-महालेखापरीक्षक148–151राष्ट्रपतिउच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की तरहराष्ट्रपति / राज्यपाल
अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग आयोग338, 338क, 338खराष्ट्रपतिराष्ट्रपति के नियमों सेराष्ट्रपति (राज्य संबंधी प्रतिवेदन राज्यपाल को)
भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी350खराष्ट्रपतिनिर्दिष्ट नहींराष्ट्रपति

महाधिवक्ता (अनुच्छेद 165) राज्य का मुख्य विधि अधिकारी है: राज्यपाल द्वारा नियुक्त, उच्च न्यायालय का न्यायाधीश बनने के लिए अर्हित, राज्यपाल के प्रसादपर्यंत पद धारण करने वाला, और राज्य विधान-मंडल में बोलने पर मत न देने का अधिकारी (अनुच्छेद 177), ठीक वैसे ही जैसे महान्यायवादी संसद में (अनुच्छेद 88)। अंत में, कई निकाय संवैधानिक बिल्कुल नहीं हैं। प्रत्येक सांविधिक निकाय किसी अधिनियम पर टिका है: राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (1993), केंद्रीय सतर्कता आयोग (2003, विनीत नारायण, 1997 के बाद) और लोकपाल (2013)। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो 1963 के संकल्प से बना और अपनी शक्तियाँ दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 से लेता है, और नीति आयोग 2015 के मंत्रिमंडल संकल्प से, इसलिए दोनों कार्यपालक निकाय हैं।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. पंचायतों के निर्वाचनों का अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण कौन करता है?

  1. भारत निर्वाचन आयोग
  2. राज्य निर्वाचन आयोग
  3. राज्य का राज्यपाल
  4. राज्य वित्त आयोग
उत्तर देखें

उत्तर: B. राज्य निर्वाचन आयोग

अनुच्छेद 243ट पंचायत निर्वाचन राज्य निर्वाचन आयोग को देता है। भारत निर्वाचन आयोग केवल संसद, राज्य विधान-मंडलों, राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचन देखता है; राज्यपाल राज्य निर्वाचन आयुक्त को नियुक्त करता है पर निर्वाचन नहीं कराता; राज्य वित्त आयोग पंचायतों के वित्त से संबंधित है।

Q2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. 2023 के अधिनियम के अधीन निर्वाचन आयुक्तों की चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायमूर्ति शामिल हैं।
2. टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि निर्वाचन आयोग बहुमत से निर्णय करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: मुख्य न्यायमूर्ति केवल अनूप बरनवाल (2023) की अंतरिम समिति में थे; अधिनियम में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री हैं। कथन 2 सही है। इसलिए 'केवल 1' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 2 की अनदेखी करता है।

Q3. लोक सेवा आयोगों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य लोक सेवा आयोग के सदस्य को राज्यपाल हटा सकता है।
2. लोक सेवा आयोग की सलाह सरकार पर बाध्यकारी नहीं है।
3. पिछड़े वर्गों के लिए पदों के आरक्षण पर लोक सेवा आयोग से परामर्श आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. केवल 1 और 3
  4. केवल 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

केवल कथन 2 सही है (मनबोधन लाल श्रीवास्तव, 1957)। कथन 1 गलत है क्योंकि केवल राष्ट्रपति सदस्य को हटा सकता है (अनुच्छेद 317), और कथन 3 गलत है क्योंकि अनुच्छेद 320(4) आरक्षण को परामर्श से बाहर रखता है; इसलिए 1 या 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q4. वित्त आयोग के सदस्यों की अर्हताएँ कहाँ निर्धारित हैं?

  1. संविधान का अनुच्छेद 280
  2. वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951
  3. सातवीं अनुसूची
  4. केंद्रीय वित्त मंत्रालय के नियम
उत्तर देखें

उत्तर: B. वित्त आयोग (प्रकीर्ण उपबंध) अधिनियम, 1951

अनुच्छेद 280 संसद को अर्हताएँ तय करने देता है, और 1951 का अधिनियम उन्हें तय करता है। अनुच्छेद 280 स्वयं केवल अध्यक्ष और चार सदस्यों का ढाँचा देता है; सातवीं अनुसूची विधान के विषयों की सूची है; और वित्त मंत्रालय अर्हताएँ तय नहीं करता।

Q5. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को केवल उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश की रीति और आधारों पर पद से हटाया जा सकता है।
2. संघ के लेखाओं पर नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के प्रतिवेदन सीधे लोक सभा के अध्यक्ष को प्रस्तुत किए जाते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 अनुच्छेद 148(1) को दोहराता है। कथन 2 गलत है: अनुच्छेद 151 संघ के प्रतिवेदन राष्ट्रपति को भेजता है, जो उन्हें संसद के समक्ष रखवाता है। इसलिए 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 1 की अनदेखी करता है।

Q6. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (संशोधन) — सूची II (परिवर्तन)
A. 65वाँ (1990) — 1. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा
B. 89वाँ (2003) — 2. पिछड़े वर्गों की अपनी सूचियाँ रखने की राज्यों की शक्ति बहाल
C. 102वाँ (2018) — 3. अलग राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग
D. 105वाँ (2021) — 4. संयुक्त राष्ट्रीय अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आयोग
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-4, B-3, C-1, D-2
  2. A-3, B-4, C-1, D-2
  3. A-4, B-3, C-2, D-1
  4. A-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-4, B-3, C-1, D-2

65वें ने संयुक्त आयोग बनाया, 89वें ने अनुसूचित जनजाति आयोग अलग किया, 102वें ने अनुच्छेद 338ख जोड़ा और 105वें ने राज्य सूचियाँ बहाल कीं। दूसरा विकल्प 65वें और 89वें को उलट देता है, तीसरा 102वें और 105वें को, और चौथा पिछड़े वर्गों वाला परिवर्तन 65वें को दे देता है।

Q7. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राज्य के महाधिवक्ता में उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त होने की अर्हता होनी चाहिए।
2. महाधिवक्ता को राज्य विधान सभा में बोलने का अधिकार है पर मत देने का नहीं।
3. भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए विशेष अधिकारी को राष्ट्रपति नियुक्त करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: C. केवल 2 और 3

कथन 1 गलत है: महाधिवक्ता को उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की अर्हताएँ चाहिए (अनुच्छेद 165); उच्चतम न्यायालय की अर्हताएँ महान्यायवादी पर लागू हैं। कथन 2 (अनुच्छेद 177) और 3 (अनुच्छेद 350ख) सही हैं। 'केवल 1', 'केवल 1 और 2' और '1, 2 और 3' सभी में गलत कथन 1 है।

Q8. निम्नलिखित में से कौन-सा सांविधिक निकाय है?

  1. नीति आयोग
  2. केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो
  3. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग
  4. भारत का नियंत्रक-महालेखापरीक्षक
उत्तर देखें

उत्तर: C. राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग

राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 से बना। नीति आयोग (2015) और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (1963) कार्यपालक संकल्पों से बने, और नियंत्रक-महालेखापरीक्षक अनुच्छेद 148 के अधीन संवैधानिक पद है।

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