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केंद्र, नेता, दमन और परिणाम

1857 का विद्रोह · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

1857 के विद्रोह के मुख्य केंद्र और उनके नेता (दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बिहार, बरेली), ब्रिटिश सेनापति और दमन, वफ़ादार रहे क्षेत्र और शासक, विद्रोह की विफलता के कारण, इतिहासकारों ने इसे कैसे देखा, भारत सरकार अधिनियम 1858, महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा और सेना का पुनर्गठन।

भाग 1 में देखा गया कि 1857 का विद्रोह क्यों भड़का और 11 मई 1857 को दिल्ली तक कैसे पहुँचा। यह भाग उसके आगे की कहानी है। विद्रोह के कई केंद्र थे, हर एक के अपने नेता और अपना क्रम, और अंग्रेज़ों को 1857 की गर्मियों से 1859 के वसंत तक उन्हें एक-एक करके वापस लेना पड़ा। पहले हम मुख्य केंद्रों को देखेंगे, दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, झाँसी, बिहार और रुहेलखंड, फिर उन क्षेत्रों को जो शांत रहे और विद्रोह की विफलता के कारणों को। अंत में इसके परिणाम: इतिहासकारों ने इसे कैसे समझा, ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन का अंत, महारानी की उद्घोषणा और सेना का पुनर्गठन।

दिल्ली विद्रोह का प्रतीकात्मक केंद्र थी। बहादुर शाह द्वितीय ने विद्रोह को अपना नाम दिया और आदेश उनकी मुहर से जारी हुए, पर वास्तविक सैनिक शक्ति सैनिकों के हाथ में थी। जुलाई 1857 में बरेली से अपने सैनिकों के साथ आए तोपख़ाने के अधिकारी बख़्त ख़ान को विद्रोही सेनाओं की कमान दी गई, पर सेनापतियों और मुग़ल शहज़ादों के आपसी झगड़ों ने रक्षा को कमज़ोर किया। जून से एक ब्रिटिश सेना शहर की दीवारों के बाहर रिज पर डेरा डाले थी। पंजाब से कुमुक आने के बाद उसने सितंबर 1857 के मध्य में शहर पर धावा बोला; हमले का नेतृत्व करने वाला जॉन निकल्सन घातक रूप से घायल हुआ। विलियम हडसन ने हुमायूँ के मक़बरे के पास बादशाह को पकड़ा और तीन मुग़ल शहज़ादों को गोली मार दी। बहादुर शाह पर 1858 में मुक़दमा चला और उन्हें रंगून निर्वासित किया गया, जहाँ 1862 में उनकी मृत्यु हुई, और उनके साथ मुग़ल वंश समाप्त हो गया।

कानपुर में नेता नाना साहब थे, अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय के दत्तक पुत्र, जिनकी पेंशन कंपनी ने जारी रखने से मना कर दिया था। जून 1857 में जब वहाँ की रेजिमेंटों ने विद्रोह किया, तो वे उनके मुखिया बने और पेशवा घोषित किए गए। जनरल ह्यू व्हीलर के अधीन छोटी ब्रिटिश टुकड़ी लगभग तीन सप्ताह तक एक कमज़ोर मोर्चाबंदी के पीछे डटी रही और फिर नदी के रास्ते सुरक्षित निकलने के वचन पर उसने आत्मसमर्पण किया। सतीचौरा घाट पर नावों पर गोलियाँ चलीं, और बंदी बनाई गई स्त्रियों और बच्चों को बाद में बीबीघर में मार दिया गया। इन हत्याओं के बाद पूरे क्षेत्र में अंग्रेज़ों ने निर्मम प्रतिशोध लिया। हेनरी हैवलॉक ने जुलाई 1857 में कानपुर फिर से जीत लिया। नाना साहब का संघर्ष उनके सेनापति तात्या टोपे और सलाहकार अज़ीमुल्ला ख़ान ने आगे बढ़ाया; नाना साहब स्वयं बाद में नेपाल चले गए, और उनका अंतिम भाग्य अनिश्चित है।

अवध में सबसे व्यापक विद्रोह हुआ, क्योंकि सैनिक, ताल्लुक़दार और किसान मिलकर उस सरकार के विरुद्ध उठे जो केवल एक वर्ष पहले आई थी। लखनऊ में अपदस्थ नवाब वाजिद अली शाह की एक पत्नी, बेगम हज़रत महल ने नेतृत्व संभाला और अपने छोटे बेटे बिरजिस क़द्र को नवाब घोषित कराया। अंग्रेज़ निवासी और वफ़ादार रहे सिपाही रेज़िडेंसी के भीतर बंद हो गए, जहाँ घेराबंदी के आरंभ में ही मुख्य आयुक्त सर हेनरी लॉरेंस मारे गए। हैवलॉक और जेम्स आउट्रम सितंबर 1857 में लड़ते हुए भीतर पहुँचे, पर वे स्वयं घिर गए; नए प्रधान सेनापति सर कॉलिन कैंपबेल ने नवंबर में टुकड़ी को बाहर निकाला, और मार्च 1858 में लखनऊ अंततः फिर से जीत लिया गया। बेगम ने अंग्रेज़ों के प्रस्ताव ठुकरा दिए और नेपाल चली गईं। फ़ैज़ाबाद में मौलवी अहमदुल्ला शाह अवध के विद्रोह के एक और प्रमुख नेता थे, जब तक 1858 में वे मारे नहीं गए।

मध्य भारत में सबसे प्रमुख नेता झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं, जिनके दत्तक पुत्र को व्यपगत का सिद्धांत के अंतर्गत गद्दी से वंचित किया गया था। आरंभ में वे कुछ झिझकती प्रतीत होती हैं, पर जब अंग्रेज़ों ने उन्हें शत्रु माना तो उन्होंने बड़े साहस से झाँसी की रक्षा की। मध्य भारत फ़ील्ड फ़ोर्स के सेनापति सर ह्यू रोज़ ने नगर को घेरा और अप्रैल 1858 में उस पर क़ब्ज़ा किया। रानी निकल गईं और तात्या टोपे से जा मिलीं, और दोनों ने मिलकर ग्वालियर पर अधिकार किया, जिसके शासक सिंधिया अंग्रेज़ों के वफ़ादार रहे, यद्यपि उनके अनेक सैनिक विद्रोहियों से जा मिले। जून 1858 में ग्वालियर के पास लड़ते हुए रानी की मृत्यु हुई, और रोज़ ने जल्द ही नगर वापस ले लिया। इसके बाद तात्या टोपे ने तेज़ी से चलते हुए और आमने-सामने की लड़ाई से बचते हुए मध्य भारत में लंबा छापामार अभियान चलाया, जब तक अप्रैल 1859 में विश्वासघात से पकड़े जाकर उन्हें फाँसी नहीं दी गई।

विद्रोह के नेता इन प्रसिद्ध केंद्रों से दूर भी थे। बिहार में आरा के पास जगदीशपुर के वृद्ध ज़मींदार कुँवर सिंह ने, जिनकी जागीर क़र्ज़ में डूब रही थी, विद्रोही सैनिकों की कमान संभाली। उन्होंने अपने ज़िले से बहुत दूर तक लंबा अभियान चलाया और जगदीशपुर लौटे, जहाँ अप्रैल 1858 में घावों से उनकी मृत्यु हुई। रुहेलखंड में रुहेला सरदार हाफ़िज़ रहमत ख़ान के वंशज ख़ान बहादुर ख़ान ने मुग़ल बादशाह के नाम पर बरेली में सरकार स्थापित की। मान लीजिए किसी ज़िले से कलेक्टर और सेना भाग चुके हैं: कोई स्थानीय भूस्वामी ख़ज़ाना ले लेता है और बादशाह के नाम पर राजस्व वसूलता है, पर दूसरे केंद्रों से उसका संपर्क बहुत कम है। उत्तर भर में दोहराई गई यह तस्वीर दिखाती है कि विद्रोह कितना व्यापक था और एक कमान ने उसे कितना कम बाँधा था।

विद्रोह के मुख्य केंद्र, उनके नेता और अंग्रेज़ों की कार्रवाई
केंद्रविद्रोह के नेताब्रिटिश सेनापति और परिणाम
दिल्लीबहादुर शाह द्वितीय; बख़्त ख़ान (जुलाई 1857 से सेनापति)निकल्सन (मारा गया), हडसन; सितंबर 1857 में फिर से जीती गई
कानपुरनाना साहब; तात्या टोपे; अज़ीमुल्ला ख़ानव्हीलर का आत्मसमर्पण (जून 1857); हैवलॉक ने फिर जीता (जुलाई 1857)
लखनऊ (अवध)बेगम हज़रत महल; बिरजिस क़द्रहेनरी लॉरेंस (मारे गए), हैवलॉक, आउट्रम, कॉलिन कैंपबेल; मार्च 1858 में फिर से जीता गया
झाँसी और ग्वालियररानी लक्ष्मीबाई; तात्या टोपेह्यू रोज़; झाँसी अप्रैल 1858, ग्वालियर जून 1858
जगदीशपुर (बिहार)कुँवर सिंहअप्रैल 1858 में घावों से कुँवर सिंह की मृत्यु
बरेली (रुहेलखंड)ख़ान बहादुर ख़ान1858 के ब्रिटिश अभियान में वापस लिया गया
फ़ैज़ाबाद (अवध)मौलवी अहमदुल्ला शाह1858 में मारे गए

भारत के बड़े भाग शांत रहे। एक दशक से भी कम पहले जीते गए पंजाब को उसके मुख्य आयुक्त जॉन लॉरेंस ने संभाले रखा, जिन्होंने संदिग्ध रेजिमेंटों से हथियार ले लिए और नई सिख और पंजाबी टुकड़ियाँ खड़ी कीं जो दिल्ली की घेराबंदी में पहुँचीं। मद्रास और बंबई की सेनाएँ अधिकतर वफ़ादार रहीं, और दक्षिण और पश्चिम में केवल छिटपुट अशांति हुई। अधिकांश राजा अलग रहे या खुलकर अंग्रेज़ों की सहायता की: पटियाला, नाभा और जींद के शासकों ने सेना भेजी, ग्वालियर के सिंधिया और इंदौर के होल्कर अपने सैनिकों के विद्रोह के बावजूद वफ़ादार रहे, और हैदराबाद के निज़ाम ने अपने मंत्री सालार जंग की सलाह पर दक्कन को शांत रखा। नेपाल के जंग बहादुर लखनऊ को फिर से जीतने में सहायता के लिए गोरखा सैनिक लेकर आए। अनेक बड़े ज़मींदार, व्यापारी, साहूकार और नया अंग्रेज़ी-शिक्षित वर्ग भी अलग रहे, क्योंकि वे अपना भविष्य ब्रिटिश शासन के साथ देखते थे।

इतना व्यापक और दृढ़ विद्रोह विफल क्यों हुआ? पहला, इसका कोई साझा नेतृत्व या योजना नहीं थी। हर केंद्र अधिकतर अपने बल पर लड़ा, नेता प्रायः एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी थे, और बहादुर शाह एक वृद्ध व्यक्ति थे जो नाम तो दे सकते थे पर युद्ध का संचालन नहीं कर सकते थे। दूसरा, खोए हुए शासकों और अधिकारों की वापसी के अलावा विद्रोहियों के पास भविष्य का कोई स्पष्ट चित्र नहीं था। तीसरा, विद्रोह उत्तर और मध्य भारत तक सीमित रहा, इसलिए अंग्रेज़ पंजाब, दक्षिण, पश्चिम और बंगाल से सैनिक, धन और रसद ले सके। चौथा, संगठन और साधनों में अंग्रेज़ आगे थे: टेलीग्राफ़ आदेशों को तेज़ी से पहुँचाता था, एनफ़ील्ड राइफ़ल की मार अनेक विद्रोहियों की पुरानी बंदूक़ों से दूर तक थी, और समुद्र के रास्ते सेना आई, जिसमें चीन जा रही वे रेजिमेंटें भी थीं जिन्हें भारत की ओर मोड़ दिया गया।

इतिहासकार लंबे समय से इस पर बहस करते रहे हैं कि 1857 किस प्रकार की घटना थी। उस समय के ब्रिटिश अधिकारियों ने इसकी सैनिक शुरुआत पर ज़ोर देते हुए इसे सिपाही विद्रोह कहा। कुछ ने इसे सामंती प्रतिक्रिया माना, यानी राजाओं और ताल्लुक़दार का अपना खोया हुआ वापस पाने का प्रयास। तीसरा दृष्टिकोण इस पर ज़ोर देता है कि किसान, कारीगर और नगरवासी, विशेषकर अवध में, इसमें शामिल हुए, और इसे जन-विद्रोह कहता है। वि. दा. सावरकर ने 1909 में प्रकाशित अपनी पुस्तक 'द इंडियन वॉर ऑफ़ इंडिपेंडेंस ऑफ़ 1857' में इसे एक सुनियोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम बताया। 1957 की शताब्दी पर सु. ना. सेन और र. च. मजूमदार जैसे इतिहासकारों ने प्रश्न उठाया कि क्या इसे आधुनिक अर्थ में राष्ट्रीय कहा जा सकता है। अधिकांश विद्वान अब इसे सिपाही विद्रोह से कहीं अधिक, पर अभी राष्ट्रवादी आंदोलन से कम मानते हैं: हिंदू और मुसलमान मुग़ल बादशाह के नाम पर साथ लड़े, और बाद के राष्ट्रवादियों ने इसकी स्मृति से प्रेरणा ली।

विद्रोह को किस रूप में देखा गया
दृष्टिकोणकिस बात पर ज़ोरकिसका मत
सिपाही विद्रोहयह सेना में शुरू हुआ; भारत का बड़ा भाग अलग रहाउस समय के ब्रिटिश अधिकारी
सामंती प्रतिक्रियाराजाओं और ताल्लुक़दारों का खोया हुआ वापस पाने का प्रयासपुराने शासक वर्गों की भूमिका पर ज़ोर देने वाले इतिहासकार
जन-विद्रोहकिसान, कारीगर और नगरवासी शामिल हुए, सबसे अधिक अवध मेंजन-भागीदारी पर ज़ोर देने वाले इतिहासकार
स्वतंत्रता संग्रामविदेशी शासन के विरुद्ध सुनियोजित राष्ट्रीय संघर्षवि. दा. सावरकर (1909)

पहला स्थायी परिणाम कंपनी के शासन का अंत था। 2 अगस्त 1858 के भारत सरकार अधिनियम ने भारत का शासन ईस्ट इंडिया कंपनी से ब्रिटिश ताज को सौंप दिया। निदेशक मंडल (कोर्ट ऑफ़ डायरेक्टर्स) और नियंत्रण बोर्ड समाप्त कर दिए गए, जिससे 1784 के पिट्स इंडिया एक्ट से बनी दोहरी नियंत्रण व्यवस्था का अंत हुआ। उनके स्थान पर भारत सचिव आया, जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य था और संसद के प्रति उत्तरदायी था, और जिसकी सहायता के लिए पंद्रह सदस्यों की भारत परिषद थी जिसकी भूमिका सलाहकारी थी। भारत में गवर्नर-जनरल को अब ताज के प्रत्यक्ष प्रतिनिधि के रूप में वायसराय की उपाधि भी मिली, और कैनिंग पहले वायसराय बने। भारत में प्रशासन का ढाँचा आरंभ में बहुत कम बदला; बदला यह कि अंतिम सत्ता कहाँ थी, जो अब किसी व्यापारिक कंपनी के बजाय लंदन में एक मंत्री और संसद के हाथ में थी।

नई नीति की घोषणा महारानी की उद्घोषणा में हुई, जिसे कैनिंग ने 1 नवंबर 1858 को इलाहाबाद में एक दरबार में पढ़कर सुनाया। इसमें घोषित किया गया कि ताज ने भारत का शासन अपने हाथ में ले लिया है और राज्य-क्षेत्र का और विस्तार नहीं चाहा जाएगा। इसने भारतीय राजाओं के अधिकारों, गरिमा और सम्मान का आदर करने और उनके साथ की गई संधियों का पालन करने, भारतीयों के धार्मिक विश्वासों में हस्तक्षेप न करने, सबको विधि का समान और निष्पक्ष संरक्षण देने, और किसी भी जाति या मत के भारतीयों को उन पदों पर प्रवेश देने का वचन दिया जिनके लिए उनकी शिक्षा, योग्यता और सत्यनिष्ठा उन्हें योग्य बनाती हो। इसने विद्रोहियों को क्षमा भी दी, सिवाय उनके जो ब्रिटिश प्रजा की हत्या में सीधे शामिल थे। व्यपगत का सिद्धांत छोड़ दिया गया और राजाओं का उत्तराधिकारी गोद लेने का अधिकार मान लिया गया। इस तरह पुत्रहीन शासक अब उत्तराधिकारी गोद लेकर निश्चिंत हो सकता था कि राज्य उसी को मिलेगा, जो 1853 में झाँसी में हुई घटना का उल्टा था।

सेना का पुनर्गठन उन सबक़ों के आधार पर हुआ जो अंग्रेज़ों ने 1857 से लिए। पील आयोग (1859) के बाद भारतीय सैनिकों की तुलना में यूरोपीय सैनिकों का अनुपात बढ़ाया गया, तोपख़ाना लगभग पूरी तरह यूरोपीय हाथों में रखा गया, और भर्ती अवध और बिहार से हटकर पंजाब, नेपाल और उत्तर-पश्चिम के उन समूहों की ओर गई जिन्हें अंग्रेज़ अब वफ़ादार मानते थे; टुकड़ियाँ इस तरह भी गठित की गईं कि अलग-अलग समुदायों के लोग साथ सेवा करें और आसानी से एकजुट न हो सकें। नीति में राजा विलय किए जाने वाले राज्यों के बजाय सुरक्षित रखे जाने वाले सहयोगी बन गए, और सरकार सामाजिक सुधार के बारे में सतर्क हो गई। कुल मिलाकर, 1857 का विद्रोह कुचल दिया गया, फिर भी इसने कंपनी के शासन, मुग़ल वंश और विलय की नीति का अंत किया, सेना और राजाओं के प्रति व्यवहार को नया रूप दिया, और साझा प्रतिरोध की ऐसी स्मृति छोड़ी जिससे बाद के राष्ट्रवादियों ने प्रेरणा ली।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. 1857 के विद्रोह के केंद्रों का उनके नेताओं से मिलान कीजिए:
A. लखनऊ
B. जगदीशपुर
C. बरेली
D. कानपुर
1. कुँवर सिंह
2. नाना साहब
3. बेगम हज़रत महल
4. ख़ान बहादुर ख़ान
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-3, B-1, C-4, D-2
  2. A-3, B-4, C-1, D-2
  3. A-2, B-1, C-4, D-3
  4. A-1, B-3, C-2, D-4
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-3, B-1, C-4, D-2

लखनऊ: बेगम हज़रत महल; जगदीशपुर: कुँवर सिंह; बरेली: ख़ान बहादुर ख़ान; कानपुर: नाना साहब। विकल्प (b) जगदीशपुर को ख़ान बहादुर ख़ान और बरेली को कुँवर सिंह से जोड़ता है, जो ग़लत है; (c) लखनऊ और कानपुर को उलट देता है; (d) में हर जोड़ा ग़लत है।

Q2. भारत सरकार अधिनियम, 1858 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने भारत सचिव का पद बनाया, जो ब्रिटिश मंत्रिमंडल का सदस्य था।
2. इसने निदेशक मंडल और नियंत्रण बोर्ड को समाप्त किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों सही हैं: अधिनियम ने भारतीय मामलों के शीर्ष पर संसद के प्रति उत्तरदायी कैबिनेट मंत्री, भारत सचिव, को रखा और पुरानी दोहरी व्यवस्था की दोनों संस्थाओं को समाप्त किया। अतः (a), (b) और (d) ग़लत हैं।

Q3. जुलाई 1857 में दिल्ली में विद्रोही सेनाओं की कमान किसे दी गई?

  1. तात्या टोपे
  2. बख़्त ख़ान
  3. अज़ीमुल्ला ख़ान
  4. कुँवर सिंह
उत्तर देखें

उत्तर: B. बख़्त ख़ान

बरेली से आए तोपख़ाने के अधिकारी बख़्त ख़ान को दिल्ली में कमान दी गई। तात्या टोपे कानपुर में और बाद में मध्य भारत में नाना साहब के सेनापति थे; अज़ीमुल्ला ख़ान नाना साहब के सलाहकार थे; कुँवर सिंह ने बिहार में नेतृत्व किया।

Q4. 1 नवंबर 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा लॉर्ड कैनिंग ने किस स्थान पर आयोजित दरबार में पढ़ी?

  1. दिल्ली
  2. कलकत्ता
  3. इलाहाबाद
  4. लखनऊ
उत्तर देखें

उत्तर: C. इलाहाबाद

यह इलाहाबाद में पढ़ी गई। दिल्ली मुग़ल बादशाह की राजधानी थी, कलकत्ता राजधानी थी और लखनऊ अवध की राजधानी था, पर उद्घोषणा इनमें से किसी स्थान पर नहीं पढ़ी गई।

Q5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. सर ह्यू रोज़ ने उस ब्रिटिश सेना की कमान संभाली जिसने अप्रैल 1858 में झाँसी पर क़ब्ज़ा किया।
2. सर हेनरी लॉरेंस ने पूरे विद्रोह के दौरान अंग्रेज़ों के लिए पंजाब संभाले रखा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

केवल 1 सही है। हेनरी लॉरेंस अवध के मुख्य आयुक्त थे और लखनऊ रेज़िडेंसी की घेराबंदी के आरंभ में मारे गए; पंजाब को उनके भाई जॉन लॉरेंस ने संभाला। इसलिए कथन 2 ग़लत है, और (b), (c) तथा (d) ग़लत हैं।

Q6. 1857–58 में ब्रिटिश अधिकारियों का उनसे जुड़े स्थानों से मिलान कीजिए:
A. जॉन निकल्सन
B. हेनरी हैवलॉक
C. ह्यू रोज़
D. कॉलिन कैंपबेल
1. मध्य भारत
2. दिल्ली
3. लखनऊ को फिर से जीतना (मार्च 1858)
4. कानपुर को फिर से जीतना (जुलाई 1857)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-2, B-3, C-1, D-4
  2. A-1, B-4, C-2, D-3
  3. A-2, B-4, C-1, D-3
  4. A-3, B-2, C-4, D-1
उत्तर देखें

उत्तर: C. A-2, B-4, C-1, D-3

निकल्सन ने दिल्ली पर धावे का नेतृत्व किया; हैवलॉक ने जुलाई 1857 में कानपुर फिर से जीता; ह्यू रोज़ ने मध्य भारत फ़ील्ड फ़ोर्स का नेतृत्व किया; कॉलिन कैंपबेल ने मार्च 1858 में लखनऊ फिर से जीता। विकल्प (a) हैवलॉक और कैंपबेल को उलट देता है; (b) निकल्सन को मध्य भारत और रोज़ को दिल्ली में रखता है; (d) में हर जोड़ा ग़लत है।

Q7. निम्नलिखित में से कौन-सा वचन 1858 की महारानी विक्टोरिया की उद्घोषणा में नहीं दिया गया था?

  1. भारत में ब्रिटिश राज्य-क्षेत्र का और विस्तार नहीं
  2. भारतीय राजाओं के अधिकारों, गरिमा और सम्मान का आदर
  3. भारतीयों के धार्मिक विश्वासों में हस्तक्षेप न करना
  4. गवर्नर-जनरल की परिषद में निर्वाचित भारतीय बहुमत
उत्तर देखें

उत्तर: D. गवर्नर-जनरल की परिषद में निर्वाचित भारतीय बहुमत

उद्घोषणा ने विलय न करने, राजाओं के सम्मान और धर्म में हस्तक्षेप न करने का वचन दिया, इसलिए (a), (b) और (c) सभी वचन थे। किसी परिषद में निर्वाचित भारतीय बहुमत की कोई बात इसमें नहीं थी, इसलिए (d) उत्तर है।

Q8. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. वि. दा. सावरकर ने 1909 में प्रकाशित एक पुस्तक में 1857 की घटनाओं को स्वतंत्रता संग्राम बताया।
2. हैदराबाद के निज़ाम विद्रोह में शामिल हुए और उन्होंने दक्कन में विद्रोह का नेतृत्व किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

केवल 1 सही है। निज़ाम ने अपने मंत्री सालार जंग की सलाह पर वफ़ादारी निभाई और दक्कन को शांत रखा, इसलिए कथन 2 ग़लत है; अतः (b), (c) और (d) ग़लत हैं।

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