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रोज़गार नीति: ग्रामीण रोज़गार गारंटी, श्रम संहिताएँ और योजनाएँ

गरीबी और बेरोज़गारी · भाग 3 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

मनरेगा (2005): माँगने पर 100 दिन के काम का क़ानूनी अधिकार, 15 दिन का नियम और बेरोज़गारी भत्ता, सामाजिक लेखापरीक्षा और लागत-साझेदारी; 125 दिन, मौसमी विराम, मानक आवंटन और 60:40 साझेदारी वाले वीबी-जी राम जी अधिनियम, 2025 (1 जुलाई 2026 से लागू) द्वारा उसका प्रतिस्थापन; 21 नवंबर 2025 से लागू चार श्रम संहिताएँ; डे-एनआरएलएम और स्वयं सहायता समूह, पीएमईजीपी, पीएमकेवीवाई और प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना।

भाग 2 ने दिखाया कि भारत काम को कैसे मापता है और बेरोज़गारी कई रूप क्यों लेती है; यह भाग देखता है कि राज्य इसके लिए क्या करता है। सबसे बड़ा उत्तर ग्रामीण मज़दूरी-काम की क़ानूनी गारंटी रहा है: 2005 का रोज़गार गारंटी क़ानून, जिसने बीस वर्ष तक हर ग्रामीण परिवार को माँगने पर काम का अधिकार दिया, और 2025 का वह क़ानून जिसने जुलाई 2026 से उसका स्थान लिया। इसके साथ चार श्रम संहिताएँ हैं, जिन्होंने मज़दूरी, औद्योगिक संबंध, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा के नियम नए सिरे से लिखे, और स्वरोज़गार, कौशल और औपचारिक भर्ती को बढ़ावा देने वाली योजनाओं का एक समूह।

राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 ने ग्रामीण काम को एक योजना से क़ानूनी अधिकार में बदल दिया। पहले के मज़दूरी-रोज़गार कार्यक्रम केवल उतना ही काम देते थे जितना उनकी निधि अनुमति देती थी; अधिनियम ने काम न दिए जाने पर राज्य को उत्तरदायी बनाया। यह 2 फ़रवरी 2006 को 200 ज़िलों में लागू हुआ, 2008 में सभी ग्रामीण ज़िलों तक पहुँचा और 2009 में इसका नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) रखा गया। हर उस ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य अकुशल शारीरिक काम के लिए स्वेच्छा से आगे आएँ, एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिन के मज़दूरी-रोज़गार का अधिकार था। गारंटी का उद्देश्य था कमज़ोर मौसम में न्यूनतम आय देना, शहरों की ओर मजबूरी के पलायन को धीमा करना और स्वयं गाँवों में तालाब और सड़क जैसी उपयोगी परिसंपत्तियाँ बनाना।

अधिकार माँग-आधारित था। परिवार पंजीकरण कराता और जॉब कार्ड पाता; काम के लिए आवेदन करने वाले वयस्क को 15 दिन के भीतर काम देना होता था, अन्यथा राज्य सरकार बेरोज़गारी भत्ता देती थी, पहले 30 दिनों के लिए मज़दूरी दर का कम से कम एक-चौथाई और वर्ष के शेष भाग के लिए कम से कम आधा। काम कामगार के घर से 5 किमी के भीतर देना था, अन्यथा यात्रा के लिए 10 प्रतिशत अतिरिक्त मज़दूरी। लाभार्थियों में कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ होनी थीं। मज़दूरी दरें केंद्र अधिसूचित करता था, और मज़दूरी साप्ताहिक या एक पखवाड़े के भीतर देय थी। काम ग्राम सभा में चुने जाते थे, और लागत के हिसाब से कम से कम आधे काम ग्राम पंचायतें करती थीं, जल संरक्षण, सूखा-रोधन, भूमि विकास और ग्रामीण सड़कों को प्राथमिकता के साथ।

दो और विशेषताओं ने अधिनियम को अलग पहचान दी। धारा 17 ने ग्राम सभा से पंचायत के सभी कामों की नियमित सामाजिक लेखापरीक्षा कराने की अपेक्षा की: ग्रामवासी खुली बैठक में मस्टर रोल, भुगतान और स्वयं कामों की जाँच करते हैं। और अधिकांश लागत केंद्र वहन करता था: अकुशल मज़दूरी का पूरा भाग और सामग्री लागत का तीन-चौथाई, जिसमें कुशल और अर्ध-कुशल कामगारों की मज़दूरी शामिल थी, जबकि राज्य सामग्री लागत का शेष एक-चौथाई और बेरोज़गारी भत्ता देते थे। ग्राम पंचायत स्तर पर कामों की लागत में मज़दूरी कम से कम 60 प्रतिशत होनी थी, जिससे कार्यक्रम मशीनों और ठेकेदारों से चलने वाली निर्माण योजना के बजाय श्रम-प्रधान बना रहा।

व्यवहार में गारंटी ने सुरक्षा जाल का काम किया। सूखे के वर्षों में काम की माँग बढ़ी, और 2020-21 में यह तेज़ी से बढ़ी, जब कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान प्रवासी कामगार अपने गाँव लौटे और कार्यक्रम उनमें से बहुतों की आय का मुख्य स्रोत बन गया। हाल के वर्षों में सृजित काम के व्यक्ति-दिनों में आधे से अधिक हिस्सा महिलाओं का रहा। इसकी कमज़ोरियाँ भी जानी-पहचानी थीं: मज़दूरी का देर से भुगतान, कुछ राज्यों की न्यूनतम मज़दूरी से कम अधिसूचित मज़दूरी दरें, असमान गुणवत्ता की परिसंपत्तियाँ, और वर्ष समाप्त होने से पहले अक्सर कम पड़ जाने वाली निधि, जिससे माँगने पर रोज़गार के वादे के बावजूद काम सीमित कर दिया जाता था। इन शिकायतों ने, और इस प्रश्न ने कि लागत कौन वहन करे, उसके स्थान पर नए क़ानून की बहस की रूपरेखा तय की।

संसद ने 2005 के अधिनियम के स्थान पर विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025, जिसे वीबी-जी राम जी कहा जाता है, बनाया। दोनों सदनों ने 18 दिसंबर 2025 को विधेयक पारित किया और राष्ट्रपति ने 21 दिसंबर 2025 को अनुमति दी। फिर ग्रामीण विकास मंत्रालय ने 1 जुलाई 2026 को वह तिथि अधिसूचित की जिस दिन नया अधिनियम लागू हुआ और मनरेगा, उसके अधीन बने नियमों और योजनाओं सहित, निरसित हो गया। गारंटी प्रति ग्रामीण परिवार प्रति वित्तीय वर्ष 100 से बढ़कर 125 दिन के मज़दूरी-काम की हो जाती है, और मज़दूरी साप्ताहिक या काम के 15 दिन के भीतर देय है। राज्य बुवाई और कटाई के चरम मौसम में वर्ष में अधिकतम 60 दिन का विराम अधिसूचित करते हैं, जब कोई काम नहीं लिया जाता, ताकि खेतों को सबसे अधिक आवश्यकता के समय श्रम की कमी न हो।

सबसे बड़ा बदलाव वित्त-पोषण के ढाँचे में है। मनरेगा में केंद्रीय निधि माँग के पीछे चलती थी: यदि अधिक लोग काम माँगते, तो केंद्र को मज़दूरी के लिए अधिक धन जुटाना पड़ता था। नए अधिनियम में केंद्र हर राज्य के लिए पहले से एक मानक आवंटन तय करता है, और उससे अधिक व्यय राज्य पर पड़ता है। लागत केंद्र और राज्यों के बीच 60:40 में बँटती है, पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए 90:10, और विधानमंडल रहित संघ राज्यक्षेत्रों में पूरी लागत केंद्र वहन करता है, जबकि प्रशासनिक व्यय की सीमा 6 से बढ़कर 9 प्रतिशत हो जाती है। काम चार विषयों में समूहित हैं, जल सुरक्षा, मुख्य ग्रामीण अवसंरचना, आजीविका अवसंरचना और चरम मौसम से निपटने के काम, और ये ग्राम सभा द्वारा अनुमोदित तथा पीएम गति शक्ति मंच से जुड़ी ग्राम पंचायत योजनाओं से आते हैं। समर्थक अधिक दिनों और बेहतर नियोजन की ओर संकेत करते हैं; आलोचक तर्क देते हैं कि सीमित बजट माँगने पर काम के अधिकार को कमज़ोर करता है।

मनरेगा (2005) और वीबी-जी राम जी अधिनियम (2025) की तुलना
विशेषतामनरेगा, 2005वीबी-जी राम जी अधिनियम, 2025
प्रति ग्रामीण परिवार प्रति वर्ष गारंटीशुदा दिनकम से कम 100125
लागू2 फ़रवरी 2006 (200 ज़िले); 2008 से सभी ग्रामीण ज़िले1 जुलाई 2026, मनरेगा को निरसित करते हुए
केंद्रीय वित्त-पोषणमाँग-आधारित; केंद्र पूरी अकुशल मज़दूरी और सामग्री लागत का 75% देता थाप्रति राज्य मानक आवंटन; 60:40 (पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य 90:10; विधानमंडल रहित संघ राज्यक्षेत्रों में 100% केंद्र)
मौसमी विरामनहींबुवाई और कटाई के चरम समय में वर्ष में अधिकतम 60 दिन, राज्यों द्वारा अधिसूचित
मज़दूरी भुगतानसाप्ताहिक या एक पखवाड़े के भीतरसाप्ताहिक या 15 दिन के भीतर
नियोजनकाम ग्राम सभा में चुने जाते; लागत के हिसाब से कम से कम आधे ग्राम पंचायतों द्वाराग्राम सभा द्वारा अनुमोदित ग्राम पंचायत योजनाएँ, पीएम गति शक्ति से जुड़ी

श्रम समवर्ती सूची का विषय है, और दशकों में केंद्र ने चालीस से अधिक श्रम क़ानून बनाए थे, जिनमें से कई स्वतंत्रता से पुराने थे, जिनकी परिभाषाएँ एक-दूसरे पर चढ़ती थीं। संसद ने उनमें से 29 को चार श्रम संहिताएँ में मिलाया: मज़दूरी संहिता, 2019, औद्योगिक संबंध संहिता, 2020, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता, 2020। यद्यपि ये 2019 और 2020 में पारित हुईं, संहिताएँ केंद्र और राज्यों के नियमों की प्रतीक्षा करती रहीं, और चारों 21 नवंबर 2025 को एक साथ लागू हुईं। उद्देश्य था नियोक्ताओं के लिए अनुपालन सरल बनाना और साथ ही न्यूनतम मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा जैसे बुनियादी संरक्षण कहीं अधिक कामगारों तक पहुँचाना।

हर संहिता में कुछ बिंदु जानने योग्य हैं। मज़दूरी संहिता ने चार क़ानून समाहित किए, मज़दूरी संदाय अधिनियम, 1936, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948, बोनस संदाय अधिनियम, 1965 और समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976; यह न्यूनतम मज़दूरी को सभी कर्मचारियों तक बढ़ाती है और केंद्र को एक आधार मज़दूरी तय करने देती है जिससे नीचे किसी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी नहीं जा सकती। औद्योगिक संबंध संहिता उस प्रतिष्ठान के आकार को 100 से बढ़ाकर 300 कामगार करती है जिसे कामबंदी, छँटनी या बंदी से पहले सरकारी अनुमति चाहिए, और नियत अवधि रोज़गार को मान्यता देती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों को परिभाषित करती है और सरकारों को उनके लिए योजनाएँ बनाने देती है, जिनका वित्त-पोषण अंशतः एग्रीगेटर वार्षिक कारोबार के 1 से 2 प्रतिशत से करते हैं, जो ऐसे कामगारों को उनके द्वारा दी गई राशि के 5 प्रतिशत तक सीमित है; नियत अवधि कर्मचारी एक वर्ष के बाद उपदान के पात्र होते हैं।

चार श्रम संहिताएँ (21 नवंबर 2025 से लागू)
संहितापारित वर्षमुख्य बिंदु
मज़दूरी संहिता2019न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम, 1948 सहित चार क़ानूनों का विलय; सभी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम मज़दूरी; केंद्रीय आधार मज़दूरी
औद्योगिक संबंध संहिता2020कामबंदी, छँटनी या बंदी के लिए अनुमति केवल 300 से अधिक कामगारों पर (पहले 100); नियत अवधि रोज़गार
सामाजिक सुरक्षा संहिता2020गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगार परिभाषित; कारोबार के 1–2% का एग्रीगेटर अंशदान, उन्हें दिए भुगतान के 5% तक सीमित; नियत अवधि कर्मचारियों को एक वर्ष बाद उपदान
व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता2020कारखानों, खानों, बागानों और अन्य कार्यस्थलों के क़ानूनों का विलय

मज़दूरी-काम के अलावा राज्य स्वरोज़गार को बढ़ावा देता है। ग्रामीण विकास मंत्रालय का दीनदयाल अंत्योदय योजना–राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (डे-एनआरएलएम) जून 2011 में आजीविका के रूप में, स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोज़गार योजना के स्थान पर, शुरू हुआ। यह गरीब ग्रामीण महिलाओं को स्वयं सहायता समूह में संगठित करता है, प्रायः दस से बीस सदस्यों के, जो साथ मिलकर बचत करती हैं और एक-दूसरे को उधार देती हैं; समूहों को ग्राम और क्लस्टर स्तर पर संघों में जोड़ा जाता है और बैंक ऋण से जोड़ा जाता है, ताकि छोटे ऋण डेयरी, सिलाई या गाँव की दुकान जैसी आजीविका में बढ़ सकें। इसी तर्ज़ पर एक शहरी मिशन, डे-एनयूएलएम, 2013 में शुरू हुआ। प्रधानमंत्री रोज़गार सृजन कार्यक्रम (पीएमईजीपी), जो 2008 में दो पुरानी योजनाओं को मिलाकर बना और जिसे सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय खादी और ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से चलाता है, नए सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने के लिए बैंक ऋण पर 15 से 35 प्रतिशत की सब्सिडी देता है।

कौशल और औपचारिक भर्ती दूसरे साधन हैं। प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना (पीएमकेवीवाई), जो 2015 में कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय के स्किल इंडिया मिशन के अंतर्गत शुरू हुई, अल्पकालिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों और पूर्व शिक्षा की मान्यता को वित्त देती है, जो लोगों के पास पहले से मौजूद कौशल को प्रमाणित करती है। सबसे नई योजना सीधे औपचारिक रोज़गार को लक्ष्य करती है। केंद्रीय बजट 2024-25 में घोषित रोज़गार-संबद्ध प्रोत्साहन 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना के रूप में शुरू हुआ, लगभग 99,446 करोड़ रुपये के परिव्यय और लगभग 3.5 करोड़ रोज़गार के लक्ष्य के साथ। 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच सृजित रोज़गार के लिए, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में पंजीकृत पहली बार के कर्मचारियों को दो किस्तों में एक महीने की मज़दूरी, 15,000 रुपये तक, मिलती है, और नियोक्ताओं को रखे गए हर अतिरिक्त कामगार के लिए प्रति माह 3,000 रुपये तक मिलते हैं।

इस भाग की नीतियाँ भाग 2 में रखी गई समस्याओं का उत्तर हैं। शारीरिक काम की गारंटी गाँवों की मौसमी और प्रच्छन्न बेरोज़गारी के लिए उपयुक्त है, और 2025 का क़ानून उस गारंटी को बनाए रखते हुए यह बदलता है कि लागत कौन दे और केंद्र पहले से कितनी प्रतिबद्धता करे। श्रम संहिताएँ बड़े असंगठित कार्यबल को मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा के साझा नियमों के अंतर्गत लाने का प्रयास करती हैं। स्वयं सहायता समूह और पीएमईजीपी अल्प-रोज़गार को स्वरोज़गार में बदलते हैं, पीएमकेवीवाई कौशल के संरचनात्मक बेमेल को संबोधित करती है, और भर्ती प्रोत्साहन काम को औपचारिक क्षेत्र की ओर धकेलते हैं। भाग 1 के साथ पढ़ने पर अध्याय एक ही समस्या के दो पक्ष दिखाता है: गरीबी रेखाएँ और सूचकांक पीछे छूटे लोगों को गिनते हैं, और श्रम आँकड़े दिखाते हैं कि काम उन तक पहुँच रहा है या नहीं। गरीबी सबसे तेज़ी से वहाँ घटती है जहाँ लोगों को स्थिर, उत्पादक काम मिलता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यदि आवेदन के 15 दिन के भीतर काम नहीं दिया गया, तो राज्य सरकार द्वारा बेरोज़गारी भत्ता देय था।
2. लाभार्थियों में कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ होनी थीं।
3. अधिनियम ने ग्रामीण क्षेत्रों के हर वयस्क व्यक्ति को 100 दिन के रोज़गार की गारंटी दी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है: कम से कम 100 दिन की गारंटी प्रति ग्रामीण परिवार थी, प्रति वयस्क नहीं। इसलिए 'केवल 2 और 3', 'केवल 1 और 3' और '1, 2 और 3' गलत हैं।

Q2. महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005 के अंतर्गत कामों की सामाजिक लेखापरीक्षा किसके द्वारा की जानी थी?

  1. भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक
  2. ग्राम सभा
  3. ज़िला कलेक्टर
  4. ग्रामीण विकास मंत्रालय
उत्तर देखें

उत्तर: B. ग्राम सभा

धारा 17 ने ग्राम सभा से ग्राम पंचायत के सभी कामों की नियमित सामाजिक लेखापरीक्षा कराने की अपेक्षा की। नियंत्रक-महालेखापरीक्षक सरकारी लेखों की लेखापरीक्षा करता है पर सामाजिक लेखापरीक्षा निकाय नहीं है; ज़िला कलेक्टर और मंत्रालय कार्यक्रम का प्रशासन और निगरानी करते हैं पर सामाजिक लेखापरीक्षा नहीं करते।

Q3. विकसित भारत – रोज़गार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) अधिनियम, 2025 के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह प्रति ग्रामीण परिवार प्रति वित्तीय वर्ष 125 दिन के मज़दूरी-रोज़गार की गारंटी देता है।
2. यह उसी दिन लागू हुआ जिस दिन राष्ट्रपति ने अनुमति दी, 21 दिसंबर 2025।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: अनुमति 21 दिसंबर 2025 को दी गई, पर अधिनियम अधिसूचना द्वारा 1 जुलाई 2026 से लागू हुआ और तभी मनरेगा निरसित हुआ। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q4. वीबी-जी राम जी अधिनियम, 2025 के अंतर्गत पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए केंद्र-राज्य लागत साझेदारी है

  1. 60:40
  2. 75:25
  3. 90:10
  4. 100:0
उत्तर देखें

उत्तर: C. 90:10

पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्य लागत 90:10 में बाँटते हैं। 60:40 अन्य राज्यों का अनुपात है; 100:0 विधानमंडल रहित संघ राज्यक्षेत्रों पर लागू है; 75:25 मनरेगा में सामग्री लागत में केंद्र का हिस्सा था, नए अधिनियम का अनुपात नहीं।

Q5. निम्नलिखित में से कौन-सी श्रम संहिता संसद ने 2019 में पारित की, बाकी तीन से एक वर्ष पहले?

  1. मज़दूरी संहिता
  2. औद्योगिक संबंध संहिता
  3. सामाजिक सुरक्षा संहिता
  4. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता
उत्तर देखें

उत्तर: A. मज़दूरी संहिता

मज़दूरी संहिता 2019 की है। औद्योगिक संबंध संहिता, सामाजिक सुरक्षा संहिता और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाएँ संहिता तीनों 2020 में पारित हुईं, इसलिए वे विकल्प गलत हैं। चारों 21 नवंबर 2025 को लागू हुईं।

Q6. 21 नवंबर 2025 से लागू श्रम संहिताओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. औद्योगिक संबंध संहिता कामबंदी, छँटनी या बंदी के लिए पूर्व सरकारी अनुमति केवल 300 या अधिक कामगारों वाले प्रतिष्ठानों में अपेक्षित करती है।
2. सामाजिक सुरक्षा संहिता गिग और प्लेटफ़ॉर्म कामगारों की योजनाओं के लिए एग्रीगेटरों के अंशदान का प्रावधान करती है।
3. मज़दूरी संहिता हर राज्य को केंद्र द्वारा तय आधार मज़दूरी से नीचे न्यूनतम मज़दूरी तय करने देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है: किसी राज्य की न्यूनतम मज़दूरी केंद्र द्वारा तय आधार मज़दूरी से नीचे तय नहीं की जा सकती। इसलिए 'केवल 2 और 3', 'केवल 1 और 3' और '1, 2 और 3' गलत हैं।

Q7. निम्नलिखित योजनाओं को उन्हें चलाने वाले मंत्रालय या निकाय से सुमेलित कीजिए:
A. डे-एनआरएलएम B. पीएमईजीपी C. पीएमकेवीवाई D. प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना
1. खादी और ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय
2. ग्रामीण विकास मंत्रालय
3. कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय
4. कर्मचारी भविष्य निधि संगठन में पंजीकृत कामगारों को दिए जाने वाले लाभ
सही कूट चुनिए:

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-3, D-4
  3. A-2, B-3, C-1, D-4
  4. A-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-1, C-3, D-4

डे-एनआरएलएम ग्रामीण विकास मंत्रालय के अधीन है (2), पीएमईजीपी सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय खादी और ग्रामोद्योग आयोग के माध्यम से चलाता है (1), पीएमकेवीवाई कौशल विकास और उद्यमशीलता मंत्रालय के अधीन है (3), और प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना ईपीएफओ पंजीकरण से जुड़े लाभ देती है (4)। दूसरा कूट डे-एनआरएलएम और पीएमईजीपी को बदल देता है; तीसरा पीएमईजीपी और पीएमकेवीवाई को; चौथा डे-एनआरएलएम और पीएमकेवीवाई को।

Q8. प्रधानमंत्री विकसित भारत रोज़गार योजना के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह ईपीएफओ में पंजीकृत पहली बार के कर्मचारियों को दो किस्तों में एक महीने की मज़दूरी, 15,000 रुपये तक, देती है।
2. यह 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 के बीच सृजित रोज़गार को शामिल करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों कथन सही हैं: कर्मचारी भाग दो किस्तों में 15,000 रुपये तक एक महीने की मज़दूरी देता है, और योजना 1 अगस्त 2025 से 31 जुलाई 2027 तक सृजित रोज़गार को शामिल करती है। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

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