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औद्योगिक नीति और 1991 के सुधार

उद्योग और अवसंरचना · भाग 1 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

1948 और 1956 के औद्योगिक नीति संकल्प और उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951, लाइसेंस-परमिट राज, लघु उद्योग आरक्षण, एमआरटीपी अधिनियम और फ़ेरा, जुलाई 1991 का औद्योगिक नीति वक्तव्य, उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण का अर्थ, प्रतिस्पर्धा अधिनियम और सीसीआई, महारत्न, नवरत्न और मिनीरत्न उद्यम, विनिवेश और रणनीतिक बिक्री, तथा 2021 की सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति।

यह अध्याय इस बारे में है कि भारत चीज़ें कैसे बनाता है, और उन सड़कों, बंदरगाहों और बिजली के बारे में जो इसे संभव बनाते हैं। भाग 1 औद्योगिक नीति की कहानी बताता है: स्वतंत्र भारत ने ऐसा राज्य-नेतृत्व वाला रास्ता क्यों चुना जिसमें सबसे बड़े कारखाने सरकार के थे और निजी फ़र्मों को बढ़ने के लिए अनुमति चाहिए थी, उस व्यवस्था ने अर्थव्यवस्था को कैसे पीछे रखा, और जुलाई 1991 में शुरू हुए सुधारों ने उसे कैसे खोला। उन सुधारों का सार तीन शब्दों में है: उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण। भाग का अंत इस बात से होता है कि सार्वजनिक क्षेत्र का क्या हुआ। भाग 2 आज के उद्योग, उसके मापन और उसे दी जाने वाली सहायता को, और भाग 3 अवसंरचना तथा उसके वित्तपोषण को समझाता है।

अप्रैल 1948 के पहले औद्योगिक नीति संकल्प ने एक मिश्रित अर्थव्यवस्था की रूपरेखा दी, जिसमें सार्वजनिक और निजी उद्यम राज्य के निर्देशन में साथ-साथ काम करते। हथियार और गोला-बारूद, परमाणु ऊर्जा और रेलवे संघ सरकार का एकाधिकार बने। कोयला, लोहा और इस्पात, जहाज़ निर्माण और खनिज तेल जैसे छह आधारभूत उद्योगों में नई इकाइयाँ केवल राज्य शुरू करता, हालाँकि मौजूदा निजी फ़र्में दस वर्ष तक चल सकती थीं। शेष उद्योग विनियमन के अधीन निजी उद्यम के लिए खुले थे, और यह विनियमन उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 से आया: अनुसूचित उद्योग की किसी फ़र्म को कारखाना लगाने, क्षमता काफ़ी बढ़ाने या नया उत्पाद बनाने के लिए केंद्र से लाइसेंस चाहिए था। औद्योगिक लाइसेंसिंग का उद्देश्य दुर्लभ पूँजी को उन उद्योगों की ओर मोड़ना था जिन्हें योजनाएँ बढ़ाना चाहती थीं।

अप्रैल 1956 का औद्योगिक नीति संकल्प और आगे गया। यह 'समाजवादी ढंग के समाज' के राष्ट्रीय लक्ष्य और दूसरी पंचवर्षीय योजना के अनुरूप था, जिसने इस सोच के साथ भारी उद्योग को विकास के केंद्र में रखा कि एक गरीब देश को मशीनें बनाने वाली मशीनें बनानी होंगी। उद्योगों को तीन अनुसूचियों में बाँटा गया। अनुसूची क में 17 उद्योग थे, जैसे हथियार, परमाणु ऊर्जा, लोहा और इस्पात, रेलवे और हवाई परिवहन, जहाँ नई इकाइयाँ केवल राज्य की ज़िम्मेदारी होतीं। अनुसूची ख में 12 उद्योग थे, जैसे मशीन टूल, उर्वरक और सड़क परिवहन, जो क्रमशः राज्य के स्वामित्व में आते, और निजी फ़र्में राज्य के प्रयास की पूरक बन सकती थीं। बाकी सब, अनुसूची ग में, लाइसेंस के अधीन रहते हुए निजी क्षेत्र के लिए छोड़ा गया। यहीं से अर्थव्यवस्था की 'शीर्ष ऊँचाइयों' पर सार्वजनिक क्षेत्र के नियंत्रण का विचार आता है।

अगले तीन दशकों में ये नियंत्रण बढ़कर वह बन गए जिसे आलोचक लाइसेंस-परमिट राज कहते थे। संयंत्र लगाने, क्षमता बढ़ाने या मशीन आयात करने की इच्छुक फ़र्म को अक्सर कई अलग-अलग मंज़ूरियाँ चाहिए थीं, और हर एक में महीनों लगते थे। लाइसेंस प्रायः उन बड़े व्यावसायिक घरानों को मिलते जो व्यवस्था को चलाना जानते थे, और संरक्षित फ़र्मों पर लागत घटाने या गुणवत्ता सुधारने का दबाव कम था। 1967 से उत्पादों की एक बढ़ती सूची, जो अपने शिखर पर 800 से अधिक थी, केवल लघु इकाइयों के लिए आरक्षित की गई। उद्देश्य रोज़गार की रक्षा था, पर मान लीजिए किसी आरक्षित वस्तु को बनाने वाली छोटी इकाई बढ़ना चाहती: निवेश सीमा पार करते ही उसका संरक्षण चला जाता, इसलिए कई इकाइयाँ छोटी ही रहीं। परिणाम था ऊँची लागत, बार-बार की कमी और धीमी वृद्धि, जिसे अर्थशास्त्री राज कृष्ण ने 'हिंदू वृद्धि दर' कहा, लगभग 3.5 प्रतिशत प्रति वर्ष।

दो कानूनों ने पकड़ और कस दी। एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार (एमआरटीपी) अधिनियम, 1969 उन सरकारी निष्कर्षों के बाद आया कि आर्थिक शक्ति कुछ व्यावसायिक घरानों में केंद्रित थी; एक परिसंपत्ति सीमा से ऊपर की बड़ी फ़र्मों को विस्तार, विलय या नई इकाई खोलने के लिए सरकारी मंज़ूरी चाहिए थी। विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम (फ़ेरा), 1973 ने विदेशी मुद्रा को कड़ाई से नियंत्रित किया और भारतीय कंपनियों में विदेशी शेयरधारिता को सामान्यतः 40 प्रतिशत तक सीमित किया; आईबीएम और कोका-कोला उन फ़र्मों में थीं जिन्होंने नियंत्रण छोड़ने के बजाय भारत छोड़ दिया। 1977 के औद्योगिक नीति वक्तव्य ने ध्यान लघु और कुटीर उद्योगों की ओर मोड़ा, और उनकी सेवा के लिए 1978 से ज़िला उद्योग केंद्र बनाए गए। 1980 के दशक में कुछ नियम ढीले हुए, जैसे फ़र्मों को एक ही लाइसेंस पर संबंधित उत्पादों की व्यापक श्रेणी बनाने देना ('ब्रॉड-बैंडिंग'), पर व्यवस्था का मूल ढाँचा बना रहा।

1991 में यह व्यवस्था संकट से टकराई: विदेशी मुद्रा भंडार कुछ ही सप्ताह के आयात जितना रह गया था, जैसा बाह्य क्षेत्र का अध्याय बताता है। 24 जुलाई 1991 को, संघीय बजट के दिन, सरकार ने संसद के सामने नया औद्योगिक नीति वक्तव्य रखा। औद्योगिक लाइसेंसिंग सभी उद्योगों के लिए समाप्त कर दी गई, सिवाय उन 18 के जिन्हें सुरक्षा, रणनीति, संरक्षा या पर्यावरण के कारणों से लाइसेंस के अधीन रखा गया; यह सूची अब घटकर कुछ ही रह गई है, जैसे रक्षा उपकरण, औद्योगिक विस्फोटक, खतरनाक रसायन, और तंबाकू उत्पाद तथा मादक पेय। सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योग 17 से घटाकर 8 किए गए, और बाद में केवल दो: परमाणु ऊर्जा और रेल परिचालन। अधिकांश क्षेत्रों में फ़र्म को कारखाना लगाने के लिए अनुमति की ज़रूरत नहीं रही; उसे केवल सरकार को सूचित करने वाला एक ज्ञापन दाखिल करना था।

औद्योगिक नीति के तीन पड़ाव
नीतिमुख्य विचारसार्वजनिक क्षेत्रनिजी क्षेत्र
औद्योगिक नीति संकल्प, 1948राज्य के निर्देशन में मिश्रित अर्थव्यवस्थाहथियार, परमाणु ऊर्जा और रेलवे में एकाधिकार; छह आधारभूत उद्योगों में नई इकाइयाँअन्यत्र खुला, 1951 के अधिनियम के तहत लाइसेंस
औद्योगिक नीति संकल्प, 1956समाजवादी ढंग; भारी उद्योग पहलेअनुसूची क (17 उद्योग) अनन्य; अनुसूची ख (12) क्रमशः राज्य-स्वामित्वअनुसूची ग, लाइसेंस के अधीन
औद्योगिक नीति वक्तव्य, 1991लाइसेंस समाप्ति और खुलापनआरक्षित सूची 17 से घटकर 8 (अब 2)लाइसेंस केवल 18 उद्योगों के लिए (अब कुछ ही); प्राथमिकता उद्योगों में 51% तक एफ़डीआई स्वचालित

उसी वक्तव्य ने एमआरटीपी का वह नियम समाप्त किया कि बड़ी फ़र्मों को नए निवेश के लिए पूर्व मंज़ूरी चाहिए, इसलिए केवल आकार अब संदेह का कारण नहीं रहा। उच्च प्राथमिकता वाले उद्योगों की एक सूची में 51 प्रतिशत तक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को स्वचालित मंज़ूरी मिलनी थी, और विदेशी प्रौद्योगिकी लाने के समझौते आसान किए गए। लगातार घाटे वाले सार्वजनिक उद्यम पुनरुद्धार या बंदी के लिए भेजे जाने थे, और कुछ में सरकार की शेयरधारिता का एक हिस्सा बेचा जाना था। बाद के कानूनों ने तस्वीर पूरी की: फ़ेरा की जगह विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम (फ़ेमा), 1999 आया, जो विदेशी मुद्रा उल्लंघनों को आपराधिक नहीं बल्कि दीवानी मामले मानता है, और एमआरटीपी अधिनियम की जगह प्रतिस्पर्धा कानून आया। औद्योगिक नीति एक व्यापक पैकेज का हिस्सा थी जिसमें जुलाई 1991 का रुपये का अवमूल्यन और कम आयात शुल्क भी शामिल थे।

इन सुधारों को एलपीजी कहा जाता है। उदारीकरण का अर्थ है उन नियंत्रणों को हटाना जो फ़र्मों को यह तय करने से रोकते हैं कि क्या, कितना, कहाँ और किस कीमत पर उत्पादन करें: लाइसेंस समाप्त करना, ब्याज दरें मुक्त करना, आरक्षण खत्म करना। निजीकरण का अर्थ है मालिक के रूप में राज्य की छोटी भूमिका, या तो सार्वजनिक उद्यमों में सरकारी शेयर बेचकर या दूरसंचार, विमानन और बिजली जैसे राज्य के लिए रखे गए क्षेत्रों को निजी फ़र्मों के लिए खोलकर। वैश्वीकरण का अर्थ है कम प्रशुल्क, आसान विदेशी निवेश और बाज़ार-निर्धारित विनिमय दर के माध्यम से विश्व अर्थव्यवस्था से अधिक निकटता से जुड़ना। तीनों एक-दूसरे को सहारा देते हैं: लाइसेंस से मुक्त फ़र्म तभी बढ़ सकती है जब वह मशीनें आयात कर सके और विदेश में बेच सके। पैकेज दो समय-सीमाओं पर भी चला: राजकोषीय और चालू खाता घाटे घटाने के लिए अल्पकालिक स्थिरीकरण, और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधार।

लाइसेंस हटने के बाद खतरा बहुत अधिक नियंत्रण से हटकर बहुत कम प्रतिस्पर्धा का हो गया, क्योंकि प्रभुत्वशाली फ़र्म अब भी अपनी स्थिति का दुरुपयोग कर सकती थी। प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 प्रतिस्पर्धा को हानि पहुँचाने वाले करारों, जैसे कीमतें तय करने या बाज़ार बाँटने वाले गुटों (कार्टेल), और प्रभुत्वशाली स्थिति के दुरुपयोग, जैसे परभक्षी कीमत निर्धारण, को प्रतिबंधित करता है; यह निर्धारित सीमाओं से ऊपर के विलयों और अधिग्रहणों, यानी 'संयोजनों', की भी समीक्षा करता है। इसे भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग लागू करता है, जो 2003 में बना एक सांविधिक निकाय है; इसने करारों और प्रभुत्व संबंधी नियम 2009 में लागू करने शुरू किए, जिस वर्ष एमआरटीपी अधिनियम निरस्त हुआ, और विलय संबंधी नियम 2011 में। अंतर महत्वपूर्ण है: एमआरटीपी अधिनियम बड़े आकार को ही समस्या मानता था, जबकि प्रतिस्पर्धा अधिनियम फ़र्म के आकार से परे हानिकारक आचरण को दंडित करता है। 2023 के संशोधन ने सौदे के मूल्य पर आधारित एक कसौटी जोड़ी, ताकि किसी छोटी पर मूल्यवान कंपनी, प्रायः डिजिटल कंपनी, की खरीद की समीक्षा हो सके।

उदारीकरण ने सार्वजनिक क्षेत्र को समाप्त नहीं किया। केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम (सीपीएसई) वह कंपनी है जिसमें संघ सरकार, अकेले या अन्य सीपीएसई के साथ, आधे से अधिक शेयर रखती है; एनटीपीसी और ओएनजीसी इसके उदाहरण हैं। मज़बूत उद्यमों को प्रतिस्पर्धा की गुंजाइश देने के लिए सरकार उन्हें श्रेणियाँ देती है: नवरत्न और मिनीरत्न श्रेणियाँ 1997 में और सबसे बड़े उद्यमों के लिए महारत्न श्रेणी 2009 में बनाई गई। श्रेणी जितनी ऊँची, उसका बोर्ड मंत्रालय के पास गए बिना उतना ही बड़ा निवेश मंज़ूर कर सकता है, और संयुक्त उद्यम बनाने तथा विदेश में विस्तार करने में उतना ही स्वतंत्र होता है। मिनीरत्न को लगातार लाभ कमाया होना चाहिए, नवरत्न मिनीरत्नों में से प्रदर्शन संकेतकों के अंकों पर चुना जाता है, और महारत्न को पहले से एक सूचीबद्ध नवरत्न होना चाहिए जिसका कारोबार, निवल मूल्य और लाभ बहुत बड़ा हो और जिसकी महत्वपूर्ण वैश्विक उपस्थिति हो।

केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों की श्रेणियाँ
श्रेणीकब बनीकौन पात्र
मिनीरत्न1997लगातार लाभ के रिकॉर्ड वाले सीपीएसई
नवरत्न1997मिनीरत्नों में से प्रदर्शन संकेतकों के अंकों पर चुने गए
महारत्न2009बहुत बड़े कारोबार, निवल मूल्य और लाभ तथा महत्वपूर्ण वैश्विक उपस्थिति वाले सूचीबद्ध नवरत्न

विनिवेश सरकार द्वारा किसी सार्वजनिक उद्यम में अपने कुछ या सभी शेयरों की बिक्री है। यह 1991-92 में छोटी अल्पांश हिस्सेदारियों की बिक्री से शुरू हुआ, मुख्यतः बजट के लिए धन जुटाने हेतु। रंगराजन समिति (1993) ने सलाह दी कि सरकार की हिस्सेदारी कितनी घट सकती है, और विनिवेश आयोग (1996) ने सलाह दी कि क्या और कैसे बेचा जाए। 1999 से 2004 के बीच रणनीतिक विनिवेश हुआ, यानी प्रबंधन नियंत्रण सहित नियंत्रक हिस्सेदारी किसी निजी खरीदार को बेचना: पहला मॉडर्न फ़ूड इंडस्ट्रीज़ था, 2000 में, फिर 2001 में बाल्को। प्रभारी विभाग का नाम 2016 में बदलकर दीपम (निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग) किया गया, और एयर इंडिया की टाटा समूह को बिक्री जनवरी 2022 में पूरी हुई। 2021-22 के बजट की नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति चार व्यापक रणनीतिक क्षेत्रों (परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा; परिवहन और दूरसंचार; बिजली, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज; बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ) में केवल न्यूनतम उपस्थिति रखती है; अन्य क्षेत्रों में उद्यमों का निजीकरण किया जाना है या उन्हें बंद किया जाना है।

कुल मिलाकर, औद्योगिक नीति तीन चरणों से गुज़री है। 1948 से 1970 के दशक के अंत तक राज्य ने नेतृत्व किया और लाइसेंस दिए; 1980 के दशक में नियंत्रण किनारों पर ढीले हुए; और 1991 से राज्य ने यह तय करना छोड़ दिया कि फ़र्में क्या बना सकती हैं, और इसके बजाय प्रतिस्पर्धा आयोग के माध्यम से आचरण का विनियमन, कम उद्यमों का स्वामित्व और, जैसा भाग 2 दिखाता है, उन उद्योगों को प्रोत्साहन देना शुरू किया जिन्हें वह बढ़ाना चाहता है। 1991 के चार स्तंभ थे: लाइसेंस समाप्ति, सार्वजनिक क्षेत्र के लिए बहुत छोटा आरक्षित क्षेत्र, एमआरटीपी पूर्व मंज़ूरी का अंत, और विदेशी निवेश तथा प्रौद्योगिकी के लिए खुले द्वार। शेयर बेचना सार्वजनिक परिसंपत्तियों के उपयोग का एकमात्र तरीका नहीं है: स्वामित्व रखते हुए उन्हें पट्टे पर देना, जिसे परिसंपत्ति मुद्रीकरण कहते हैं, भाग 3 में फिर आएगा।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. औद्योगिक नीति संकल्प, 1956 के अंतर्गत अनुसूची क में थे:

  1. 17 उद्योग जिनमें नई इकाइयाँ केवल राज्य की ज़िम्मेदारी होतीं
  2. 12 उद्योग जो क्रमशः राज्य-स्वामित्व में आते, निजी फ़र्मों के पूरक प्रयास के साथ
  3. बिना किसी लाइसेंस के निजी क्षेत्र के लिए छोड़े गए उद्योग
  4. लघु इकाइयों द्वारा निर्माण के लिए आरक्षित उत्पाद
उत्तर देखें

उत्तर: A. 17 उद्योग जिनमें नई इकाइयाँ केवल राज्य की ज़िम्मेदारी होतीं

अनुसूची क में हथियार, परमाणु ऊर्जा, लोहा और इस्पात तथा रेलवे जैसे 17 उद्योग राज्य के लिए आरक्षित थे। क्रमशः राज्य-स्वामित्व वाले 12 उद्योग अनुसूची ख में थे; निजी क्षेत्र की अनुसूची ग में भी लाइसेंस चाहिए था; लघु उद्योग आरक्षण 1967 में शुरू हुआ और अनुसूचियों का हिस्सा नहीं था।

Q2. जुलाई 1991 के औद्योगिक नीति वक्तव्य के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसने 18 की एक छोटी सूची को छोड़कर सभी उद्योगों के लिए औद्योगिक लाइसेंसिंग समाप्त कर दी।
2. इसने सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित उद्योगों की संख्या 8 से बढ़ाकर 17 कर दी।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: लाइसेंस केवल 18 उद्योगों के लिए रखा गया। कथन 2 परिवर्तन को उलट देता है: आरक्षित सूची 17 से घटाकर 8 की गई, बढ़ाई नहीं गई। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q3. सूची I (कानून) को सूची II (अधिनियमन का वर्ष) से सुमेलित कीजिए:
सूची I
A. एमआरटीपी अधिनियम
B. फ़ेरा
C. फ़ेमा
D. प्रतिस्पर्धा अधिनियम
सूची II
1. 1999
2. 1969
3. 2002
4. 1973
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-2, B-4, C-1, D-3
  2. A-4, B-2, C-1, D-3
  3. A-2, B-4, C-3, D-1
  4. A-2, B-1, C-4, D-3
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-4, C-1, D-3

एमआरटीपी अधिनियम 1969, फ़ेरा 1973, फ़ेमा 1999 और प्रतिस्पर्धा अधिनियम 2002, अतः A-2, B-4, C-1, D-3। दूसरा विकल्प एमआरटीपी और फ़ेरा को अदल-बदल देता है; तीसरा फ़ेमा और प्रतिस्पर्धा अधिनियम को; चौथा फ़ेरा को फ़ेमा का वर्ष देता है।

Q4. भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह निर्धारित सीमाओं से ऊपर के विलयों और अधिग्रहणों की समीक्षा करता है।
2. यह किसी फ़र्म के बड़े आकार को अपने आप में अपराध मानता है।
3. यह प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 के तहत स्थापित एक सांविधिक निकाय है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 3

कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 पुराने एमआरटीपी दृष्टिकोण का वर्णन करता है; प्रतिस्पर्धा अधिनियम हानिकारक आचरण को दंडित करता है, आकार को नहीं। इसलिए कथन 2 वाला हर विकल्प गलत है।

Q5. निम्नलिखित में से कौन-से इस समय भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के लिए आरक्षित एकमात्र उद्योग हैं?

  1. परमाणु ऊर्जा और रेल परिचालन
  2. कोयला और खनिज तेल
  3. हथियार तथा गोला-बारूद और हवाई परिवहन
  4. लोहा और इस्पात तथा भारी मशीनरी
उत्तर देखें

उत्तर: A. परमाणु ऊर्जा और रेल परिचालन

1991 में 17 से 8 की कटौती के बाद सूची और घटकर परमाणु ऊर्जा और रेल परिचालन रह गई। कोयला, खनिज तेल, हथियार, हवाई परिवहन, लोहा और इस्पात तथा भारी मशीनरी कभी आरक्षित थे पर निजी फ़र्मों के लिए खोल दिए गए हैं।

Q6. केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यमों के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. महारत्न श्रेणी 2009 में शुरू की गई।
2. किसी सीपीएसई को पहले नवरत्न बने बिना महारत्न का दर्जा दिया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है। कथन 2 गलत है: महारत्न को पहले से शेयर बाज़ार में सूचीबद्ध नवरत्न होना चाहिए। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q7. रणनीतिक विनिवेश के माध्यम से बेचा गया पहला केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम कौन-सा था?

  1. मॉडर्न फ़ूड इंडस्ट्रीज़
  2. भारत एल्युमिनियम कंपनी (बाल्को)
  3. एयर इंडिया
  4. भारतीय इस्पात प्राधिकरण
उत्तर देखें

उत्तर: A. मॉडर्न फ़ूड इंडस्ट्रीज़

मॉडर्न फ़ूड इंडस्ट्रीज़ 2000 में बेची गई। बाल्को 2001 में बिकी; एयर इंडिया की बिक्री जनवरी 2022 में ही पूरी हुई; भारतीय इस्पात प्राधिकरण अब भी सार्वजनिक क्षेत्र का उद्यम है।

Q8. संघीय बजट 2021-22 में घोषित नई सार्वजनिक क्षेत्र उद्यम नीति के अंतर्गत निम्नलिखित में से कौन-सा रणनीतिक क्षेत्रों में से एक नहीं है?

  1. परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा
  2. परिवहन और दूरसंचार
  3. बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ
  4. होटल और पर्यटन
उत्तर देखें

उत्तर: D. होटल और पर्यटन

चार रणनीतिक क्षेत्र हैं: परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष और रक्षा; परिवहन और दूरसंचार; बिजली, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज; तथा बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाएँ। होटल और पर्यटन गैर-रणनीतिक क्षेत्र है, जहाँ उद्यमों का निजीकरण या बंदी होनी है; अन्य तीन विकल्प रणनीतिक क्षेत्र हैं।

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