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विनिमय दरें, विदेशी मुद्रा भंडार और विदेशी पूँजी

बाह्य क्षेत्र · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

विनिमय दर कैसे तय होती है, मूल्यह्रास और अधिमूल्यन बनाम अवमूल्यन और पुनर्मूल्यन, उनके प्रभाव, स्थिर, अस्थिर और प्रबंधित व्यवस्थाएँ और असंभव त्रयी, सम-मूल्य और 1975 की टोकरी से जुड़ाव से एलईआरएमएस (1992) और एकीकृत बाज़ार दर (1993) तक भारत का रास्ता, रुपये में व्यापार निपटान (2022), एनईईआर और आरईईआर, विदेशी मुद्रा भंडार के चार घटक और उनकी पर्याप्तता, एफ़डीआई और उसकी 10 प्रतिशत सीमा, मार्ग, निषिद्ध क्षेत्र और प्रेस नोट 3, सेबी के अधीन एफ़पीआई, ईसीबी, अनिवासी भारतीय जमाएँ और बाहरी ऋण।

भाग 1 ने दिखाया कि भारत के भुगतान संतुलन में क्या आता और जाता है। यह भाग उस कीमत को देखता है जो इन प्रवाहों को जोड़ती है, और विदेशी मुद्रा के उस भंडार को जो उन्हें सहारा देता है। यह विनिमय दर से शुरू होता है: उसे क्या चलाता है, उसके बढ़ने या घटने से अर्थव्यवस्था पर क्या असर होता है, और बाज़ार की हलचल तथा सरकारी निर्णय में क्या अंतर है। फिर यह देखता है कि 1991 के बाद भारत की विनिमय दर प्रणाली स्थिर दर से बाज़ार-निर्धारित दर में कैसे बदली, और अर्थशास्त्री रुपये को एक साथ कई मुद्राओं के मुकाबले कैसे मापते हैं। इसके बाद विदेशी मुद्रा भंडार आता है: वह किससे बनता है और कितना पर्याप्त है। दूसरा आधा भाग विदेशी पूँजी को उसके मुख्य रूपों में बाँटता है और प्रत्येक के नियम समझाता है।

विनिमय दर एक मुद्रा की दूसरी मुद्रा में कीमत है, जैसे एक अमेरिकी डॉलर खरीदने के लिए आवश्यक रुपयों की संख्या। बाज़ार-आधारित प्रणाली में यह विदेशी मुद्रा की माँग और आपूर्ति से तय होती है। डॉलर की माँग आयातक, विदेश में यात्रा या पढ़ाई करने वाले भारतीय, और पैसा बाहर ले जाने वाले विदेशी निवेशक करते हैं; उसकी आपूर्ति निर्यातक, विप्रेषण भेजने वाले कामगार और पैसा लाने वाले विदेशी निवेशक करते हैं। जब दर ₹84 से ₹87 प्रति डॉलर हो जाती है, तो प्रत्येक डॉलर से अधिक रुपये मिलते हैं, यानी रुपये का मूल्य घटा है: यह मूल्यह्रास है। उलटी दिशा में, ₹87 से ₹84, गति रुपये का अधिमूल्यन है।

कमज़ोर रुपये के मिले-जुले प्रभाव होते हैं। भारतीय वस्तुएँ विदेशी खरीदारों के लिए सस्ती हो जाती हैं, जिससे निर्यात को मदद मिल सकती है, जबकि आयात रुपयों में महँगा हो जाता है, जिससे वह हतोत्साहित हो सकता है। चूँकि भारत अपना अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, गिरता रुपया ईंधन की कीमतों के ज़रिए मुद्रास्फीति भी बढ़ाता है, और विदेशी मुद्रा में लिए गए ऋणों को चुकाने की रुपया लागत बढ़ा देता है। मज़बूत रुपया उलटा काम करता है: सस्ता आयात और कम आयातित मुद्रास्फीति, पर निर्यातकों के लिए कठिन स्थिति। मूल्यह्रास और अधिमूल्यन बाज़ार द्वारा लाए गए परिवर्तन बताते हैं। अवमूल्यन या पुनर्मूल्यन स्थिर या बँधी प्रणाली में किसी मुद्रा का मूल्य घटाने या बढ़ाने का सोचा-समझा सरकारी निर्णय है। भारत ने 1966 में और जुलाई 1991 में रुपये का अवमूल्यन किया; दर के बाज़ार-निर्धारित होने के बाद से गिरते रुपये के लिए सही शब्द मूल्यह्रास है।

देश तीन मोटी विनिमय दर व्यवस्थाओं में से चुनते हैं। स्थिर दर में सरकार या केंद्रीय बैंक मूल्य तय करता है और विदेशी मुद्रा खरीद-बेचकर उसकी रक्षा करता है; स्वर्ण मानक और 1944 की ब्रेटन वुड्स प्रणाली, जिसमें मुद्राओं के अमेरिकी डॉलर के मुकाबले सम-मूल्य थे और डॉलर सोने से जुड़ा था, स्थिर प्रणालियाँ थीं, और ब्रेटन वुड्स 1970 के दशक के आरंभ में टूट गई। मुक्त अस्थिर व्यवस्था में केवल बाज़ार दर तय करता है। भारत सहित अधिकांश उभरती अर्थव्यवस्थाएँ प्रबंधित अस्थिर विनिमय दर अपनाती हैं, जिसमें बाज़ार दर तय करता है पर हलचल अव्यवस्थित होने पर केंद्रीय बैंक हस्तक्षेप करता है। इन विकल्पों के पीछे 'असंभव त्रयी' है: कोई देश एक साथ स्थिर विनिमय दर, पूँजी की मुक्त आवाजाही और स्वतंत्र मौद्रिक नीति नहीं रख सकता। वह कोई भी दो रख सकता है, पर तीसरी छोड़नी पड़ती है।

भारत का अपना रास्ता बारी-बारी से हर व्यवस्था दिखाता है। स्वतंत्रता के बाद रुपये का एक आधिकारिक सम-मूल्य था, और जून 1966 में उसका अवमूल्यन किया गया। ब्रेटन वुड्स के ढहने के बाद, सितंबर 1975 से रुपये को भारत के मुख्य व्यापारिक साझेदारों की मुद्राओं की एक टोकरी से जोड़ा गया, और दर रिज़र्व बैंक घोषित करता था। मार्च 1992 में उदारीकृत विनिमय दर प्रबंध प्रणाली (एलईआरएमएस) ने दोहरी दर लागू की: विदेशी मुद्रा कमाई का 60 प्रतिशत बाज़ार दर पर बदला जा सकता था और 40 प्रतिशत आवश्यक आयात तथा सरकारी ज़रूरतों के लिए आधिकारिक दर पर बेचना पड़ता था। मार्च 1993 में दोनों दरों को एक बाज़ार-निर्धारित दर में एकीकृत कर दिया गया। तब से रिज़र्व बैंक कहता आया है कि वह अत्यधिक उतार-चढ़ाव रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है, किसी विशेष स्तर की रक्षा के लिए नहीं। जुलाई 2022 में उसने निर्यात और आयात का बीजक बनाने और निपटान रुपये में करने की अनुमति भी दी।

रुपये-डॉलर की दर कहानी का केवल एक भाग बताती है, क्योंकि भारत कई देशों से व्यापार करता है। नाममात्र प्रभावी विनिमय दर (एनईईआर) मुद्राओं की एक टोकरी के मुकाबले रुपये की विनिमय दरों का भारित औसत है, जिसमें प्रत्येक मुद्रा को भारत के व्यापार में उसके हिस्से के अनुसार भार दिया जाता है। वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (आरईईआर) एक कदम आगे जाकर भारत और उन साझेदारों के बीच मुद्रास्फीति के अंतर के लिए एनईईआर को समायोजित करती है, इसलिए वह मापती है कि भारतीय वस्तुएँ वास्तव में कितनी प्रतिस्पर्धी हैं। रिज़र्व बैंक दोनों को 6-मुद्रा और 40-मुद्रा रूप में, 100 माने गए आधार वर्ष के सापेक्ष सूचकांक के रूप में प्रकाशित करता है। मान लीजिए रुपया दूसरी मुद्राओं के मुकाबले स्थिर रहता है पर भारतीय कीमतें विदेश की कीमतों से तेज़ बढ़ती हैं: एनईईआर मुश्किल से हिलती है, फिर भी आरईईआर बढ़ती है, यानी भारतीय वस्तुएँ विदेशी खरीदारों के लिए महँगी हो गई हैं। इसलिए जब आरईईआर 100 से काफ़ी ऊपर हो, तो रुपया वास्तविक रूप से मज़बूत हुआ है और निर्यातकों के लिए कीमत पर प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है।

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार, जिसे रिज़र्व बैंक आरबीआई अधिनियम और फ़ेमा के अधीन रखता और प्रबंधित करता है, चार घटकों से बना है: विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ (सबसे बड़ा घटक, मुख्यतः सुरक्षित विदेशी सरकारी प्रतिभूतियों तथा जमाओं में निवेशित), सोना, विशेष आहरण अधिकार (1969 में आईएमएफ़ द्वारा बनाई गई अंतरराष्ट्रीय आरक्षित परिसंपत्ति), और आरक्षित किश्त स्थिति, यानी आईएमएफ़ पर भारत का तुरंत निकाला जा सकने वाला दावा। भंडार एक सुरक्षा जाल है: निर्यात आय सूख जाए तो वह आयात का भुगतान करता है, बाहरी ऋण भुगतान पूरे करता है, निवेशकों को भरोसा देता है, और रिज़र्व बैंक को रुपये को स्थिर रखने का साधन देता है। पर्याप्तता आयात आवरण (भंडार कितने महीने के आयात का भुगतान कर सकता है) और अल्पकालिक बाहरी ऋण के मुकाबले भंडार के अनुपात जैसे मापों से आँकी जाती है। जब रिज़र्व बैंक रुपये को बढ़ने से रोकने के लिए डॉलर खरीदता है, तो वह प्रणाली में रुपये छोड़ता है; वह उन्हें खुले बाज़ार परिचालनों या बाज़ार स्थिरीकरण योजना से सोख सकता है, जिसे निष्प्रभावन कहते हैं।

प्रत्यक्ष विदेशी निवेश किसी अनिवासी का ऐसा निवेश है जो किसी भारतीय उद्यम में स्थायी हित, और प्रायः उसके प्रबंधन में भागीदारी, लाता है। विदेशी मुद्रा प्रबंध (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 रेखा सटीक रूप से खींचते हैं: भारत से बाहर के निवासी व्यक्ति द्वारा किसी असूचीबद्ध भारतीय कंपनी में किया गया कोई भी निवेश एफ़डीआई है, और किसी सूचीबद्ध कंपनी की निर्गम-पश्चात चुकता इक्विटी पूँजी के, पूर्णतः तनुकृत आधार पर, 10 प्रतिशत या अधिक का निवेश भी। यह 10 प्रतिशत की सीमा 2014 में अरविंद मायाराम की अध्यक्षता वाली समिति की सिफ़ारिश पर आधारित है। एफ़डीआई दो में से किसी एक मार्ग से आता है। स्वचालित मार्ग में पूर्व अनुमोदन की ज़रूरत नहीं होती; निवेश की केवल बाद में रिज़र्व बैंक को सूचना दी जाती है। सरकारी मार्ग में, 2017 में विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड के समाप्त होने के बाद, अनुमोदन संबंधित मंत्रालय या विभाग से एक ऑनलाइन सुविधा पोर्टल के माध्यम से मिलता है।

नीति एफ़डीआई को क्यों आकर्षित करती है? क्योंकि यह विदेशी पूँजी का सबसे स्थिर रूप है: किसी कारखाने को एक दोपहर में बेचकर निकला नहीं जा सकता, और यह प्रायः प्रौद्योगिकी, प्रबंधन के तरीके, रोज़गार और निर्यात बाज़ारों तक पहुँच लाता है। उद्योग संवर्धन और आंतरिक व्यापार विभाग एफ़डीआई नीति बनाता है, और अब अधिकांश क्षेत्र स्वचालित मार्ग से 100 प्रतिशत तक विदेशी स्वामित्व की अनुमति देते हैं, यद्यपि कुछ पर सीमाएँ हैं या सरकारी अनुमोदन चाहिए। कुछ गतिविधियाँ एफ़डीआई के लिए पूरी तरह बंद हैं, जिनमें लॉटरी, जुआ और सट्टेबाज़ी, चिट फ़ंड, अचल संपत्ति कारोबार, तंबाकू के सिगार और सिगरेट का निर्माण, और परमाणु ऊर्जा शामिल हैं। 2020 का प्रेस नोट 3 कहता है कि भारत के साथ स्थल सीमा साझा करने वाले देश की किसी इकाई का, या ऐसी इकाई का जिसका लाभार्थी स्वामी ऐसे देश में स्थित है या उसका नागरिक है, कोई भी निवेश केवल सरकारी मार्ग से आएगा।

विदेशी पोर्टफोलियो निवेश अनिवासियों द्वारा मुख्यतः प्रतिफल के लिए, नियंत्रण चाहे बिना, शेयरों, बॉन्डों और ऐसी ही प्रतिभूतियों की खरीद है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को सेबी (विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक) विनियम, 2019 के अधीन सेबी में पंजीकरण कराना होता है, और किसी सूचीबद्ध कंपनी में प्रत्येक निवेशक की हिस्सेदारी उसकी इक्विटी के 10 प्रतिशत से कम रहनी चाहिए; यह रेखा पार होने पर निवेशक को या तो थोड़े समय में हिस्सेदारी घटानी होती है या उसे एफ़डीआई माना जाता है। पोर्टफोलियो धन भारतीय बाज़ारों को गहराई देता है और चालू खाता घाटे की भरपाई में मदद करता है, पर वैश्विक ब्याज दरें बढ़ने या जोखिम लेने की इच्छा घटने पर वह जल्दी निकल जाता है, इसीलिए उसे प्रायः 'हॉट मनी' कहा जाता है। भाग 1 में बताया गया 2013 का टेपर टैंट्रम एक पोर्टफोलियो बहिर्वाह था।

एफ़डीआई और एफ़पीआई की तुलना
विशेषताप्रत्यक्ष विदेशी निवेशविदेशी पोर्टफोलियो निवेश
उद्देश्यस्थायी हित, प्रबंधन में भागीदारीवित्तीय प्रतिफल, कोई नियंत्रण नहीं
सूचीबद्ध कंपनी की सीमानिर्गम-पश्चात चुकता इक्विटी का 10% या अधिकप्रति निवेशक 10% से कम
असूचीबद्ध कंपनीकोई भी निवेश एफ़डीआई माना जाता हैलागू नहीं
नियम कौन बनाता हैडीपीआईआईटी नीति; फ़ेमा गैर-ऋण लिखत नियम; रिज़र्व बैंक को सूचनासेबी में पंजीकरण (एफ़पीआई विनियम, 2019); फ़ेमा नियम
स्थिरतादीर्घकालिक, निकालना कठिनजल्दी निकल सकता है ('हॉट मनी')
सामान्य उदाहरणकोई विदेशी कार निर्माता भारत में संयंत्र लगाता हैकोई विदेशी कोष भारतीय एक्सचेंज पर शेयर खरीदता है

दो अन्य माध्यम स्वामित्व के बजाय ऋण लाते हैं। बाह्य वाणिज्यिक उधार (ईसीबी) वह ऋण है जो कोई पात्र भारतीय कंपनी विदेश से बैंक ऋण, बॉन्ड या ऐसे ही साधनों के ज़रिए जुटाती है, उस ढाँचे के अधीन जिसे रिज़र्व बैंक फ़ेमा के तहत चलाता है, और जिसमें लागत, परिपक्वता और अंतिम उपयोग पर सीमाएँ हैं। अनिवासी भारतीयों की जमाएँ तीन मुख्य प्रकार की होती हैं: एनआरई खाते, जो रुपये में होते हैं और पूर्णतः प्रत्यावर्तनीय हैं; एफ़सीएनआर(बी) खाते, जो विदेशी मुद्रा में होते हैं, इसलिए विनिमय जोखिम जमाकर्ता के बजाय बैंक उठाता है; और एनआरओ खाते, जिनमें भारत में अर्जित आय रहती है और जिन्हें केवल एक वार्षिक सीमा तक प्रत्यावर्तित किया जा सकता है। व्यापार ऋण और आधिकारिक ऋणों के साथ ये भारत का बाहरी ऋण बनाते हैं, जिसकी सूचना वित्त मंत्रालय और रिज़र्व बैंक नियमित रूप से देते हैं। विश्लेषक जीडीपी के सापेक्ष ऋण के आकार और, सबसे बढ़कर, एक वर्ष के भीतर देय हिस्से पर नज़र रखते हैं, क्योंकि अल्पकालिक ऋण ने ही 1991 की तंगी को संकट में बदला था।

अब सारे टुकड़े जुड़ जाते हैं। भुगतान संतुलन में दर्ज प्रवाह विदेशी मुद्रा बाज़ार में मिलते हैं, जहाँ वे विनिमय दर तय करते हैं; भारत उस दर को अस्थिर रहने देता है पर रिज़र्व बैंक तीखे उतार-चढ़ाव के विरुद्ध झुकता है, उस भंडार से जो मज़बूत अंतर्वाह के समय बनाया जाता है। प्रभावी विनिमय दरें, विशेषकर आरईईआर, दिखाती हैं कि रुपये का स्तर प्रतिस्पर्धा में मदद कर रहा है या नुकसान। पूँजी पक्ष पर नीति विदेशी धन को स्थिरता के क्रम में रखती है: एफ़डीआई का स्वागत है और वह अधिकांशतः स्वचालित है, पोर्टफोलियो प्रवाह स्वागत योग्य हैं पर सीमित और निगरानी में हैं, और ऋण, विशेषकर अल्पकालिक ऋण, को कसकर रखा जाता है। 1991 और 2013 के सबक इन सबमें चलते हैं। भारत के बाहर से इन प्रवाहों को आकार देने वाली संस्थाएँ, आईएमएफ़, विश्व बैंक और डब्ल्यूटीओ, अगले अध्याय का विषय हैं।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. बाज़ार-निर्धारित प्रणाली में यदि विनिमय दर ₹84 से ₹87 प्रति अमेरिकी डॉलर हो जाती है, तो रुपये का:

  1. अधिमूल्यन हुआ है
  2. मूल्यह्रास हुआ है
  3. अवमूल्यन किया गया है
  4. पुनर्मूल्यन किया गया है
उत्तर देखें

उत्तर: B. मूल्यह्रास हुआ है

अब एक डॉलर के लिए अधिक रुपये चाहिए, यानी बाज़ार के ज़रिए रुपये का मूल्य घटा है: यह मूल्यह्रास है। 'अधिमूल्यन' उलटी दिशा है, और अवमूल्यन तथा पुनर्मूल्यन स्थिर या बँधी प्रणाली में सरकारी निर्णय हैं, बाज़ार के परिवर्तन नहीं, इसलिए बाकी विकल्प गलत हैं।

Q2. रुपये के मूल्यह्रास के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. यह भारतीय निर्यात को विदेशी खरीदारों के लिए सस्ता करने की प्रवृत्ति रखता है।
2. यह अमेरिकी डॉलर में लिए गए ऋणों को चुकाने की रुपया लागत घटाता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: अब प्रत्येक डॉलर से अधिक रुपयों की भारतीय वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। कथन 2 गलत है: मूल्यह्रास के बाद चुकौती के प्रत्येक डॉलर के लिए अधिक रुपये चाहिए, इसलिए डॉलर ऋण की रुपया लागत बढ़ती है। अतः 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q3. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए (भारत की विनिमय दर नीति का चरण : समय):
1. रुपये को मुद्राओं की टोकरी से जोड़ना : सितंबर 1975
2. उदारीकृत विनिमय दर प्रबंध प्रणाली (दोहरी दर) : मार्च 1992
3. एक बाज़ार-निर्धारित दर में एकीकरण : मार्च 1993
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. तीनों
  4. कोई नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: C. तीनों

तीनों युग्म सही हैं: टोकरी से जुड़ाव सितंबर 1975 में शुरू हुआ, 60:40 दोहरी दर वाली एलईआरएमएस मार्च 1992 में, और दरें मार्च 1993 में एकीकृत हुईं। इसलिए 'केवल एक', 'केवल दो' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q4. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. रुपये की नाममात्र प्रभावी विनिमय दर केवल अमेरिकी डॉलर के मुकाबले गणना की जाती है।
2. वास्तविक प्रभावी विनिमय दर भारत और उसके व्यापारिक साझेदारों के बीच मुद्रास्फीति के अंतर के लिए नाममात्र प्रभावी विनिमय दर को समायोजित करती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: एनईईआर मुद्राओं की टोकरी के मुकाबले व्यापार-भारित औसत है (रिज़र्व बैंक 6 और 40 मुद्राएँ लेता है), केवल डॉलर नहीं। कथन 2 सही है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q5. निम्नलिखित में से कौन-सा भारत के विदेशी मुद्रा भंडार का घटक नहीं है?

  1. विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ
  2. सोना
  3. विशेष आहरण अधिकार
  4. भारतीय बैंकों में अनिवासी भारतीयों की जमाएँ
उत्तर देखें

उत्तर: D. भारतीय बैंकों में अनिवासी भारतीयों की जमाएँ

रिज़र्व बैंक द्वारा रखे भंडार में विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियाँ, सोना, एसडीआर और आईएमएफ़ में आरक्षित किश्त स्थिति आती है, इसलिए पहले तीन विकल्प घटक हैं। अनिवासी भारतीय जमाएँ अनिवासियों के प्रति भारतीय बैंकों की देयताएँ और पूँजी अंतर्वाह हैं, आरक्षित परिसंपत्तियाँ नहीं, इसलिए वही सही उत्तर है।

Q6. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. विदेशी मुद्रा प्रबंध (गैर-ऋण लिखत) नियम, 2019 के अधीन भारत से बाहर के निवासी व्यक्ति द्वारा किसी सूचीबद्ध भारतीय कंपनी की निर्गम-पश्चात चुकता इक्विटी पूँजी का 10 प्रतिशत या अधिक निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश माना जाता है।
2. स्वचालित मार्ग से एफ़डीआई के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक का पूर्व अनुमोदन आवश्यक है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है और मायाराम समिति द्वारा सुझाई गई 10 प्रतिशत की रेखा को दर्शाता है। कथन 2 गलत है: स्वचालित मार्ग में रिज़र्व बैंक या सरकार का पूर्व अनुमोदन नहीं चाहिए; निवेश की केवल बाद में सूचना दी जाती है। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q7. अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र में 'असंभव त्रयी' कहती है कि कोई देश एक साथ नहीं रख सकता:

  1. स्थिर विनिमय दर, पूँजी की मुक्त आवाजाही और स्वतंत्र मौद्रिक नीति
  2. कम मुद्रास्फीति, ऊँची वृद्धि और राजकोषीय अधिशेष
  3. चालू खाता घाटा, पूँजी खाता अधिशेष और बढ़ता भंडार
  4. मुक्त व्यापार, अस्थिर विनिमय दर और स्वतंत्र मौद्रिक नीति
उत्तर देखें

उत्तर: A. स्थिर विनिमय दर, पूँजी की मुक्त आवाजाही और स्वतंत्र मौद्रिक नीति

त्रयी स्थिर विनिमय दर, खुले पूँजी प्रवाह और स्वतंत्र मौद्रिक नीति से संबंधित है: एक साथ केवल दो रखी जा सकती हैं। वृद्धि के साथ कम मुद्रास्फीति और अधिशेष एक नीतिगत लक्ष्य है, त्रयी नहीं; बड़े पूँजी अंतर्वाह और बढ़ते भंडार के साथ चालू खाता घाटा भारत का सामान्य स्वरूप है और पूरी तरह संभव है; और अस्थिर दर ही स्वतंत्र मौद्रिक नीति संभव बनाती है, इसलिए बाकी विकल्प गलत हैं।

Q8. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए (अनिवासी भारतीयों की जमा योजना : विशेषता):
1. एनआरई खाता : रुपये में और पूर्णतः प्रत्यावर्तनीय
2. एफ़सीएनआर(बी) खाता : विदेशी मुद्रा में
3. एनआरओ खाता : बिना किसी सीमा के मुक्त रूप से प्रत्यावर्तनीय
उपर्युक्त युग्मों में से कितने सही सुमेलित हैं?

  1. केवल एक
  2. केवल दो
  3. तीनों
  4. कोई नहीं
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल दो

युग्म 1 और 2 सही हैं। युग्म 3 गलत है: एनआरओ खातों में भारत में अर्जित आय रहती है और उसे केवल एक वार्षिक सीमा तक प्रत्यावर्तित किया जा सकता है। इसलिए 'केवल एक', 'तीनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

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