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अनुच्छेद 368, बहुमत, मूल ढांचा और मुख्य संशोधन

संविधान का संशोधन और मूल ढांचा · भाग 1 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

संविधान कैसे और कितना बदला जा सकता है: अनुच्छेद 368 और उसकी प्रक्रिया, संशोधन के तीन मार्ग और वे उपबंध जिनके लिए राज्यों का अनुसमर्थन चाहिए, बहुमत के प्रकार, शंकरी प्रसाद से मिनर्वा मिल्स तक का संघर्ष जिससे मूल ढांचे का सिद्धांत निकला, और सबसे अधिक पूछे जाने वाले संशोधन।

लिखित संविधान को देश के साथ बदल सकना चाहिए, पर इतनी आसानी से नहीं कि कोई अस्थायी बहुमत मूल विधि को दोबारा लिख दे। भाग 20 का एकमात्र अनुच्छेद 368 यह संतुलन बनाता है: यह संसद को संविधान का संशोधन करने की शक्ति देता है और प्रक्रिया तय करता है। यह भाग समझाता है कि कोई संशोधन विधेयक कैसे पारित होता है, कठिनाई के तीन स्तर कौन-से हैं और संविधान किन प्रकार के बहुमत का प्रयोग करता है; फिर मूल अधिकार को घटाने के प्रश्न पर संसद और न्यायालयों का संघर्ष, जिससे मूल ढांचा का सिद्धांत निकला; और अंत में वे संशोधन जिन पर प्रारंभिक परीक्षा सबसे अधिक पूछती है।

अनुच्छेद 368(1) कहता है: 'इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद अपनी संविधायी शक्ति का प्रयोग करते हुए इस संविधान के किसी उपबंध का परिवर्धन, परिवर्तन या निरसन के रूप में संशोधन इस अनुच्छेद में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार कर सकेगी।' 'संविधायी शक्ति' शब्द 24वें संशोधन (1971) से आए। ये बताते हैं कि संविधान का संशोधन करते समय संसद सामान्य विधि-निर्माता की तरह नहीं, बल्कि स्वयं मूल विधि को नया रूप देने वाले निकाय की तरह काम करती है। इसी संशोधन ने अनुच्छेद 13(4) जोड़ा, ताकि कोई संविधान संशोधन ऐसी 'विधि' न माना जाए जो केवल इस कारण शून्य हो जाए कि वह किसी मूल अधिकार को कम करता है। यह शक्ति केवल संसद के पास है। कोई राज्य विधान-मंडल संशोधन की शुरुआत नहीं कर सकता, और भारत में कुछ देशों जैसा कोई अलग संविधान-निकाय या जनमत-संग्रह नहीं है। मान लीजिए कोई राज्य सातवीं अनुसूची की सूचियों के बीच कोई विषय बदलवाना चाहता है: वह संघ पर दबाव डाल सकता है, पर बदलाव केवल संसद में विधेयक से ही हो सकता है।

संशोधन संसद के किसी भी सदन में विधेयक के रूप में शुरू होता है। कोई मंत्री या कोई गैर-सरकारी सदस्य इसे पुरःस्थापित कर सकता है, और राष्ट्रपति की पूर्व सिफारिश आवश्यक नहीं है। प्रत्येक सदन को इसे अलग-अलग विशेष बहुमत से पारित करना होता है: उस सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और साथ ही उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत। चूँकि हर सदन की सहमति अलग से चाहिए, संशोधन विधेयक कभी संयुक्त बैठक में नहीं जा सकता; यदि लोक सभा द्वारा पारित विधेयक को राज्य सभा अस्वीकार कर दे, तो विधेयक समाप्त हो जाता है। दोनों सदनों से पारित होने के बाद विधेयक राष्ट्रपति के पास जाता है, जो 'अपनी अनुमति देगा'। ये शब्द 24वें संशोधन से बाध्यकारी बने, इसलिए राष्ट्रपति न अनुमति रोक सकता है, न विधेयक को पुनर्विचार के लिए लौटा सकता है। अनुमति मिलते ही संविधान विधेयक के अनुसार संशोधित हो जाता है।

हर उपबंध को बदलना समान रूप से कठिन नहीं है; तीन मार्ग हैं। पहले मार्ग पर संसद कुछ उपबंधों को साधारण बहुमत से पारित सामान्य विधि द्वारा बदलती है, और संबंधित अनुच्छेद स्वयं कहते हैं कि ऐसी विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संशोधन नहीं है। उदाहरण हैं: नए राज्यों का निर्माण और राज्यों की सीमाओं या नामों में परिवर्तन (अनुच्छेद 2 से 4), किसी राज्य की विधान परिषद् का सृजन या उत्सादन (अनुच्छेद 169), पाँचवीं और छठी अनुसूचियाँ, और वे विषय जो 'जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे' संसद पर छोड़े गए हैं, जैसे सदन की गणपूर्ति (अनुच्छेद 100(3)) और सदस्यों के वेतन (अनुच्छेद 106)। दूसरे मार्ग पर, जिसमें संविधान का अधिकांश भाग आता है, मूल अधिकार और राज्य की नीति के निदेशक तत्व भी, अनुच्छेद 368 का विशेष बहुमत पर्याप्त है। तीसरे मार्ग पर, संघीय संतुलन तय करने वाले उपबंधों के लिए विशेष बहुमत के साथ कम से कम आधे राज्यों के विधान-मंडलों का अनुसमर्थन आवश्यक है।

जिन उपबंधों के लिए अनुसमर्थन आवश्यक है, वे अनुच्छेद 368(2) के परंतुक में गिनाए गए हैं। वे हैं: राष्ट्रपति का निर्वाचन (अनुच्छेद 54 और 55); संघ और राज्यों की कार्यपालिका शक्ति का विस्तार (अनुच्छेद 73 और 162); उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय, जिनमें संघ राज्यक्षेत्रों के उच्च न्यायालय भी हैं (अनुच्छेद 241); जीएसटी परिषद् (अनुच्छेद 279क, 101वें संशोधन, 2016 द्वारा जोड़ा गया); विधायी शक्तियों का वितरण (भाग 11 का अध्याय 1) और सातवीं अनुसूची की कोई भी सूची; संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व (चौथी अनुसूची); और स्वयं अनुच्छेद 368। इसका कारण संघवाद है: ये उपबंध संघ में राज्यों का स्थान तय करते हैं, इसलिए संघ को इन्हें अकेले दोबारा लिखने में सक्षम नहीं होना चाहिए। राज्य अपने विधान-मंडलों के संकल्पों से अनुसमर्थन करते हैं, और संविधान कोई समय-सीमा तय नहीं करता। इसी कारण 101वाँ संशोधन, जिसने जीएसटी बनाया और सातवीं अनुसूची बदली, राष्ट्रपति तक पहुँचने से पहले राज्यों के पास भेजा गया।

अनुच्छेद 368 का विशेष बहुमत संविधान के अनेक बहुमतों में से केवल एक है। साधारण बहुमत का अर्थ है उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के आधे से अधिक; इससे सामान्य विधेयक और धन विधेयक पारित होते हैं और अविश्वास प्रस्ताव का निर्णय होता है। पूर्ण बहुमत का अर्थ है सदन की कुल सदस्य संख्या के आधे से अधिक। प्रभावी बहुमत केवल भरी हुई सीटों को गिनता है, अर्थात रिक्तियों को छोड़कर उस समय के सदस्यों के आधे से अधिक; राज्य सभा के संकल्प द्वारा उपराष्ट्रपति को हटाने (अनुच्छेद 67(ख)) और अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाने (अनुच्छेद 94(ग)) के लिए यह आवश्यक है। विशेष बहुमत के तीन रूप हैं। अनुच्छेद 368 वाला रूप पूर्ण बहुमत को उपस्थित और मत देने वालों के दो-तिहाई से जोड़ता है; इसी रूप से उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश को हटाया जाता है और राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा का अनुमोदन होता है। केवल उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाई अनुच्छेद 249 या अनुच्छेद 312 के अधीन राज्य सभा के संकल्प के लिए चाहिए। अनुच्छेद 61 के अधीन राष्ट्रपति पर महाभियोग के लिए कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई चाहिए।

संविधान में बहुमत के प्रकार
प्रकारअर्थकिसके लिए (उदाहरण)
साधारणउपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के आधे से अधिकसामान्य और धन विधेयक; अविश्वास प्रस्ताव
पूर्णकुल सदस्य संख्या के आधे से अधिकअनुच्छेद 368 के विशेष बहुमत में उपस्थित और मत देने वालों के दो-तिहाई के साथ
प्रभावीउस समय के सदस्यों के आधे से अधिक (रिक्तियाँ छोड़कर)उपराष्ट्रपति को हटाना (अनु. 67(ख)); अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को हटाना (अनु. 94(ग))
विशेष: पूर्ण + उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाईप्रत्येक सदन में दोनों शर्तेंसंविधान संशोधन (अनु. 368); न्यायाधीश को हटाना (अनु. 124(4)); राष्ट्रीय आपात का अनुमोदन (अनु. 352(6))
विशेष: उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाईउपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाईअनु. 249 और अनु. 312 के अधीन राज्य सभा के संकल्प
विशेष: कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाईसदन के सभी सदस्यों का दो-तिहाईराष्ट्रपति पर महाभियोग (अनु. 61)

1950 के बाद दो दशकों तक मुख्य प्रश्न यह था कि क्या संसद अनुच्छेद 368 का प्रयोग मूल अधिकारों को घटाने के लिए कर सकती है, क्योंकि अनुच्छेद 13(2) राज्य को ऐसी कोई 'विधि' बनाने से रोकता है जो उन्हें छीनती या न्यून करती हो। शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ (1951) में, और फिर सज्जन सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1965) में, उच्चतम न्यायालय ने कहा कि संविधान संशोधन अनुच्छेद 13 के अर्थ में 'विधि' नहीं है, इसलिए मूल अधिकार का भी संशोधन हो सकता है; पहले और सत्रहवें संशोधन को वैध ठहराया गया। आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य (1967) में ग्यारह न्यायाधीशों की पीठ ने यह मत पलट दिया और कहा कि संसद को किसी मूल अधिकार को छीनने या न्यून करने की शक्ति नहीं है। संसद ने 1971 में 24वें संशोधन से उत्तर दिया, जिसने किसी भी उपबंध के संशोधन की उसकी शक्ति की पुष्टि की, और 25वें संशोधन से, जिसने अनुच्छेद 39(ख) और (ग) के निदेशक तत्वों को प्रभावी करने वाली विधियों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 31ग जोड़ा। इस तरह न्यायालय की अब तक की सबसे बड़ी पीठ के लिए मंच तैयार हुआ।

केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य में, जिसका निर्णय 24 अप्रैल 1973 को तेरह न्यायाधीशों ने सात के मुकाबले छह के बहुमत से दिया, न्यायालय ने 24वें संशोधन को वैध ठहराया और गोलकनाथ को उलट दिया: संसद संविधान के किसी भी भाग का, मूल अधिकारों सहित, संशोधन कर सकती है। फिर भी न्यायालय ने एक ऐसी सीमा पढ़ी जो अनुच्छेद 368 के शब्दों में कहीं नहीं है। बहुमत का तर्क था कि संविधान को बदलना उसकी पहचान को बदल देने से अलग है, इसलिए अनुच्छेद 368 का प्रयोग मूल ढांचा को, अर्थात उन केंद्रीय लक्षणों को जो संविधान को वह बनाते हैं जो वह है, मिटाने के लिए नहीं किया जा सकता। न्यायालय ने अनुच्छेद 31ग के पहले भाग को वैध माना, पर उसके दूसरे भाग को अमान्य कर दिया, जो न्यायालयों को यह पूछने से रोकना चाहता था कि कोई विधि वास्तव में निदेशक तत्वों को प्रभावी करती है या नहीं। संसद ने 42वें संशोधन (1976) से यह सीमा हटाने का प्रयास किया, जिसने अनुच्छेद 368 में खंड (4) और (5) जोड़े: किसी संशोधन को किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जा सकेगा, और संशोधन की शक्ति असीमित होगी। मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) में न्यायालय ने दोनों खंड अमान्य कर दिए और कहा कि सीमित संशोधन शक्ति और न्यायिक पुनर्विलोकन स्वयं मूल लक्षण हैं।

न्यायालय ने मूल लक्षणों की कोई पूरी सूची कभी जारी नहीं की; वह उन्हें एक-एक मामले में पहचानता है। उसके निर्णयों में नामित लक्षणों में ये हैं: संविधान की सर्वोच्चता, सरकार का गणतंत्रात्मक और लोकतंत्रात्मक रूप, पंथनिरपेक्षता, संघीय स्वरूप, शक्तियों का पृथक्करण, न्यायिक पुनर्विलोकन, स्वतंत्र और निष्पक्ष निर्वाचन, विधि का शासन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, सीमित संशोधन शक्ति और मूल अधिकारों तथा निदेशक तत्वों के बीच सामंजस्य। यह सिद्धांत मुख्यतः संशोधनों की कसौटी है, और यह विशेष अनुच्छेदों की नहीं, सिद्धांतों की रक्षा करता है। मान लीजिए कोई संशोधन मतदान की आयु या किसी सदन की सीटों की संख्या बदलता है: कोई मूल लक्षण क्षतिग्रस्त नहीं होता, इसलिए वह टिकता है। मान लीजिए इसके बजाय वह प्रधानमंत्री के निर्वाचन को हर न्यायालय की पहुँच से बाहर कर देता है: यही अनुच्छेद 329क(4) था, जिसे इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में अमान्य किया गया। नौवीं अनुसूची में रखी गई विधियों के लिए वामन राव बनाम भारत संघ (1981) ने 24 अप्रैल 1973 को विभाजन रेखा बनाया, इसलिए बाद में जोड़ी गई विधियाँ मूल ढांचे की कसौटी पर परखी जा सकती हैं।

संशोधनों का एक छोटा समूह परीक्षा का अधिकांश भार उठाता है; नीचे की तालिका उन्हें सूचीबद्ध करती है। दो पर अधिक ध्यान देना चाहिए। आपात के दौरान पारित 1976 के 42वें संशोधन ने इतना कुछ बदला कि उसे प्रायः 'लघु संविधान' कहा जाता है। इसने उद्देशिका में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष' और 'अखंडता' जोड़े, भाग 4क के रूप में मूल कर्तव्य अंतःस्थापित किए, और शिक्षा तथा वन सहित पाँच विषय राज्य सूची से समवर्ती सूची में ले गया। उसके बाद आई सरकार द्वारा पारित 1978 के 44वें संशोधन ने इसका बहुत कुछ उलट दिया। इसने संपत्ति के अधिकार को भाग 3 से निकालकर अनुच्छेद 300क के अधीन विधिक अधिकार बनाया, राष्ट्रीय आपात के आधार के रूप में 'आंतरिक अशांति' की जगह 'सशस्त्र विद्रोह' रखा, और उपबंध किया कि आपात के दौरान अनुच्छेद 20 और 21 निलंबित नहीं किए जा सकते।

सबसे अधिक पूछे जाने वाले संशोधन
संशोधनवर्षमुख्य परिवर्तन
पहला1951नौवीं अनुसूची और अनुच्छेद 31क, 31ख; अनुच्छेद 15(4); अनुच्छेद 19(2) में निर्बंधन के नए आधार
सातवाँ1956राज्यों का पुनर्गठन; भाग क, ख, ग और घ राज्यों की जगह राज्य और संघ राज्यक्षेत्र
24वाँ1971मूल अधिकारों सहित किसी भी उपबंध के संशोधन की शक्ति; राष्ट्रपति की अनुमति अनिवार्य
42वाँ1976उद्देशिका में 'समाजवादी', 'पंथनिरपेक्ष', 'अखंडता'; मूल कर्तव्य; अनुच्छेद 368(4), (5)
44वाँ1978संपत्ति का अधिकार अनुच्छेद 300क में; 'आंतरिक अशांति' की जगह 'सशस्त्र विद्रोह'
52वाँ1985दसवीं अनुसूची (दल-बदल विरोधी)
61वाँ1988मतदान की आयु 21 से घटाकर 18
73वाँ और 74वाँ1992पंचायतें (भाग 9) और नगरपालिकाएँ (भाग 9क)
86वाँ2002शिक्षा का अधिकार (अनुच्छेद 21क); ग्यारहवाँ मूल कर्तव्य
101वाँ2016माल और सेवा कर; जीएसटी परिषद् (अनुच्छेद 279क)
103वाँ2019आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए अधिकतम 10% आरक्षण (अनुच्छेद 15(6), 16(6))
106वाँ2023लोक सभा, राज्य विधान सभाओं और दिल्ली विधान सभा में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित

भारतीय पद्धति बहुत कठोर अमेरिकी प्रक्रिया और ब्रिटिश व्यवहार के बीच है, जहाँ संसद सामान्य विधि से संवैधानिक नियम बदलती है। इसी संतुलन के कारण संविधान का सौ से अधिक बार संशोधन होने पर भी उसका मूल भाग पहचानने योग्य रूप से वही बना रहा। आलोचक कमियाँ गिनाते हैं: कोई विशेष संविधान-निकाय या जनमत-संग्रह नहीं, राज्यों को संशोधन शुरू करने की शक्ति नहीं और केवल सूचीबद्ध विषयों पर उनकी राय, अनुसमर्थन की कोई समय-सीमा नहीं, और दोनों सदनों के बीच गतिरोध से निकलने का कोई उपाय नहीं। मूल ढांचा का सिद्धांत दूसरी ओर से इस कमी का कुछ भाग भरता है: अनुच्छेद 368 तय करता है कि संविधान कैसे बदला जा सकता है, और मूल ढांचा तय करता है कि कितना।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन विधेयक को संसद के प्रत्येक सदन में किस बहुमत से पारित होना चाहिए?

  1. उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का बहुमत
  2. सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत
  3. सदन की कुल सदस्य संख्या का कम से कम दो-तिहाई बहुमत
  4. उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का तीन-चौथाई
उत्तर देखें

उत्तर: B. सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का कम से कम दो-तिहाई बहुमत

अनुच्छेद 368(2) प्रत्येक सदन में पूर्ण बहुमत और उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाई, दोनों माँगता है। उपस्थित और मत देने वालों का केवल बहुमत सामान्य विधेयकों का साधारण बहुमत है; कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई राष्ट्रपति पर महाभियोग (अनुच्छेद 61) का सूत्र है; तीन-चौथाई बहुमत अनुच्छेद 368 में कहीं नहीं है।

Q2. भारत के संविधान के संशोधन के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. संविधान संशोधन विधेयक किसी राज्य की विधान सभा में पुरःस्थापित किया जा सकता है।
2. संविधान संशोधन विधेयक पर संसद के दोनों सदनों के बीच गतिरोध संयुक्त बैठक में सुलझाया जा सकता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: D. न तो 1, न ही 2

दोनों कथन गलत हैं। संशोधन की शुरुआत केवल संसद के किसी सदन में विधेयक से हो सकती है, राज्य विधान-मंडल में कभी नहीं, इसलिए 'केवल 1' और 'दोनों' गलत हैं। प्रत्येक सदन को विधेयक अलग से विशेष बहुमत से पारित करना होता है और अनुच्छेद 108 की संयुक्त बैठक लागू नहीं होती, इसलिए 'केवल 2' भी गलत है।

Q3. निम्नलिखित में से किस उपबंध के संशोधन के लिए संसद में विशेष बहुमत के अतिरिक्त कम से कम आधे राज्यों के विधान-मंडलों का अनुसमर्थन आवश्यक है?
1. राष्ट्रपति का निर्वाचन
2. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व
3. भाग 3 के मूल अधिकार
4. जीएसटी परिषद् (अनुच्छेद 279क)
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. केवल 1, 2 और 3
  2. केवल 1, 2 और 4
  3. केवल 2, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1, 2 और 4

अनुच्छेद 368(2) का परंतुक राष्ट्रपति के निर्वाचन (अनुच्छेद 54, 55), संसद में राज्यों के प्रतिनिधित्व और अनुच्छेद 279क को गिनाता है। मूल अधिकारों का संशोधन केवल विशेष बहुमत से होता है, इसलिए मद 3 वाला हर विकल्प ('1, 2 और 3', '2, 3 और 4' और 'चारों') गलत है।

Q4. निम्नलिखित में से कौन-सा कार्य संसद साधारण बहुमत से कर सकती है, और जिसे अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए संविधान का संशोधन नहीं माना जाता?

  1. किसी राज्य की विधान परिषद् का उत्सादन
  2. किसी विषय का राज्य सूची से समवर्ती सूची में अंतरण
  3. अनुच्छेद 21क के शिक्षा के अधिकार में परिवर्तन
  4. राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति में परिवर्तन
उत्तर देखें

उत्तर: A. किसी राज्य की विधान परिषद् का उत्सादन

अनुच्छेद 169(3) कहता है कि विधान परिषद् का उत्सादन या सृजन करने वाली विधि अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन नहीं है। सातवीं अनुसूची की सूचियों के बीच विषय बदलने और राष्ट्रपति के निर्वाचन में परिवर्तन के लिए विशेष बहुमत और आधे राज्यों का अनुसमर्थन चाहिए; मूल अधिकार अनुच्छेद 21क में परिवर्तन के लिए विशेष बहुमत चाहिए।

Q5. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (बहुमत)
A. प्रभावी बहुमत
B. सदन की कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई
C. उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों का दो-तिहाई
D. कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाई
सूची II (किसके लिए)
1. राष्ट्रपति पर महाभियोग
2. राज्य सभा द्वारा उपराष्ट्रपति को हटाना
3. अनुच्छेद 249 के अधीन राज्य सभा का संकल्प
4. उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाना
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. A-2, B-1, C-3, D-4
  2. A-1, B-2, C-4, D-3
  3. A-2, B-4, C-3, D-1
  4. A-3, B-1, C-2, D-4
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-2, B-1, C-3, D-4

अनुच्छेद 67(ख) उपराष्ट्रपति के लिए उस समय के सभी सदस्यों का बहुमत (प्रभावी) लेता है; अनुच्छेद 61 को कुल सदस्य संख्या का दो-तिहाई चाहिए; अनुच्छेद 249 को उपस्थित और मत देने वालों का दो-तिहाई; अनुच्छेद 124(4) अनुच्छेद 368 जैसा विशेष बहुमत लेता है। दूसरा विकल्प A और B तथा C और D को उलट देता है; तीसरा B और D के उपयोग आपस में बदल देता है; चौथा A और C को बदल देता है।

Q6. उच्चतम न्यायालय के निम्नलिखित निर्णयों को कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. आई.सी. गोलकनाथ बनाम पंजाब राज्य
2. मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ
3. शंकरी प्रसाद बनाम भारत संघ
4. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. 3-1-4-2
  2. 1-3-4-2
  3. 3-4-1-2
  4. 1-4-3-2
उत्तर देखें

उत्तर: A. 3-1-4-2

शंकरी प्रसाद का निर्णय 1951 में, गोलकनाथ का 1967 में, केशवानंद का 1973 में और मिनर्वा मिल्स का 1980 में हुआ। '1-3-4-2' और '1-4-3-2' गोलकनाथ को शंकरी प्रसाद से पहले रखते हैं, जो गलत है; '3-4-1-2' केशवानंद को गोलकनाथ से पहले रखता है, जबकि केशवानंद ने गोलकनाथ को उलटा था।

Q7. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका निर्णय तेरह न्यायाधीशों की पीठ ने किया।
2. इसने कहा कि संसद किसी भी मूल अधिकार का संशोधन नहीं कर सकती।
3. इसने 24वें संशोधन की वैधता को बनाए रखा।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 1 और 3
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 1 और 3

कथन 1 और 3 सही हैं। कथन 2 गोलकनाथ (1967) का वर्णन है, जिसे केशवानंद ने उलट दिया: संसद मूल अधिकारों का संशोधन कर सकती है, बशर्ते मूल ढांचा बचा रहे। 'केवल 1' कथन 3 को छोड़ देता है, और कथन 2 वाले विकल्प गलत हैं।

Q8. निम्नलिखित में से कौन-सा परिवर्तन संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 द्वारा नहीं किया गया?

  1. उद्देशिका में 'पंथनिरपेक्ष' शब्द जोड़ना
  2. भाग 4क के रूप में मूल कर्तव्य अंतःस्थापित करना
  3. अनुच्छेद 368 में खंड (4) और (5) जोड़ना
  4. संपत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 300क के अधीन विधिक अधिकार बनाना
उत्तर देखें

उत्तर: D. संपत्ति के अधिकार को अनुच्छेद 300क के अधीन विधिक अधिकार बनाना

अनुच्छेद 300क और संपत्ति को भाग 3 से हटाना 44वें संशोधन (1978) से हुआ। 42वें संशोधन ने उद्देशिका में 'पंथनिरपेक्ष' ('समाजवादी' और 'अखंडता' के साथ) जोड़ा, भाग 4क अंतःस्थापित किया, और अनुच्छेद 368(4) और (5) जोड़े, जिन्हें बाद में मिनर्वा मिल्स में अमान्य किया गया, इसलिए पहले तीन विकल्प उसी के किए परिवर्तन हैं।

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