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यूरोपीय कंपनियाँ और बंगाल की विजय (1498–1772)

भारत में ब्रिटिश विस्तार · भाग 1 / 3 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

पुर्तगाली, डच, अंग्रेज़, डेनिश और फ़्रांसीसी कंपनियाँ भारत कैसे आईं; अंग्रेज़ी बस्तियाँ और 1717 का फ़रमान; तीनों कर्नाटक युद्ध और अंग्रेज़ों ने फ़्रांसीसियों को क्यों हराया; प्लासी (1757), मीर क़ासिम और बक्सर (1764); इलाहाबाद की संधियाँ और दीवानी (1765); द्वैध शासन (1765–72); और कंपनी सफल क्यों हुई।

1750 में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी भारतीय तट पर कुछ किलेबंद गोदाम रखने वाली कई यूरोपीय व्यापारिक कंपनियों में से एक थी। सौ वर्ष बाद वह लगभग पूरे उपमहाद्वीप पर, सीधे या संधि से बँधे राजाओं के माध्यम से, शासन कर रही थी। यह अध्याय इस परिवर्तन को तीन भागों में देखता है: कंपनी ने बंगाल कैसे जीता (यह भाग), उसने मैसूर और मराठों को कैसे पराजित किया (भाग 2), और किन नीतियों से उसने बचे हुए अधिकांश भाग को अपने में मिलाया (भाग 3)। बंगाल पहले आता है क्योंकि वही निर्णायक मोड़ था। भारत के सबसे समृद्ध प्रांत के भू-राजस्व पर नियंत्रण मिलते ही कंपनी माल खरीदने के लिए यूरोप से चाँदी लाने के बजाय भारतीय धन से बड़ी सेनाओं का खर्च उठा सकती थी। तीन चरण याद रखें: प्लासी (1757) ने कंपनी को अपनी पसंद का शासक दिया, बक्सर (1764) ने बंगाल, अवध और मुग़ल बादशाह की संयुक्त सेनाओं को तोड़ा, और दीवानी का अनुदान (1765) ने उसे राजस्व वसूलने का वैधानिक अधिकार दिया।

सबसे पहले पुर्तगाली आए। वास्को द गामा 1498 में केप ऑफ़ गुड होप का चक्कर लगाकर कालीकट पहुँचा, और 1510 में अफ़ोंसो द अल्बुकर्क ने बीजापुर सल्तनत से गोवा छीनकर उसे एक समुद्री साम्राज्य का केंद्र बनाया, जिसने किलों और जहाज़ों के लिए सशस्त्र परमिटों से मसाला व्यापार पर नियंत्रण का प्रयास किया। डच ईस्ट इंडिया कंपनी (वी.ओ.सी.) 1602 में बनी; उसकी मुख्य रुचि आज के इंडोनेशिया के मसाला द्वीपों में थी, पर उसने भारत में मसूलीपट्टनम, पुलीकट और चिनसुरा जैसे स्थानों पर कारखाने स्थापित किए। अंग्रेज़ी कंपनी को 31 दिसंबर 1600 को महारानी एलिज़ाबेथ प्रथम से चार्टर मिला था, जिसने उसे केप के पूर्व में अंग्रेज़ी व्यापार का एकाधिकार दिया। 1616 में एक डेनिश कंपनी आई, जिसकी बस्तियाँ त्रांकेबार और सेरामपुर थीं, और फ़्रांसीसी कंपनी (कोम्पान्यी दे ज़ांद ओरिएंताल) 1664 में बनी, जिसने 1674 में पांडिचेरी बसाया। बंगाल में डच ख़तरा तब समाप्त हुआ जब 1759 में बेदरा में अंग्रेज़ों ने उन्हें हराया। 1740 के दशक से असली प्रतिस्पर्धा अंग्रेज़ों और फ़्रांसीसियों के बीच थी।

अंग्रेज़ों ने पश्चिमी तट पर सूरत से शुरुआत की, जहाँ 1612 में स्वाली के पास एक अंग्रेज़ी बेड़े द्वारा पुर्तगालियों को हराने के बाद 1613 के एक मुग़ल फ़रमान ने उन्हें व्यापार की अनुमति दी; फिर सर टॉमस रो ने 1615–19 तक जहाँगीर के दरबार में रहकर व्यापक विशेषाधिकार माँगे। पूर्वी तट पर कंपनी ने 1639 में मद्रास का स्थान प्राप्त किया और वहाँ फ़ोर्ट सेंट जॉर्ज बनाया। बंबई 1661 में अंग्रेज़ी राजमुकुट को दहेज के भाग के रूप में मिला, जब चार्ल्स द्वितीय ने पुर्तगाली राजकुमारी कैथरीन ऑफ़ ब्रगांज़ा से विवाह किया, और राजमुकुट ने 1668 में इसे कंपनी को सौंप दिया। बंगाल में जॉब चारनॉक ने 1690 में हुगली के किनारे एक बस्ती बसाई, और 1698 में कंपनी ने तीन गाँवों, सुतानुटी, कालिकाता और गोविंदपुर, के ज़मींदारी अधिकार खरीदे, जो फ़ोर्ट विलियम के चारों ओर कलकत्ता बन गए। सबसे बड़ा लाभ 1717 में मिला, जब बादशाह फ़र्रुख़सियर ने एक फ़रमान जारी कर कंपनी को 3,000 रुपये के निश्चित वार्षिक भुगतान पर बंगाल में सीमा-शुल्क के बिना व्यापार करने और अपने माल के लिए अपने परमिट, दस्तक, जारी करने की अनुमति दी।

आंग्ल-फ़्रांसीसी प्रतिद्वंद्विता कर्नाटक, अर्थात दक्षिण-पूर्वी भारत के तटीय क्षेत्र, में दो कारणों से खुले युद्ध में बदली: ब्रिटेन और फ़्रांस यूरोप में युद्धरत थे, और हैदराबाद (1748) तथा कर्नाटक में शासकों की मृत्यु से उत्तराधिकार के विवाद छिड़े जिनका लाभ दोनों कंपनियाँ उठा सकती थीं। प्रथम कर्नाटक युद्ध (1746–48) में पांडिचेरी के गवर्नर डूप्ले के नेतृत्व में फ़्रांसीसियों ने मद्रास जीत लिया, और अडयार के युद्ध (1746) में एक छोटी फ़्रांसीसी सेना ने कर्नाटक के नवाब अनवरुद्दीन की कहीं बड़ी सेना को खदेड़ दिया। यूरोप का युद्ध एक्स-ला-शैपल की संधि (1748) से समाप्त हुआ, जिसने मद्रास अंग्रेज़ों को लौटा दिया। द्वितीय युद्ध (1749–54) में दोनों कंपनियों ने प्रतिद्वंद्वी दावेदारों का समर्थन किया; 1751 में रॉबर्ट क्लाइव द्वारा अर्काट पर क़ब्ज़े ने पासा पलट दिया, और 1754 में फ़्रांसीसियों ने डूप्ले को वापस बुला लिया। तृतीय युद्ध (1756–63) सप्तवर्षीय युद्ध का भारतीय पक्ष था: सर आयर कूट ने 22 जनवरी 1760 को वांडीवाश में काउंट लाली को हराया, और 1761 में पांडिचेरी ने आत्मसमर्पण कर दिया।

तीनों कर्नाटक युद्ध एक नज़र में
युद्धवर्षयूरोप से संबंधमुख्य घटनाएँसमाप्ति
प्रथम1746–48ऑस्ट्रियाई उत्तराधिकार युद्धडूप्ले ने मद्रास जीता; अडयार का युद्ध (1746)एक्स-ला-शैपल की संधि (1748): मद्रास लौटाया गया
द्वितीय1749–54कोई नहीं (भारतीय उत्तराधिकार युद्ध)हैदराबाद और कर्नाटक में प्रतिद्वंद्वी दावेदार; क्लाइव ने अर्काट लिया (1751)डूप्ले वापस बुलाया गया (1754); युद्धविराम
तृतीय1756–63सप्तवर्षीय युद्धवांडीवाश (1760): आयर कूट ने लाली को हराया; पांडिचेरी का पतन (1761)पेरिस की संधि (1763): फ़्रांसीसी ठिकाने व्यापारिक केंद्रों के रूप में लौटाए गए

कर्नाटक युद्धों का महत्त्व हाथ बदलने वाले क्षेत्र से कम और उनसे मिली सीखों से अधिक था। डूप्ले ने दिखाया कि यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित कुछ सौ सैनिक, एक साथ दागी जाने वाली बंदूकों और तेज़ी से चलने वाली तोपों के साथ, अपने से कई गुना बड़ी भारतीय सेनाओं को हरा सकते हैं, और यह कि जो भारतीय शासक किसी कंपनी की सेना की बदौलत गद्दी पर बैठा हो, उससे उस सेना का खर्च और भूमि तथा राजस्व वसूले जा सकते हैं। अंग्रेज़ों ने दोनों तरीक़े अपनाए: उन्होंने यूरोपीय ढंग से प्रशिक्षित और यूरोपीय अफ़सरों वाली भारतीय सैनिकों की सिपाही बटालियनें खड़ी कीं, और धन तथा क्षेत्र के बदले मित्र दावेदारों को गद्दी पर बैठाना शुरू किया। इन युद्धों ने यह भी दिखाया कि प्रतिस्पर्धा अंग्रेज़ों ने ही क्यों जीती। उनकी नौसेना अधिक शक्तिशाली थी और वे समुद्र से सैनिक तथा धन ला सकते थे, जबकि फ़्रांसीसी नहीं ला सकते थे; फ़्रांसीसी कंपनी अपनी सरकार पर निर्भर थी, जबकि अंग्रेज़ी कंपनी के अपने वित्तीय साधन थे; और 1757 के बाद अंग्रेज़ों के पास बंगाल का धन था, जबकि फ़्रांसीसियों के पास ऐसा कोई आधार नहीं था। अंततः 1763 की शांति ने पांडिचेरी और अन्य फ़्रांसीसी ठिकाने व्यापारिक केंद्रों के रूप में लौटा दिए, पर फ़्रांस फिर कभी भारत में अंग्रेज़ी शक्ति के लिए ख़तरा नहीं बना।

मुर्शिद क़ुली ख़ाँ और अलीवर्दी ख़ाँ के समय बंगाल दिल्ली से लगभग स्वतंत्र हो चुका था, और 1756 में जब सिराजुद्दौला अपने नाना का उत्तराधिकारी बना, तो उसके सामने एक ऐसी कंपनी थी जो अपने कर्मचारियों के निजी व्यापार के लिए दस्तक का दुरुपयोग करती थी, उसकी अनुमति के बिना कलकत्ता की किलेबंदी करती थी और उसके दरबार से ख़ज़ाना लेकर भागे एक व्यक्ति को शरण देती थी। उसने जून 1756 में क़ासिमबाज़ार और कलकत्ता ले लिए। क्लाइव और एडमिरल वॉटसन मद्रास से आए, जनवरी 1757 में कलकत्ता वापस लिया और अलीनगर की संधि (फ़रवरी 1757) करवाई, जिसने कंपनी के विशेषाधिकार बहाल किए। फिर क्लाइव ने नवाब के सेनापति मीर जाफ़र, साहूकार जगत सेठ, राय दुर्लभ और बिचौलिए अमीचंद के साथ षड्यंत्र रचा। 23 जून 1757 को प्लासी में नवाब की अधिकांश सेना अलग खड़ी रही; केवल मीर मदान और मोहनलाल जैसे कुछ सेनानायक लड़े। सिराज भागा और मारा गया, मीर जाफ़र नवाब बना, और कंपनी को 24 परगना की ज़मींदारी तथा बड़ी रक़में मिलीं। प्लासी लड़ाई से अधिक षड्यंत्र से जीता गया।

मीर जाफ़र को जल्द ही पता चला कि वह कंपनी की धन की माँगें पूरी नहीं कर सकता, और 1760 में कंपनी ने उसकी जगह उसके दामाद मीर क़ासिम को बैठाया, जिसने बदले में उसे बर्दवान, मिदनापुर और चटगाँव के ज़िले दिए। मीर क़ासिम योग्य शासक सिद्ध हुआ। उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से हटाकर कलकत्ता से दूर मुंगेर में बनाई, अपने वित्त को व्यवस्थित किया और एक आधुनिक सेना प्रशिक्षित की। झगड़ा व्यापार को लेकर हुआ। कंपनी के कर्मचारी अपने निजी व्यापार के लिए दस्तक का उपयोग करते रहे और उन्हें दूसरों को बेचते भी थे, जिससे नवाब का राजस्व घटा और शुल्क देने वाले भारतीय व्यापारी प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाते थे। मीर क़ासिम का उत्तर था आंतरिक शुल्कों को पूरी तरह समाप्त करना, जिससे हर व्यापारी एक समान स्थिति में आ गया। कंपनी ने इसे अपनी विशेषाधिकार वाली स्थिति पर आक्रमण माना। 1763 में युद्ध छिड़ गया; मीर क़ासिम कई लड़ाइयाँ हारा, मीर जाफ़र को फिर गद्दी पर बैठाया गया, और मीर क़ासिम सहयोगियों की तलाश में अवध भाग गया।

अवध में मीर क़ासिम, नवाब शुजाउद्दौला और मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय एक साथ आ गए। उनकी संयुक्त सेना 22 अक्टूबर 1764 को बिहार के बक्सर में मेजर हेक्टर मुनरो के नेतृत्व वाली कंपनी की सेना से भिड़ी और पराजित हुई। बक्सर प्लासी से अधिक निर्णायक था: यह वास्तविक युद्ध था, और इसने उत्तर भारत की तीनों प्रमुख शक्तियों को एक साथ हराया। बंगाल के गवर्नर के रूप में लौटे क्लाइव ने अगस्त 1765 में इलाहाबाद में दो संधियों द्वारा लाभों को पक्का किया। शाह आलम द्वितीय ने 26 लाख रुपये के वार्षिक नज़राने और कड़ा तथा इलाहाबाद के ज़िलों के बदले कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी, यानी राजस्व वसूलने का अधिकार, दे दी। शुजाउद्दौला को कड़ा और इलाहाबाद को छोड़कर अवध वापस मिला, उसने युद्ध-क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये दिए और अपनी रक्षा करने वाली कंपनी की सेना का खर्च उठाना स्वीकार किया। क्लाइव ने अवध को जानबूझकर बना रहने दिया, ताकि वह बंगाल और मराठों तथा अफ़ग़ानों के बीच एक मध्यवर्ती राज्य रहे।

1765 से 1772 तक बंगाल में जो व्यवस्था चली उसे द्वैध शासन कहते हैं। मुग़ल परंपरा में प्रांतीय शासन के दो भाग थे: दीवानी, अर्थात राजस्व वसूली और दीवानी न्याय, और निज़ामत, अर्थात पुलिस, रक्षा और फ़ौजदारी न्याय। अब दीवानी कंपनी के पास अपने अधिकार से थी, और निज़ामत पर भी उसका नियंत्रण था, क्योंकि 1765 के एक समझौते से युवा नवाब ने रक्षा कंपनी को सौंप दी और उसके द्वारा स्वीकृत एक नायब को मान लिया। फिर भी कंपनी सीधे शासन नहीं करती थी। वह भारतीय नायबों, बंगाल में मुहम्मद रज़ा ख़ाँ और बिहार में राजा शिताब राय, के माध्यम से काम करती थी, जो उसके लिए राजस्व वसूलते थे। परिणाम था उत्तरदायित्व के बिना शक्ति: धन कंपनी लेती थी, जबकि दोष नवाब पर आता था और उसके पास शासन के साधन नहीं थे। फ़सल नष्ट होने पर भी राजस्व की माँग ऊँची बनी रही, और 1770 के बंगाल अकाल ने जनसंख्या के बहुत बड़े भाग की जान ले ली। 1772 में कंपनी ने अपने अधिकारियों के माध्यम से राजस्व वसूलने का निर्णय किया; वॉरेन हेस्टिंग्स ने द्वैध व्यवस्था समाप्त की और ख़ज़ाना मुर्शिदाबाद से कलकत्ता ले गया।

सब जोड़कर देखें तो बंगाल की कहानी एक कड़ी है, जिसमें हर चरण ने अगले को संभव बनाया: व्यापारिक विशेषाधिकार (1717), उनका दुरुपयोग, नवाब से युद्ध (1756–57), आश्रित नवाब (1757–63), उत्तरी गठबंधन की हार (1764), राजस्व का वैधानिक अधिकार (1765), और अंततः प्रत्यक्ष प्रशासन (1772)। एक व्यापारिक कंपनी सफल क्यों हुई? 1707 में औरंगज़ेब की मृत्यु के बाद मुग़ल सत्ता कमज़ोर हो गई थी, और क्षेत्रीय शासक बँटे हुए थे तथा प्रायः आपस में लड़ते थे। कंपनी के पास समुद्र पर प्रभुत्व, नियमित वेतन पाने वाली अनुशासित सिपाही सेनाएँ, भारतीय साहूकारों से ऋण, और एक ऐसा संस्थागत संगठन था जो किसी एक नेता से अधिक समय तक टिकता था। सबसे बढ़कर, 1765 के बाद उसके पास बंगाल का राजस्व था, जिससे उन सेनाओं का खर्च चला जो मैसूर और मराठों से लड़ेंगी, जो भाग 2 का विषय है। ईस्ट इंडिया कंपनी स्वयं को व्यापारी कहते हुए भी बंगाल में शासक बन चुकी थी।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. 1765 में अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को बंगाल, बिहार और उड़ीसा की दीवानी किसने दी?

  1. सिराजुद्दौला
  2. मीर जाफ़र
  3. शाह आलम द्वितीय
  4. शुजाउद्दौला
उत्तर देखें

उत्तर: C. शाह आलम द्वितीय

दीवानी मुग़ल बादशाह शाह आलम द्वितीय ने इलाहाबाद की संधि (अगस्त 1765) के अधीन 26 लाख रुपये के वार्षिक नज़राने पर दी। सिराजुद्दौला 1757 में मारा जा चुका था; मीर जाफ़र कंपनी द्वारा बैठाया गया नवाब था और दीवानी देना उसके अधिकार में नहीं था, यह बादशाह का अधिकार था; शुजाउद्दौला अवध का नवाब था, जिसने अपना राज्य वापस पाने के लिए अलग संधि की।

Q2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. प्लासी का युद्ध 1757 में ईस्ट इंडिया कंपनी और सिराजुद्दौला की सेनाओं के बीच लड़ा गया।
2. प्लासी में कंपनी की सेना का नेतृत्व हेक्टर मुनरो ने किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: प्लासी 23 जून 1757 को सिराजुद्दौला के विरुद्ध लड़ा गया। कथन 2 ग़लत है: प्लासी में नेतृत्व रॉबर्ट क्लाइव ने किया; हेक्टर मुनरो ने 1764 में बक्सर में नेतृत्व किया। इसलिए विकल्प (b), (c) और (d) ग़लत हैं।

Q3. सूची I को सूची II से सुमेलित कीजिए:
सूची I (युद्ध): A. अडयार B. वांडीवाश C. प्लासी D. बक्सर
सूची II (वर्ष): 1. 1746 2. 1757 3. 1760 4. 1764
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-1, B-3, C-2, D-4
  2. A-3, B-1, C-2, D-4
  3. A-1, B-2, C-3, D-4
  4. A-1, B-3, C-4, D-2
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-1, B-3, C-2, D-4

अडयार 1746 (प्रथम कर्नाटक युद्ध), वांडीवाश 1760 (तृतीय कर्नाटक युद्ध), प्लासी 1757 और बक्सर 1764 में लड़ा गया। विकल्प (b) अडयार और वांडीवाश को उलट देता है; विकल्प (c) वांडीवाश को 1757 और प्लासी को 1760 देता है; विकल्प (d) प्लासी और बक्सर को उलट देता है।

Q4. 1717 का फ़रमान, जिसने अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी को एक निश्चित वार्षिक भुगतान के बदले बंगाल में सीमा-शुल्क दिए बिना व्यापार की अनुमति दी, किसने जारी किया?

  1. औरंगज़ेब
  2. बहादुर शाह प्रथम
  3. फ़र्रुख़सियर
  4. मुहम्मद शाह
उत्तर देखें

उत्तर: C. फ़र्रुख़सियर

1717 का फ़रमान बादशाह फ़र्रुख़सियर ने जारी किया: 3,000 रुपये वार्षिक पर बंगाल में शुल्क-मुक्त व्यापार और दस्तक जारी करने का अधिकार। औरंगज़ेब की मृत्यु 1707 में और बहादुर शाह प्रथम की 1712 में, फ़रमान से पहले, हो चुकी थी; मुहम्मद शाह 1719 में ही बादशाह बना।

Q5. बंगाल के द्वैध शासन (1765–72) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. दीवानी, अर्थात राजस्व वसूली और दीवानी न्याय, कंपनी के पास थी।
2. इसे 1773 के रेग्युलेटिंग एक्ट ने समाप्त किया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: 1765 से दीवानी कंपनी के पास अपने अधिकार से थी। कथन 2 ग़लत है: द्वैध व्यवस्था 1772 में समाप्त हुई, जब कंपनी ने वॉरेन हेस्टिंग्स के अधीन अपने अधिकारियों से राजस्व वसूलने का निर्णय किया, रेग्युलेटिंग एक्ट से एक वर्ष पहले। इसलिए (b), (c) और (d) ग़लत हैं।

Q6. मीर क़ासिम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. उसने अपनी राजधानी मुर्शिदाबाद से मुंगेर स्थानांतरित की।
2. उसने सभी व्यापारियों के लिए आंतरिक शुल्क समाप्त कर दिए।
3. वह बक्सर में पराजित सहयोगियों में से एक था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: D. 1, 2 और 3

तीनों सही हैं। मीर क़ासिम ने राजधानी मुंगेर स्थानांतरित की, आंतरिक शुल्क समाप्त किए ताकि भारतीय व्यापारी कंपनी के कर्मचारियों के समान स्थिति में आ जाएँ, और 1763 में कंपनी से हारने के बाद शुजाउद्दौला और शाह आलम द्वितीय से मिल गया, जिनके साथ वह 1764 में बक्सर में पराजित हुआ। बाक़ी हर विकल्प एक सही कथन छोड़ देता है।

Q7. इन व्यापारिक कंपनियों के गठन का सही कालक्रम निम्नलिखित में से कौन-सा है?
1. डच ईस्ट इंडिया कंपनी (वी.ओ.सी.)
2. अंग्रेज़ी ईस्ट इंडिया कंपनी
3. फ़्रांसीसी कंपनी (कोम्पान्यी दे ज़ांद ओरिएंताल)
4. डेनिश ईस्ट इंडिया कंपनी

  1. 1-2-4-3
  2. 2-1-4-3
  3. 2-1-3-4
  4. 1-2-3-4
उत्तर देखें

उत्तर: B. 2-1-4-3

अंग्रेज़ी कंपनी को 31 दिसंबर 1600 को चार्टर मिला, डच वी.ओ.सी. 1602 में, डेनिश कंपनी 1616 में और फ़्रांसीसी कंपनी 1664 में बनी, अतः क्रम 2-1-4-3 है। विकल्प (a) डचों को अंग्रेज़ों से पहले रखता है; विकल्प (c) और (d) फ़्रांसीसी (1664) को डेनिश (1616) से पहले रखते हैं, और (d) डचों को भी पहले रखता है।

Q8. ईस्ट इंडिया कंपनी और शुजाउद्दौला के बीच इलाहाबाद की संधि (1765) के अधीन निम्नलिखित में से किन पर सहमति हुई?
1. कड़ा और इलाहाबाद को छोड़कर अवध शुजाउद्दौला को लौटा दिया गया।
2. शुजाउद्दौला ने कंपनी को युद्ध-क्षतिपूर्ति दी।
3. अवध को कंपनी के क्षेत्रों में मिला लिया गया।
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं: शुजाउद्दौला को कड़ा और इलाहाबाद के बिना अवध वापस मिला और उसने युद्ध-क्षतिपूर्ति के रूप में 50 लाख रुपये दिए। कथन 3 ग़लत है: क्लाइव ने अवध को जानबूझकर मध्यवर्ती राज्य बनाए रखा; उसका विलय 1856 में ही हुआ। अतः कथन 3 वाले (b) और (d) ग़लत हैं, और (c) कथन 2 को छोड़ देता है।

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