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भारत में राष्ट्रीय आय का मापन: एनएसओ, जारी करने का कैलेंडर, आधार वर्ष और जीडीपी से आगे

राष्ट्रीय आय · भाग 2 / 2 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

भारत के राष्ट्रीय आय के आँकड़े कैसे बनते हैं: नौरोजी से राष्ट्रीय आय समिति तक के आरंभिक अनुमान, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय और उसका जारी करने का कैलेंडर, आधार वर्ष और 2011-12 तथा 2022-23 की शृंखलाएँ, क्षेत्रवार हिस्से, प्रति व्यक्ति आय और पीपीपी, तथा हरित जीडीपी और मानव विकास सूचकांक।

भाग 1 ने बताया कि राष्ट्रीय आय क्या मापती है। यह भाग व्यावहारिक प्रश्न पूछता है: भारत में ये आँकड़े वास्तव में कौन तैयार करता है, वे कब आते हैं, और समय के साथ कैसे बदलते हैं। बजट के राजस्व लक्ष्य, राजकोषीय घाटे का अनुपात और आरबीआई के वृद्धि अनुमान सभी सकल घरेलू उत्पाद के हिस्से के रूप में बताए जाते हैं, इसलिए जीडीपी मापने का तरीका बदलने से हर दूसरा आँकड़ा अलग ढंग से पढ़ा जाता है। यह भाग कहानी इस क्रम में चलाता है: स्वतंत्रता से पहले के आरंभिक अनुमान, उसके बाद बनी सांख्यिकी व्यवस्था, वह कैलेंडर जिस पर हर वर्ष के आँकड़े जारी और संशोधित होते हैं, आधार वर्ष और उसके संशोधन, क्षेत्रों और औसत आय के बारे में आँकड़े क्या दिखाते हैं, और वे माप जो राष्ट्रीय आय से आगे देखते हैं।

भारत की राष्ट्रीय आय मापने के प्रयास औपनिवेशिक शासन में शुरू हुए, कुछ हद तक यह दिखाने के लिए कि देश कितना गरीब हो गया था। दादाभाई नौरोजी ने 1867-68 के लिए ब्रिटिश भारत की आय लगभग 20 रुपये प्रति व्यक्ति आँकी और इस आँकड़े का प्रयोग धन के निष्कासन की अपनी आलोचना में किया, जो बाद में पॉवर्टी एंड अन-ब्रिटिश रूल इन इंडिया (1901) में संकलित हुई। 1930 के दशक में वी.के.आर.वी. राव ने क्रमबद्ध, क्षेत्रवार पद्धति पर आधारित पहले अनुमान तैयार किए। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने अगस्त 1949 में पी.सी. महालनोबिस की अध्यक्षता में राष्ट्रीय आय समिति बनाई, जिसमें डी.आर. गाडगिल और राव सदस्य थे। 1950 के दशक के आरंभ में आई इसकी रिपोर्टों ने आधिकारिक अनुमानों की पद्धति तय की, और 1951 में बने केंद्रीय सांख्यिकी संगठन ने इन्हें नियमित रूप से तैयार करने का काम सँभाला।

आज ये अनुमान सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (एमओएसपीआई) के राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (एनएसओ) से आते हैं। एनएसओ 2019 में केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय, जो राष्ट्रीय लेखे तैयार करता था, और राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय, जो बड़े घरेलू और उद्यम सर्वेक्षण करता है, के विलय से बना। एनएसओ के भीतर राष्ट्रीय लेखा प्रभाग पूरे देश के लिए जीडीपी, जीवीए और संबंधित समुच्चय तैयार करता है। हर राज्य का अर्थ और सांख्यिकी निदेशालय अपने राज्य के लिए सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) तैयार करता है, और एक साझा पद्धति अपनाता है ताकि राज्यों की तुलना हो सके। अधिकांश कच्चा माल एनएसओ स्वयं इकट्ठा नहीं करता, बल्कि वह अन्य जगहों से आता है: कृषि मंत्रालय से फ़सल अनुमान, कंपनियों के दाखिले, कर अभिलेख, आरबीआई के आँकड़े और सरकारों के लेखे।

किसी वर्ष का सकल घरेलू उत्पाद एक बार में घोषित नहीं होता; बेहतर आँकड़े आने के साथ उसका कई बार अनुमान लगाया जाता है। पहले अग्रिम अनुमान जनवरी के आरंभ में आते हैं, वित्त वर्ष समाप्त होने से भी पहले, ताकि 1 फ़रवरी को प्रस्तुत केंद्रीय बजट उनका उपयोग कर सके। दूसरे अग्रिम अनुमान फ़रवरी के अंत में आते हैं, और अनंतिम अनुमान मई के अंत में, यानी वर्ष समाप्त होने के लगभग दो महीने बाद। फिर उस वर्ष के आँकड़े बाद के वर्षों में संशोधित होते हैं, जब उद्योगों के वार्षिक सर्वेक्षण और कंपनियों के लेखापरीक्षित खातों जैसे पूरे आँकड़े आते हैं। तिमाही अनुमान हर तिमाही के समाप्त होने के लगभग दो महीने बाद आते हैं। उदाहरण के लिए 2025-26 के लिए एमओएसपीआई की 27 फ़रवरी 2026 की प्रेस विज्ञप्ति ने दूसरे अग्रिम अनुमान दिए और अनंतिम अनुमानों के लिए 29 मई 2026 की तिथि तय की।

एक वर्ष का जीडीपी अनुमान कैसे आता है
अनुमानकब आता हैकिस पर आधारित
पहला अग्रिमजनवरी के आरंभ में, वर्ष समाप्त होने से पहलेपहले महीनों के आँकड़े; बजट में प्रयोग
दूसरा अग्रिमफ़रवरी के अंत मेंतीसरी तिमाही के आँकड़े जुड़ते हैं
अनंतिममई के अंत मेंपूरे वर्ष के आँकड़े, कुछ अब भी अधूरे
संशोधितबाद के वर्षों मेंवार्षिक सर्वेक्षण, कंपनियों के लेखापरीक्षित खाते
तिमाहीहर तिमाही के लगभग दो महीने बादजीएसटी और उत्पादन आँकड़ों जैसे संकेतक

वास्तविक वृद्धि को कीमतों के बदलाव से अलग करने के लिए उत्पादन का मूल्य किसी चुने हुए आधार वर्ष की कीमतों पर आँका जाता है। अच्छा आधार वर्ष सूखे या संकट से रहित एक साधारण वर्ष होता है, और अर्थव्यवस्था बदलने के साथ उसे आगे बढ़ाना पड़ता है: नए उद्योग आते हैं, पुराने सिकुड़ते हैं और बेहतर आँकड़े उपलब्ध होते हैं। भारत की शृंखलाएँ 1948-49, 1960-61, 1970-71, 1980-81, 1993-94, 1999-2000, 2004-05 और 2011-12 जैसे आधार वर्षों से होकर गुज़री हैं। जनवरी 2015 में जारी 2011-12 शृंखला ने तीन बड़े बदलाव किए। मुख्य वृद्धि साधन लागत पर जीडीपी के बजाय स्थिर बाज़ार कीमतों पर जीडीपी से मापी जाने लगी; उद्योगवार उत्पादन मूल कीमतों पर सकल मूल्य वर्धन के रूप में दिखाया गया; और निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र को कंपनियों के एक नमूने के बजाय कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय के एमसीए-21 डेटाबेस में कंपनियों के दाखिलों से मापा गया।

2011-12 शृंखला ने हाल की वृद्धि की तस्वीर बदल दी और एक लंबी बहस छेड़ दी। इसने कभी-कभी बैंक ऋण, औद्योगिक उत्पादन और कर संग्रह के संकेतों से तेज़ वृद्धि दिखाई, और प्रश्न उठे कि एमसीए-21 के दाखिलों को सभी कंपनियों तक कैसे बढ़ाया गया। 2019 में एक पूर्व मुख्य आर्थिक सलाहकार ने तर्क दिया कि वृद्धि को बढ़ा-चढ़ाकर आँका गया था; सरकारी सांख्यिकीविदों ने उनकी पद्धति पर आपत्ति की। अगले संशोधन में नए आँकड़े और पद्धतियाँ लाई गईं। 27 फ़रवरी 2026 को एमओएसपीआई ने 2022-23 आधार वर्ष वाली नई शृंखला जारी की। यह तिमाही अनुमानों के लिए जीएसटी और अन्य प्रशासनिक अभिलेखों का व्यापक उपयोग करती है, असंगठित उद्यमों को वार्षिक सर्वेक्षणों से शामिल करती है, कई गतिविधियों में लगी कंपनियों को गतिविधिवार अलग करती है, और कृषि तथा विनिर्माण में दोहरा अपस्फीतीकरण अपनाती है: उत्पादन और आगतों को अलग-अलग अपस्फीत किया जाता है, ताकि सस्ते आगतों को अधिक वास्तविक उत्पादन न समझ लिया जाए।

तीन-क्षेत्र योजना में प्राथमिक क्षेत्र में कृषि, वानिकी और मत्स्यन तथा खनन और उत्खनन आते हैं; द्वितीयक क्षेत्र में विनिर्माण, निर्माण, और बिजली, गैस तथा जल आपूर्ति आते हैं; और तृतीयक या सेवा क्षेत्र में व्यापार, होटल, परिवहन, संचार, वित्त, स्थावर संपदा, लोक प्रशासन और अन्य सेवाएँ आती हैं। आधिकारिक तालिकाएँ और आर्थिक सर्वेक्षण प्रायः थोड़ा भिन्न वर्गीकरण अपनाते हैं: 'कृषि' का अर्थ कृषि, वानिकी और मत्स्यन है, जबकि खनन को विनिर्माण, उपयोगिताओं और निर्माण के साथ 'उद्योग' में रखा जाता है। दशकों में सेवाएँ भारत के सकल मूल्य वर्धन के आधे से अधिक तक पहुँच गई हैं, जबकि कृषि का हिस्सा पाँचवें भाग से नीचे आ गया है। फिर भी हाल के आवधिक श्रम बल सर्वेक्षणों के अनुसार कृषि में दो-पाँचवें से अधिक कामगार लगे हैं, इसीलिए खेती में प्रति कामगार उत्पादन कम रहता है।

प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय को जनसंख्या से भाग देकर निकाली जाती है, जिससे प्रति व्यक्ति औसत आय मिलती है। भारत का आधिकारिक माप प्रति व्यक्ति निवल राष्ट्रीय आय है। यह जीडीपी से भिन्न प्रश्न का उत्तर देती है: किसी देश की अर्थव्यवस्था बड़ी हो सकती है पर औसत आय कम, यदि उसकी जनसंख्या बहुत बड़ी हो, और यही भारत की स्थिति है। जनसंख्या बढ़ने पर यह कुल आय से धीमी बढ़ती है। यह केवल औसत भी है, इसलिए यह नहीं बताती कि आय अमीर और गरीब के बीच या राज्यों के बीच कैसे बँटी है। अंतरराष्ट्रीय वर्गीकरण के लिए विश्व बैंक प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई, जीएनपी का वर्तमान नाम) को अमेरिकी डॉलर में बदलकर प्रयोग करता है, और इस आधार पर भारत को निम्न-मध्यम आय वाले देशों के समूह में रखता है।

बाज़ार विनिमय दरों पर जीडीपी को बदलकर देशों की तुलना करना भ्रामक हो सकता है, क्योंकि वही वस्तुएँ और सेवाएँ कुछ देशों में दूसरों की तुलना में बहुत सस्ती होती हैं। क्रय शक्ति समता (पीपीपी) इसका समाधान यह पूछकर करती है कि वस्तुओं और सेवाओं की जो टोकरी अमेरिका में एक अमेरिकी डॉलर में मिलती है, वही टोकरी कितने रुपये में मिलती है, और फिर उसी दर पर बदलती है। विश्व बैंक का अंतरराष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम इन दरों की गणना के लिए देशों में कीमतें इकट्ठा करता है। चूँकि भारत में बहुत-सी कीमतें अपेक्षाकृत कम हैं, इसलिए पीपीपी के आधार पर भारत की अर्थव्यवस्था बाज़ार विनिमय दरों की तुलना में कहीं बड़ी दिखती है; कार्यक्रम के 2021 के दौर में यह चीन और अमेरिका के बाद दुनिया में तीसरे स्थान पर रही।

जीडीपी किसी वन से बेची गई लकड़ी को गिनता है पर खोए हुए वन को नहीं, इसलिए कोई देश अपनी प्राकृतिक पूँजी को घटाते हुए भी बढ़ता दिख सकता है। हरित जीडीपी पारंपरिक मापों में से प्राकृतिक संसाधनों के क्षय और पर्यावरणीय क्षति की लागत घटाकर इसे सुधारने का प्रयास करता है। संयुक्त राष्ट्र की पर्यावरणीय-आर्थिक लेखा प्रणाली (एसईईए) अंतरराष्ट्रीय ढाँचा देती है। भारत में पार्थ दासगुप्ता की अध्यक्षता वाले एक विशेषज्ञ समूह ने 2013 में हरित राष्ट्रीय लेखों का ढाँचा प्रस्तुत किया, और एमओएसपीआई अपनी वार्षिक एनविस्टैट्स इंडिया रिपोर्टों में वनों, जल और भूमि जैसी परिसंपत्तियों के पर्यावरणीय लेखे प्रकाशित करता है। ये लेखे मुख्य जीडीपी आँकड़ों के साथ-साथ तैयार होते हैं; उन्होंने उनकी जगह नहीं ली है, आंशिक रूप से इसलिए कि नष्ट हुए पारितंत्रों का मौद्रिक मूल्य आँकना कठिन और विवादास्पद है।

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई), जिसे संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) 1990 से अपनी मानव विकास रिपोर्ट में प्रकाशित करता है, महबूब उल हक़ ने अमर्त्य सेन के विचारों के आधार पर तैयार किया, ताकि प्रगति को केवल आय से नहीं बल्कि इस बात से आँका जाए कि लोग क्या कर पाते हैं और क्या बन पाते हैं। यह तीन आयामों को जोड़ता है: लंबा और स्वस्थ जीवन, जिसे जन्म के समय जीवन प्रत्याशा से मापा जाता है; ज्ञान, जिसे वयस्कों की स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों और बच्चों की स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों से मापा जाता है; और सम्मानजनक जीवन स्तर, जिसे पीपीपी डॉलर में प्रति व्यक्ति जीएनआई से मापा जाता है। तीनों आयामों के अंकों को ज्यामितीय माध्य से जोड़ा जाता है, इसलिए कोई देश एक आयाम के बहुत कमज़ोर अंक की पूरी भरपाई दूसरे आयाम के ऊँचे अंक से नहीं कर सकता। भारत मध्यम मानव विकास समूह में रखा गया है।

कुल जीडीपी से आगे के माप
मापक्या जोड़ता हैकौन प्रकाशित करता है
प्रति व्यक्ति आयप्रति व्यक्ति औसत आय (निवल राष्ट्रीय आय ÷ जनसंख्या)एनएसओ, एमओएसपीआई
पीपीपी पर जीडीपीसमान क्रय शक्ति पर अर्थव्यवस्थाओं की तुलनाविश्व बैंक (अंतरराष्ट्रीय तुलना कार्यक्रम)
हरित लेखेप्राकृतिक संसाधनों का क्षय और पर्यावरणीय क्षतिएमओएसपीआई (एनविस्टैट्स इंडिया), संयुक्त राष्ट्र एसईईए ढाँचा
मानव विकास सूचकांकस्वास्थ्य, शिक्षा और आय एक साथयूएनडीपी (मानव विकास रिपोर्ट)

कुल मिलाकर जीडीपी का एक आँकड़ा किसी सरल गिनती का नहीं, एक लंबी प्रक्रिया का अंतिम परिणाम है। इसे एनएसओ अनेक स्रोतों से संकलित करता है, एक प्रकाशित कैलेंडर पर कई बार संशोधित करता है, एक ऐसे आधार वर्ष की कीमतों पर आँकता है जो स्वयं अद्यतन होता रहता है, और कुल तथा प्रति व्यक्ति दोनों रूपों में बताता है। हर चरण में एक परीक्षा जाल है: अग्रिम अनुमान वर्ष समाप्त होने से पहले आते हैं; खनन आधिकारिक तालिकाओं में 'उद्योग' है पर तीन-क्षेत्र योजना में 'प्राथमिक'; भारत की आधिकारिक प्रति व्यक्ति आय प्रति व्यक्ति निवल राष्ट्रीय आय है; और पीपीपी तुलनाएँ कम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं को बाज़ार विनिमय दरों की तुलना में बड़ा दिखाती हैं। और चूँकि सकल घरेलू उत्पाद कल्याण नहीं, उत्पादन मापता है, इसलिए हरित लेखे और एचडीआई जैसे माप उसकी जगह लेने के बजाय उसके साथ खड़े होते हैं।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. 1949 में गठित राष्ट्रीय आय समिति के अध्यक्ष कौन थे?

  1. पी.सी. महालनोबिस
  2. वी.के.आर.वी. राव
  3. डी.आर. गाडगिल
  4. दादाभाई नौरोजी
उत्तर देखें

उत्तर: A. पी.सी. महालनोबिस

महालनोबिस समिति के अध्यक्ष थे। वी.के.आर.वी. राव और डी.आर. गाडगिल इसके सदस्य थे, अध्यक्ष नहीं, और दादाभाई नौरोजी ने अपना अनुमान 1867-68 के लिए दिया था, समिति बनने से बहुत पहले।

Q2. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय और राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय के विलय से बना।
2. राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय नीति आयोग के अधीन कार्य करता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: दोनों कार्यालयों का 2019 में विलय हुआ। कथन 2 गलत है: एनएसओ सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का हिस्सा है। इसलिए 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 1 को छोड़ देता है।

Q3. किसी वर्ष के जीडीपी के निम्नलिखित अनुमानों को उनके जारी होने के क्रम में व्यवस्थित कीजिए:
1. अनंतिम अनुमान
2. पहले अग्रिम अनुमान
3. दूसरे अग्रिम अनुमान
4. पहले संशोधित अनुमान
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए।

  1. 2-3-1-4
  2. 2-1-3-4
  3. 1-2-3-4
  4. 3-2-4-1
उत्तर देखें

उत्तर: A. 2-3-1-4

पहले अग्रिम अनुमान जनवरी के आरंभ में, दूसरे अग्रिम फ़रवरी के अंत में, अनंतिम मई के अंत में, और संशोधित अनुमान बाद के वर्षों में ही आते हैं। '2-1-3-4' अनंतिम को दूसरे अग्रिम से पहले रखता है; '1-2-3-4' अनंतिम से शुरू होता है, जो दोनों अग्रिम अनुमानों के बाद आता है; '3-2-4-1' अग्रिम अनुमानों को उलट देता है और संशोधित को अनंतिम से पहले रखता है।

Q4. 2011-12 आधार वर्ष वाली राष्ट्रीय लेखा शृंखला के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. मुख्य वृद्धि स्थिर बाज़ार कीमतों पर जीडीपी से मापी गई।
2. निजी कॉर्पोरेट क्षेत्र के लिए एमसीए-21 डेटाबेस के कंपनी आँकड़ों का उपयोग किया गया।
3. उद्योगवार उत्पादन साधन लागत पर सकल मूल्य वर्धन के रूप में दिखाया गया।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 गलत है: 2011-12 शृंखला ने उद्योगवार जीवीए मूल कीमतों पर दिखाया, साधन लागत पर नहीं। इसलिए कथन 3 वाला हर विकल्प गलत है।

Q5. अर्थव्यवस्था के तीन-क्षेत्र वर्गीकरण में निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:
1. खनन और उत्खनन : प्राथमिक क्षेत्र
2. निर्माण : तृतीयक क्षेत्र
3. बिजली, गैस और जल आपूर्ति : द्वितीयक क्षेत्र
उपर्युक्त युग्मों में से कौन-से सही सुमेलित हैं?

  1. केवल 1 और 3
  2. केवल 1 और 2
  3. केवल 2 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 3

युग्म 1 और 3 सही हैं। निर्माण द्वितीयक क्षेत्र में आता है, तृतीयक में नहीं, इसलिए युग्म 2 गलत है और उसे शामिल करने वाला हर विकल्प गलत है। ध्यान दें कि आधिकारिक तालिकाएँ खनन को 'उद्योग' में रखती हैं, पर तीन-क्षेत्र योजना में यह प्राथमिक है।

Q6. क्रय शक्ति समता (पीपीपी) के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. पीपीपी रूपांतरण दरें यह तुलना करती हैं कि वस्तुओं और सेवाओं की एक ही टोकरी अलग-अलग देशों में कितने की है।
2. पीपीपी के आधार पर भारत की अर्थव्यवस्था बाज़ार विनिमय दरों पर बदलने की तुलना में छोटी दिखती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1, न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 पीपीपी का वर्णन है। कथन 2 सत्य का उलटा है: भारत में बहुत-सी कीमतें कम होने से पीपीपी के आधार पर उसकी अर्थव्यवस्था बड़ी दिखती है। इसलिए 'केवल 2' और 'दोनों' गलत हैं, और 'न तो 1, न ही 2' कथन 1 को छोड़ देता है।

Q7. मानव विकास सूचकांक की गणना में निम्नलिखित में से किसका संकेतक के रूप में प्रयोग नहीं होता?

  1. जन्म के समय जीवन प्रत्याशा
  2. स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष
  3. प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (पीपीपी)
  4. शिशु मृत्यु दर
उत्तर देखें

उत्तर: D. शिशु मृत्यु दर

एचडीआई स्वास्थ्य के लिए जन्म के समय जीवन प्रत्याशा, ज्ञान के लिए स्कूली शिक्षा के औसत और अपेक्षित वर्ष, और जीवन स्तर के लिए पीपीपी डॉलर में प्रति व्यक्ति जीएनआई का प्रयोग करता है। शिशु मृत्यु दर इसके संकेतकों में नहीं है, जबकि बाकी तीनों विकल्प इसके संकेतक हैं।

Q8. फ़रवरी 2026 में एमओएसपीआई द्वारा जारी राष्ट्रीय लेखा शृंखला के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसका आधार वर्ष 2022-23 है।
2. यह कृषि और विनिर्माण में दोहरा अपस्फीतीकरण अपनाती है।
3. यह तिमाही अनुमानों के लिए जीएसटी आँकड़ों का उपयोग बंद कर देती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 2 और 3
  3. केवल 1 और 3
  4. 1, 2 और 3
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1 और 2

कथन 1 और 2 सही हैं। कथन 3 जो हुआ उसका उलटा है: नई शृंखला तिमाही अनुमानों के लिए जीएसटी और अन्य प्रशासनिक आँकड़ों पर बहुत निर्भर है। इसलिए कथन 3 वाला हर विकल्प गलत है।

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स्रोत