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कृषि कीमतें, खरीद और बाज़ार

कृषि और खाद्य सुरक्षा · भाग 1 / 1 · तथ्य-जाँच की तिथि · हम कैसे जाँचते हैं

स्रोतों (नीचे सूचीबद्ध) से AI की मदद से लिखा गया, फिर एक अलग AI से तथ्य-जाँच की गई।

न्यूनतम समर्थन मूल्य क्या है और क्यों शुरू हुआ, सीएसीपी 22 फ़सलों की कीमतों की सिफ़ारिश कैसे करता है, लागत अवधारणाएँ ए2, ए2+एफ़एल और सी2 तथा 2018-19 का डेढ़ गुना नियम, एमएसपी की सीमाएँ, भारतीय खाद्य निगम और विकेंद्रीकृत खरीद, बफ़र स्टॉक और खुले बाज़ार में बिक्री, पीएम-आशा, एपीएमसी मंडियाँ और उनकी समस्याएँ, आदर्श अधिनियम, ई-नाम, 2020 के कृषि कानून और उनका निरसन, और आवश्यक वस्तु अधिनियम।

भारत के श्रमिकों का बहुत बड़ा भाग आज भी खेती पर निर्भर है, फिर भी किसान की आय एक साथ दो जोखिमों के सामने रहती है: मौसम फ़सल बिगाड़ सकता है, और अच्छी फ़सल कीमत गिरा सकती है। सार्वजनिक नीति दूसरे जोखिम का उत्तर तीन साधनों से देती है जिन्हें यह भाग समझाता है: एक गारंटीशुदा न्यूनतम कीमत, न्यूनतम समर्थन मूल्य; खरीद और बफ़र स्टॉक के माध्यम से अनाज की सरकारी खरीद और भंडारण; और उन बाज़ारों के नियम जहाँ किसान बेचते हैं। सरकार किसानों से जो अनाज खरीदती है, वही बाद में सार्वजनिक वितरण प्रणाली से गरीब परिवारों को सस्ते में बेचा जाता है, जो भाग 2 का विषय है, इसलिए ये साधन किसान के खेत को राशन की दुकान से जोड़ते हैं। भाग 3 ऋण, आय सहायता, बीमा और भूमि की ओर मुड़ता है।

न्यूनतम समर्थन मूल्य वह कीमत है जिस पर बाज़ार कीमत उससे नीचे गिरने पर सरकार फ़सल खरीदने को तैयार रहती है। यह एक न्यूनतम सीमा है, निश्चित कीमत नहीं: जब बाज़ार कीमतें ऊँची हों, किसान बस बाज़ार में बेचते हैं। यह विचार 1960 के दशक के मध्य में आकार लिया, जब भारत सहायता कार्यक्रमों के तहत अनाज आयात कर रहा था और उसे चाहिए था कि किसान हरित क्रांति के महँगे उच्च उपज वाले बीज अपनाएँ। किसान नए बीज, उर्वरक और सिंचाई में तभी निवेश करते जब भरपूर फ़सल का अर्थ बर्बादी न हो, इसलिए सुनिश्चित कीमत इस पैकेज का हिस्सा बनी। इन कीमतों पर सलाह देने के लिए 1965 में कृषि मूल्य आयोग बनाया गया; 1985 में इसका नाम बदलकर कृषि लागत और मूल्य आयोग किया गया, यह दिखाने के लिए कि अब खेती की लागत भी कीमतों जितनी ही महत्वपूर्ण थी।

कृषि लागत और मूल्य आयोग कृषि और किसान कल्याण मंत्रालय का एक संबद्ध कार्यालय है। हर मौसम में यह 22 अधिदेशित फ़सलों के लिए समर्थन मूल्यों की सिफ़ारिश करता है: धान, दलहन और कपास जैसी 14 खरीफ़ फ़सलें, गेहूँ, चना और सरसों जैसी 6 रबी फ़सलें, और दो वाणिज्यिक फ़सलें, जूट और खोपरा। गन्ने को अलग तरीके से, उचित और लाभकारी मूल्य के माध्यम से, देखा जाता है जो चीनी मिलों को चुकाना होता है। अपनी सिफ़ारिशें करते समय आयोग उत्पादन लागत, माँग और आपूर्ति, घरेलू और विश्व कीमतों के रुझान, प्रतिस्पर्धी फ़सलों की तुलना में किसी फ़सल की कीमत, खेती और शेष अर्थव्यवस्था के बीच व्यापार की शर्तों, और उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव को देखता है। अंतिम निर्णय आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति का होता है, जो बुवाई से पहले कीमतें घोषित करती है ताकि किसान तय कर सकें कि क्या उगाना है।

उत्पादन लागत को परतों में मापा जाता है, और परत का चुनाव एमएसपी बहस का केंद्र है। ए2 में वे लागतें आती हैं जो किसान वास्तव में नकद या वस्तु में चुकाता है: बीज, उर्वरक, कीटनाशक, भाड़े का श्रम, मशीन किराया, सिंचाई शुल्क और पट्टे पर ली गई भूमि का किराया। ए2+एफ़एल इसमें अवैतनिक पारिवारिक श्रम का आरोपित मूल्य जोड़ता है। सी2 सबसे पूर्ण माप है: यह ए2+एफ़एल में किसान की अपनी भूमि का किराया मूल्य और उसकी अपनी स्थायी पूँजी पर ब्याज जोड़ता है। एम.एस. स्वामीनाथन की अध्यक्षता वाले राष्ट्रीय किसान आयोग (2004–06) ने सिफ़ारिश की कि एमएसपी उत्पादन की भारित औसत लागत से कम से कम 50 प्रतिशत अधिक हो। 2018-19 के केंद्रीय बजट ने घोषणा की कि एमएसपी उत्पादन लागत के कम से कम डेढ़ गुना पर तय होगा, और सरकार वह लागत ए2+एफ़एल के रूप में मापती है, सी2 नहीं। किसान संगठनों का तर्क है कि सूत्र में सी2 का प्रयोग होना चाहिए।

एमएसपी तय करने में प्रयुक्त लागत अवधारणाएँ
अवधारणाइसमें क्या शामिल हैकहाँ प्रयोग होता है
ए2नकद या वस्तु में चुकाई गई लागत: बीज, उर्वरक, कीटनाशक, भाड़े का श्रम, मशीनरी, सिंचाई, पट्टे की भूमि का किरायाहर अन्य माप का आधार
ए2+एफ़एलए2 और अवैतनिक पारिवारिक श्रम का आरोपित मूल्यवह लागत जिस पर डेढ़ गुना नियम (2018-19) लागू होता है
सी2ए2+एफ़एल और अपनी भूमि का किराया मूल्य तथा अपनी स्थायी पूँजी पर ब्याजवह माप जिस पर किसान संगठन एमएसपी चाहते हैं

घोषित कीमत किसान की मदद तभी करती है जब कोई वास्तव में उस पर खरीदे, और यही कमज़ोर कड़ी है। एमएसपी का कोई वैधानिक आधार नहीं है: कोई कानून किसी भी खरीदार, सरकारी या निजी, को इसे चुकाने के लिए बाध्य नहीं करता, सिवाय इसके कि चीनी मिलों को गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य चुकाना होता है। व्यवहार में बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद मुख्य रूप से गेहूँ और धान की होती है, और अधिकतर पंजाब, हरियाणा और मध्य प्रदेश जैसे कुछ राज्यों में; अधिकांश अन्य फ़सलों के लिए कीमत घोषित तो होती है पर शायद ही उसकी रक्षा की जाती है। शांता कुमार की अध्यक्षता वाली एफ़सीआई पुनर्गठन पर उच्च स्तरीय समिति (2015) ने सर्वेक्षण आँकड़ों से पाया कि केवल लगभग 6 प्रतिशत कृषक परिवारों ने किसी खरीद एजेंसी को बेचा। चावल और गेहूँ की सुनिश्चित खरीद ने उत्तर-पश्चिम में खेती को अधिक पानी वाले धान की ओर भी झुका दिया है, जिससे भूजल घटा है। किसान संगठन अब सभी अधिदेशित फ़सलों के लिए एमएसपी की कानूनी गारंटी माँगते हैं।

अधिकांश सरकारी खरीद भारतीय खाद्य निगम करता है, जिसे खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के अंतर्गत 1965 में स्थापित किया गया, क्योंकि 1960 के दशक के मध्य की खाद्य कमी ने राज्य को अपना अनाज रखने का कारण दिया। एफ़सीआई एमएसपी पर गेहूँ और चावल खरीदता है, उसका भंडारण करता है, उसे रेल और सड़क से देश भर में ले जाता है, और वितरण के लिए राज्यों को जारी करता है। पुरानी केंद्रीकृत व्यवस्था में खरीद एफ़सीआई या उसकी ओर से राज्य एजेंसियाँ करती थीं और भंडार एफ़सीआई रखता था। 1997-98 में केंद्र ने विकेंद्रीकृत खरीद शुरू की, जिसके अंतर्गत भाग लेने वाला राज्य स्वयं अनाज खरीदता, भंडारित और वितरित करता है, और केंद्र लागत वहन करता है; कोई भी अधिशेष एफ़सीआई को सौंप दिया जाता है। उद्देश्य था खरीद को अधिक राज्यों तक फैलाना, अनाज को लंबी दूरी तक ले जाने की लागत घटाना, और राज्यों को स्थानीय रूप से पसंद किया जाने वाला अनाज खरीदने देना।

एमएसपी पर खरीदा गया अनाज बफ़र स्टॉक के रूप में रखा जाता है, एक भंडार जो तीन काम करता है: यह सार्वजनिक वितरण प्रणाली और कल्याण योजनाओं की मासिक ज़रूरतें पूरी करता है, सूखे या फ़सल की विफलता से बचाता है, और बाज़ार गर्म होने पर बेचकर सरकार को कीमतें ठंडी करने देता है। केंद्र हर तिमाही के पहले दिन (अप्रैल, जुलाई, अक्टूबर और जनवरी) के लिए भंडारण मानदंड तय करता है, और इनमें परिचालन भंडार के ऊपर एक रणनीतिक भंडार भी शामिल है। जब भंडार मानदंडों से बहुत ऊपर जमा हो जाते हैं, जैसा प्रायः हुआ है, तो अनाज के भंडारण पर पैसा खर्च होता है और वह खराब भी हो सकता है। एक निकास खुला बाज़ार बिक्री योजना (घरेलू) है, जिसके अंतर्गत एफ़सीआई अधिशेष गेहूँ और चावल आटा मिलों जैसे थोक खरीदारों को आरक्षित कीमत पर बेचता है। एफ़सीआई प्रति क्विंटल जो लागत वहन करता है, जिसमें खरीद, भंडारण और परिवहन शामिल हैं, आर्थिक लागत कहलाती है, और यह राशन की दुकानों को अनाज जारी करने की कीमत से काफ़ी ऊपर है।

क्योंकि खरीद अनाजों के पक्ष में रही थी, दलहन और तिलहन के किसान, जिनका भारत बड़ी मात्रा में आयात करता है, प्रायः एमएसपी से नीचे बेचते थे। 2018 में सरकार ने एक छत्र योजना, प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा), शुरू की जिसके तीन भाग हैं। मूल्य समर्थन योजना के अंतर्गत नेफ़ेड जैसी केंद्रीय एजेंसियाँ बाज़ार कीमत एमएसपी से नीचे गिरने पर दलहन, तिलहन और खोपरा की भौतिक खरीद करती हैं। तिलहन के लिए बनी मूल्य न्यूनता भुगतान योजना के अंतर्गत सरकार कुछ भी नहीं खरीदती: वह पंजीकृत किसानों को एमएसपी और औसत बाज़ार कीमत का अंतर चुकाती है, जबकि फ़सल बाज़ार में बिकती है। तीसरी, प्रायोगिक निजी खरीद और स्टॉकिस्ट योजना चुनी हुई निजी एजेंसियों को सरकार की ओर से एमएसपी पर खरीदने देती है। न्यूनता भुगतान का मार्ग भंडारण की लागत से बचाता है, पर इसके लिए इस बात के विश्वसनीय आँकड़े चाहिए कि हर किसान ने क्या और किस कीमत पर बेचा।

किसान कहाँ बेचते हैं, यह मोटे तौर पर राज्य तय करते हैं, क्योंकि कृषि तथा बाज़ार और मेले राज्य सूची के विषय हैं। 1960 के दशक से राज्यों ने कृषि उपज विपणन (विनियमन) अधिनियम पारित किए जिन्होंने विनियमित मंडियाँ स्थापित कीं, जिनमें से हर एक को एक कृषि उपज मंडी समिति (एपीएमसी) चलाती है। उद्देश्य था खुली नीलामी, लाइसेंसधारी व्यापारियों और अधिसूचित बाज़ार के भीतर शीघ्र भुगतान की शर्त लगाकर किसानों को उन साहूकारों और व्यापारियों से बचाना जो तौल और कीमत में धोखा करते थे। समय के साथ इस व्यवस्था में अपनी समस्याएँ पैदा हुईं: जिस क्षेत्र की सेवा करनी थी उसके लिए बहुत कम मंडियाँ, व्यापारियों और कमीशन एजेंटों के एक छोटे घेरे के पास लाइसेंस, लागत बढ़ाने वाले मंडी शुल्क और अन्य प्रभार, और ऐसे नियम जो प्रायः किसानों को अधिसूचित प्रांगण के बाहर बेचने से रोकते थे। मंडी से दूर रहने वाला किसान अक्सर गाँव के द्वार पर ही किसी व्यापारी को कम कीमत पर बेच देता था।

क्योंकि बाज़ार राज्य का विषय है, केंद्र ने इनमें सुधार अधिकतर समझा-बुझाकर किए हैं। उसने 2003 में एक आदर्श एपीएमसी अधिनियम भेजा, जिसमें निजी बाज़ार, किसानों से सीधी खरीद और संविदा खेती की अनुमति थी, और 2017 में एक अधिक व्यापक आदर्श कृषि उपज और पशुधन विपणन (संवर्धन और सुविधा) अधिनियम, जिसने पूरे राज्य को एक बाज़ार मानने का प्रस्ताव किया। अप्रैल 2016 में उसने ई-नाम, राष्ट्रीय कृषि बाज़ार, शुरू किया, एक ऑनलाइन व्यापार मंच जो मंडियों को जोड़ता है ताकि एक जगह का खरीदार दूसरी जगह की उपज पर बोली लगा सके; लघु कृषक कृषि-व्यापार संघ इसकी प्रमुख एजेंसी है। 2020 में संसद आगे बढ़ी और तीन कृषि कानून पारित किए जिन्होंने राज्य शुल्क के बिना एपीएमसी प्रांगणों के बाहर व्यापार की अनुमति दी, संविदा खेती का ढाँचा बनाया और भंडारण सीमाएँ ढीली कीं। मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसानों के लगातार विरोध के बीच, उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2021 में इन कानूनों पर रोक लगाई और कृषि कानून निरसन अधिनियम, 2021 से इन्हें निरस्त कर दिया गया।

कृषि बाज़ारों पर एक और नियंत्रण आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 है। यह केंद्र को, जो सामान्यतः यह शक्ति राज्यों को सौंप देता है, उन वस्तुओं के उत्पादन, आपूर्ति, वितरण और व्यापार को नियंत्रित करने का अधिकार देता है जिन्हें वह आवश्यक घोषित करे, जैसे अनाज, दालें, खाद्य तेल और प्याज़। इसका सबसे प्रसिद्ध साधन भंडारण सीमा है, यानी कोई व्यापारी कितना माल रख सकता है उसकी अधिकतम सीमा, जिसका प्रयोग कीमतें उछलने पर जमाखोरी से लड़ने के लिए होता है। आलोचक कहते हैं कि बार-बार की भंडारण सीमाएँ गोदामों और शीत भंडारों में निजी निवेश को हतोत्साहित करती हैं, क्योंकि भरपूर फ़सल के समय व्यापारी फ़सल को भंडारित करने की योजना नहीं बना सकते। आवश्यक वस्तु (संशोधन) अधिनियम, 2020, जो तीन कृषि कानूनों में से एक था, अधिकांश कृषि उपज पर भंडारण सीमा केवल असाधारण स्थितियों में या कीमतों में तेज़ वृद्धि के बाद लगाने की अनुमति देता था; यह 2021 में अन्य कानूनों के साथ निरस्त कर दिया गया, इसलिए 1955 का अधिनियम फिर से अपने पुराने रूप में लागू है।

इस भाग के टुकड़े मिलकर एक श्रृंखला बनाते हैं। कृषि लागत और मूल्य आयोग सिफ़ारिश करता है और मंत्रिमंडल न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करता है; एफ़सीआई और राज्य खरीद के माध्यम से उस कीमत को किसानों के लिए असली पैसे में बदलते हैं; अनाज बफ़र स्टॉक बनता है जो राशन व्यवस्था को चलाता है और कीमतें स्थिर रखता है; और कृषि उपज मंडी समिति प्रांगणों, ई-नाम और आवश्यक वस्तु अधिनियम के नियम उस सब का भाग्य तय करते हैं जो सरकार नहीं खरीदती। यह श्रृंखला गेहूँ और चावल के लिए मज़बूती से और अधिकांश अन्य फ़सलों के लिए कमज़ोरी से काम करती है, इसीलिए पीएम-आशा जैसी योजनाएँ, बाज़ार सुधार और कानूनी एमएसपी की माँग जीवंत मुद्दे बने हुए हैं। भाग 2 खरीदे गए अनाज के पीछे सार्वजनिक वितरण प्रणाली और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम, 2013 तक जाता है।

परीक्षा में ध्यान दें

पुनरावृत्ति

अभ्यास प्रश्न

Q1. भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) के संदर्भ में, निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. एमएसपी कृषि लागत और मूल्य आयोग तय करता है और यह निजी व्यापारियों पर बाध्यकारी है।
  2. एमएसपी सीएसीपी की सिफ़ारिश पर सरकार घोषित करती है और इसका कोई वैधानिक आधार नहीं है।
  3. एमएसपी केवल गेहूँ और धान के लिए घोषित होता है।
  4. गन्ने का एमएसपी 22 अधिदेशित फ़सलों के भाग के रूप में घोषित होता है।
उत्तर देखें

उत्तर: B. एमएसपी सीएसीपी की सिफ़ारिश पर सरकार घोषित करती है और इसका कोई वैधानिक आधार नहीं है।

सीएसीपी सिफ़ारिश करता है और आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति निर्णय लेती है; कोई कानून एमएसपी को बाध्यकारी नहीं बनाता। सीएसीपी इसे तय नहीं करता और निजी व्यापारी बाध्य नहीं हैं; एमएसपी 22 फ़सलों पर है, केवल गेहूँ और धान पर नहीं; और गन्ने के लिए एमएसपी के स्थान पर उचित और लाभकारी मूल्य है।

Q2. सीएसीपी द्वारा प्रयुक्त लागत अवधारणाओं के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. ए2+एफ़एल लागत में अपनी भूमि का किराया मूल्य शामिल है।
2. एक ही फ़सल के लिए सी2 लागत ए2+एफ़एल लागत से अधिक होती है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: B. केवल 2

कथन 1 गलत है: ए2+एफ़एल चुकाई गई लागत में केवल पारिवारिक श्रम का आरोपित मूल्य जोड़ता है; अपनी भूमि का किराया केवल सी2 में आता है। कथन 2 सही है: सी2 ए2+एफ़एल में अपनी भूमि का किराया और अपनी पूँजी पर ब्याज जोड़ता है, इसलिए यह अधिक होता है। इसलिए 'केवल 1', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q3. 1997-98 में शुरू की गई विकेंद्रीकृत खरीद योजना के अंतर्गत,

  1. एफ़सीआई हर ज़िले में किसानों से सीधे अनाज खरीदता है
  2. निजी व्यापारियों को पीडीएस के लिए एमएसपी पर अनाज खरीदने का लाइसेंस दिया जाता है
  3. भाग लेने वाला राज्य अनाज खरीदता, भंडारित और वितरित करता है, और लागत केंद्र वहन करता है
  4. राज्यों को एमएसपी के ऊपर बोनस देना अनिवार्य है
उत्तर देखें

उत्तर: C. भाग लेने वाला राज्य अनाज खरीदता, भंडारित और वितरित करता है, और लागत केंद्र वहन करता है

विकेंद्रीकृत खरीद में खरीद, भंडारण और वितरण राज्य को सौंपा जाता है, लागत केंद्र वहन करता है और अधिशेष ले लेता है। यह हर ज़िले में एफ़सीआई की खरीद नहीं है (वह केंद्रीकृत खरीद है), यह निजी व्यापारियों को लाइसेंस नहीं देती, और कोई बोनस की शर्त नहीं लगाती।

Q4. योजनाओं का उनकी विशेषताओं से मिलान कीजिए:
A. मूल्य समर्थन योजना — 1. किसानों को एमएसपी और बाज़ार कीमत का अंतर चुकाती है
B. मूल्य न्यूनता भुगतान योजना — 2. एफ़सीआई अधिशेष अनाज थोक खरीदारों को बेचता है
C. खुला बाज़ार बिक्री योजना (घरेलू) — 3. मंडियों को जोड़ने वाला ऑनलाइन मंच
D. ई-नाम — 4. एमएसपी पर दलहन, तिलहन और खोपरा की भौतिक खरीद
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. A-4, B-1, C-2, D-3
  2. A-1, B-4, C-2, D-3
  3. A-4, B-2, C-1, D-3
  4. A-2, B-1, C-4, D-3
उत्तर देखें

उत्तर: A. A-4, B-1, C-2, D-3

मूल्य समर्थन योजना एमएसपी पर दलहन, तिलहन और खोपरा खरीदती है; मूल्य न्यूनता भुगतान योजना बिना खरीदे कीमत का अंतर चुकाती है; ओएमएसएस (डी) एफ़सीआई का अधिशेष अनाज बेचती है; और ई-नाम मंडियों को जोड़ने वाला ऑनलाइन बाज़ार है। बाकी कूट इनमें से कम से कम दो को बदल देते हैं।

Q5. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. कृषि तथा 'बाज़ार और मेले' सातवीं अनुसूची की राज्य सूची के विषय हैं।
2. 2003 का आदर्श एपीएमसी अधिनियम सभी राज्यों पर बाध्यकारी एक केंद्रीय कानून था।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: A. केवल 1

कथन 1 सही है: दोनों राज्य सूची की प्रविष्टियाँ हैं, इसीलिए राज्य एपीएमसी कानून बनाते हैं। कथन 2 गलत है: आदर्श अधिनियम एक प्रारूप था जो केंद्र ने राज्यों को अपनी इच्छा से अपनाने के लिए भेजा, संसद द्वारा पारित कानून नहीं। इसलिए 'केवल 2', 'दोनों' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q6. न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफ़ारिश करते समय कृषि लागत और मूल्य आयोग निम्नलिखित में से किसे ध्यान में रखता है?
1. उत्पादन लागत
2. फ़सलों के बीच मूल्य समता
3. कृषि और गैर-कृषि के बीच व्यापार की शर्तें
4. उपभोक्ताओं पर संभावित प्रभाव
नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

  1. केवल 1 और 2
  2. केवल 1, 3 और 4
  3. केवल 2, 3 और 4
  4. 1, 2, 3 और 4
उत्तर देखें

उत्तर: D. 1, 2, 3 और 4

सीएसीपी माँग और आपूर्ति तथा घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कीमतों के रुझानों के साथ इन चारों को ध्यान में रखता है। बाकी हर विकल्प कम से कम एक ऐसा कारक छोड़ देता है जिस पर आयोग विचार करता है, इसलिए वे गलत हैं।

Q7. भारतीय खाद्य निगम के बारे में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
1. इसकी स्थापना खाद्य निगम अधिनियम, 1964 के अंतर्गत हुई।
2. यह खुला बाज़ार बिक्री योजना (घरेलू) के अंतर्गत अधिशेष गेहूँ थोक खरीदारों को बेचता है।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

  1. केवल 1
  2. केवल 2
  3. 1 और 2 दोनों
  4. न तो 1 और न ही 2
उत्तर देखें

उत्तर: C. 1 और 2 दोनों

दोनों सही हैं: एफ़सीआई 1964 के अधिनियम के अंतर्गत 1965 में बना, और यह कीमतें ठंडी करने के लिए ओएमएसएस (घरेलू) से अधिशेष भंडार जारी करता है। इसलिए 'केवल 1', 'केवल 2' और 'कोई नहीं' गलत हैं।

Q8. 2020 के कृषि कानूनों के बारे में निम्नलिखित में से कौन-सा कथन सही है?

  1. इन्होंने सभी 22 अधिदेशित फ़सलों के एमएसपी को वैधानिक आधार दिया।
  2. इनमें आवश्यक वस्तु अधिनियम का एक संशोधन शामिल था और ये 2021 में निरस्त कर दिए गए।
  3. इन्होंने ई-नाम समाप्त कर उसके स्थान पर निजी बाज़ार बनाए।
  4. उच्चतम न्यायालय ने इन्हें असंवैधानिक घोषित कर रद्द किया।
उत्तर देखें

उत्तर: B. इनमें आवश्यक वस्तु अधिनियम का एक संशोधन शामिल था और ये 2021 में निरस्त कर दिए गए।

तीन कानूनों में से एक ने आवश्यक वस्तु अधिनियम में संशोधन किया, और तीनों कृषि कानून निरसन अधिनियम, 2021 से निरस्त हुए। इन्होंने एमएसपी को वैधानिक नहीं बनाया, ई-नाम समाप्त नहीं किया, और उच्चतम न्यायालय ने जनवरी 2021 में केवल इन पर रोक लगाई; इन्हें रद्द नहीं किया।

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